बुधवार, 30 नवंबर 2011

SAFAR - II

पहाड़गंज एक ऐसी जगह , जहाँ सब कुछ था /गरीबी और लाचारी में रहते हुए लोग , पुल के नीचे बैठे चरसी , जिसे कोई कानून, पता नही क्यूँ किसी सुधर गृह नहीं भेजता था , और जिसे देख के ये एहसास होता के क्यूँ केवल भारत की लाचारी और बेबसी की ही तस्वीरे दिखाते हैं विदेशी लोग / इसलिए के कानून और व्यवस्था  बड़े बड़े काम करती और ये सब तो उनके लिए छोटी बात थी / उस जगह खाना 20 rs का भी मिल जाता और 200 का भी / अर्थात , मिला जुला समाज था वहां का, हर तरीके के लोग थे / मेरी जिससे भी बात होती , मैं अपने टोन पर विशेष ध्यान रखता , और कुछ नये शब्द सीखने की कोशिश करता / मैं अलग अलग प्रान्तों के लोगों से मिलकर उनके संस्कार विचार इत्यादि का अवलोकन करता / हमारा कार्यालय पहले तल्ले पे था , और नीचे एक चाय की दुकान थी /वहां मेरा बैठना होता सुबह शाम / चाय वाले अंकल जी बाहर से थे कही से , वो मुझे हरियाणवी समझते थे / क्यूँ की दिल्ली की भाषा मिली जुली थी और बोलने के प्रयास में , हरयाणवी का असर मेरी टोन में अधिक था /मेरे सामने ही वो बिहारियों का मजाक उड़ाते और मैं उनकी तरफ देख के हँसता/

मैंने वहां ऑफिस की व्यवस्था देखि , बिलकुल लचर व्यवस्था थी, किसी भी चीज़ का कोई रिकॉर्ड नही / 2 रूपए की कॉपी में , हिसाब लिखा हुआ था , जैसे किसी बच्चे के maths की नोट बुक हो / खैर मैंने चीजों को सही करना शुरू किया ,stationary वगैरह ला के / वहां के मेनेजर साहब , बड़े ही उदास , शांत और आलसी टाइप चीज़ लगे मुझे / मैंने उनको ज्ञान दिया , वो चुप चाप सुनता रहा . न तो हाँ बोला और न ही ना / मुझे दाल में कुछ काला नज़र आया / विशेष रूप से पूछने पर पता चला के , उसकी शिकायत ये है की उसकी तनख्वाह बहुत कम है / लेकिन मैं इस जवाब से संतुष्ट नही हुआ , वो कुछ छुपा रहा था /  शाम के वक़्त पता चला के ये ऑफिस तो शाम को , वहां के लोगों के लिए शराब पीने का अड्डा था / मुझे गुस्सा तो बहुत आया मगर , मैं भी यही चाहता था के मेनेजर साहब शराब पी लें और फिर असलियत बयाँ करें / मुझे तो वैसे ही सब सम्मान दे रहे थे , मेनेजर साहब ने बता दिया होगा उन्हें पहले से ही / उनलोगों ने दबाव डाला और मैंने हामी भर दी, मेरे लिए भी गिलास भर दिया गया / वहां मनोरंजन हुआ , मैंने गाने भी सुनाये , और अपने विचार भी ,सबने मजे किये / महफ़िल उठ गयी / सब के जाने के बाद मैंने , मेनेजर साहब से फिर से बात छेड़ी, उसने सिर्फ इतना ही कहा के वो मजबूरी में काम कर रहा है, और मुझे जल्द ही सब पता चल जायेगा / मैंने बहुत कोशिश की मगर असली बात पता नही चली / अगले दिन मैं वहां के कुछ offices में गया और कुछ clients बनाये / मुझे यही नही पता चलता था के मेनेजर साहब दिन भर गायब कहाँ रहते हैं??? मेरा दो दिनों बाद का टिकट हो गया , और उसी दिन मुझे सारे गोरखधंधे का पता चल गया / दरअसल ये co कुरियर co के आड़ में स्मगलिंग करती थी , इलेक्ट्रोनिक्स का / मेरे पाँव तले की ज़मीं खिसक गयी , मुझे मेनेजर साहब ने बताया के बहुत लम्बा खेल होता है/ माल चीन से आता और रेलवे के द्वारा , पटना और फिर वहां से , अलग अलग जगहों पर जाता / मेरे साथ ये तीसरा धोखा था /मैं दिखने में भोला भला और अछे खानदान का लगता था इसलिए मुझे इस कम के लिए चुना गया था / मैंने इस बार , इनको सबक सिखाने की सोंची , और पूरा मामला और खेल क्या है , समझने के लिए तैयार हो गया /

अगले दिन मेनेजर साहब मुझे पहाड़ गंज से करीब एक किलोमीटर आगे ले गये , रेलवे ट्रैक के किनारे किनारे / जहाँ हम रुके शायद वहां ट्रेन की सफाई वगैरह की जाती थी / वहां एक ट्रेन का इंजन लगा था , मेनेजर साहब ने ड्राईवर से मेरी बात करवाई , जान पहचान के बाद उन्होंने मुझे नियत समय आने को बोल दिया / मुझे धीरे धीरे खेल समझ में आ रहा था / शाम को मेनेजर साहब दो बड़े बड़े बैग ले कर आये और मुझसे कहा के , यही ले जाना है , कोई दिक्कत नही होगी , ड्राईवर खुद लेके जायेगा engine में रख कर / मैंने रात को पुरे सामान को चेक किया , कही इलेक्ट्रोनिक्स के नाम पे कुछ और तो नही / मगर उसमे कुछ भी नहीं निकला , केवल automatic कैमरों से भरे थे  दोनों बैग / दरअसल ये टैक्स की चोरी थी , ये गोरखधंधा करते थे ये लोग / खैर मैं नियत समय पर बैग ले कर ड्राईवर को दे आया / वापस स्टेशन आकर ट्रेन पकड़ी , जिसके engine में वो सामान रखा था / पटना पहुँचने के बाद मैं सीधा ऑफिस पहुंचा , और किसी को कुछ भी ऐसा नही कहा जिससे ये शक हो के मुझे ये गैर कानूनी काम अच्छा नही लगा / शाम के वक़्त मैंने police control रूम में फ़ोन किया , और बताया के क्या गोरखधंधा चल रहा है / मेरे इस प्रयास का कोई फायेदा मुझे अगले दिन दिखाई नही दिया / शायद सब पहले से ही तय था / मैंने ऑफिस पहुँच कर नौकरी छोड़ने की बात की , उन्होंने कई तरह का लालच दिया मुझे मगर ,मैंने वो नौकरी भी छोड़ दी /


फिर से एक सप्ताह के करीब का ब्रेक लग गया , और फिर वही दोस्तों के साथ मस्ती  और कॉलेज किया मैंने / दिमाग में बस एक चीज़ चलती के , क्या दुनिया है ये, सभी सब का केवल इस्तेमाल करना जानते हैं बस / स्वार्थी दुनिया है ये और जिसके पास अपना धन नही वो किसी कम का नही इस दुनियां में / एक दिन अचानक मेरे सबसे पहले ऑफिस से एक व्यक्ति मेरे घर आया , और बताया के मुझे मालिक ने बुलाया है / मेरी समझ में कुछ आया नही / बाद में पता चला के वो मुझे दुबारा नौकरी पर रखना चाहते थे , दरअसल उन्हें कोई काम मिला था , जिसमे 24 hrs में दिल्ली में document डेलिवर करने थे , और सारे highly confidential थे / उन्हें मुझपर अब भी विश्वास था , मुझे ये जान कर ख़ुशी हुई / लेकिन काम ये अलग तरीके का था , शाम की ट्रेन से दिल्ली जाना था, अगले दिन दिल्ली पहुँच के , documents deliver करने थे , और फिर शाम को ट्रेन पकड़ कर वापस आना था / पैसों की कमाई तो थी , मगर मेहनत बहुत थी /मैंने तय किया , कुछ न करने से कुछ करना अच्छा है ,मैंने हामी भर दी / अब सिलसिला शुरू हुआ , हर दिन दिल्ली पटना करने का / दिल्ली के बहुत सारे स्थान से परिचित हुआ , क्यूँ की document भी मुझे खुद ही ले जाना होता था / मेरा दुनिया को देखने का , समझने का नजरिया भी बदला / मगर इन सब के बीच मैं बहुत थक जाता , रोज़ ट्रेन में सफ़र आसान काम नही था / करीब एक महीने हो गये थे लगातार ऐसा ही करते करते , मैं अब किसी दुसरे विकल्प की तलाश में था /


उधर घर की हालत में कोई विशेष सुधार नही था / वैसा ही था सबकुछ/ दोनों बहने बड़ी हो रही थी और उनकी डिमांड भी / क्यूँ की उनकी पढाई का खर्च भी बढ़ रहा था / महंगाई भी बढ़ रही थी , उस हिसाब से मेरी कमाई नही / किसी भी तकनिकी पढाई के लिए न मेरे पास समय था , न ही पैसा / मुझे elcetronics से लगाव था / मैं इसमें कुछ करना चाहता था ,मगर मजबूरी थी / मैं ये नही चाहता था के , मेरे जैसी दिक्कत मेरी बहनों को आये , इसलिए मैं बस पैसे कमाना चाहता था / मेरा सपना अब बदल चुका था ,क्यूँ की मुझे पता था के मेरे पास समय नही है पढने का / मुझे किसी अच्छे से मौके की तलाश थी , दिक्कत ये थी के , मैंने अभी इंटर भी पास नही किया था / वैसे मैं फॉर्म भरता रहता , मगर कई बार व्यस्तता अथवा पैसों के अभाव में नही जा पता था परीक्षा के लिए / कई परीक्षाएं दी भी मगर बात नही बनी / एक दिन मैंने अपने को गौर से आइने में देखा , आँखों में ऑंखें डाल के , लगातार / उस रात मैंने सोंचा के मेरे पास कस्टमर्स भी हैं और काम कैसे करना है इसका तरीका भी / क्यूँ न मैं अपना काम खुद शुरू कर दूँ /ये विचार आते ही मेरी आँखों में चमक आ गयी / मैं  रात भर यही प्लानिंग करता रहा के सुबह मुझे किस प्रकार इसे अंजाम देना है / सुबह मैं अपने दो चार कस्टमर्स  के पास गया , वो ऐसे कस्टमर्स थे जिन्हें  मेरे ऊपर पूरा भरोसा था / मैं किस कंपनी से उनका काम करूं इनसे उन्हें कोई मतलब नही था ,मतलब बस ये था के काम मैं कर रहा हूँ / उन्होंने मुझे आश्वाशन दे दिया , मेरा साथ देने का / अब मैं अपने courier मार्केट पहुंचा , और विभिन्न लोगों के साथ बातें की / मैंने लगभग पूरे बिहार और पूरे नोर्थ इंडिया की सेट्टिंग कर ली / दुसरे कंपनी के द्वारा काम करने से बचत तो कम थी , मगर , मेरे लिए काफी थी / जितनी मेहनत , उतना ही फायेदा / शाम को मैं अपने मित्र मंडली के पास पहुंचा और अपना प्लान बताया / सब ने अपने सुझाव दिए और , मुझे प्रोत्साहित भी किया / अगले दिन मैंने अपनी कंपनी का नाम सोंचा , और बिल बुक छपने को दे दिया , नाम रखा "saarc express" / एक sign board बनवाया और अपने घर के बालकोनी में टांग दिया / अपने रूम को मैंने अपना ऑफिस बना लिया / ये सारे खर्च मैंने इधर उधर से जुगाड़ बाजी कर के कर ली / अपने लिए दो ड्रेस और एक executive बैग ख़रीदा / अगले चार दिन बाद , मैंने ओपनिंग कर दी अपने काम की / नौकरी छोड़ दी एक बार फिर से / सुबह तय्यार होके, हाथ में बैग और आँखों में धूप का चश्मा लगा कर , निकल पड़ा नई मंजिलों की ओर/ दोस्तों के अलावा किसी को विश्वास नही था के मैं इस प्रकार कुछ कर पाउँगा, मगर मुझे अपने आप पर पूरा भरोसा था / मेरे जितने भी कस्टमर्स थे , सब ने पहले मुझे लोकल पटना के documents से try किया / पहले दिन ही मुझे लगभग 100 docs  मिले , मतलब २०० रूपए का काम / अगले दिन से मेरी दिन चर्या यही बन गयी ,सुबह 8 :30 में घर से डोक्स लेके निकलना , और शाम तक उसे बाँटना , फिर शाम में अगले दिन के लिए डोक्स बुक करना , और अगले दिन फिर वही / मैं रोज़ लगभग 20-25 किलोमीटर पैदल चलता / मगर न तो अपनी चाल काम होने देता , न अपनी presentation / जहाँ भी मैं डोक्स लेकर जाता , अपनी कंपनी के बारे में बताता / मैं बिना किसी  registration और किसी भी कानूनी कार्यवाही  के कंपनी चला रहा था/ मैंने कभी टैक्स भी नही दिया था / लेकिन बिहार की अवस्था ऐसी थी के सब चलता था / मेरी मेहनत धीरे धीरे रंग लायी , और मुझे आउट स्टेशन का भी काम मिलने लगा / मैं अपने को ओफिसेस में इस तरह प्रस्तुत करता , के मेरी वाक् पटुता के कारण मुझे कुछ न कुछ काम मिल ही जाता / मेरा काम बढ़ गया था , और लोकल पटना के डोक्स भी ज्यादा होते जा रहे थे , जिन्हें मैं अकेला संभाल नहीं पा रहा था / एक और वजह थी, मैं साइकिल से ज्यादा पैदल ही चल के जाना पसंद करता कही भी , या  फिर ऑटो से / मैंने अपने दो साथियों  को अपने साथ जोड़ लिया , उन्हें भी पार्ट टाइम कुछ डोक्स डेलिवर करने को देता / उनकी भी कुछ कमाई हो जाती / पहले महीने मैंने लगभग 6 हज़ार की कमाई की / जो मेरे लिये एक अच्छी कमाई थी , उस वक़्त ये एक अच्छी रकम भी थी / मैंने सबसे पहले जरुरत का सामान ,बच्चों के कपडे वगैरह , माँ के लिए साडी इत्यादि खरीदी / मैं खुश था , क्यूँ की एक तो अपना काम था दूसरा मुझे धोखा  भी नहीं दे सकता था अब कोई , सिवाए किस्मत के /  मार्केट में भी ये बात फ़ैल चुकी थी के , मैंने अपना काम कर लिया है / मेरा काम बढ़ता जा रहा था , लेकिन आश्चर्य तो ये था , के पटना के अलवा मेरा कहीं भी ब्रांच नही था , फिर भी मैं पूरे इंडिया के डोक्स को डेलिवर करवा देता था, समय से / दरअसल मैं जितने में डोक्स बुक करता , आधे पैसे में उन agencies को दे देता जिनका वहां ब्रांच हो / आधे पैसे उसके , आधे मेरे / इसी तरह काम चल रहा था / लगभग तीन महीने में मेरे पास 15 से ज्यादा कस्टमर्स हो गये / मेरे कपडे , स्टाइल सब बदल चुके थे , मैं अपने को बिज़नस मैन के लुक में रखने की कोशिश करता , बातें professional करता / मैंने कई कोरिअर वालों के कस्टमर्स को तोडा था , और उनके लिए खतरा बन रहा था / मैं था तो असलियत में झोला चाप ही / सारा ऑफिस तो मेरे बैग में ही था , मैं खुद ही ऑफिस था / धीरे धीरे courier वालों ने मेरा काम बंद करने के लिए मेरे डोक्स को लेट करना शुरू कर दिया / मेरे समझ में बात आने लगी थी /मुझे कहीं से ये भी सुनने को मिला के कुछ लोग मेरे घर पर छापा मरवाना चाहते हैं ताके registration एक्ट के तहत मेरा काम बंद करवा सकें /  इससे पहले के मार्केट में और कस्टमर्स में मेरी बदनामी होती , मुझे अपना काम बंद करना पड़ा / क्यूँ की मैं रिश्ते ख़राब नही करना चाहता था , किसी और काम का अनुभव भी तो नहीं था मेरे पास / मैंने ये रिश्ता आगे के लिए बना कर रखा /


एक बार फिर मैं बिना काम का हो चुका था / पिछले तीन महीनो में , मैंने बहुत कुछ किया था , घर को पूरा संभाला था , लेकिन मैं फिर से वही पहुँच गया / मैं बार बार नाकाम हो रहा था, कहीं भी सही दिशा नही मिल रही थी , फिर भी मैं डटा हुआ था , कोशिश जारी थी /  मैं अंतर मंथन रोज़ ही करता , स्थितियों का अवलोकन करना और अगला कदम लेना , सब खुद सोंचना पड़ता / जब आदमी के पास पैसों की कमी होती है, तो सब साथ छोड़ देते हैं / पिछले 8 सालों से यही देख रहा था / जो रिश्तेदार मेरे घर आके , महीनो रह कर , अपना काम यहाँ करके जाते , आज झांक कर देखने तक नही आते थे / संपर्क करने पर , हमें देखते हीं खुद का रोना ले कर बैठ जाते ताके हम कोई डिमांड न कर दें उनसे / बड़ी अजीब सी स्थिति थी , सारा कुछ खुद ही करना पड़ता, कोई दिशा निर्देश देने वाला भी नहीं था / इसी बीच मैंने अपना फर्स्ट इयर पूरा किया /

इसी तरह मैंने दो और कुरिएर कंपनी में लगभग 6 महीने और काम किया , लेकिन मैं संतुष्ट नही था /इसके बाद  जीवन का एक नया मोड़ आया / एक नए तरह का काम , वो था , एक होटल में मेनेजर का / दरअसल उस होटल के मालिक मेरे पिता जी के शिष्य थे / बातों बातों में उन्होंने पिता जी से मेरे बारे में पूछा और मुझे बुलवाया / मुझे रात्रि में मेनेजर की ड्यूटी मिल गयी / हालांके जितनी कमाई मैं खुद कर लेता था अपने काम में , उतनी तनख्वाह नही थी , फिर भी नए तरीके के काम के लिए मैंने हामी भर दी / वो होटल स्टेशन के पास था , और कस्टमर्स का आना जाना लगा रहता / मैं करीब एक सप्ताह में पूरा काम सीख गया / मेरी ड्यूटी रात्रि के आठ बजे से सुबह के आठ बजे तक थी / वहां मेहमान नवाजी ही सबसे महत्व पूर्ण थी / मैंने वहां भी अपने ढंग से चीजों को बदलना शुरू किया / मैं रात को हर दो घंटे पे round लगाता / कस्टमर्स के फ़ोन पर तुरंत reaction देता / अगर कोई वेटर लेट करता तो उसे कड़ाई से उसके काम और ज़िम्मेवारियों के बारे में बताता / धीरे धीरे मैं वहां भी सबका चहेता बनता जा रहा था / वहां एक और अच्छी बात थी के  , वहां कस्टमर्स अक्सर official  काम से आते और , बिल की रकम बढ़ा के बनवाते , बढ़ी हुई रकम का 50 % मेनेजर का होता /मेरी कमाई भी हो रही थी वहां /

एक दिन मुझे पता चला के वेटर अकेले क्यूँ नही जाते हैं रात को round  लगाने / दरअसल उस होटल में एक क़त्ल हो चुका था / किसी कस्टमर ने किसी महिला का क़त्ल कर दिया था , और लाश कई दिनों तक बाथरूम में ही रही थी , बेदर्दी से काट के हत्या की गयी थी / पूरे होटल के स्टाफ के बीच ये अफवाह थी के , यहाँ उसकी आत्मा भटकती है / दरवाजे पे तंत्र मंत्र का भी कुछ टंगा हुआ था / मालिक ने भी इस बात की पुष्टि की , मगर , मैं न तो भगवान को मानता था , न ही भूत को / मैं बेधड़क अपना काम कर रहा था / मेरे इस तरह सबका ख्याल रखने के कारण मालिक भी खुश थे और कस्टमर्स भी / वहां कुछ ही दिनों में कस्टमर्स से इतना घुल मिल गया के वो अक्सर मुझे अपने पास बुला लेते / अपनी बातों को शेयर करते , मुझसे भी मेरे बारे में जानते / मेरी कहानी सुन के मुझे आश्वाशन देते की , मेरे अन्दर कुछ बात है और एक दिन मैं नाम करूँगा / ऐसे कस्टमर्स की संख्या बढती जा रही थी / वो जाते जाते अलग से मुझे टिप भी देते / कुछ ही दिनों में मेरी उपरी कमाई रोज़ की 500 के लगभग होने लगी , कभी कभी हज़ार की भी हो जाती / मैं वहां अपनी पहचान बना चुका था / सब अच्छा होने लगा था / कमाई हो रही थी तो मैंने अपने लिए एक स्टील plated नई साइकिल खरीदी / वो मेरे अपने पैसों की खरीदी हुई थी / संगीत के शौक को पूरा करने के लिए डेक ख़रीदा / अब मैं घर का सारा खर्च उठा रहा था , और सबकी जरूरतों को पूरा भी कर रहा था / मगर इनसब अच्छी अच्छी चीजों में एक बुरी चीज़ भी हो रही थी / अक्सर कस्टमर्स के दिल जीतने के लिए उनके साथ शराब पीनी पड़ती / क्यूँ की शराब ही वो चीज़ थी जिसके बाद कस्टमर भावनाओ को व्यक्त करता और मैं उसका अपने हिसाब से उत्तर देता , या सम्बंधित कोई गाना वगैरह सुनाता, और बदले में जाते जाते मोटी टिप मिलती मुझे  / मुझे ये अहसास था , और इसलिए मेरी कमाई भी रोज़ ब  रोज़ बढ़ रही थी /अब मैं लगभग रोज़ शराब पीता , और रात्रि की ड्यूटी भी देता / घर में भी किसी को पता नही चलता / सब मजे में चल रहा था / मैंने लगभग १० हज़ार रूपए डेढ़ महीने में इक्कठा कर लिया था / मगर घर में किसी को इस बात का पता नही था / माँ कभी कभी पूछती थी , के इतना पैसा कहाँ से आ रहा है , उसे शक सा होता मेरे पे / मगर मैंने बता दिया के कस्टमर्स कैसे बिल बनवाते हैं और कैसे टिप देके जाते हैं / मगर मेरी इतनी कमाई है, उसे विश्वास नही होता इसलिए मैंने विशेष कुछ बताया नही / होली बहुत ही अच्छे से मनी / सबके लिए कपडे वगैरह लिए / कुछ राहत मिली मुझे , मैं और पैसे इक्कठे करना चाहता था , और कुरिएर की agency लेना चाहता था और लीगल रूप से काम करना चाहता था / मैंने लगभग 6 महीने में 25 रूपए जोड़ लिए / चुकीं मैं अभी काम कर ही रहा था , मैंने इसे किसी और धंधे में इन्वेस्ट करने का सोंचा ताकि मैं अपने पैसों को बढ़ा सकूँ / मेरा एक मित्र नोर्थ बिहार में पोस्ट ऑफिस डिपार्टमेंट में stationary supply करता था / वो ठेके पे काम लेता टेंडर भरता और सेट्टिंग से पास भी करवा लेता / उसने भरोसा दिया के 25 हज़ार का तीन महीने में लगभग 30 - 35 हज़ार बन सकता है अगर किस्मत ने साथ दिया तो / मैंने कई और मित्रों और मेरे से उम्र में बड़े मित्रों से सलाह लिया / उन्होंने भी कहा के कोई दिक्कत नही है इसके साथ काम करने में / मैंने अपनी सारी बचत अपने मित्र के धंधे में लगा दी /

उधर होटल में एक दिन एक घटना हुई / मुझे शक हुआ के मालिक के लड़के वहां दोस्तों के साथ कुछ गड़बड़ करते हैं / वेटर से पता चला के जिस दिन मैं आता नही वहां लड़की वगैरह ले के आते थे वो लोग / मुझे इससे कोई मतलब तो नही था , मगर एक दिन मेरे रहते उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की , जो मैंने नही होने दी / उसी दिन से , उनका व्यवहार मेरे प्रति बदल गया / मैं उनकी आँखों का कांटा बन गया था / मगर मैं अपने काम से मालिक,  स्टाफ और कस्टमर्स का दिल जीत चुका था / उन्हें मुझ पर हावी होने का कोई मौका नही मिल पा रहा था / सन्डे को मेरी छुट्टी हुआ करती थी , अगले दिन सुबह ही मालिक ने मुझे बुलाया / मुझसे पूछा के शनिवार को कौन कौन आया था , और drawer (जिसमे पैसे रखे होते थे ) किसने किसने खोला था / मैंने कहा के चाबी तो केवल आपके पास रहती है , फिर और कौन खोल सकता है ? मैंने पूछा के बात क्या है , पूछने पर पता चला के , लगभग 50 हज़ार रूपए के आस पास चोरी हुए हैं वहां से / मेरा तो दिमाग घूम गया / मैं वहां थोड़ी देर रहा और मालिक को होने वाली घटनाओ के बारे में सब बता दिया / मुझे जाने की आज्ञा मिल गयी / रास्ते में मेरी समझ में आ गया के ये सब खेल केवल मुझे हटाने के लिए था , और किसने किया होगा ये / शाम को मैं गया ड्यूटी पर , रात को मेरी बहुत बहस हुई मालिक के लड़कों के साथ , उन्होंने मार पीट की भी कोशिश की , मगर स्टाफ के बीच बचाओ के कारण मामला शांत हो गया / वो सभी बड़े बाप के बिगडैल बेटे थे , वहां काम करना अब उचित नही था / मैंने वो नौकरी भी छोड़ दी /


मैंने अपना  ध्यान कुछ दिन stationary वाले काम पर देने की सोंची / मैं उसी काम में जुट गया , कैसे काम होता है सीखने लगा / पहले महीने मुझे अच्छी आमदनी हुई / मैंने कुछ दवा वगैरह का भी काम किया , और छोटे छोटे ऑफिस में stationary supply भी की /दो महीनो तक सब ठीक चलता रहा , मगर 2 महीनो के बाद , मेरे मित्र के नियत में खोट आने लगी / वो मुझे टालने लगा / पैसे कमाने का जरिया केवल वही एक धंधा था , उसकी नियत मुझे अच्छी नही लगी / मैंने अपने पैसे वापस मांगे , मगर कई लोगों को बुला कर , उसने तय कर दिया के वो मेरे पैसे हर महीने के हिसाब से , 4 महीनो में देगा / मेरी पूंजी टूट चुकी थी , और एक बार फिर से मुझे नौकरी करने की आवश्यकता थी / क्यूँ कि चार महीनो का समय ले लिया था उसने और मैं बेकार बैठा था / चूँकि मैं कॉमर्स से था , मुझे एक जगह पार्ट टाइम accountant की नौकरी मिल गयी / लगभग चार महीने मैंने वहां कम किया और अपने पैसे निकलने की कोशिश की , जो मेरे मित्र के पास फँस गये थे / कई कई दिन दौड़ना पड़ता उसके पास , 10 दिन दौड़ा कर एक दिन पैसे देता वो , वो भी बड़ी मुश्किल से / उसका व्यवहार बिलकुल बदल गया था मेरे प्रति /

मैं अब 18 साल का हो चुका था / इंटर पास कर चुका था , मगर समय के आभाव के कारण distance education से graduation का दाखिला ले चुका था /मैं बार बार धोखे और नाकामी से मैं तंग आ चुका था / मैं दुखी रहने लगा और उस नाज़ुक सी उम्र में मेरा सहारा बनी शराब / मैं सप्ताह में चार दिन शराब पीता, मेरा ठिकाना था एक बार / मैं जल्द ही उस बार का रोज़ का ग्राहक बन चुका था / उस बार में मैं इस कदर अज़ीज़ बना , के कॉर्नर का टेबल मेरे लिए हमेशा खाली रहता / वजह थी , मेरी सबसे मीठी बोली , चाहे वो वेटर हो या मेनेजर / मुझे एक और आदत लगी वहां , वो थी ग़ज़लों और  शेरों की / उस वक़्त Kumar Shanu की एक album निकली थी जिसका नाम था "नशा "/ उसकी प्रत्येक ग़ज़ल मुझे अच्छी लगती / उस बार में बड़े बड़े तुर्रम खान आते थे , मगर मेरे आते ही, चाहे कोई भी गीत बज रहा हो , वो हटा दिया जाता और" नशा " लगा दिया जाता / ये मेरा डर नहीं , मेरे प्रति वहां के स्टाफ का प्यार था  / स्वयं बार के मालिक , जो कि एक बहुत ही धनि व्यक्ति थे , मुझसे व्यक्तिगत रूप से मिले , और मुझे ज्यादा शराब न पीने की सलाह दी / मगर उन्हें पता था के मैं हमेशा लिमिट में ही रह कर शराब पीता हूँ / मैं धीरे धीरे शराब की चपेट में आता जा रहा था / घर देर से पहुंचना , मेरी आदत बन चुकी थी / मेरे से कोई भी कुछ भी पूछता या समझाने की कोशिश करता तो मैं बहस करता / अपने तर्क को सही करके बताता , सिद्ध करने की कोशिश करता के मैं सही हूँ / परिवार की गलत नीतियों , और गलत निर्णय के कारण मेरा ये हाल है / मेरे लिए किसी ने कुछ नही किया , कुछ नही सोंचा मेरी करियर का / मैं मशीन हूँ और इसे चलने के लिए खुराक चाहिए / घर में टेंशन सी रहने लगी /पापा से भी बहस हो जाती थी कभी कभी , मेरे अन्दर का रावण कभी भी  जाग जाता  था / मैं घर को तो किसी तरह चला रहा था , मगर मेरी बिना मेहनत के पैसे जो मुझे बक्शीश में मिले थे धीरे धीरे ख़त्म होते जा रहे थे / मैं एक नये तरीके का जीवन जी रहा था , जिसे party life बोलूँगा मैं / हर वो क्षण जो आनंद दे मैं उस क्षण को जीता था / कोई भी अवसर शादी विवाह, घुमने फिरने , मौज मस्ती का नही छोड़ता था / मगर जब भी मैं तन्हा होता , हमेशा अपने साथ हो रहे अन्याय से दुखी होता , लगता के इन सब का कारण केवल पैसा है /    मैं अवसाद का शिकार होता जा रहा था / गुस्सा अब इस हद तक बढ़ने लगा के छोटी छोटी बातों पे अपना हाथ दीवाल पर मार देता , या किसी भी चीज़ पे , और तब तक मरता जब तक की खून न निकल जाये / आँखों में हमेशा खून सा तैरता रहता /

एक बार की घटना है , मैं अपने घर का टीवी इत्यादि खुद ही ठीक कर लेता अगर , छोटी मोटी गड़बड़ी हो या बड़ी  / मैंने देख देख से बहुत कुछ सीख लिया था / कई बार ऐसा होता के , किसी अच्छे प्रोग्राम से पहले मैं मेहनत कर के TV को देखने लायक बना देता , मगर अगर वो थोड़ी देर बाद फिर से ख़राब हो जाये तो पिता जी मुझे दोष देते / अकारण ऐसा बोलने से मैं चिढ जाता / मगर फिर कभी , सिस्टर या माँ के कहने पे , फिर से बना देता , मगर पिता जी की ताने मारने की आदत नही जाती थी / एक दिन ऐसा ही हुआ , और मैंने गुस्से में पूरा टीवी उठा के ज़मीन पर पटक दिया / माँ का भी हाल कुछ ऐसा ही था, जब भी मैं उसे परिवार के लिए अपने संघर्ष और बलिदान की दुहाई देता / वो सीधा बोल देती की तूने  कुछ विशेष नही किया , पूरी दुनियां ऐसा करती है / दुनियां ने मेरी मेहनत की तो क़द्र नही की थी मगर , घर में भी यही हाल  देख कर मेरा दिमाग ख़राब हो जाता , मैं बहुत मुश्किल से अपने ऊपर कण्ट्रोल कर पाता / एक दिन घर में मैं और पिता जी अकेले थे , किसी बात पे कहा सुनी हो गयी और मैंने गुस्से  में आकर अपनी जीवन लीला समाप्त करने की ठान ली / रात को सोते समय मैंने नींद की चार पांच गोलियां खायी , और सोने से पहले अपना हाथ ब्लेड से काट डाला ताके बचने का कोई चांस न रहे /रात को करीब 9 बजे के आसपास सोया हूँगा मैं / मगर अगले दिन करीब 9 बजे रात को फिर मेरी आंख खुल गयी / मेरा हाथ चादर और गद्दे से चपका हुआ था , खून वहां जमा हुआ था / सर बहुत ही भारी था और मुझे समझ नही आ रहा था के मैं बच कैसे गया ? धीरे धीरे सब याद आ रहा था , और समझ में भी / नींद की वजह से , मैं सही जगह हाथ नही काट पाया था , मुझे पता भी नही था के कहा काटने से मरते है /नींद की गोलियों के असर के कारण मेरे शरीर का पानी कम हो गया , और खून गाढ़ा, इसलिए मेरा हाथ जहाँ से खून गिर रहा था , चादर और गद्दे से चिपक गया / चादर ने कपडे और गद्दे ने रुई का कम किया और सोते वक़्त , मेरा ज्यादा खून नही निकला , न ही बिस्तर पर ज्यादा फैला / पिता जी सुबह अपने काम पे चले गये और मैं सोता रहा था / इतना गुस्सा था मेरे अन्दर , किसी से भी नहीं डरता था /पहले मैं गुस्से को पी जाता था , मगर अब मैं कभी भी अपने गुस्से को दबा नही पा रहा था / अब अपने आप को आइने में देख कर मैं अपने आप को चिढ़ता नही बल्कि ज्यादा से ज्यादा गुस्से से देखता / मैं पूरी तरह से बर्बाद हो रहा था / मैं उस सब का विरोध करता जो सही नही / अगर ticket window से बिना लाइन के कोई टिकेट  लेने की कोशिश करता तो उसे मेरे गुस्से का सामना करना होता ,  दादा बनने की कोशिश करता तो , लात और घूसों से उसका स्वागत करता , पब्लिक भी मेरे साथ होती / मैं कभी सही काम करने वालों से नही उलझता बल्कि गलत करने और दादा बनने वालों को ढूंढता फिरता /  मैंने इस हद तक ये सब किया के अब जब मुझे याद आता है तो विश्वास नही होता / मुझे दो बातों से बड़ी एलर्जी थी , एक अगर मैं शांति पूर्वक शांत रहने के लिए बोल दूँ , और फिर भी सामने वाला चिल्लाता रहे , दूसरा , जब कोई मेरी मेहनत का कोई मूल्य न लगाए , मैं तारीफ नही चाहता था , मगर ये अहसास भी नही के मैंने कुछ नही किया /

लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी मैंने , किताब पढनी  नही छोड़ी थी / पिता जी के पुराने बक्से से , एक दिन मुझे विवेकानंद की किताब मिली / मैंने इससे पहले कभी उनको नही पढ़ा था / उनके चित्र , और उनकी आँखों को देख कर उनके बारे में जानने का सम्मोहन सा उत्पन्न हो गया / शायद इसकी वजह केवल उनकी ऑंखें थी , या कोई ईश्वरीय प्रेरणा / उस रात मैंने विवेकानंद को पढना शुरू किया , जान कर आश्चर्य हुआ के , वो घोर नास्तिक इन्सान थे पहले , और उस ज़माने के एक बहुत ही पढ़े लिखे विद्यार्थी / मेरी जिज्ञासा और बढ़ गयी / मैंने वो किताब पूरी खत्म कर दी , रात भर पढता रहा / उनके सिद्धांत मुझे काफी पसंद आये / सबसे अच्छी बात मुझे उनका वो प्रसंग लगा के , " अगर तुम्हें भौतिकी का कोई अविष्कार करना है , तो पहले भौतिकी पढनी पड़ेगी , गुरु के सानिध्य में प्रक्टिकल करना पड़ेगा , परिणाम निकलने पड़ेंगे और बार बार असफल होने के बाद सफल प्रयास से ही एक दिन अविष्कार में तुम कामयाब हो सकते हो" / उस पुस्तक ने मेरे ऊपर बहुत ही गहन प्रभाव डाला / अगले ही दिन से मैं गहराई से एक के बाद एक , अध्यात्मिक पुस्तकें पढने लगा , मुझे बड़ी शांति महसूस हुई / लेकिन इश्वर पे विश्वास अभी भी नही जागा था / मैंने रामायण , गीता , ओशो , विवेकानंद , श्री राम शर्मा , इत्यादि को पढ़ा / तुलसी दास जी की एक लाइन जो  मेरे अन्दर कुछ हद तक , इश्वर पर विश्वास जगाने का का कारण बना वो ये था के " किसी भी कार्य में पारंगत होने से पहले उसका ढोंग करना पड़ता है " / मेरी जिज्ञासा अब बढती ही जा रही थी / विवेकानंद और अन्य ने जिस प्रकार सारे जगत , मनुष्य , जन्म मृत्यु , आकाश- वायु , सौरमंडल और उससे भी आगे का वर्णन किया था , मैं उसे महसूस करना चाहता था / मुझे दिन प्रति दिन ये अहसास होने लगा , "तुम अगर इश्वर की तरफ एक कदम बढाओगे तो वो तुम्हारी तरफ दो कदम बढ़ाएगा " , मुझे कोई चुम्बकीये शक्ति प्रेरित कर रही थी  , और चीजों को नियंत्रित भी कर रही थी  / उसी दौरान मुझे एक और पुस्तक जो योग पे थी , और जिसे परम पूज्य डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली ने लिखा था , पढने को मिली / उस पुस्तक ने मेरे जीवन को बदल दिया/उनकी मन्त्रों , तंत्रों , योग , इश्वर , अनुभूति , सम्मोहन , हस्तरेखा इत्यादि की पुस्तकें पढनी शुरू की / मेरे अन्दर एक अद्भुत बदलाव हो रहा था / एक महीने लगभग १० - १० घंटे , मैं इन्हीं सब चीजों को पढता रहा / एक दिन मुझे अहसास हुआ के , मुझे ध्यान करना चाहिए , जिसके फायदे सभी ने बताये थे / मैं ध्यान करने लगा , रात को मैं घंटों ध्यान करता , मेरी मानसिक स्थिति में भी धीरे धीरे सुधार हो रहा था , और ये अनुभूति भी के इश्वर है / मैंने अपने पूर्वजों की कुछ पांडुलिपियों का भी अध्ययन किया , और मुझे ये जान कर घोर आश्चर्य हुआ के , पौराणिक विज्ञान आज के विज्ञान से अधिक सार्थक और अद्भुत था / मेरी जिज्ञासा बढती गयी / मैंने हस्तरेखा , सांख्य ज्योतिष ,पंचांग जो भी मिल रहा था ,सब को पढता और धीरे धीरे मैं उसकी प्रक्टिस करता / मैं बदलने लगा था , इश्वर को जानने की समझने की इक्षा बलवती होती जा रही थी , मगर अभी इश्वर पर विश्वास पूर्ण रूप से नही कर पा रहा था  / कारण शायद यह था के बाकि सभी चीजें वैज्ञानिक थी , और इश्वर एक अनुभूति / मेरा मन अब एक ऐसे स्थान पर जाने के लिए छटपटा रहा था , जहाँ का वातावरण प्राकृतिक हो और मुझे कोई भी तंग करने वाला न हो / मैं इस अद्भुत ज्ञान पे शोध करना चाहता था / लेकिन शहर के वातावरण में ऐसा संभव नही हो पा रहा था /

एक बार फिर से छठ पूजा आ गयी , और मेरा जाना अपने ननिहाल में हुआ / मेरे मामा जी देवी के भक्त थे , और नाना जी प्रकांड पंडित , मगर नाना जी ने कभी भी अपना नाम को जग के आगे जाहिर नही किया , न ही अपने ज्ञान को / मैंने मामा जी से कुछ जानकारियां ली , अपने मनो भाव को बताया / उन्होंने बहुत कुछ बताया मुझे , अनुभव , कर्म कांड , इत्यादि /वहां प्राकृतिक वातावरण में रह कर मैंने अपने ऊपर ज्योतिषिये प्रयोग किये और मुझे ज्ञात हुआ के मेरे ऊपर 22 वे वर्ष मृत्यु तुल्य कष्ट है , या फिर मृत्यु ही / पहले जो एक बार मैं प्रयास कर चुका था वो भी सामने में आया / मैंने उसी वक़्त से प्रयोग के तौर पे , महा मृत्युंजय मंत्र का मानसिक जाप करता / कुछ ही दिनों में ऐसी आदत हो गयी के , मैं जब कोई और काम भी कर रहा होता , मेरे दिमाग में अपने आप वो मंत्र चलता रहता /

छठ पूजा में ही मेरे मौसी के लड़के का आना हुआ था  , जिसने मुझे ये बताया के sulabh international में जॉब के लिए कुछ रिक्तियां निकली हैं / ये संस्था श्री विन्द्वेश्वर पाठक जी की थी , जो एक प्रसिद्द समाज सेवी हैं / उन्होंने देश से मैला ढ़ोने की प्रथा समाप्त की थी , और कई पुरस्कारों से देश और विदेश में अलंकृत भी हुए थे / मुझे यह भी ज्ञात हुआ के नेपाल और भूटान राष्ट्रों सहित भारत के विभिन्न राज्यों के लिए रिक्तियां निकाली गयी हैं / चूँकि श्री पाठक का जन्म स्थान बिहार था , अतः वो यहाँ छठ पूजा में आये थे और उन्हीं के द्वारा ये जानकारी यहाँ दी गयी थी / सुलभ का मुख्य कार्यालय पालम, दिल्ली में स्थित था / मैं भी कोई अच्छी संस्था से जुड़ना चाहता था / अतः मैंने वहां जाने का फैसला कर लिया / छठ के बाद मैंने अपने घर में इस बाबत बात की और थोड़े से पैसे , एक बिछाने का , एक ओढने का , कुछ पहनने के वस्त्र और कुछ किताबों को लेकर चल पड़ा मैं फिर से एक दिल्ली की सफ़र की तरफ , इस आशा के साथ के अब तब तलक लौट के नही आना है , जब तक मैं कुछ बन न जाऊं , अपनी एक अलग पहचान न बना लूँ / 

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