सुबह मैं जल्दी से उठा , पूरे जोश में था , आज जीवन के पहले जॉब के लिए जाना जो था / कुछ सफ़ेद कागज़ और पेन लेकर , मैं अपने पहली interview के चल पड़ा / कदम तेज़ थे , मन में फिर वही गाना चल रहा था "जीत जायेंगे हम ....." / मैं ऑफिस पहुंचा ,घर से ज्यादा दूर नही था , co का नाम था " डोल्फिन कुरिअर सर्विस प्राइवेट लिमिटेड "/ मैं अन्दर पहुंचा , कुछ तेज़ धड़क रहा था मेरा दिल / वहां के manager साहब से मेरी मुलाकात हुई , मैंने अपना परिचय दिया और जिन्होंने भेजा था , उनका रेफरेंस भी / उन्होंने मुझसे bio data लिखने को बोला / मैंने अपनी जेब से सफ़ेद कागज़ निकला और bio data लिखने लगा , उस वक़्त हस्तलिखित और स्वयं के लिखे हुए bio data ही प्रचलित था / उन्होंने मेरी handwriting , स्पीड वगैरह देखि और फिर मेरे से कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछे / co के मालिक ब्रांच ऑफिस में थे , मुझे मेनेजर ने वहां जाने को बोला , उन्होंने मेरे सामने ही उन्हें फ़ोन कर दिया और मैं चल दिया ब्रांच ऑफिस / ब्रांच ऑफिस पहुंचा तो देखा के वो वहां थे नही , मैं उनका इंतज़ार करने लगा / मेरी समझ तो आ गया था के ये एक बड़ी courier कंपनी है , और डाकखाने की तरह का काम है / मैं ब्रांच ऑफिस में बैठा था , और वहां के reception पर बैठे लड़के से बातें कर रहा था / उसके आगे करीब 30 - 35 चिट्ठियां रखी थी , वो उसे बुक कर रहा था , मैं ध्यान से देख रहा था , के वो कैसे बुक कर रहा है उसे, शिपमेंट कैसे बना रहा है / मैंने उससे आग्रह किया के क्या मैं एक दो चिट्ठियां बुक करूँ , वो सहर्ष तैयार हो गया , मैंने चिट्ठियों को बुक करना शुरू किया /लगभग 5 min में मैंने सारी चिट्ठियां बुक कर दी , मैं इतना मगन था के मुझे पता नही चला के मालिक आ भी चुके थे और अपने केबिन में जा चुके थे / वहां से सबसे पहले उन्होंने शिपमेंट बुक मगाई , रिसेप्सन वाले लड़के से / लड़का उनकी केबिन में गया और थोड़ी बाद मुझे बुला कर उनके पास ले गया / मैं अभिवादन के साथ उनके आगे खड़ा हो गया , अब केबिन में मैं , मालिक और मेनेजर साहब थे / उन्होंने मुझसे पूछा , पहले कहाँ काम किया है ? मैंने कहा कही नही / उन्होंने कहा , " तो फिर तुमने इतनी जल्दी ये सारे document कैसे बुक कर लिए , मैंने कहा के 'देख कर सिखा सर , अभी अभी '/ फिर उन्होंने मुझे फ़ोन directory दी जिसके मुख्य पृष्ठ पर बहुत सारी इंग्लिश लिखी थी , उन्होंने मुझे पढने को कहा / मैंने बेहिचक पढना शुरू किया / उन्होंने फिर मुझसे पूछा के काम कितनी जल्दी सीख सकते हो , मैंने कहा , 4 -5 दिनों में / उन्होंने मुझे 5 रुपये दिए और पान लाने को कहा , वो पान खाते थे / मैं पैसे लेकर बाहर तो निकल गया लेकिन मुझे लगा के ये मेरी कोई परीक्षा है/ मैं वहां के नजदीक मगर एक अच्छे दिखने वाले पान की दुकान पर पहुँच गया और उसे ऑफिस का नाम बता के वहां के मालिक के लिए पान बनाने को कहा / मैं पान लेकर जब सज्जन जी (co के मालिक ) के पास आया तो उन्होंने आश्चर्य से मुझे देखा और कहा के , तुम्हें कैसे पता के मैं यही पान खाता हूँ / मैंने कहा , सीधी सी बात है सर , यहाँ के पान वाले से ही पान आता होगा , उन्हें जरुर पता होगा आप क्या खाते हो, मैंने आपका नाम लिया और पान ले आया /वो मेरे कॉमन सेन्स से प्रभावित हुए और मुझे नौकरी पर रख लिया गया/
वो अप्रैल, सन 1995 की , बात थी ,,,मेरी तनख्वाह रखी गयी , 1000 /- rs महिना , 12 घंटे की नौकरी , महीने में चार छुट्टियाँ / उस वक़्त 1000 /- rs का महत्व हुआ करता था / मैं खुश था , कल से आने को बोल के मैं ख़ुशी ख़ुशी घर पहुंचा , और घर आके ये बताया / सब को ख़ुशी ही हुई , किसी ने ये सोंचा नहीं के , मेरी पढाई , करियर का क्या होगा , क्यूँ की अभी सबसे बड़ी प्राथमिकता पैसों की थी /दोस्तों के पास भी गया , बताया के अब मैं उनसे कम मिल सकूँगा,मगर सभी मेरी नौकरी से खुश थे / सभी मुझे आगे बढ़ता देखना चाहते थे / रात को मैं घर आया /सब ने कहा के भगवान को प्रसाद चढ़ा देना / मैंने फिर भगवान की हंसी उडा दी / रात को सोने वक़्त मैंने अपने को आइने में निहारा , देखा के क्या मैं बड़ा हो गया हूँ, नौकरी करने लायक ? मूछें देखीं , जो अभी आई नही थी सही ढंग से , आँखों में ऑंखें डाल कर मुस्काता , अपने को चिढाता और खुद को ही शाबाशी देता / मैंने अभी तक जो भी घर में देखा जो भी स्थितियां सब का अवलोकन कर रहा था / सोंच रहा था के चलो , अब नौकरी तो मिल ही गयी , जल्द ही सब ठीक कर लूँगा /एक विश्वास तो था ही अपने ऊपर /
सुबह नहा धो के , तेज़ कदमो के साथ पहले दिन ऑफिस पहुंचा / मेनेजर साहब नही आये थे , छोटे बड़े सभी स्टाफ को मैं नमस्कार करता , मुझे नही पता था के मेरी पोस्ट क्या है ? मैं भले ही उस वक़्त 15 साल का था , मगर , जज्बा मेरा बड़ा था / करीब 10 बजे co के मालिक आये , उन्होंने मुझे केबिन में बुलाया , और मुझे उसी दिन मैनेजमेंट का पहला ज्ञान मिला / उस co में पहले से एक asst manager था , करीब 6 साल पुराना स्टाफ ,उसी के हाथ में ऑफिस के सारे इन्टरनल वर्क थे / मगर इधर वो लालची हो गया था, चीजों को इस तरह से गूँथ रखा था उसने के , कोई अन्य व्यक्ति उसके बिना ऑफिस में काम ही न कर सके / उसकी बहुत चलती थी , मालिक से भी सही व्यवहार , जो होना चाहिए नही था / वहां काम इस तरह का था के , रोज़ सैकड़ों चिट्ठियां आती थी , पुरे बिहार में बटने के लिए , और शाम को सैकड़ों चिट्ठियां भेजी जाती , देश के विभिन्न राज्यों में / इसका पूरा काम वही देखता , बिल्स वगैरह भी / मालिक ने मेरे सामने प्रस्ताव रखा , के उसका काम जल्द से जल्द सीख जाओ , उन्हें उस शख्स को अपनी co से हटाना था , और विकल्प के रूप में वो मेरा इस्तेमाल चाहते थे / मुझे उस वक़्त मैनेजमेंट की ये चाल अच्छे से समझ नही आई / मैंने अति उत्साह पूर्वक , 10 दिनों में पूरा काम सिखने की हामी भर दी , मालिक ने आश्वाशन दिया के अगर ऐसा मैं कर पाया , तो मुझे asst manager बना दिया जायेगा और तनख्वाह भी बढ़ा दी जाएगी /
उस दिन के बाद से मेरा एक ही लक्ष्य रह गया, कोई और विशेष कार्य नही था मेरे लिए , बस उसके काम को देख के सीखना था , मालिक मेरे से रोज़ शाम को अपडेट लेते / काम सीखना आसान नही था , सैकड़ों चिट्ठियों को राज्य के विभिन्न जगहों पे सही समय भेजना , और शाम को राज्य से देश के विभिन्न स्थानों पे भेजना, सबका रिकॉर्ड रखना , 15 स्टाफ को संभालना और शिकायतों का निपटारा करना , क्यूँ की कुरिअर का काम ही जल्द से जल्द चिट्ठियों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को पहुचना होता है , लोग एक्स्ट्रा पैसे इसी लिए देते थे / मैंने मेहनत की और 7 दिनों के भीतर काम सीख गया / एक सप्ताह के अन्दर ही , पुराने asst manager को हटा दिया गया और मुझे बना दिया गया / उस वक़्त लेबर law इतना प्रचलित नही था , सब सेट्टिंग से होता ,वरना एक प्राइवेट लिमिटेड co का asst manager 15 साल का हो ही नही सकता था /
मेरी जिम्मेवारियां बढ़ गयी , मुझे महत्वपूर्ण चाभियाँ इत्यादि सौप दिए गये / मैं सुबह 8 बजे आ कर ऑफिस खोलता और रात के आठ बजे तक एक मशीन की तरह काम करता / धीरे धीरे एक महीने में ही मैं मालिक का सबसे मेहनती और वफादार स्टाफ बन गया / मेरी तरक्की की स्पीड देख के ,मेनेजर साहब को भी अचम्भा होता और , अब शायद वो भी डरने लगे थे मुझसे , क्यूँ की accounts तो वही देखते थे , मगर मुझे कुछ घपलों का पता चल चुका था के ये लोग , co को कैसे चूना लगाते थे / शायद इसी वजह से डेली अकाउंट देखने का काम भी मालिक ने मुझे सौप दिया / मैं था तो उस वक़्त बच्चा ही , कच्ची उम्र में ही उस जगह आ गया था जिसे मार्केट बोलते हैं , जहाँ मैनेजमेंट के तीर कमान चलते थे / सब एक दूसरे के कंधे पे पैर रख कर आगे बढ़ना चाहते थे , और मैं एक कोमल और आसान कन्धा था / मेनेजर साहब ने मुझे मोहरा बनाने की तय्यारी कर ली थी / उन्होंने धीरे धीरे मेरे से नजदीकियां बढाई, और पहले मुझे विश्वास में लिया / मेरे दिमाग में उन्होंने भरा , के co. , co. होती है , मालिक , मालिक होता है, लेकिन स्टाफ को आपस में मिल कर रहना चाहिए और , एक दूसरे की गलतियों लो ढकना छुपाना चाहिए / धीरे धीरे वो मेरा इतना घनिष्ट हो गया के , मैं मैनेजमेंट के दाव - पेंच उनसे सिखने लगा / ये मेरे लिया बड़ा रोचक भी था , और एक नया तजुर्बा भी , क्यूँ के ये दाव - पेंच आगे बहुत काम आने वाले थे / मगर वो तो पुराने घाघ थे / एक दिन वो मुझे एक बार (Bar) में ले गये , मैं हर स्थिति में जल्दी से जल्दी आगे बढ़ना चाहता था / जीवन में पहली बार उस दिन मैंने बियर पी / मैं वो हर चीज़ करने को तय्यार था जो मुझे तरक्की दे सके , मेरे पास समय कम था , ऐसा मुझे लगता था / कुछ दिनों बाद ही मैं उनके साथ कभी कभी शराब भी पीने लगा , उम्र अभी भी 16 की नही हुई थी मेरी / मैं ये जान ही न पाया के सब के पीछे एक खेल है , मैं उस खेल को समझ नही पा रहा था , मुझे उनपे विश्वास जो था / मगर वो तो एक प्रोफेशनल गेम खेल रहा था , उसकी सत्ता के लिए मैं खतरा जो बनता जा रहा था /
मेरा रिजल्ट भी अभी आया नही था , कही खो गये थे इस मार्केट और वयस्तता के बीच मेरे सपने / मैं अपने को काम काजी आदमी सा महसूस करने लगा / सुबह 8 से शाम को 8 तक काम, फिर मेनेजर साहब के साथ दाव पेंच सीखना और घर आके सोना / मैं घर से फ्री हो चुका था , १०-११ बज जाते घर आते आते / सन्डे को दोस्तों से भी नही मिल पता था , एक ही चीज़ याद थी बस , पैसा / मेरी हालत ३ महीने में ऐसी हो गयी के , मुझे २-३ दिनों तक घर के सभी सदस्य देख नही पाते थे / देर रात आता और सुबह जल्दी निकल जाता / मैंने काम पूरा संभाल लिया था , घर के खर्च में आधी हिस्सेदारी भी करने लगा था / नई नई पार्टियाँ पकड़ के अपना कमीशन बढ़ा रहा था / मैं पूरा खर्च उठाना चाहता था , मगर २ हज़ार रुपये में उस वक़्त भी , 5 सदस्यों का भरण पोषण आसान नही था /
मैंने ऑफिस में काम करने का अपना अलग ही तरीका निकला , क्यूँ की मैं MBA तो था नही , न ही मैंने कही से ट्रेनिंग ली थी / मैंने अपने ढंग से तीन महीनो में हर चीज़ व्यवस्थित कर दी , और सबसे महत्व पूर्ण कार्य किया वो था कस्टमर्स और विभिन्न राज्यों के ऑफिस के शिकायतों का निपटारा / मैंने समय सीमा तय की , शिकायतों के निपटारे की उस वक़्त/ये एक नया प्रयोग था , जो आज कल के ज्यादा तर कॉल सेंटर्स आजमाते हैं / मेरा शिकायतों के निपटारे की समय सीमा अधिकतम 48 घंटे थी / अगले २ महीनो में , पटना का हर प्रमुख कुरियर सर्विस , और मेरा हेड ऑफिस और ब्रान्चेज़ , रवि शंकर को जानने लगे / मेरे काम करने के तरीके को ले कर सब प्रभावित थे , मैं one man army था / बात उड़ते उड़ते हेड ऑफिस तक पहुंची दिल्ली , और रीजनल ऑफिस कलकत्ता , मेरी सीधी बात होने लगी कलकत्ता के हेड से / हमारा ब्रांच उन्हीं के अन्दर था /
इधर पिता जी का व्यवसाय समाप्ति की ओर अग्रसर था / आखिर कर उन्होंने नौकरी करने को ठान ली , घर बैठने से तो यही अच्छा था / उन्होंने एक जगह जॉब कर ली / मुझे अहसास हुआ था , के समय कैसे करवटें बदलता है , जो co का मालिक रह चुका हो वो आज खुद नौकरी कर रहा है किसी के यहाँ / वक़्त अपना काम कर रहा था , और किस्मत अपना , गुज़ारा किसी तरह से चल रहा था / इसी बीच मेरा मैट्रिक का रिजल्ट आ गया , उम्मीद 70 % से ऊपर की थी मगर , 67 % ही नंबर आये / लगभग सभी सब्जेक्ट में 75 से 80 % नंबर थे , मगर बस संस्कृत , जिसमे मुझे अच्छे नंबरों की उम्मीद थी उसी में बस 49 % ही रह गया / खैर मैं संतुष्ट हो गया नम्बरों से / मैंने अपनी परिस्थितियों को देखते हुए कॉमर्स चुना और कॉलेज में दाखिला ले लिया / मेरा उस वक़्त मनोरंजन का एक ही साधन था, दोस्तों के साथ फिल्म देखना और सन्डे को क्रिकेट खेलना / उम्र धीरे धीरे बढ़ रही थी , और नया जोश बन रहा था / मैं अपने आप को स्मार्ट समझता , देखता के नज़रें पीछा करती हैं, मगर मेरे पास उन नज़रों का पीछा करने का वक़्त कहाँ था / लगभग मेरे सारे मित्र कही न कही किसी न किसी के साथ प्रेम सम्बन्ध में डूबे थे , मगर मेरा केस अलग ही था , तन्हा अकेला / कभी कभी इस विषय पर मैं सोंचता , मगर केवल गाना गा के , या सुन के अपने को बहला लेता /
हमारी co उस वक़्त नोर्थ के लिए एक और co से जुड़ गयी , जिसका पूरे भारत में 500 से ज्यादा शहरों तक पहुँच थी / उसका नाम पुष्पक प्राइवेट लिमिटेड था / उसके मालिक से मेरी कुछ ही दिनों में घनिष्टता हो गयी / हमारी co की नीति के तहत हम पहले अपने co. के document को प्राथमिकता देते थे और इस वजह से ,पुष्पक का काम यहाँ ठीक ढंग से नही हो पा रहा था / पुष्पक अपना खुद का ब्रांच खोलना चाहती थी , और एक बंगाली बाबु इसी सिलसिले में पटना आये / मैंने ही उनके रहने खाने इत्यादि का बंदोबस्त किया / रात को होटल में उन्होंने मेरे से बात की , मेरी जानकारी को परखा और मुझे बधाइयाँ दी / मैं उनकी सेवा में दो दिन रहा , वो मेरे से प्रभावित हुए / उनके जाने के करीब 2-३ दिनों बाद , मेरे ऑफिस के फ़ोन पर ही पुष्पक के मालिक का कलकत्ता से फ़ोन आया , उन्होंने मुझे STD से रात में बात करने को कहा / शाम को ऑफिस से छूटने के बाद मैंने उनसे बात की / मेरी ख़ुशी का ठिकाना नही रहा के वो मुझे पटना ब्रांच सौपना चाहते थे , incharge बना के , और तनख्वाह 5 हज़ार महिना / अंधे को क्या चाहिए थी , दो ऑंखें / मैं खुश था , मगर उनकी एक शर्त थी , जमानत राशी जमा करने की , 20 हज़ार रूपए / मगर मैं तय्यार था , मैं उधेड़ बुन में लग गया ,और मैंने तय किया के , इसके बारे में मैं अपने मेनेजर जिसे मैं गुरु मानता था , उससे बात करूँगा / शाम को मैंने उनसे बात की , उसकी आँखों में चमक आ गयी , उसे वो हाथ लग गया जिसका उसे इंतज़ार था / उस वक़्त उसने मुझे आश्वाशन दिया और आधे पैसे देने का वादा भी / मैं अब बाकि के पैसे के लिए सोंचने लगा , सारी कोशिशे जो हो सकती थी की मैंने , जब मुझे लगा के मैं कर लूँगा मैंने शाम को पुष्पक के मालिक को फ़ोन लगाया और बात पक्की कर ली , मुझे एक सप्ताह के अन्दर पैसे जमा करने थे , उसकी भी यही शर्त थी की इसके बारे में मेरे मालिक को कुछ पता नही चले / मगर किस्मत को तो कुछ और मंजूर था ,,,,इस मार्केट के उसूल अब धीरे धीरे पता चलने थे , मुखौटे के अन्दर का चेहरा अब सामने जो आना था /
अगले दिन जब ऑफिस गया तो मालिक ने मुझे केबिन में बुलाया , मुझसे पूछ ताछ की , मैंने सब बता दिया / उन्होंने मुझसे बोला के तुम मेरा ही बिज़नस चौपट करना चाहते हो , मैंने कहा के नही , मैंने दूसरी co. के लिए बात की थी , न की आपकी / ये भी कहा के , मैंने नही उन्होंने मुझसे संपर्क किया / उन्होंने मुझे उस वक़्त कुछ नही कहा , मगर मुझे पता चल चुका था के , इस विषय पे मेनेजर साहब ने ही उन्हें सूचित किया था , ताकि मुझे नौकरी से निकाल दिया जाये और उनकी सत्ता पर से खतरा हट जाये / अगले चार पाँच दिनों में ही एक नया लड़का रख लिया गया , और उसे ट्रेनिंग देने को मुझसे कहा गया / मैंने ट्रेनिंग दी , और चूकी चीजें व्यवस्थित थी , लड़का भी काम सीख गया , काम चलाने लायक / मुझे नौकरी से हटा दिया गया / मैं शाम को मेनेजर से मिला और बस यही कहा के अपने धोका किया है , और ये ठीक नही है /वो मुस्कुरा कर बोला के , उसने co के प्रति वफादारी दिखाई है और मैंने गद्दारी / खैर मैं बुझे मन से घर वापस चला आया / एक बार फिर से मुझे नई नौकरी की तलाश करनी थी / मैंने घर में किसी को कुछ नही बोला ,, शांति पूर्वक छत पे जाकर , विचार करने लगा / एक बार फिर बना बनाया सपना टूट चुका था / मैंने करीब 8 महीने नौकरी की थी वहां , मगर वहां से बहुत कुछ सीखा था / ये भी के लोग जो अपने दिखते है वो कितने स्वार्थी हो सकते हैं / मेरे साथ कितना बड़ा खेल खेला था मेनेजर साहब ने , लेकिन मुझे सीख भी बहुत बड़ी मिली थी /
अगले दिन मैं फिर से नई नौकरी की तलाश में निकल गया / मेरे पास स्किल तो था ही और मार्केट में मेरी पहचान भी / अगले दिन ही अपेक्षाकृत छोटी नौकरी मैंने ढूंढ़ ली / मुझे चार पाँच दिनों बाद ज्वाइन करना था / इस खाली समय में मैंने , कॉलेज के क्लास किये / पहले दिन ही कॉलेज में घुसते ही नज़ारा देखा के , एक लड़के हो , 10 लड़के मिल कर पीट रहे हैं / संवादों से पता चला के , किसी लड़की वगैरह का चक्कर था / उसे अनदेखा कर मैं कॉलेज में गया / चुप चाप क्लास की , और वापस आ गया / शाम को दोस्तों के साथ मस्ती की , और घर आकर बताया के मैंने नौकरी छोड़ दी है और ये भी के दूसरी पकड़ ली /
चार पाँच दिनों घर पे रहने के बाद अहसास हुआ के , नौकरी छूटने के बाद , आदमी की क्या हालत हो जाती है घर में / लोगों का नजरिया भी बदल जाता है / मैं ये भी सोंच रहा था , के पिता जी पे क्या बीती होगी , शायद इसी सब परेशानी से बचने के लिए पिता जी ने , नौकरी की है ताकि वो व्यस्त रह सकें / दोस्तों के पास दो चार दिन बिताये तो पता चला के , 8 महीनो में स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं / बिहार में युवा बर्बाद हो रहे थे , काम और रोजगार की काफी कमी थी / नौजवान पीढ़ी गलत रास्ते पर तेज़ी के साथ बढ़ रही थी , चारों तरफ अंधकार का ही बोलबाला हो रहा था / रोज़ अपहरण , क़त्ल , लूट की घटनाये सुनने को मिलती / ये सब देख से मेरा मन यही होता के , मेरा भविष्य यहाँ नही कही और है / मगर अभी चारा भी कुछ नही था / मेरी उम्र ही कितनी थी , अभी 17 साल भी पूरे नहीं हुए थे /
उसी दौरान एक दिन मेरे घर उन दोस्तों की टीम पहुंची जिनकी उम्र मेरे से चार पाँच साल बड़ी थी / उन्होंने सीधे मुझसे कहा के दिल्ली चलना है , पूछने पर कारण ये पता चला के रक्त दान करने / पता चला के , हमारे एक मित्र के सम्बन्धी दिल्ली के AIMS में भर्ती थे , उन्हें खून की सख्त जरुरत थी / उस वक़्त दिल्ली में खून बेचने का व्यापर बड़ी तेज़ी के साथ चल रहा था / AIMS ने सुरक्षा कारणों से , केवल निजी सम्बन्धियों से ही खून लेना शुरू कर दिया था, किसी भी blood bank इत्यादि से खून लेना बंद कर दिया था / वो जितना खून लेते उतना ही खून मरीज़ के ग्रुप के हिसाब से अपने निजी बैंक से दे देते थे / मामला गंभीर था , हम 8 लोग थे , मैंने हामी भर दी / घर आया और कुछ कपडे वगैरह पैक करने लगा , घर वालों ने जब पूछा तो बता दिया मैंने के दिल्ली जा रहा हूँ, खून देने / पहले तो उन्होंने आश्चर्य किया मगर , जब मैंने बताया के मैं अच्छा काम करने जा रहा हूँ , तो सब ने हामी भर दी / शाम की ट्रेन से मैं दिल्ली के लिए दोस्तों के साथ रवाना हो गया / मैं पहली बार इतने लम्बे सफ़र पर था, और दिल्ली के भी / ये ट्रेन यात्रा भी मेरे लिए एक सीख ही रही / जैसे जैसे मैं दिल्ली के नजदीक पहुँचता गया , वैसे वैसे मुझे अहसास होने लगा के, बिहार के लोगों की क्या इज्ज़त रह गयी है बाहर, मजाक का पात्र है वो / अलीगढ स्टेशन पे वहां के लोकल लोगों ने स्लीपर बोगी पर कब्ज़ा कर लिया , जो भी बोलता उसे बिहारी और पता नही क्या क्या बोलते थे वो लोग / हमारी संख्या भी कम नहीं थी , आठ लड़के थे हम , हमारी जबरदस्त झड़प हुई उनसे / खैर हम दिल्ली पहुंचे , मेरी बोलने की शैली पहले से ही थोड़ी अलग थी , और थोडा बहुत मैंने रास्ते में भी सीख लिया था / दिल्ली , कही साफ कही बहुत ही गन्दी थी , बड़े बड़े नालों के ऊपर बने घरों में रह रहे लोगों को देख कर दुःख हुआ , क्या यही है हमारी राजधानी / चारों तरफ भाग दौड़ , शोर शराबा , ऊँचे बिल्डिंग्स को छोड़ कर कोई भी अंतर नहीं लगा मुझे दिल्ली और पटना में / हम वहां बिहार भवन में रुके , जो के कनाट प्लेस के पास था / वो बहुत ही बढ़िया जगह थी / वहां आकर ये लगा के हाँ , ये राजधानी जैसा लग रहा है /पालिका बाज़ार गया , वहां भी बहुत अच्छा लगा , मज़ा आया , भूमिगत मार्केट में घूम के / सबसे अजीब मुझे वहां पानी बिकता हुआ देख कर लगा / पानी की किल्लत उन दिनों भी थी दिल्ली में / यमुना को देख कर अहसास हुआ के विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से एक क्यूँ कहा जाता है दिल्ली को /
अगले दिन हमें AIMS में जाना था , सुबह हम सारे लोग AIMS में पहुंचे , वहां पहुँच कर यमलोक जैसा अहसास हुआ / पर्चियों की इतनी लम्बी कतार देख कर बड़ा अचम्भा हुआ / किसी किसी की पर्ची तो 4 दिनों से वहीँ थी / बड़ा अजब गजब माहौल था वहां का / वहां खून देने वालों का पहले एक वरिष्ठ डॉक्टर साक्षात्कार लिया करते थे, ताकि वो सुनश्चित कर सकें के ये मरीज़ के अपने ही रिश्तेदार हैं , किराये के नहीं / हमें साक्षात्कार के लिए ले जाया गया , वो कोई लेडी डॉक्टर थी / मगर उनके केबिन में जाने की, मेरे वरिष्ट मित्रों को हिम्मत नही हुई , और मुझे ही बात करने को कहा / मैं डॉक्टर साहिबा के सामने उपस्थित हुआ / उनका व्यक्तित्व बड़ा ही अच्छा था , बाल कन्धों तक कटे हुए , और चश्मा नाक के नोक पे टंगा हुआ , उन्होंने मुझे घूरते हुए मेरा नाम पूछा / मैंने बताया , मुझसे पूछा के मरीज़ मेरा कौन है, मैंने बताया के मेरे मित्र का सम्बन्धी / उन्होंने मेरे से कुछ देर बात की , फिर बोली की मेरी बात करने की शैली बिहार के लोगों जैसी नही है / मुझे हंसी आ गयी , वो अब तक गंभीर थी , मगर वो भी हंस पड़ी / मैंने उन्हें अपना टिकट और पहचान पत्र दिखाते हुए कहा के मैडम अगर भगवान ने मुझे बिहार में पैदा किया तो इसमें मेरी क्या गलती है ? वो फिर से हंसी , और मुझे कुर्सी पे बैठने को कहा / वो किसी चीज़ को लिखने में व्यस्त हो गयी और थोड़ी देर बाद मुझे परचा थमाते हुए बोली के, इसे blood bank ले जाओ , तुम्हें blood मिल जायेगा , किसी को भी blood देने की जरुरत नही है / मैं खुश तो हो गया , मगर मैं स्वयं तो अपना रक्त दान देना ही चाहता था / मैंने अपनी इक्षा ज़ाहिर की , उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी एक नर्स को निर्देश दे दिया / मैंने अपने दोस्तों को बताया के बिना blood दिए ही बैंक से blood मिल जायेगा , एक दो को छोड़ के बाकि बहुत खुश हुए क्यूँ की , वो वैसे भी डर रहे थे खून देने से / बाकि जो खुश नही हुए मेरे साथ हो लिए ,मैंने अपना पहला रक्त दान AIMS में किया , भारत की राजधानी में आकर / वहां हम लोग दो तीन दिन रहे , बहुत मस्ती की , और वापस पटना आ गये /
अगले दिन मैं नयी co में गया , जहाँ मैंने नई joining की थी /पुरानी co के मुकाबले वो छोटी थी , मगर उसका मालिक उसे बढ़ाना चाहता था , और मेरे अनुभव का इस्तेमाल करना चाहता था / मैंने वहां के सिस्टम को बदला , co के delivery एरिया को अपनी पुरानी जान पहचान से बढ़ाना शुरू किया /वहां भी मैंने लगभग 6 महीने नौकरी की , मगर फिर से वही हुआ , जब सारा सिस्टम दुरुस्त हो गया तो , मालिक की नज़र बदल गयी , उसने मेनेजर पोस्ट के लिए अख़बार में विज्ञापन दे दिया , और एक लड़की को मेरे सर के ऊपर बैठा दिया / मोहतरमा को भले ही ऑफिस का काम नहीं आता था मगर , मेकप करना और कान भरना अच्छी तरह आता था / ऑफिस का माहौल गन्दा होता जा रहा था , मैंने वो नौकरी भी छोड़ देने का फैसला किया / लेकिन इस बार मैं एक दिन भी खाली बैठना नही चाहता था , सो मैंने पहले ही नौकरी की तलाश की / एक और कुरिअर co जो हाई फाई थी, उसके रेट्स काफी महंगे थे , वहां मेरा आना जाना लगा रहता था / कारण था के वो हवाई जहाज़ से documents भेजते थे , इसलिए अधिकतर शहरों में 24 घंटे में डाक पहुँच जाती थी / अगर कोई urgent document होता तो हम उसपे एक्स्ट्रा चार्ज करते और , उस कुरिअर द्वारा भेज देते /उनकी मालकिन एक पंजाब की लेडी थीं , वो अक्सर अपने यहाँ काम करने का ऑफर देती थी / मैंने उनसे सम्पर्क साधा और मैंने अगले सप्ताह ही उसे ज्वाइन कर लिया / पिछले डेढ़ साल में मेरी ये तीसरी नौकरी थी / वहां कुछ ही दिन काम करने के बाद पता चला के इनका मुख्य काम दिल्ली , मुंबई , बंगलौर जैसे केवल बड़े शहरों में चलता है / अगले चार पाँच दिनों बाद ही , मालकिन ने मुझे बुलाया , और उसी दिन मुझे पता चला के मुझे रखने का इनका क्या उद्देश्य था / उन्होंने मुझे बताया के उनका दिल्ली ऑफिस सही ढंग से काम नही कर रहा है, और मुझे वहां जा कर उनके ऑफिस की व्यवस्था सही करनी है / समझा ऐसी रही थी , जैसे मुंह से शहद टपक रहा हो, असलियत जानने के बाद मैंने तुरंत मना कर दिया , मगर उन्होंने समझाया के , 10 - 15 दिनों के लिए मुझे जाना चाहिए और , मेरे लिए ये एक अच्छा अनुभव होगा /इतनी जल्दी जल्दी मैं नौकरी नही बदलना चाहता था , और अनुभव लेने वाली बात भी मेरे समझ में आ गयी / मैंने हामी भर दी /
घर आ कर मैंने बताया के मैं 10 दिनों के लिए दिल्ली जा रहा हूँ , काम के सिलसिले में / दो चार दिनों बाद मैं लगभग 17 साल की उम्र में , नौकरी के लिए दिल्ली टूर पे था / आज मैं सोंचता हूँ , के कितने कम उम्र में , मैंने अपना पहला ओफ्फिसिअल टूर किया था / मैं इससे पहले हाल ही में दिल्ली आ चुका था , और बिहारियों की स्थिति भी देख चुका था/ पिछली बार तो मैं साथियों के साथ था , मगर इस बार अकेला / इसलिए रास्ते भर मैंने , दिल्ली की टोन को सीखने की कोशिश की / अलीगढ के पास फिर से लोकल लोगों की दादा गिरी देखने को मिली /मुझे बताया गया था के , दिल्ली स्टेशन के पास पहाड़गंज में शीला सिनेमा हॉल के ठीक सामने ऑफिस है , जहाँ मुझे जाना है /मैं स्टेशन से बाहर निकला और , taxi , ऑटो , होटल चिल्लाते दलालों को अनदेखा करता हुआ , जैसे मैं यहाँ का पुराना बंदा हूँ , बाहर आया और , अपने दिल्ली के टोन का पहला प्रयोग रिक्शे वाले से शीला टाकिज पूछने में किया / उसने तुरंत मुझे बता दिया , वहां से पैदल का रास्ता था , सड़क पार करते हीं / मैं दिल्ली पहुच चुका था , इस बार दिल्ली के लोगों के बीच , दिल्ली को और अच्छे से जानने के लिए / मुझे रुकना ऑफिस में ही था , वही रुकने की व्यवस्था थी , वहां का मेनेजर एक पहाड़ी लड़का था / दिखने में काफी शांत और सीधा / खाना वगैरह खाने के बाद मैं ऑफिस की खिड़की से बाहर पुल को देख रहा था , रात के एक बज चुके थे , मगर , शहर अभी भी जगा हुआ था / मेरे दिमाग में अपने पिछले सफ़र की यादें आ रही थी, घर की, और माँ के हाथ के आलू के पराठों की भी / मैं काफी समय तक शुन्य को निहारता रहा था , तभी एक गाड़ी ने तेज़ ब्रेक लगाया, और उसकी आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी / मैं सो गया , अगले दिन के सफ़र पे दुबारा चलने के लिए /
वो अप्रैल, सन 1995 की , बात थी ,,,मेरी तनख्वाह रखी गयी , 1000 /- rs महिना , 12 घंटे की नौकरी , महीने में चार छुट्टियाँ / उस वक़्त 1000 /- rs का महत्व हुआ करता था / मैं खुश था , कल से आने को बोल के मैं ख़ुशी ख़ुशी घर पहुंचा , और घर आके ये बताया / सब को ख़ुशी ही हुई , किसी ने ये सोंचा नहीं के , मेरी पढाई , करियर का क्या होगा , क्यूँ की अभी सबसे बड़ी प्राथमिकता पैसों की थी /दोस्तों के पास भी गया , बताया के अब मैं उनसे कम मिल सकूँगा,मगर सभी मेरी नौकरी से खुश थे / सभी मुझे आगे बढ़ता देखना चाहते थे / रात को मैं घर आया /सब ने कहा के भगवान को प्रसाद चढ़ा देना / मैंने फिर भगवान की हंसी उडा दी / रात को सोने वक़्त मैंने अपने को आइने में निहारा , देखा के क्या मैं बड़ा हो गया हूँ, नौकरी करने लायक ? मूछें देखीं , जो अभी आई नही थी सही ढंग से , आँखों में ऑंखें डाल कर मुस्काता , अपने को चिढाता और खुद को ही शाबाशी देता / मैंने अभी तक जो भी घर में देखा जो भी स्थितियां सब का अवलोकन कर रहा था / सोंच रहा था के चलो , अब नौकरी तो मिल ही गयी , जल्द ही सब ठीक कर लूँगा /एक विश्वास तो था ही अपने ऊपर /
सुबह नहा धो के , तेज़ कदमो के साथ पहले दिन ऑफिस पहुंचा / मेनेजर साहब नही आये थे , छोटे बड़े सभी स्टाफ को मैं नमस्कार करता , मुझे नही पता था के मेरी पोस्ट क्या है ? मैं भले ही उस वक़्त 15 साल का था , मगर , जज्बा मेरा बड़ा था / करीब 10 बजे co के मालिक आये , उन्होंने मुझे केबिन में बुलाया , और मुझे उसी दिन मैनेजमेंट का पहला ज्ञान मिला / उस co में पहले से एक asst manager था , करीब 6 साल पुराना स्टाफ ,उसी के हाथ में ऑफिस के सारे इन्टरनल वर्क थे / मगर इधर वो लालची हो गया था, चीजों को इस तरह से गूँथ रखा था उसने के , कोई अन्य व्यक्ति उसके बिना ऑफिस में काम ही न कर सके / उसकी बहुत चलती थी , मालिक से भी सही व्यवहार , जो होना चाहिए नही था / वहां काम इस तरह का था के , रोज़ सैकड़ों चिट्ठियां आती थी , पुरे बिहार में बटने के लिए , और शाम को सैकड़ों चिट्ठियां भेजी जाती , देश के विभिन्न राज्यों में / इसका पूरा काम वही देखता , बिल्स वगैरह भी / मालिक ने मेरे सामने प्रस्ताव रखा , के उसका काम जल्द से जल्द सीख जाओ , उन्हें उस शख्स को अपनी co से हटाना था , और विकल्प के रूप में वो मेरा इस्तेमाल चाहते थे / मुझे उस वक़्त मैनेजमेंट की ये चाल अच्छे से समझ नही आई / मैंने अति उत्साह पूर्वक , 10 दिनों में पूरा काम सिखने की हामी भर दी , मालिक ने आश्वाशन दिया के अगर ऐसा मैं कर पाया , तो मुझे asst manager बना दिया जायेगा और तनख्वाह भी बढ़ा दी जाएगी /
उस दिन के बाद से मेरा एक ही लक्ष्य रह गया, कोई और विशेष कार्य नही था मेरे लिए , बस उसके काम को देख के सीखना था , मालिक मेरे से रोज़ शाम को अपडेट लेते / काम सीखना आसान नही था , सैकड़ों चिट्ठियों को राज्य के विभिन्न जगहों पे सही समय भेजना , और शाम को राज्य से देश के विभिन्न स्थानों पे भेजना, सबका रिकॉर्ड रखना , 15 स्टाफ को संभालना और शिकायतों का निपटारा करना , क्यूँ की कुरिअर का काम ही जल्द से जल्द चिट्ठियों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को पहुचना होता है , लोग एक्स्ट्रा पैसे इसी लिए देते थे / मैंने मेहनत की और 7 दिनों के भीतर काम सीख गया / एक सप्ताह के अन्दर ही , पुराने asst manager को हटा दिया गया और मुझे बना दिया गया / उस वक़्त लेबर law इतना प्रचलित नही था , सब सेट्टिंग से होता ,वरना एक प्राइवेट लिमिटेड co का asst manager 15 साल का हो ही नही सकता था /
मेरी जिम्मेवारियां बढ़ गयी , मुझे महत्वपूर्ण चाभियाँ इत्यादि सौप दिए गये / मैं सुबह 8 बजे आ कर ऑफिस खोलता और रात के आठ बजे तक एक मशीन की तरह काम करता / धीरे धीरे एक महीने में ही मैं मालिक का सबसे मेहनती और वफादार स्टाफ बन गया / मेरी तरक्की की स्पीड देख के ,मेनेजर साहब को भी अचम्भा होता और , अब शायद वो भी डरने लगे थे मुझसे , क्यूँ की accounts तो वही देखते थे , मगर मुझे कुछ घपलों का पता चल चुका था के ये लोग , co को कैसे चूना लगाते थे / शायद इसी वजह से डेली अकाउंट देखने का काम भी मालिक ने मुझे सौप दिया / मैं था तो उस वक़्त बच्चा ही , कच्ची उम्र में ही उस जगह आ गया था जिसे मार्केट बोलते हैं , जहाँ मैनेजमेंट के तीर कमान चलते थे / सब एक दूसरे के कंधे पे पैर रख कर आगे बढ़ना चाहते थे , और मैं एक कोमल और आसान कन्धा था / मेनेजर साहब ने मुझे मोहरा बनाने की तय्यारी कर ली थी / उन्होंने धीरे धीरे मेरे से नजदीकियां बढाई, और पहले मुझे विश्वास में लिया / मेरे दिमाग में उन्होंने भरा , के co. , co. होती है , मालिक , मालिक होता है, लेकिन स्टाफ को आपस में मिल कर रहना चाहिए और , एक दूसरे की गलतियों लो ढकना छुपाना चाहिए / धीरे धीरे वो मेरा इतना घनिष्ट हो गया के , मैं मैनेजमेंट के दाव - पेंच उनसे सिखने लगा / ये मेरे लिया बड़ा रोचक भी था , और एक नया तजुर्बा भी , क्यूँ के ये दाव - पेंच आगे बहुत काम आने वाले थे / मगर वो तो पुराने घाघ थे / एक दिन वो मुझे एक बार (Bar) में ले गये , मैं हर स्थिति में जल्दी से जल्दी आगे बढ़ना चाहता था / जीवन में पहली बार उस दिन मैंने बियर पी / मैं वो हर चीज़ करने को तय्यार था जो मुझे तरक्की दे सके , मेरे पास समय कम था , ऐसा मुझे लगता था / कुछ दिनों बाद ही मैं उनके साथ कभी कभी शराब भी पीने लगा , उम्र अभी भी 16 की नही हुई थी मेरी / मैं ये जान ही न पाया के सब के पीछे एक खेल है , मैं उस खेल को समझ नही पा रहा था , मुझे उनपे विश्वास जो था / मगर वो तो एक प्रोफेशनल गेम खेल रहा था , उसकी सत्ता के लिए मैं खतरा जो बनता जा रहा था /
मेरा रिजल्ट भी अभी आया नही था , कही खो गये थे इस मार्केट और वयस्तता के बीच मेरे सपने / मैं अपने को काम काजी आदमी सा महसूस करने लगा / सुबह 8 से शाम को 8 तक काम, फिर मेनेजर साहब के साथ दाव पेंच सीखना और घर आके सोना / मैं घर से फ्री हो चुका था , १०-११ बज जाते घर आते आते / सन्डे को दोस्तों से भी नही मिल पता था , एक ही चीज़ याद थी बस , पैसा / मेरी हालत ३ महीने में ऐसी हो गयी के , मुझे २-३ दिनों तक घर के सभी सदस्य देख नही पाते थे / देर रात आता और सुबह जल्दी निकल जाता / मैंने काम पूरा संभाल लिया था , घर के खर्च में आधी हिस्सेदारी भी करने लगा था / नई नई पार्टियाँ पकड़ के अपना कमीशन बढ़ा रहा था / मैं पूरा खर्च उठाना चाहता था , मगर २ हज़ार रुपये में उस वक़्त भी , 5 सदस्यों का भरण पोषण आसान नही था /
मैंने ऑफिस में काम करने का अपना अलग ही तरीका निकला , क्यूँ की मैं MBA तो था नही , न ही मैंने कही से ट्रेनिंग ली थी / मैंने अपने ढंग से तीन महीनो में हर चीज़ व्यवस्थित कर दी , और सबसे महत्व पूर्ण कार्य किया वो था कस्टमर्स और विभिन्न राज्यों के ऑफिस के शिकायतों का निपटारा / मैंने समय सीमा तय की , शिकायतों के निपटारे की उस वक़्त/ये एक नया प्रयोग था , जो आज कल के ज्यादा तर कॉल सेंटर्स आजमाते हैं / मेरा शिकायतों के निपटारे की समय सीमा अधिकतम 48 घंटे थी / अगले २ महीनो में , पटना का हर प्रमुख कुरियर सर्विस , और मेरा हेड ऑफिस और ब्रान्चेज़ , रवि शंकर को जानने लगे / मेरे काम करने के तरीके को ले कर सब प्रभावित थे , मैं one man army था / बात उड़ते उड़ते हेड ऑफिस तक पहुंची दिल्ली , और रीजनल ऑफिस कलकत्ता , मेरी सीधी बात होने लगी कलकत्ता के हेड से / हमारा ब्रांच उन्हीं के अन्दर था /
इधर पिता जी का व्यवसाय समाप्ति की ओर अग्रसर था / आखिर कर उन्होंने नौकरी करने को ठान ली , घर बैठने से तो यही अच्छा था / उन्होंने एक जगह जॉब कर ली / मुझे अहसास हुआ था , के समय कैसे करवटें बदलता है , जो co का मालिक रह चुका हो वो आज खुद नौकरी कर रहा है किसी के यहाँ / वक़्त अपना काम कर रहा था , और किस्मत अपना , गुज़ारा किसी तरह से चल रहा था / इसी बीच मेरा मैट्रिक का रिजल्ट आ गया , उम्मीद 70 % से ऊपर की थी मगर , 67 % ही नंबर आये / लगभग सभी सब्जेक्ट में 75 से 80 % नंबर थे , मगर बस संस्कृत , जिसमे मुझे अच्छे नंबरों की उम्मीद थी उसी में बस 49 % ही रह गया / खैर मैं संतुष्ट हो गया नम्बरों से / मैंने अपनी परिस्थितियों को देखते हुए कॉमर्स चुना और कॉलेज में दाखिला ले लिया / मेरा उस वक़्त मनोरंजन का एक ही साधन था, दोस्तों के साथ फिल्म देखना और सन्डे को क्रिकेट खेलना / उम्र धीरे धीरे बढ़ रही थी , और नया जोश बन रहा था / मैं अपने आप को स्मार्ट समझता , देखता के नज़रें पीछा करती हैं, मगर मेरे पास उन नज़रों का पीछा करने का वक़्त कहाँ था / लगभग मेरे सारे मित्र कही न कही किसी न किसी के साथ प्रेम सम्बन्ध में डूबे थे , मगर मेरा केस अलग ही था , तन्हा अकेला / कभी कभी इस विषय पर मैं सोंचता , मगर केवल गाना गा के , या सुन के अपने को बहला लेता /
हमारी co उस वक़्त नोर्थ के लिए एक और co से जुड़ गयी , जिसका पूरे भारत में 500 से ज्यादा शहरों तक पहुँच थी / उसका नाम पुष्पक प्राइवेट लिमिटेड था / उसके मालिक से मेरी कुछ ही दिनों में घनिष्टता हो गयी / हमारी co की नीति के तहत हम पहले अपने co. के document को प्राथमिकता देते थे और इस वजह से ,पुष्पक का काम यहाँ ठीक ढंग से नही हो पा रहा था / पुष्पक अपना खुद का ब्रांच खोलना चाहती थी , और एक बंगाली बाबु इसी सिलसिले में पटना आये / मैंने ही उनके रहने खाने इत्यादि का बंदोबस्त किया / रात को होटल में उन्होंने मेरे से बात की , मेरी जानकारी को परखा और मुझे बधाइयाँ दी / मैं उनकी सेवा में दो दिन रहा , वो मेरे से प्रभावित हुए / उनके जाने के करीब 2-३ दिनों बाद , मेरे ऑफिस के फ़ोन पर ही पुष्पक के मालिक का कलकत्ता से फ़ोन आया , उन्होंने मुझे STD से रात में बात करने को कहा / शाम को ऑफिस से छूटने के बाद मैंने उनसे बात की / मेरी ख़ुशी का ठिकाना नही रहा के वो मुझे पटना ब्रांच सौपना चाहते थे , incharge बना के , और तनख्वाह 5 हज़ार महिना / अंधे को क्या चाहिए थी , दो ऑंखें / मैं खुश था , मगर उनकी एक शर्त थी , जमानत राशी जमा करने की , 20 हज़ार रूपए / मगर मैं तय्यार था , मैं उधेड़ बुन में लग गया ,और मैंने तय किया के , इसके बारे में मैं अपने मेनेजर जिसे मैं गुरु मानता था , उससे बात करूँगा / शाम को मैंने उनसे बात की , उसकी आँखों में चमक आ गयी , उसे वो हाथ लग गया जिसका उसे इंतज़ार था / उस वक़्त उसने मुझे आश्वाशन दिया और आधे पैसे देने का वादा भी / मैं अब बाकि के पैसे के लिए सोंचने लगा , सारी कोशिशे जो हो सकती थी की मैंने , जब मुझे लगा के मैं कर लूँगा मैंने शाम को पुष्पक के मालिक को फ़ोन लगाया और बात पक्की कर ली , मुझे एक सप्ताह के अन्दर पैसे जमा करने थे , उसकी भी यही शर्त थी की इसके बारे में मेरे मालिक को कुछ पता नही चले / मगर किस्मत को तो कुछ और मंजूर था ,,,,इस मार्केट के उसूल अब धीरे धीरे पता चलने थे , मुखौटे के अन्दर का चेहरा अब सामने जो आना था /
अगले दिन जब ऑफिस गया तो मालिक ने मुझे केबिन में बुलाया , मुझसे पूछ ताछ की , मैंने सब बता दिया / उन्होंने मुझसे बोला के तुम मेरा ही बिज़नस चौपट करना चाहते हो , मैंने कहा के नही , मैंने दूसरी co. के लिए बात की थी , न की आपकी / ये भी कहा के , मैंने नही उन्होंने मुझसे संपर्क किया / उन्होंने मुझे उस वक़्त कुछ नही कहा , मगर मुझे पता चल चुका था के , इस विषय पे मेनेजर साहब ने ही उन्हें सूचित किया था , ताकि मुझे नौकरी से निकाल दिया जाये और उनकी सत्ता पर से खतरा हट जाये / अगले चार पाँच दिनों में ही एक नया लड़का रख लिया गया , और उसे ट्रेनिंग देने को मुझसे कहा गया / मैंने ट्रेनिंग दी , और चूकी चीजें व्यवस्थित थी , लड़का भी काम सीख गया , काम चलाने लायक / मुझे नौकरी से हटा दिया गया / मैं शाम को मेनेजर से मिला और बस यही कहा के अपने धोका किया है , और ये ठीक नही है /वो मुस्कुरा कर बोला के , उसने co के प्रति वफादारी दिखाई है और मैंने गद्दारी / खैर मैं बुझे मन से घर वापस चला आया / एक बार फिर से मुझे नई नौकरी की तलाश करनी थी / मैंने घर में किसी को कुछ नही बोला ,, शांति पूर्वक छत पे जाकर , विचार करने लगा / एक बार फिर बना बनाया सपना टूट चुका था / मैंने करीब 8 महीने नौकरी की थी वहां , मगर वहां से बहुत कुछ सीखा था / ये भी के लोग जो अपने दिखते है वो कितने स्वार्थी हो सकते हैं / मेरे साथ कितना बड़ा खेल खेला था मेनेजर साहब ने , लेकिन मुझे सीख भी बहुत बड़ी मिली थी /
अगले दिन मैं फिर से नई नौकरी की तलाश में निकल गया / मेरे पास स्किल तो था ही और मार्केट में मेरी पहचान भी / अगले दिन ही अपेक्षाकृत छोटी नौकरी मैंने ढूंढ़ ली / मुझे चार पाँच दिनों बाद ज्वाइन करना था / इस खाली समय में मैंने , कॉलेज के क्लास किये / पहले दिन ही कॉलेज में घुसते ही नज़ारा देखा के , एक लड़के हो , 10 लड़के मिल कर पीट रहे हैं / संवादों से पता चला के , किसी लड़की वगैरह का चक्कर था / उसे अनदेखा कर मैं कॉलेज में गया / चुप चाप क्लास की , और वापस आ गया / शाम को दोस्तों के साथ मस्ती की , और घर आकर बताया के मैंने नौकरी छोड़ दी है और ये भी के दूसरी पकड़ ली /
चार पाँच दिनों घर पे रहने के बाद अहसास हुआ के , नौकरी छूटने के बाद , आदमी की क्या हालत हो जाती है घर में / लोगों का नजरिया भी बदल जाता है / मैं ये भी सोंच रहा था , के पिता जी पे क्या बीती होगी , शायद इसी सब परेशानी से बचने के लिए पिता जी ने , नौकरी की है ताकि वो व्यस्त रह सकें / दोस्तों के पास दो चार दिन बिताये तो पता चला के , 8 महीनो में स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं / बिहार में युवा बर्बाद हो रहे थे , काम और रोजगार की काफी कमी थी / नौजवान पीढ़ी गलत रास्ते पर तेज़ी के साथ बढ़ रही थी , चारों तरफ अंधकार का ही बोलबाला हो रहा था / रोज़ अपहरण , क़त्ल , लूट की घटनाये सुनने को मिलती / ये सब देख से मेरा मन यही होता के , मेरा भविष्य यहाँ नही कही और है / मगर अभी चारा भी कुछ नही था / मेरी उम्र ही कितनी थी , अभी 17 साल भी पूरे नहीं हुए थे /
उसी दौरान एक दिन मेरे घर उन दोस्तों की टीम पहुंची जिनकी उम्र मेरे से चार पाँच साल बड़ी थी / उन्होंने सीधे मुझसे कहा के दिल्ली चलना है , पूछने पर कारण ये पता चला के रक्त दान करने / पता चला के , हमारे एक मित्र के सम्बन्धी दिल्ली के AIMS में भर्ती थे , उन्हें खून की सख्त जरुरत थी / उस वक़्त दिल्ली में खून बेचने का व्यापर बड़ी तेज़ी के साथ चल रहा था / AIMS ने सुरक्षा कारणों से , केवल निजी सम्बन्धियों से ही खून लेना शुरू कर दिया था, किसी भी blood bank इत्यादि से खून लेना बंद कर दिया था / वो जितना खून लेते उतना ही खून मरीज़ के ग्रुप के हिसाब से अपने निजी बैंक से दे देते थे / मामला गंभीर था , हम 8 लोग थे , मैंने हामी भर दी / घर आया और कुछ कपडे वगैरह पैक करने लगा , घर वालों ने जब पूछा तो बता दिया मैंने के दिल्ली जा रहा हूँ, खून देने / पहले तो उन्होंने आश्चर्य किया मगर , जब मैंने बताया के मैं अच्छा काम करने जा रहा हूँ , तो सब ने हामी भर दी / शाम की ट्रेन से मैं दिल्ली के लिए दोस्तों के साथ रवाना हो गया / मैं पहली बार इतने लम्बे सफ़र पर था, और दिल्ली के भी / ये ट्रेन यात्रा भी मेरे लिए एक सीख ही रही / जैसे जैसे मैं दिल्ली के नजदीक पहुँचता गया , वैसे वैसे मुझे अहसास होने लगा के, बिहार के लोगों की क्या इज्ज़त रह गयी है बाहर, मजाक का पात्र है वो / अलीगढ स्टेशन पे वहां के लोकल लोगों ने स्लीपर बोगी पर कब्ज़ा कर लिया , जो भी बोलता उसे बिहारी और पता नही क्या क्या बोलते थे वो लोग / हमारी संख्या भी कम नहीं थी , आठ लड़के थे हम , हमारी जबरदस्त झड़प हुई उनसे / खैर हम दिल्ली पहुंचे , मेरी बोलने की शैली पहले से ही थोड़ी अलग थी , और थोडा बहुत मैंने रास्ते में भी सीख लिया था / दिल्ली , कही साफ कही बहुत ही गन्दी थी , बड़े बड़े नालों के ऊपर बने घरों में रह रहे लोगों को देख कर दुःख हुआ , क्या यही है हमारी राजधानी / चारों तरफ भाग दौड़ , शोर शराबा , ऊँचे बिल्डिंग्स को छोड़ कर कोई भी अंतर नहीं लगा मुझे दिल्ली और पटना में / हम वहां बिहार भवन में रुके , जो के कनाट प्लेस के पास था / वो बहुत ही बढ़िया जगह थी / वहां आकर ये लगा के हाँ , ये राजधानी जैसा लग रहा है /पालिका बाज़ार गया , वहां भी बहुत अच्छा लगा , मज़ा आया , भूमिगत मार्केट में घूम के / सबसे अजीब मुझे वहां पानी बिकता हुआ देख कर लगा / पानी की किल्लत उन दिनों भी थी दिल्ली में / यमुना को देख कर अहसास हुआ के विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से एक क्यूँ कहा जाता है दिल्ली को /
अगले दिन हमें AIMS में जाना था , सुबह हम सारे लोग AIMS में पहुंचे , वहां पहुँच कर यमलोक जैसा अहसास हुआ / पर्चियों की इतनी लम्बी कतार देख कर बड़ा अचम्भा हुआ / किसी किसी की पर्ची तो 4 दिनों से वहीँ थी / बड़ा अजब गजब माहौल था वहां का / वहां खून देने वालों का पहले एक वरिष्ठ डॉक्टर साक्षात्कार लिया करते थे, ताकि वो सुनश्चित कर सकें के ये मरीज़ के अपने ही रिश्तेदार हैं , किराये के नहीं / हमें साक्षात्कार के लिए ले जाया गया , वो कोई लेडी डॉक्टर थी / मगर उनके केबिन में जाने की, मेरे वरिष्ट मित्रों को हिम्मत नही हुई , और मुझे ही बात करने को कहा / मैं डॉक्टर साहिबा के सामने उपस्थित हुआ / उनका व्यक्तित्व बड़ा ही अच्छा था , बाल कन्धों तक कटे हुए , और चश्मा नाक के नोक पे टंगा हुआ , उन्होंने मुझे घूरते हुए मेरा नाम पूछा / मैंने बताया , मुझसे पूछा के मरीज़ मेरा कौन है, मैंने बताया के मेरे मित्र का सम्बन्धी / उन्होंने मेरे से कुछ देर बात की , फिर बोली की मेरी बात करने की शैली बिहार के लोगों जैसी नही है / मुझे हंसी आ गयी , वो अब तक गंभीर थी , मगर वो भी हंस पड़ी / मैंने उन्हें अपना टिकट और पहचान पत्र दिखाते हुए कहा के मैडम अगर भगवान ने मुझे बिहार में पैदा किया तो इसमें मेरी क्या गलती है ? वो फिर से हंसी , और मुझे कुर्सी पे बैठने को कहा / वो किसी चीज़ को लिखने में व्यस्त हो गयी और थोड़ी देर बाद मुझे परचा थमाते हुए बोली के, इसे blood bank ले जाओ , तुम्हें blood मिल जायेगा , किसी को भी blood देने की जरुरत नही है / मैं खुश तो हो गया , मगर मैं स्वयं तो अपना रक्त दान देना ही चाहता था / मैंने अपनी इक्षा ज़ाहिर की , उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी एक नर्स को निर्देश दे दिया / मैंने अपने दोस्तों को बताया के बिना blood दिए ही बैंक से blood मिल जायेगा , एक दो को छोड़ के बाकि बहुत खुश हुए क्यूँ की , वो वैसे भी डर रहे थे खून देने से / बाकि जो खुश नही हुए मेरे साथ हो लिए ,मैंने अपना पहला रक्त दान AIMS में किया , भारत की राजधानी में आकर / वहां हम लोग दो तीन दिन रहे , बहुत मस्ती की , और वापस पटना आ गये /
अगले दिन मैं नयी co में गया , जहाँ मैंने नई joining की थी /पुरानी co के मुकाबले वो छोटी थी , मगर उसका मालिक उसे बढ़ाना चाहता था , और मेरे अनुभव का इस्तेमाल करना चाहता था / मैंने वहां के सिस्टम को बदला , co के delivery एरिया को अपनी पुरानी जान पहचान से बढ़ाना शुरू किया /वहां भी मैंने लगभग 6 महीने नौकरी की , मगर फिर से वही हुआ , जब सारा सिस्टम दुरुस्त हो गया तो , मालिक की नज़र बदल गयी , उसने मेनेजर पोस्ट के लिए अख़बार में विज्ञापन दे दिया , और एक लड़की को मेरे सर के ऊपर बैठा दिया / मोहतरमा को भले ही ऑफिस का काम नहीं आता था मगर , मेकप करना और कान भरना अच्छी तरह आता था / ऑफिस का माहौल गन्दा होता जा रहा था , मैंने वो नौकरी भी छोड़ देने का फैसला किया / लेकिन इस बार मैं एक दिन भी खाली बैठना नही चाहता था , सो मैंने पहले ही नौकरी की तलाश की / एक और कुरिअर co जो हाई फाई थी, उसके रेट्स काफी महंगे थे , वहां मेरा आना जाना लगा रहता था / कारण था के वो हवाई जहाज़ से documents भेजते थे , इसलिए अधिकतर शहरों में 24 घंटे में डाक पहुँच जाती थी / अगर कोई urgent document होता तो हम उसपे एक्स्ट्रा चार्ज करते और , उस कुरिअर द्वारा भेज देते /उनकी मालकिन एक पंजाब की लेडी थीं , वो अक्सर अपने यहाँ काम करने का ऑफर देती थी / मैंने उनसे सम्पर्क साधा और मैंने अगले सप्ताह ही उसे ज्वाइन कर लिया / पिछले डेढ़ साल में मेरी ये तीसरी नौकरी थी / वहां कुछ ही दिन काम करने के बाद पता चला के इनका मुख्य काम दिल्ली , मुंबई , बंगलौर जैसे केवल बड़े शहरों में चलता है / अगले चार पाँच दिनों बाद ही , मालकिन ने मुझे बुलाया , और उसी दिन मुझे पता चला के मुझे रखने का इनका क्या उद्देश्य था / उन्होंने मुझे बताया के उनका दिल्ली ऑफिस सही ढंग से काम नही कर रहा है, और मुझे वहां जा कर उनके ऑफिस की व्यवस्था सही करनी है / समझा ऐसी रही थी , जैसे मुंह से शहद टपक रहा हो, असलियत जानने के बाद मैंने तुरंत मना कर दिया , मगर उन्होंने समझाया के , 10 - 15 दिनों के लिए मुझे जाना चाहिए और , मेरे लिए ये एक अच्छा अनुभव होगा /इतनी जल्दी जल्दी मैं नौकरी नही बदलना चाहता था , और अनुभव लेने वाली बात भी मेरे समझ में आ गयी / मैंने हामी भर दी /
घर आ कर मैंने बताया के मैं 10 दिनों के लिए दिल्ली जा रहा हूँ , काम के सिलसिले में / दो चार दिनों बाद मैं लगभग 17 साल की उम्र में , नौकरी के लिए दिल्ली टूर पे था / आज मैं सोंचता हूँ , के कितने कम उम्र में , मैंने अपना पहला ओफ्फिसिअल टूर किया था / मैं इससे पहले हाल ही में दिल्ली आ चुका था , और बिहारियों की स्थिति भी देख चुका था/ पिछली बार तो मैं साथियों के साथ था , मगर इस बार अकेला / इसलिए रास्ते भर मैंने , दिल्ली की टोन को सीखने की कोशिश की / अलीगढ के पास फिर से लोकल लोगों की दादा गिरी देखने को मिली /मुझे बताया गया था के , दिल्ली स्टेशन के पास पहाड़गंज में शीला सिनेमा हॉल के ठीक सामने ऑफिस है , जहाँ मुझे जाना है /मैं स्टेशन से बाहर निकला और , taxi , ऑटो , होटल चिल्लाते दलालों को अनदेखा करता हुआ , जैसे मैं यहाँ का पुराना बंदा हूँ , बाहर आया और , अपने दिल्ली के टोन का पहला प्रयोग रिक्शे वाले से शीला टाकिज पूछने में किया / उसने तुरंत मुझे बता दिया , वहां से पैदल का रास्ता था , सड़क पार करते हीं / मैं दिल्ली पहुच चुका था , इस बार दिल्ली के लोगों के बीच , दिल्ली को और अच्छे से जानने के लिए / मुझे रुकना ऑफिस में ही था , वही रुकने की व्यवस्था थी , वहां का मेनेजर एक पहाड़ी लड़का था / दिखने में काफी शांत और सीधा / खाना वगैरह खाने के बाद मैं ऑफिस की खिड़की से बाहर पुल को देख रहा था , रात के एक बज चुके थे , मगर , शहर अभी भी जगा हुआ था / मेरे दिमाग में अपने पिछले सफ़र की यादें आ रही थी, घर की, और माँ के हाथ के आलू के पराठों की भी / मैं काफी समय तक शुन्य को निहारता रहा था , तभी एक गाड़ी ने तेज़ ब्रेक लगाया, और उसकी आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी / मैं सो गया , अगले दिन के सफ़र पे दुबारा चलने के लिए /
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