मंगलवार, 8 नवंबर 2011

NAYI PEHCHAN

मैंने कभी भी पढाई को एक बोझ की तरह नही लिया था / मुझे maths के सवाल puzzle लगते और मुझे उसे बनाने में मज़ा आता था , history  एक कहानी की तरह लगती उसे कहानी की किताब की तरह पढता / किसी भी subject  से डर नही लगता था , और न मैं कभी पढाई पढाई करता / हाँ टाइम टेबल बना लिया था अब , 6 hrs एक दिन में काफी समझता था मैं , और बाकि चीजें भी साथ साथ चलती रहती थी / मुझे उस वक़्त कुछ ऐसा लगने लगा था , जैसे मेरे अन्दर कुछ कांफिडेंस की कमी सी है , इसे कैसे बढ़ाना है समझ नही आता था / मैंने उस वक़्त टीवी पे एक प्रोग्राम देखा जिसमे सेल्फ कांफिडेंस को बढ़ाने के कई तरीके थे , जिसमे एक तरीका था बड़े से आईने के सामने बैठ कर अपनी ही आँखों में ऑंखें डाल कर देखना / यही मुझे सबसे सस्ता और आसान सा लगा / मैंने प्रक्टिस शुरू की , 1 मिनट , दो तीन फिर 15 min तक लगातार देखने की आदत हुई, करीब 4-5 महीने मैंने ये प्रक्रिया अपनाई थी / मुझे अपने आप में परिवर्तन दिखा था / आज भी करता हूँ कभी कभी , ये अचूक है /

मैं भगवान् को मानना छोड़ चुका था  इसलिए मैं भूत को भी नही मानता था / मगर एक अनुभव ऐसा है जिसे मैं बताना चाहूँगा / हम जिस मकान में थे , इधर कुछ अजीब अजीब घटनाएँ होने लगी थीं / कभी किसी फ्लैट का दरवाजा अपने आप खुलने बंद होने लगता / कभी कुछ सुनने को मिलता कभी कुछ / मकान के पश्चिम दिशा में एक दूसरा मकान था / उसमे एक युवती ने आत्म हत्या की थी / वैसे तो शहरों में ऐसी अफवाह नही उडती मगर उस वक़्त आस पड़ोस के कई घरों में किसी साये का आतंक महसूस किया गया था / हमारा मकान ऐसा बना था जिसमे एक कमरा पश्चिम की तरफ और एक पूरब की तरफ था / हमारे फ्लैट के नीचे  स्मिता (मेरी शिष्या) का फ्लैट था , उसके पश्चिम वाले कमरे में एक बार स्मिता की आंटी जोरों से चिल्लाते हुए भागी थी , उसका कहना था के उसने एक हाथ दीवाल से निकलते देखा / हालत ये थी के पश्चिम की ओर वाले कमरे में कोई सोता ही नही था अकेला ,पूरे मकान में , सिवाय मेरे / क्या था पता नही , मै तो  भूत मानता नही था , इसलिए डरता भी नही था , छत पे अकेले रात को कोई नही जाता था , मगर मैं कभी भी चला जाता , हाँ किसी अनहोनी के लिए तैयार रहता , अपने को मजबूत बना के चलता / लोग जब पूछते के तुम्हें डर नही लगता ,तो बताता के भूत बक्टेरिया है , बस आँखों से दिखाई नही देते , अगर वो मुझे छू पायेगा तो मैं भी उसे लात घुसे मार सकता हूँ ,पर अन्दर से मैं उनके अस्तित्व को नकारता था /  बार बार मन में यही चलता के , भगवान् नही तो भूत भी नही / मगर इधर कुछ दिनों से , एक काली बिल्ली का आतंक मकान में हो गया था / कई लोगों को डरा चुकी थी वो बिल्ली, बंद रूम , अलमारी कही से भी अचानक प्रकट होके डरा देती थी / मेरा सामना मगर अभी तक उससे नही हुआ था / 
मेरी आदत थी अक्सर मैं रात को खाना खाने के बाद कोई जासूसी उपन्यास पढता , इससे मेरे दिमाग की कसरत होती थी / कमरे में अकेला सोता था , ११-११:३० तक जगता था / रात मुझे बहुत पहले से पसंद है दिन के मुकाबले / पूरी किताब दो रातों में ख़त्म कर दिया करता था / एक दिन की बात है , मैं किताब पढ़ते पढ़ते  बाथ  रूम जाने के लिए उठा , रूम का दरवाजा खोला बाथरूम गया , वापस आके दरवाजा लगाना चाहा तो देखा के , Door Stopper (पहले वो चौखट के बीच में हुआ करता था ) लगा हुआ है , केवल एक दरवाजे में / मैंने सोंचा , ये कौन लगा सकता है , पर मैंने ज्यादा ध्यान  नही दिया / दरवाजा लगाया , लाइट ऑफ की और सो गया / अगले दिन मैं फिर उपन्यास पढ़ रहा था , मगन था , पूरा ख़त्म किया/ मैं खुश था के आखिर इस बार भी मैंने उपन्यास में कातिल को पहले ही पहचान लिया , और सोने से पहले बाथरूम जाने के लिए उठा , मगर अचानक मुझे कल की बात याद आ गयी / मैंने इस बार ढंग से देखा के door stopper लगा है या नही, फिर मैं बाथरूम गया ,वापस आया और जैसे ही दरवाजा लगाना चाहा ........, दरवाजा नही लगा , door stopper फिर से लगा हुआ था / मेरे दिल में  ऐसा महसूस हूँ जैसे अचानक मेरा शरीर किसी गहरी खाई में चला गया है , शायद इसी परिस्थिति को देख कर किसी ने लिखा होगा, पैरों तले ज़मीन खिसक जाना , कुछ ऐसा ही  हाल था मेरा /
मैं डर तो गया था , मगर मैंने ज्यादा कुछ नही किया बस , उस दिन लाइट ऑफ नही की , और देर रात तक जगा रहा / अगले दिन मैं इस बारे में गहराई से सोंचता रहा ,किसी को बताया नही कुछ भी इस बारे में / मैंने फैसला किया के मैं आज इसका हल निकाल के ही रहूँगा के ये है क्या चीज़ ?
रात को मैंने एक गुप्ती (एक पतली और लम्बी बिलकुल सीधी तलवार जो छड़ी के अन्दर रहती है ) अपने बिस्तर पे रखी, दरवाजा केवल भिड़का कर छोड़ दिया , थोडा खुला भी छोड़ा , और उपन्यास पढने लगा / आज मैंने युद्ध करने की सोंच रखी थी , किसी अनजान ताकत से / मैं ऐसे लेटा था के दरवाजा मेरी दाहिनी तरफ था / करीब 12 बजे के आस पास दरवाजे के पास कुछ आहट हुई , पर मैंने केवल कान उधर कर रखा था , देख नही रहा था / तभी एक काली बिल्ली ने मुंडी अन्दर की और सीधे मेरी और देखा , मैंने भी उसे देखा , मैं उसकी आँखों में देख रहा था , और वो भी मेरे / लगभग 10 min तक यही हाल रहा , न वो भाग रही थी , न मैं नज़रें हटा रहा था / मैं समझ गया के ,ये ऑंखें नही झुकाने वाली , मैंने उसे हड़का दिया और वो भाग गयी / लेकिन इस बिल्ली का आगमन थोडा अजीब सा लगा / मैंने दरवाजा बंद किया और , गुप्ती को निकाल लिया , अपनी बगल में गुप्ती को लिटा के रखा , लाइट ऑफ की और लेट गया / कमरे में थोड़ी थोड़ी लाइट बाहर से आ रही थी , इतनी की कोई साया हो या चहल पहल हो तो देखि जा सके / पलंग जिस पर मैं लेटा था उसकी ठीक बगल में पैरों की तरफ एक टेबल था जिसपर एक पानी से भरा जग था जो के  प्लेट से ढका हुआ था, टेबल और पलंग के बीच लगभग एक फीट का फासला था / लगभग आधे घंटे मैं लेटा रहा अब  नींद मेरी आँखों पर सवार हो रही थी / लगभग अर्ध निंद्रा में मैं पहुँच चुका था , अचानक सामने टेबल पे रखे हुए पानी के जग का प्लेट गिरा और मेरी ऑंखें खुल गयी / मगर मैं अचानक से उठा नही , वैसे ही लेटा रहा , बस सामने देखने की कोशिश करने लगा के है क्या वहां , मेरी नज़रें टेबल पर जम गयी / वहां अँधेरे में मुझे जग के पीछे कुछ दिखा , एक ढेर सा रखा था , मैं वैसे ही चुप चाप लेटा था और मेरा दाहिना  हाथ गुप्ती पर था / शरीर में एक अजब सी हलचल हो रही थी , रोयें खड़े हो गये थे उस ढेर जैसी चीज़ को देख कर , पर मैं साँस भी धीरे धीरे ले रहा था / करीब १ min बाद , वो ढेर धीरे से उठा , वो एक बिल्ली जैसी चीज़ थी जो बिल्ली से आकार में बड़ी थी ...उसे देखते ही मेरे दिमाग से कोई तरंग निकल कर अन्दर ही अन्दर मेरी रीढ़ की हड्डियों में दौड़ने लगी / मेरा हाथ गुप्ती पर कस चुका था , वो बिल्ली जैसी चीज़ अब धीरे धीरे अपने पाँव टेबल से पलंग की और बढ़ाने लगी / उसने एक पाँव पलंग पर रखा , उसकी  पीठ का हिस्सा अब पलंग और टेबल की बीच के गैप पर था , और पिछले दोनों पैर टेबल पर /अब स्थिति ऐसी थी की अगर वो अपना अगला कदम बढाती तो सीधे मेरे पैर पे उसका पैर पड़ता , और उसने कदम उठा दिया , इससे पहले के वो अगला कदम रखती , मैंने पूरी ताकत के साथ गलियां देते हुए उसकी पीठ पर वार किया / चूँकि उसकी पीठ गैप के ऊपर थी , ऐसा लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है और वो , बीच से मुड़ के गैप के रास्ते, पलंग के अन्दर चली गयी / मुझे गुप्ती से किसी मांसल चीज़ से टकराने का पूरा पूरा अहसास हुआ / मैंने लाइट जलाई, सांसें तेज़ थी , और गलियां लगातार दे रहा था , गुप्ती में कोई खून वगैरह नही लगा था / मैं डरा भी हुआ था और आक्रामक भी था , मैंने पलंग पर बैठे बैठे ही पलंग के नीचे देखा, वहां कुछ नही था , टेबल के नीचे भी नही, कहीं नही / मैं और डर गया , मैंने वहीँ से माँ को आवाज़ लगाई मगर , माँ पूरब के तरफ वाले रूम में थी, बीच में गैलरी थी , आवाज़ पहुंची नही / हिम्मत कर के मैं नीचे उतरा , दुबारा पूरा रूम चेक किया , ऊपर नीचे सभी जगह देख , ज्यादा सामान भी नही था मेरे रूम में और फिर ...दरवाज़ा खोल कर बाहर निकला , और बाहर से कुण्डी लगा दी / मेरे रोंगटे खड़े थे , दिल की धड़कन कानो में सुनाई पड़ रही थी और नसों में खून की गति तेज़ थी , गैलरी से गुजरते हुए ऐसा लग रहा था जैसे मेरे पाँव को धरती अपनी तरफ खीच रही है / भारी लग रहा था हर कदम , मैंने माँ को जगाया , सारी बात बताई , माँ ने रूम खोला , पापा भी आ गये , सबने ढूंढा मगर कुछ नही मिला / उस रात पिता जी कमरे में ही सोए/ उस रात डर रहा था थोड़ी देर तक , पर अगले दिन से नही , हाँ ,  सुरक्षा कारणों से लाइट जला के सोता था , एक और अजीब बात हुई के , उस दिन के बाद से , उत्पात ख़त्म हो गये बिल्डिंग में / पता नही शायद उसे मेरे हाथों ही कोई मुक्ति टाईप चीज़ मिल गयी हो ?किसी को /

इसी बीच छठ पर्व आ गया और मुझे फिर से अपने ननिहाल जाने का मौका मिला / हर साल की तरह इस साल भी नाटक का मंचन होना था / मैं फिर से रिहर्सल  में पहुंचा मामा जी के साथ / मैं रोज़ रिहर्सल जाता था , और देखता के लोग कैसे एक्टिंग करते हैं / कहानी लगभग पूरी याद हो गयी थी रोज़ वहां जाते जाते /लेकिन नाटक के ठीक दो दिन पहले एक पात्र की तबियत ख़राब हो गयी / सब चिंतित थे के अब क्या होगा , क्यों की वो पात्र   ही सूत्रधार था पूरी कहानी का , वही कहानी की शुरुआत करता है और पूरी कहानी उसी के background में चलती थी / कहानी में वो रघुवीर बना था , जो हवेली का सबसे पुराना कारिन्दा होता है , पहले सीन में वो लगभग नब्बे साल का होता है , और वो ही दर्शको को कहानी सुनाता है, background  में भी वो 60  साल का होता है / रोल भी आसान नही था / मुझे याद है शाम को सभी बड़े कलाकार आपस में विचार विमर्श कर रहे थे , के रोल तो वही कर सकता है , जिसे कहानी की थीम पता हो , और संवाद भी / अचानक उन्होंने मुझे बुलाया और पहला सीन करके दिखने को कहा , मैंने किया , उन्होंने देखा , थोड़ी देर बाद फरमान आ गया के ये रोले मैं करूँगा / मैं हैरान था , नब्बे साल के बूढ़े का रोल 14  साल की उम्र में , मगर मुझे चुनौतियाँ पसंद थी / मैं जुट गया अपने एक्ट में / नाटक के दिन मैं ग्रीन रूम में अपना मेकअप कर रहा था / मैंने अपने हाथो से जूट की मूछ बनाई , गालों पे गोंद लगा कर , जूट के रेशे चिपकाये ताकि वो दाढ़ी जैसे लगे/ झुर्रियों के लिए फविकोल लगा के , पूरी बत्तीसी निकाली ताकि जहाँ जहाँ झुर्रियां पड़नी हो पड़ जाएँ / धोती कुर्ता पहन कर , गमछे को लपेट कर मैं पुरे मेक अप में  , बूढ़े जैसे चलने की प्रक्टिस कर रहा था , तभी वहां मामा जी आये और मुझसे बोले ,,,बाबा आप यहाँ क्या कर रहे है , दर्शक दीर्घा में जाइये , यहाँ केवल कलाकार ही रह सकते हैं , मैंने हँसते हुए कहा के , मामा जी मैं हूँ / वो मुझे पहचान नही पाए थे / तब से ही जब भी कोई नाटक मंचन होता है, मेक अप मैन मुझे ही बनाया जाता है / वो मेरे जीवन का इतने बड़े स्तर पर पहला stage एक्ट था / मेरी एक्टिंग की तारीफ हुई कई लोगों का स्नेह और आशीर्वाद मिला , क्यूँ की मैंने सफलता पूर्वक एक बुजुर्ग की भूमिका छोटी उम्र में ही निभा ली थी / मुझे लगा के हाँ , मैन एक्टिंग कर सकता हूँ / कालांतर में मैंने बहुत सारे अभिनय किये , मगर हर बार मै अपने पहले अभिनय को नहीं भूलता / बड़ा मज़ा आया उस साल ननिहाल में / 

मैं वापस घर आ गया था ननिहाल से , स्कूल की वार्षिक परीक्षा में अच्छे नंबर आये , मगर मैं संतुष्ट नही था , मुझे 75 % से ज्यादा नंबर चाहिए थे / मुझे पता नही क्यूँ , सुबह जल्दी जल्दी उठ के पढने से ज्यादा , रात को पढने में मजा आता था , सब कुछ शांत शांत सा रहता था / मैंने अपनी परीक्षा के अंतिम महीने में बहुत मेहनत की , लगभग 14 -15 घंटे पढ़ा करता था / सुबह 4 से 10 सोता और बाकि समय पढता था / मैंने रोज़ 1 - 2 घंटे क्रिकेट खेलना नही छोड़ा , परीक्षा के 1 दिन पहले तक भी, वो मेरी पढाई की थकान मिटा दिया करता था / रात को रोज़ एक थर्मस चाय रखता अपने पास और पढाई करता , सारी रात /  कोई कोचिंग नही टयूशन नहीं , सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत / कोशिश करता के , घरेलु समस्याएँ मेरे दिमाग पे हावी न हो जाएँ / 

बिहार के हालात अच्छे नही थे, राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका था / ऐसे में ही हमारी परीक्षा की डेट निकल आई / हमें संगीनों के साये में परीक्षा देनी थी / सेंटर घर से 12 कम दूर था , रोज़ ट्रेन पकड़ के जाना होता था, ऑटो से नही जा सकता था / सेंटर पर ढेर सारे जवान वहां बन्दूक लिए खड़े होते , बहुत छानबीन होती थी / मेरे रूम में किसी मिनिस्टर के बेटे का भी exam  पड़ा था / पुलिस वाले खुद उसके पास चिट लेके जाते थे , दुसरे दिन ही उस रूम का माहौल गन्दा हो गया था , चोरी होने लगी थी , चीटिंग करते थे, खुलेआम नही, पर होती थी, और किसी रूम में नही होती थी , पर वहां होती थी / वहां एक परीक्षक था , जो रोज़ मुझे देखता , और ये भी , के मैं इधर उधर बिलकुल भी ध्यान नही देता और बस लिखता रहता / इंग्लिश के पेपर के दिन वो मेरे पास आया और मुझसे पूछा के , तुम तांक झांक क्यूँ नही करते ? मैंने बिना उनकी तरफ देखे हुए कहा , सर मैंने पढाई में मेहनत की है , मुझे जरुरत नही , और वैसे भी मुझे अपने शब्दों में ही उत्तर लिखना है /वो बहुत प्रभावित हुए , और कहा के कभी कोई हेल्प चाहिए तो बताना / परीक्षा ख़त्म होने के बाद उन्हों ने मुझसे कुछ देर बात की , बताया के मैंने तुम जैसा विद्यार्थी आज तक नही देखा, कहाँ पढ़े , घर में कौन कौन हैं आदि इत्यादि / अगले दिन से लंच में वो मुझे teachers रूम में ले जाने लगे और वही मैं लंच करता / सभी परीक्षकों से मेरा परिचय करवाया / मेरे मित्र इस बात को जानते थे के मैं चोरी नही करता इसलिए मुझे इतना प्यार मिल रहा है , मगर वो साले फिर भी चोरी करते थे /  इतने के बावजूद   मैंने कोई मदद नही ली परीक्षक महोदय से, शायद इसका एक कारण ये भी था , के जो विश्वास एक बार बन जाये , मैं उसे कम नही करना चाहता था / लास्ट का पेपर बचा था संस्कृत का , जो मेरा एक अच्छा विषय था , दो दिन बचे थे परीक्षा के ख़त्म होने में / 
मैं अपनी ओर से बात चलाता रहता सब से की मुझे कोई नौकरी चाहिए , परीक्षा के तुरंत बाद /मुझे तसल्ली मिलती रहती थी / मैं किसी भी तरह की नौकरी के लिए तैयार था / लास्ट पेपर देने मैं परीक्षा भवन में आया / संस्कृत में  50 no, के वैकल्पिक प्रश्न हुआ करते थे उस वक़्त / परीक्षा शुरू हो गयी /परीक्षक महोदय आये और मुझसे मेरा प्रश्न पत्र माँगा , मैंने दे दिया , उन्होंने उसे बदल कर वापस कर दिया मुझे / अब जो प्रश्न पत्र मेरे पास था , उसमे सारे वैकल्पिक प्रश्नों के विकल्पों पे निशान लगा था , मैंने उनकी ओर आश्चर्य से देखा , मगर उन्होंने धीरे से कहा के , सारे उत्तर सही हैं , आज अंतिम दिन है , सोंचा मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूँ / अंतिम दिन मैंने वो गलती कर ही दी , मैंने सारे  वैकल्पिक उत्तर बिना दिमाग लगाये वैसे ही लिख दिए जैसे परीक्षक महोदय ने दिए थे , गलती मैं इसलिए बोल रहा हूँ , रिजल्ट में संस्कृत में ही सबसे कम अंक आये , जबकि मेरा प्रिय विषय था वो / परीक्षा ख़त्म हो चुकी थी / परीक्षक महोदय ने अंतिम दिन मुझे कुछ पुलिस वालों से भी मिलवाया , मेरी तारीफ की, मैंने नमस्कार किया और आशीर्वाद लेके घर की ओर वापस चल दिया / 
 रास्ते भर एक नए अहसास , आँखों में एक नई चमक से सराबोर रहा /  लगता  था जैसे मैं जल्द ही अब सब संभाल लूँगा , मैं बड़ा हो गया हूँ अब / मैं एक नए जोश में था , घर आया , रात को मुझे स्मिता के पिता जी ने मुझे बुलाया और पूछा ,क्या तुम नौकरी करोगे ?  अंधे को क्या चाहिए , दो ऑंखें , आज ही परीक्षा दे के आया और आज ही नौकरी का ऑफर , मैंने तुरंत हाँ कर दी /उन्होंने मुझे एड्रेस दिया और बोला कल 10 बजे चले जाना , और मेरा नाम बोलना/
रवि शंकर रात भर नहीं सोया , सपने देखता , मिटाता , फिर देखता , ऐसे ही पूरी रात काटी , 15 साल की उम्र में पहली बार किसी जॉब के interview के लिए जाना था , एक नई राह बनानी थी , एक नई पहचान /

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