सपनों को देखने की आदत तो बहुत ही पहले पड़ चुकी थी, अब तो ये समझना और करना था के , वो सपने पूरे कैसे होंगे ? पिता जी का ये हर तरीके के काम में टांग अड़ाना अब अच्छा नही लग रहा था / मेरे अन्दर एक ग़ज़ब का विरोधा भास हावी हो रहा था / मैं अब बुरा बनना चाहता था , विरोध करना चाहता था , मैं अपने आप को अब बड़ा मानने लगा था / मैं 9 वीं में पहुँच चुका था , और मेरे कुछ मित्र सिगरेट पीने लगे थे, मैं पीता नही था , मगर मैं तो बुरा बनना चाहता था , मुझे लगता था के मैं नोर्मल लाइफ जियूँगा अब , सारे मित्र मंडली के बीच तालियों की गड़ गराहट के बीच मैंने पहली दफा कांग्रेस मैंदान में सिगरेट पी/ खाँसा भी , आँखों से आंसू भी निकले मगर , दिखावे के लिए ही सही , सिगरेट पी तो ली ही / शाम को जब घर आया तो कई सवाल घुमड़ रहे थे , सारी चीजों का पूर्वावलोकन किया , दुबारा / सभी चीजें याद की / वो नोटों के बिस्तर पे सोना , धीरे धीरे बिजनेस का ख़तम होना , हर चीज़ का दूर जाना जो बचपन की जरूरतें एवं खुशियाँ थी, छोटी छोटी खुशियों के लिए अपने को और अपनी बहनों के स्थिति देख कर पहले तो समझ ही नही आता था , मगर अब इन सब का जिम्मेवार मैं अब पिता जी को मानने लगा / मैं बदल रहा था / मेरे रगों का गर्म खून और अब तक एक शांत , बहुमुखी और समझदार दिमाग पर हावी हो चुका था / मैं अब ये सोंचता के , ईमानदारी के बे वहज ढोंग का ही सब नतीजा है / जब वो पैसे कमा सकते थे वो ईमानदार बने रहे और आज जो भी हो रहा है , उनकी लापरवाही के कारण हो रहा है/ मुझे अहसास हुआ के , जो peon था आज उसके पास अच्छी दौलत है मगर मैनेजेर हो कर भी इन्होने कुछ नही किया / मुझे धीरे धीरे अपने पिता जी पे गुस्सा आ रहा था / सभी चीजों के दोषी वही नज़र आ रहे थे /
अब तय्यारी जोरों से करनी थी / मुझे जल्द से जल्द अपनी पढाई पूरी करनी थी , 10 th पास करना था , नौकरी करनी थी और फॅमिली को सपोर्ट भी /घर का माहौल ऐसा हो चुका था के , पढाई का सही माहौल नही बन पाता था / घर पे आते ही समस्यायों से घिरे सब को देख के दिमाग एक जगह लग नही पता था / इतने पैसे भी नही थे के मैं कोई सपोर्ट जैसे tution या कोचिंग ले सकूँ / जो करना था मुझे खुद ही करना था / मेरी सारी मित्र मंडली घर से दूर स्कूल के पास ही रहा करती थी / मैंने फैसला किया के मैं वहीँ जाकर पढाई किया करूँगा / वहीँ मुझे एक मित्र मिला , राजू / मैं उसके घर जाने लगा , वहीँ दोनों पढाई करते और खाली समय में , कैरम खेलते / उसके घर में मेरी के अलग ही पहचान थी /हम उसके घर पे ग्रुप बना के पढाई करते / अब तो ऐसा हो चुका था , के स्कूल से घर जाकर , वापस राजू के घर आता और देर शाम तक पढाई करता / जब तक वहां रहता अच्छे से पढता था /
उधर पिता जी का धंधा तो डूबता ही जा रहा था / अब मैं जेनेरल स्टोर का भी कुछ काम देखता था , साइकिल से मार्केट जाता और सारी मार्केटिंग करता शॉप के लिए / हालत अब इतनी बुरी हो चुकी थी के , बड़ी मुश्किल से काम चल पा रहा था / बीच बीच में बचे खुचे फैक्ट्री वाले आते और पिता जी की कुछ सेल होती / एक वक़्त था जब पिता जी का टूर हर वीक लगता और महीने में 6 - 8 ट्रक की सेल होती / आज सेल की हालत ये थी के 1 ट्रक मॉल 6 महीनो के लिए काफी होता / बड़ा ही बुरा वक़्त था / जैसे तैसे समय बीत रहा था / घर ही हालत अब ऐसी थी के माँ की साड़ी से बहनों के लिए सूट बनता / मैं उतारे हुए कपडे जो मेरे रिश्तेदारों या "स्मिता" (मेरी शिष्या) के पापा की हुआ करती थी , उल्टर करके पहनता / नए कपड़ों के लिए पैसे नही थे / पुराने दिन याद करता और रोता /घर में अगर एक सामान लाना होता तो बहुत पहले से प्लानिंग करनी पड़ती / दूध ,अख़बार, घी सब बंद हो चुका था , हमें सही ढंग से खाना भी नसीब नही था /मेरी माँ ने उस दौर में बहुत ही समझदारी से घर चलाया / दिमाग काम नही करता था , सोंचता क्या होगा ? कैसे होगा ? कब होगा ? लेकिन महापुरुषों की कहानियां पढ़ी थी , संघर्ष में भी खुश रहना , संतोष करना , आ गया था मुझे / हर हालात को , अपने गानों में भुलाने की कोशिश करता / गाना जरुर गाता था , और कोशिश करता के हालात मेरी पढाई पे हावी न हों / मगर अब मैं बच्चा नही था / चीजें परेशां करने लगी थी , और एक बहुत ही बुरी चीज़ मेरे अन्दर आ गयी , वो था गुस्सा / ढेर सारा गुस्सा ,तिल तिल कर बढ़ रहा था , और इक्कठा हो रहा था / ऐसा महसूस होता के दिल के अन्दर कोई समुद्र है , और उसके अन्दर कोई ज्वालामुखी , जो धीरे धीरे अपना विकराल रूप धारण कर रहा है /कब फूटेगा पता नही था /
बिहार का माहौल ऐसा हो चुका था के , पिस्टल , कट्टा रखना लडको के लिए आम हो गया था / बात बात पर अब गोलियां चलने लगी थी / लूट पाट अपहरण की घटनाये बढती जा रही थी / कई बार उस वक़्त ऐसा हुआ के , हम दो तीन लड़के एक चौराहे पे खड़े हों और पोलिसे की जिप्सी हमें चेक करने आती और पूरी तलाशी लेती, जब की हम केवल 9th क्लास में आये ही थे /मेरे ग्रुप के भी कुछ लड़के इस लाइन में आ चुके थे / मैंने उसने दूरी बना ली थी , मगर सम्बन्ध ख़तम नही हुए थे / मुझे याद है जब अख़बार में निकला था के , एक सेवेंथ क्लास के लड़के ने प्रेम प्रसंग के कारण अपने दोस्त को गोली मार दी / बहुत ही बुरा माहौल था / मुझे अब इस सिस्टम पे भी गुस्सा आने लगा था / वो पाटलिपुत्र जहाँ विश्व का सर्वप्रथम संविधान लिखा गया , वो आज अराजकता की चपेट में आ चुका था / हर बिज़नस करने वालों को गुंडों और नेताओ को चंदा देना पड़ता / हर जगह बदमाशों का बोलबाला था / दुकाने 9 बजे ही बंद हो जाया करती थी / 10 बजे के बाद कोई स्टेशन से कही और नही जा सकता था , लूट लिया जाता था /
दीपावली फिर से आने वाली थी / मैंने पहली बार बचत की सोंची , ताकि मैं सबके लिए पटाखे खरीद सकूँ , लगभग दो महीनो की मेहनत के बाद , मैंने करीब 250 rs इकठ्ठा कर लिए / इस दीपावली के दो दिनों पहले , मैं जब स्कूल से घर आया , तो सामने का दृश्य देख कर मेरा दिमाग घूम गया / माँ पीतल और ताम्बे के कुछ बर्तनों को संदूक से निकल रही थी , और एक बोरी में रख रही थी / मेरे पूछने पर माँ ने बहुत धीरे से बोला के , पैसे नही हैं , इसलिए इसे बेच रहे हैं , चुप रहना , किसी को बताना नही / मेरा दिमाग घूम गया , घर के असली हालात के बारे में मुझे अब ज्ञान हुआ / हालात यहाँ तक आ गये थे के , हमें बर्तन तक बेचने पड़ रहे हैं / आँखों से एक आंसू की लकीर निकल आई और पिता जी पे ढेर सारा गुस्सा , के उन्होंने कोई LIC या कोई बचत क्यों नही की / प्लानिंग क्यों नही की , जब वो अच्छे ढंग से परवरिश नही कर सकते तो , हमें जन्म ही क्यूँ दिया / और बेटे की चाहत में दो और संतान क्यूँ पैदा किया ? मन में हजारों सवाल घूम रहे थे , मन में आता था के , उन लड़कों से मिल जाऊं जो छोटी मोटी घटनाएँ करते हैं , और अपना जेब खर्च निकल लेते है , पर मैंने अपने ऊपर कंट्रोल किया /मैं मानता हूँ के केवल अपने उन्हीं माता पिता के और पूर्वजों के संस्कार के कारण मैं अपने ऊपर इतना कण्ट्रोल कर पाया , वरना मेरे भटकने में अब कोई कमी नही थी / उम्र , परिस्थितियाँ एवं समाज का वातावरण सब अनुकूल थीं , मैं भटक सकता था ,,,,कच्ची उम्र थी /
मैंने मूड को बदलने की कोशिश की , बाज़ार जा कर , ढेर सारे पटाखे ख़रीदे / अपने बचत के पैसों से, और भी कुछ कर सकता था , फॅमिली को दे सकता था , मगर मेरा टार्गेट था इसबार बहनों को पटाखों से खुश कर देना / इस बार की दीपावली भी अजीब थी, माँ और पिता जी अपनी जिम्मेवारियां पूरी कर रहे थे और मैं अपनी / दोनों का अंदाज़ अलग था , वो दाल रोटी खरीद रहे था , मैं चंद खुशियाँ / बहने बहुत खुश थी , चंद घंटे तक खूब हंगामा रहा , खूब पटाखे छोड़े / वो मेरे बच्चे जैसे थे ,उन्हें खुश देख कर , बहुत ही ख़ुशी हुई , लगा जैसे कुछ ना सही मगर , उनके लिए थोड़ी सी तो ख़ुशी खरीद ही डाली / पैसों से खुशियाँ खरीदी जाती है , उस दिन अहसास हुआ /
मैंने 9th पास कर लिया , अब मैं 10th क्लास में आ चुका था / हालात बदल रहे थे , उम्मीदें जग रही थी और सपने मरते जा रहे थे / फिर भी अभी तक आस नही छोड़ी थी , कहते हैं , जब तलक साँस है , तब तक आस है / मैं घर में सबको हिम्मत देने की कोशिश करता था / छोटे मोटे काम घर के करता , जहाँ तक होता सपोर्ट करता / एक और नई चीज़ आई थी मेरे अन्दर वो था , इलेक्ट्रोनिक्स से प्यार / मैं अपना रेडिओ , टीवी , टेप रेकॉर्डर खुद ही ठीक करता / नई नई चीजें करने की कोशिश करता / ख़राब tube light को diaod और बल्ब से जोड़ कर जलाता / छोटे मोटर से battery से चलने वाला पंखा बनाता/ पडोसिओं की भी मदद करता ,अगर उनका कोई सामान ख़राब हो जाता / मेरी सारी मेहनत और संघर्ष को राजू का परिवार बहुत सराहता , सपोर्ट करता मुझे , और हिम्मत देता के एक दिन सब ठीक हो जायेगा / मैं वहां जाकर अपने को खुश महसूस करता /मैं राजू की माँ को माँ ही बोलता , उसकी दीदी को दिदिया , भाई को भैया / परिवार जैसा था मेरा वो , और मुझे भी वो परिवार का सदस्य ही मानते थे / अपने दिल की साडी भड़ास मैं वहां निकलता , जो पिता जी पर थी / वो मुझे समझाते मगर मेरे तर्क के आगे चुप हो जाते और मुझे तसल्ली देते /
मुझे याद है वो दिल को झकझोरने वाला दिन , जब पिता जी ने मुझे बुलाया / उस कमरे में मैं , माँ और पिता जी थे , माँ ने किवाड़ लगा दी ताके बच्चे न सुने / पिता जी ने कहा , मेरे पास आज कुल नगद 20 rs हैं / मैं अब तुम लोगों के लिए नमक भी नही खरीद सकता , मेरे पास एक ही चारा है , मेरे साथ सब गाँव चलो , यहाँ मैं तुम सब का खर्च नही उठा सकता /ऐसा सुनते ही , मेरे पैरों तले तो जैसे ज़मीं ही निकल गयी / अब क्या करूँ ? मैंने कहा के ये कैसे होगा , जो कभी गाँव में नही रहे वो कैसे रहेंगे , सब की पढाई का क्या होगा ? मगर पिता जी कुछ नही बोले वो हिम्मत हार चुके थे , माँ बस रोये जा रही थी / मैं चुप चाप खड़ा था / बगल में ही एक कोने में पूजा घर था , मैं लगातार उनको देख रहा था जिनकी सुबह शाम , बिना किसी रुकावट के पिता जी ने पूजा की / कोई सहारा नही दे रहा था / मैंने अपने को संभाला , फिर कहा के , कुछ दिनों की बात है , मैं जल्द ही घर संभाल लूँगा , आप चिंता न करो / पर मैं जानता था के ये सब कहना भर ही आसान था , करना बड़ा मुश्किल / फिर भी मैंने सांत्वना दी और छत पे जाके खाली आकाश को देखता रहा , मेरे सामने केवल बहनों के चेहरे घूम रहे थे / मैं ये सोंच रहा था के , कैसा अच्छा दिन बिताया था मैंने , बिना किसी कमी के , जो चाहा वो मिला था , मगर , ये कैसी घडी थी/ये कैसी परीक्षा थी , क्या हो रहा था , आज मैं अपने को अर्श से फर्श पे महसूस कर रहा था / वो दिन याद आते जब किसी बात की कोई कमी नही थी , एक एक चीज़ एक एक पल और आँखों में थे बस आंसू /
उस रात मैं घंटों छत पे रहा , मुझे भगवान से नफरत हो गयी / मुझे वो पत्थर की मूरत लगने लगे , और तर्क की बिनाह पर मैंने उन्हें केवल धोखा करार दे दिया , मैं नास्तिक बन गया /उस रात मैं सो न सका , diary में लिखा , "बदनाम न होता हमारे इश्क से अगर , तो शायद खुदा भी इतना मशहूर न होता "/ पता नही क्यूँ नफरत हो गयी थी उससे उसी दिन से /
सुबह उठते ही सभी चीजें जिनका सबंध भगवान् से था , सब बैग से निकल दिया , हर चीज़ जो शरीर पे धारण कर रखी थी सब कुछ /कोई तिलक नही , कुछ नही , एक मूर्ति रखी थी घर में , उसे छत पे ले गया , लातों से बहुत मारा उसे / टुकड़े टुकड़े कर दिए , पिसा मसला उसे , अपनी पूरी भड़ास निकाली , मेरे अन्दर इतना गुस्सा था के मैं खुद ही हैरान था / घर में सब ने पूछा के पूजा नही की ??? मैंने बोल दिया के मुझे अब ढोंग नही करना सब बकवास है , ये बन्दर की तस्वीर है, इन्सान ने इसे भगवान बना दिया है , मुझे नही करनी अब पूजा / उन्होंने कुछ समझाने की कोशिश की , मगर मेरा गुस्सा अब आँखों तक आने लगा था और मैं केवल उन्हें जहर भरी नज़रों से देखता हुआ निकल गया , मैंने पहली बार माँ को ऐसी गुस्से वाली नज़रों से देखा था, बस दो तीन सेकंड के लिए / दिन में मैंने अपने मित्रों से बात चीत की और कोई काम जिससे कमाई हो करने की सोंची / बहुत सोंचा मगर कोई हल न निकला / मैं एक ऐसे व्यक्ति से मिला जो वैसे तो वो दादा टाइप था , मगर मुझे एक समझदार लड़का , पढ़ाकू लड़का समझ कर बहुत प्यार करता था , मनोज नाम था उसका मगर लोग उसे "बॉम्बे सिटी " के नाम से जानते थे / वो अपने एरिया में , खोमचे , ठेले लगवाता , उनकी पोलिसे वगैरह से सेट्टिंग करता / मैंने अपनी हालत बताई , पहले तो उसने समझाया के पहले 10 वी कर ले , मगर मेरी जिद और तर्क के आगे झुक गया , और एक सिनेमा हॉल के आगे , एक बड़ा खोका देने का वादा कर दिया / वो स्टेशन के पास था , और मैं वहां से बहुत अच्छी कमाई कर सकता था / रोज़ हज़ार रूपए कमा सकता था , जगह मौके की थी /किराया था 1500 /- rs महिना / मैं बड़ा खुश हुआ / तेज़ क़दमों से घर पहुंचा और अपनी बात माँ को बताई , उसने कोई reaction नही दिया , मैं कुछ समझा नही , पर इतना जरुर समझा के , माँ ने पहले की तरह मना नही किया / शायद परिस्थितियों से मजबूर थी / शाम को मैंने पिता जी से बात की , पहले उन्होंने सारी बातें सुनी और फिर एक शब्द में मना कर दिया .."नहीं "/ मैंने पूछा क्यूँ नही ? वो बोले दुनिया क्या बोलेगी के मास्टर साहब का लड़का एक खोका खोल के बैठा है , ये नही हो सकता / मेरी समझ में नही आ रहा था , क्या बोलूं बस अन्दर का लावा फुट पड़ा और मैं मैंने बोलना शुरू किया - " कौन से लोग और कौन सी दुनिया , कौन देखने आ रहा है अब ? हम यहाँ तिल तिल के मर रहे है और आप अब भी अपने आदर्शों को अपनी दिखावटी शान में जीना चाहते हैं / मैं कोई चोरी तो नही कर रहा न , मेहनत करूँगा , जब तक कुछ नही बनता तब तक के लिए है सब / आप ने अच्छा जीवन जिया है , मगर परिस्थितियां अब अलग है आपको भी पता है /"
(मुझे आज ये जरुर अहसास होता है के भले ही मेरे जीवन में थोडा कष्ट लिखा था मगर उस तरह का काम नही , सो ऊपर वाले ने वो कम उस समय नही होने दिया / ) मुझे उस वक़्त बहुत ही बुरा लगा / मुझे लगा के मैं सब ठीक कर लूँगा, पैसा आने लगेगा तो मानगे कर लूँगा मैं /मेरी आवाज़ तेज़ थी , तेज़ सांसो के साथ मैंने ये सब बोला था / मगर पिता जी नही माने बल्कि ये बोल दिया अगर ऐसा किया मैंने तो वो घर छोड़ कर चले जायेंगे / मेरा दिमाग भन्ना गया , लग रहा था मानो दिमाग के अन्दर अचानक हजारों मधु -मक्खियाँ चल रही हों और उनका भयानक शोर , घन्न्न्नन्न्न्न ऐसा शोर /
मेरी समझ में ये नही आया के , इतना रामायण , पुराण, प्रेमचंद , भारतेंदु हरिश्चंद्र और न जाने कितना साहित्य पिता जी ने पढ़ा , मगर मेहनत कर के खाने से इन्हें क्यूँ परहेज़ है ? क्या कहेगी दुनिया , और जो सब्जी बेचते हैं , खोका चलते हैं , हम से ज्यादा कमाते हैं , क्या कहती होगी उन्हें दुनिया ? क्या वो इस दुनिया के नही / एक बार फिर मेरी सोंच मेरा विचार , पिता जी के आदर्शों की भेंट चढ़ गया / मुझे गुस्सा , नफरत , असमंजस सब एक साथ आ रहा था / मैं वहां से चला गया / डर था के गुस्से में कही कुछ ज्यादा न बोल बैठूं / फिर एक बार मैंने भगवान को गुस्से से देखा , और मन ही मन गाली दी / मुझे अब नींद ही नही आती थी , घंटो जगता था , सिर्फ सोंचता , छत पे जाता , गाना गा कर अपने को बहलाता , फिर नीचे आता और सोंचता / पढाई , टेंशन और ज्यादा सोंचने और जागने से मुझे एक बीमारी लग गयी .. "माइग्रेन" , सर में जब दर्द होता तो सर फटने सा लगता था / माइग्रेन के दौरान गुस्से का मतलब होता , बेहिसाब गुस्सा , मैं दीवारों पे घुसे चलता , अपने बॉडी को हर्ट करता था / मैं , मैं नही रहा था /
फिर भी मैंने पढाई करनी नही छोड़ी थी / रोज़ पढाई करता और सोंचता , जल्दी से पास कर लूँ / स्कूल में सब छुट्टी के बाद कोचिंग जाते मैं अपनी कोचिंग खुद लेता / नोट्स बनता , लिख के याद करता / सभी कुछ न कुछ रोज़ खरीदते मैं अलग खड़ा रहता / जब सब रेस्टुरेंट जाते चौमिन खाने , मैं बोलता मुझे चौमिन अच्छा नही लगता , जबके मैंने चौमिन खाया ही नही था / बस सब के साथ हंस कर , सबकी प्रॉब्लम सोल्व करके खुश रहता /जब किसी की कोई प्रॉब्लम सोल्व करता तो मुझे treat मिलती थी / मुझे याद है मेरे एक मित्र को किसी कन्या से प्रेम हो गया था , उनका प्रेम पुराना था , मगर इधर कुछ झगडा हो गया था उनके बीच / दोनों के बीच कोई बात चीत नही थी / राकेश नाम था लड़के का , उसने मेरी handwriting देखी थी , उसने मुझसे उसके बदले प्रेम पत्र लिखने को बोला / मैं चूँकि हमेशा से सबकी मदद करने की कोशिश करता था ,वो चीज़ भी जो मैंने पहले कभी नही की , वो भी करता था / बचपन से ही ज्ञान पाने की इच्छा तो थी ही , नई चीजें करना और उसका अनुभव लेना मेरी आदत थी / मैंने उस बंधू की मनोस्थिति को समझा फिर एक कहानी , एक रूप रेखा भावनाओ , परिस्थितियों की बनाई और एक लव लैटर लिखा /मैंने बोल दिया के ऊपर अपना और नीचे उसका नाम लिख दे बस / शाम को सुन कर ख़ुशी हुई की उनकी सुलह हो गयी /शाम को ही treat मिल गयी / मंडली में मेरी एक और चीज़ सामने आई / मैंने अपने दोस्तों के लिए 50 से भी ज्यादा लव लैटर लिखे होंगे , कारण था मेरी कल्पना शक्ति , मेरे शब्द और मेरी handwriting ./ मुझे हर लैटर के लिए treat भी मिला , ये भी सत्य है , और ये भी के , मैंने औरों के लिए 50 लव लैटर तो लिखे मगर अपने लिए एक भी नही लिखा था / ऐसा नही था के दूरियां मैंने बनाई हों,मगर दिक्कत बस इतनी थी के , शायद जो भी मिले कोई ऐसा मिला ही नही जिनके लिए कोई विशेष आकर्षण हो / वैसे भी मेरा दिमाग भी यही बोलता के , 10 th है बेटा , पहले पढाई कर ले / अभी पूरी उम्र पड़ी है ये सब करने को , हाहाहा , ये सब ज्ञान मेरे पास पहले से ही फीड थे जैसे , ये सब कम उम्र में ही बड़ी बड़ी किताबें पढने का नतीजा था /
10th के registration का टाइम था / पैसे नही थे मेरे पास registration के / बुक भी लेना था मुझे , कुछ लिए नही थे सोंचा था के लास्ट में ख़त्म कर दूंगा लेकिन अब बुक भी चाहिए थी .कुछ और भी / गेस पेपर वगैरह मुझे नही चाहिए था , मैं ninth से ही formate इत्यादी पर ध्यान रखता था , important questions दोस्तों की गेस पेपर से उतरता था , answer घर आकर अपने स्टाइल में लिखता, अपने शब्दों के साथ /मगर फिर भी , दो हज़ार रुपये तो चाहिए ही थे /उस दिन घर आकर मैं सोंच रहा था के मैं तो वहीँ आ गया जहाँ से पिता जी चले थे उन्होंने भी ऐसा ही कुछ झेला और फिर मैं भी ????कहीं समय अपने को दोहरा तो नही रहा ? मगर उस वक़्त भी मैंने यही सोंचा था के , अगर दोहरा रहा है तो जीवन में मौके तो मेरे पास भी आएंगे /अगर एक बार लाइफ में उनकी जितनी अमीरी और पैसा आ जाये तो मैं उसे ऐसे manage करूँ के वो ऐसे एकदम से ख़तम न होने पाए / मैंने हार नही मानी थी , न मैंने हर मानना सीखा था / खैर मैंने अपने रिश्तेदारों के पास जा कर पैसों की वयवस्था की , इसके लिए पहली बार घर से बाहर अकेले जाना पड़ा / रास्ते भर बस की खिडकियों से बाहर देखता और सोंचता जाता , मेरे संग तो कोई नही था फिर भी एक गाना मेरे दिमाग में उस वक़्त सदा गूंजता "जीत जायेंगे हम तू अगर संग है ,,,ज़िन्दगी हर कदम इक नई जंग है /
3 महीने बाद 10 th की परीक्षा थी, अब मैं ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पढाई में लगाना चाहता था /
10th के registration का टाइम था / पैसे नही थे मेरे पास registration के / बुक भी लेना था मुझे , कुछ लिए नही थे सोंचा था के लास्ट में ख़त्म कर दूंगा लेकिन अब बुक भी चाहिए थी .कुछ और भी / गेस पेपर वगैरह मुझे नही चाहिए था , मैं ninth से ही formate इत्यादी पर ध्यान रखता था , important questions दोस्तों की गेस पेपर से उतरता था , answer घर आकर अपने स्टाइल में लिखता, अपने शब्दों के साथ /मगर फिर भी , दो हज़ार रुपये तो चाहिए ही थे /उस दिन घर आकर मैं सोंच रहा था के मैं तो वहीँ आ गया जहाँ से पिता जी चले थे उन्होंने भी ऐसा ही कुछ झेला और फिर मैं भी ????कहीं समय अपने को दोहरा तो नही रहा ? मगर उस वक़्त भी मैंने यही सोंचा था के , अगर दोहरा रहा है तो जीवन में मौके तो मेरे पास भी आएंगे /अगर एक बार लाइफ में उनकी जितनी अमीरी और पैसा आ जाये तो मैं उसे ऐसे manage करूँ के वो ऐसे एकदम से ख़तम न होने पाए / मैंने हार नही मानी थी , न मैंने हर मानना सीखा था / खैर मैंने अपने रिश्तेदारों के पास जा कर पैसों की वयवस्था की , इसके लिए पहली बार घर से बाहर अकेले जाना पड़ा / रास्ते भर बस की खिडकियों से बाहर देखता और सोंचता जाता , मेरे संग तो कोई नही था फिर भी एक गाना मेरे दिमाग में उस वक़्त सदा गूंजता "जीत जायेंगे हम तू अगर संग है ,,,ज़िन्दगी हर कदम इक नई जंग है /
3 महीने बाद 10 th की परीक्षा थी, अब मैं ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पढाई में लगाना चाहता था /
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