बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

Naye Ahsas

 मुझे दीदी के शादी के समय पहली बार अपने दादा जी के धरती , यानि अपने पिता जी की जन्म स्थली जाने का मौका मिला / जो विद्यापति नगर के पास था / विद्यापति मैथली के एक प्रसिद्द कवी हुए और कहा जाता है के भगवन शिव शंकर स्वयं उनके घर पे आकर एक नौकर के रूप में रहे / मैं जीवन में पहली बार अपने पैतृक   गाँव आया था / बाद में मुझे पता चला के पिता जी यहाँ की जमीन बेचने के लिए आये हैं / क्यूँ के मेरे कोई चाचा ताऊ जीवित नही बचे थे , पिता जी गाँव का चक्कर लगा नही पाते थे /धीरे धीरे मेरे चचेरे भाइयों ने पिता जी से झूठ बोल बोल के , हमारी ज़मीन भी बेचनी शुरू कर दी / पापा जी जा नही पाते थे , सो उन्होंने घर के आसपास को छोड़ कर अपनी सारी ज़मीन बेच दी /इसका असर उस वक़्त तो नही लेकिन बाद में मुझे महसूस हुआ के ज़मीन का एक एक टुकड़ा खरीदना कितना मुश्किल भरा काम है /
मेरा जन्म दिन हर साल 4 सितम्बर को मनाया जाता था / हर साल केक आता था और बुलाये जाते थे रिश्तेदार / लेकिन इस साल कुछ गड़बड़ थी / हालात कुछ ज्यादा हिं ख़राब लग रहे थे मुझे / इस बार जैसे तैसे सब हुआ / मुझे ये महसूस होने लगा था के , पिता जी की हालत अब ज्यादा अच्छी नही शायद / फिर आया दशहरा , इस बार भी किसी के लिए नए कपडे नही ख़रीदे गये / अब धीरे धीरे मैं गंभीर होने लगा , और कोशिश की के बात करूँ पापा से के मैं एक दो और tution पकड़ लूँ , ताके मैं घर के खर्चों में हाथ बटा सकूँ / मगर माँ ने साफ मना कर दिया , बोली तू अपनी पढाई पे ध्यान  दे बस / मैं अब जल्दी से जल्दी पढाई ख़तम करना चाहता था , चाहता था के जल्दी से 10th पास कर लूँ ,फिर जॉब और पढाई एक साथ कर लूँगा / अब धीरे धीरे मेरा लक्ष्य बदल रहा था / समय और परिस्थितियां मुझे विचलित करने लगी थी / दीपावली भी आ गयी , इस बार पटाखों की संख्या भी काफी कम थी , छोटी बहने नाराज़ हो गयी / पहले तो माँ ने उन्हें समझाया फिर डांट दिया / चारों तरफ लोग एक से एक रंगीन और महंगे पटाखे चला रहे थे , और मेरी बहने रोती हुई आसमान में उसे छूटते  हुए देख रही थी /  मुझे पहली बार उस गरीबी का हल्का सा अहसास हुआ , मैंने सोंचा , शायद इसी को गरीबी कहते हैं /मुझे भी ग्लानी महसूस हो रही थी , मन कर रहा था , इनके लिए दुनियां भर के पटाखे ला कर दे दूँ , मगर करता क्या , मैं मजबूर और लाचार था / मैंने उन्हें समझाया के , अगले साल मैं ढेर सारे पटाखे ला कर दूंगा / मैंने उन्हें फुसला दिया  , और खुद को भी /


छठ पूजा बिहार और उसके आसपास के क्षेत्र का सबसे प्रमुख त्यौहार है / जिसमे महिलाएं व्रत करती हैं , अपने पूरे परिवार के लिए / बड़ा पर्व होता है और शहर में करना थोडा कठिन होता है / इसलिए माँ इस पर्व को अपने मायके में करती थी / कई लोगों का सहयोग वहां उन्हें मिल जाता था / एक और चीज़ अच्छी होती थी , वो ये के , सभी मौसियाँ अपने बाल बच्चों के साथ वहां पहुँचती थी और हमारा एक अच्छा सा "get together" हो जाता था / अक्सर हम दीपावली के एक दिन बाद वहां के लिए प्रस्थान करते थे / इस बार भी माँ हमें लेकर वहां के लिए चल दी / सुबह जल्दी उठकर , सब तैयार हो कर चल दिए / वो हलकी ठण्ड में बस पे ननिहाल जाना , वो सूरज का रस्ते में उगना , और मेरे बस के साथ साथ कुछ दूर उसका चलना मुझे बहुत अच्छा लगता / जब बस एशिया के सबसे बड़े नदी पुल "Gandhi setu" जो गंगा पे बना है , से गुजरता ,,,सभी का ध्यान गंगा को प्रणाम करने और उसमे सिक्के फेकने में लगा रहता ,मेरा गंगा के उस पानी में , लाल सूर्य से लाल हुए विशाल जलराशि को निहारने में /
मुझे प्रकृति से बड़ा प्रेम रहा है बचपन से हिं / मुझे पेड़ पौधे , नदी पोखर बड़े अच्छे लगते / सुबह की ओस , जो पत्तीओं के ऊपर मोतियों की तरह होती , उसे देख कर, मकड़ी के जाले जो गुलाब के पेड़ की टहनियों के बीच में बुने होते , और जब उसपर सूर्य की किरण पड़ती तो ओस जमे होने के कारण, सतरंगी से दिखाए देते , उसे देख कर , गुदगुदी से होती थी / बहुत ही अच्छा लगता था, सोंचता काश एक कैमरा होता और मैं इन्हें कैद कर लेता , मगर वो नही हुआ तो क्या हुआ , मैं अपने विचारों में उन्हें कैद करता था /
मेरा ननिहाल वैशाली जिले में है । भगवान महावीर की जन्म स्थली होने के कारण जैन धर्म के मतावलंबियों के लिये वैशाली एक पवित्र स्थल है। भगवान बुद्ध का इस धरती पर तीन बार आगमन हुआ। महात्मा बुद्ध के समय सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समान महत्वपूर्ण था। अतिमहत्वपूर्ण बौद्ध एवं जैन स्थल होने के अलावा यह जगह पौराणिक हिंदू तीर्थ एवं पाटलीपुत्र जैसे ऐतिहासिक स्थल के निकट है। मौर्य और गुप्‍त राजवंश में जब पाटलीपुत्र (आधुनिक पटना) राजधानी के रूप में विकसित हुआ, तब वैशाली इस क्षेत्र में होने वाले व्‍यापार और उद्योग का प्रमुख केंद्र था। भगवान बुद्ध ने वैशाली के समीप कोल्‍हुआ में अपना अंतिम संबोधन दिया था। इसकी याद में महान मौर्य महान सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दि ईसा पूर्व सिंह स्‍तंभ का निर्माण करवाया था।यह स्थान प्राकृतिक रूप से बड़ा ही मनोहर था , और मुझे अपने ननिहाल जाना बड़ा ही अच्छा लगता था /चारों तरफ पेड़ ही पेड़ , हरियाली खुले हुए खेत और मैंदान , भागता दौड़ता बड़ा ही अच्छा लगता / बकरी के , गायों के बच्चे , बड़े अच्छे लगते , उन्हें सहलाता और प्रेम वश उनका मेरा हाथ चाटना बड़ा अच्छा लगता , मैं बहुत खुश होता और हँसता/ यहाँ आ कर सब कुछ भूल जाता था / लगभग 70 लोगों का जमावड़ा होता था यहाँ / सुबह से देर रात तक केवल मस्ती धमाल / सभी मौसियाँ व्रत  रखती थी , माँ भी , महिलाएं लोक गीत गाती / हम सारे भाई , शाम को गाँव में घुमने जाते , हमारे शहरी पन को लोग घूर घूर के देखते , और हम छाती चौड़ी किये हुए , अपने को हीरो से कम न समझते / इठला इठला के चलते /

छठ वर्त के शाम को अर्ध्य देने के लिए घर से करीब पौने किलोमीटर की दूरी पर तालाब था , जहाँ हम सारे भाई सर पे अर्ध्य का टोकरा उठा कर ले जाते , टोकरा भारी हुआ करता था / तालाब तक नंगे पाँव पहुँचते पहुँचते ,सर गर्दन के अन्दर धसने सा लगता था , पर माँ कहती थी , जितना कष्ट होगा उतना ही आशीर्वाद मिलेगा / वैसे भी , सहन शीलता मुझमे बचपन से ही थी / अक्सर इसी वजह से मेरे भाई मेरे से दुखी रहते के , मैं ज्यादा चिढ़ता नही था , अच्छा बच्चा बन के रहता , और मौसियाँ मेरा उदाहरण देके , मेरे जैसा बनने का उन्हें उलाहना देतीं /
रात को अक्सर सारे भाई , बहने , भाभियाँ सब मिलके अंतराक्षरी खेलते थे , बड़ा मज़ा आता था , कभी कभी तो सुबह अर्ध्य के समय तक आपस में बातें करते रहते थे / इतने लोगों के सोने और ओढने की व्यवस्था न होने पर , पुआल के बिस्तर पे एक ही रजाई में 3 -3 लोग सोते थे , पर फिर भी उसका आनंद आता था /सब में कितना अपना पन हुआ करता था / सुबह अर्ध्य देने के लिए मुंह अँधेरे ही उठते और अर्ध्य देने तालाब पे जाते / अँधेरे में घाट के चारों तरफ जलते हुए दिए , कितने अच्छे लगते थे / केलों के पेड़ से बनाये हुए द्वार , और रंग बिरंगी साड़ियाँ पहनी हुई महिलाएं / अर्ध्य के बाद मैं अपना सबसे पसंदीदा फल , नारियल बड़े चाव से खाता और फिर गन्ना चूसता /
उस वक़्त आलू की खेती का समय होता / मुझे खेतों में कम करना अच्छा लगता / मैं खेतों में जा कर , आलू की बुआई में मामा जी की मदद करता , गायों  के लिए घास काटता, चारा काटता ,खेतो में खाद पानी लगाता, मुझे ये सब बड़ा अच्छा लगता , बाकि सब और खेल में रहते / मेरे लिए यही सबसे अच्छा खेल होता /
छठ के अवसर पे , ननिहाल में नाटक मंडलियाँ अक्सर नाटकों का आयोजन करती / मामा जी उनके डायरेक्टर हुआ करते थे / नाटकों के सीन के बीच में कुछ GAP हुआ करता था , ताकि अगले सीन की तय्यारी परदे के पीछे की जा सके / इस  साल मैं भी उनके रिहर्सल में उनके साथ जाता / वो मेरी एक्टिंग सीखने का पहला अनुभव था / मैं चीजों को देख के ही सीखा करता था / ध्यान से हाव भाव , संवादों को देखता , और ब्रेक्स में उन्हें गाना सुनाता / लोगों को आश्चर्य होता के ये लड़का नये फ़िल्मी गानों को छोड़ कर ,पुराने गाने इतना डूब कर कैसे गाता है ? सब सराहना करते / उस साल पहली बार नाटक मंचन के बीच मामा जी ने मुझे एक गाना गाने के लिए स्टेज पर खड़ा कर दिया / सामने सैकड़ों लोगों की भीड़ थी , मैंने गाया " दुनियां बनाने वाले , क्या तेरे मन में समाई ............." गाना ख़त्म होने के बाद तालियाँ भी मिली और पैसे भी / थोड़ी देर बाद दुबारा चढ़ाया गया , मैंने गया "सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है ....." /  शायद छोटी उम्र के  कारण लोग पसंद कर रहे थे / ये मेरा अनुभव मेरे बहुत कम आया बाद में , जिसका जिक्र आगे आयेगा /
अगले दिन शाम को दो तीन लड़कियाँ आयीं और पता नही दांत निकाल निकाल के मेरी बहनों  (मामा की लड़की ) के साथ क्या बातें कर रही थी , बार बार मेरी तरफ देख रही थीं , और मैं भावविहीन चेहरा बना कर , दायें बाएं देखता हुआ पोजे दे रहा था / कुछ देर बाद वो सारे मेरे तरफ आने लगे , और मेरे दिल की धरकन तेज़ होने लगी , पता नही क्यूँ ? उन्होंने शरमाते इठलाते हुए ,मुझसे  वो दोनों गाने उनके नोट बुक में लिखने का आग्रह किया , जो मैंने रात गाये थे /उस वक़्त मैं किसी स्टार के अपने को कम नही समझ रहा था / वो तो औटोग्राफ देते हैं , मैं पूरा गाना ही लिख रहा था , वो भी दोनों गाने , दोनों नोट बुक में / उन्होंने चारों तरफ से घेर रखा था / उनका मेरे handwriting  की तारीफ करना मुझे अच्छा लग रहा था / अजीब सा अहसास था , नया नया सा /
इसी साल मैंने एक और चीज़ सीखी अपने ननिहाल में , वो थी , साइकिल चलाना / हा हा हा हा , मुझे अभी भी हंसी आती है , अपनी sixth की हिंदी की किताब में मैंने एक पाठ पढ़ा था , साइकिल की सवारी / बस ऐसा ही कुछ हाल हुआ मेरा / घास से भरे एक मैदान में सुबह 8 बजे से लगा , और दोपहर 2 बजे तक कई बार गिरने के बाद आखिर कर साइकिल पे चढ़ के ही वापस घर आया , और पास पहुँच के फिर धड़ाम/ 
हम सब ननिहाल से वापस आ गये / अब मुझे एक और कीड़ा काटने लगा था / वो था साइकिल चलाने का , मैं चाहता था के स्कूल साइकिल से जाऊं/ मैंने डरते डरते एक दिन पिता जी से बात की , उन्होंने ऊपर से नीचे तक देखा फिर बोले की साइकिल चलाना कब सीखा? मैंने उन्हें बता दिया फिर उन्होंने मुझसे पूछा के ओवरटेक कैसे करते हैं ? मैंने वो भी बता दिया / उन्होंने इस शर्त पे साइकिल की चाभी दी के पहले मैं सुबह सुबह खाली सड़क पे इसे चलाने की प्रक्टिस करूँगा , फिर स्कूल जाऊंगा / मैंने बात मान ली / अब तो मैं हवा से बातें करता था , जहाँ जाना होता साइकिल से हीं जाता , दिन भर , हर फुर्सत में , साइकिल साइकिल और बस साइकिल / साइकिल भी उस वक़्त ठोस लोहे का हुआ करता था , भारी और ऊंचाई भी उसकी ज्यादा थी/ उस वक़्त मेरे दोनों पैर ज़मीन पर एक साथ नही टिक पाते थे , जब मैं साइकिल पर हुआ करता था / लेकिन मैं संभल लेता था / एक घटना याद है , मैं गोलचक्कर पे साइकिल मोड़ रहा था , और संतुलन न बना पाने के कारण सीधा एक पुलिस जिप्सी के पीछे साइकिल ठोक दी थी , सिपाही उतरा और जोर का चांटा मर कर बोला , " पहले गाँधी मैदान में जाकर चलाना सीखो , फिर रोड पर चलाना "/वो चांटा अब भी याद है , उस वक़्त से लेकर आज तक मैं हमेशा सावधानी से driving करता हूँ, भले ही आज उस साइकिल की जगह मेरे पास bike है / भगवान भला करे , मगर उसके बाद मैंने आज तक किसी को भी टक्कर नहीं मारी / ज़िन्दगी में कुछ छोटी मोटी घटनाएँ होती हैं , मेरा मानना है के , इन्हीं घटनाओ में जीवन जीने के रहस्य छुपे होते हैं / ये आप के ऊपर होता है , कि इन घटनाओं को अप अपने जीवन में कैसे उतारते हैं , उनसे क्या सीखते हैं, और उनका असर आपके जीवन में कब तक रहता है / 

अब मैं ninth में पहुँच चुका था / हलकी हलकी मूछें भी आनी शुरू हो गयी थी / रोज़ एक नया दिन लगता / आइने में अपनी बॉडी रोज़ निहारता / बाल कई बार संवारता , हर एंगल से अपना फेस देखता / चलने का तरीका बदल चुका था / बात करने का भी / उस वक़्त कुछ ज्यादा ही गोरा था / जब काला चश्मा लगा के चलता , तो लगता निगाहें घूर रही हैं मुझे / किसी भी रिश्तेदारी में जाता तो कुछ नज़रें पीछा करती थीं , पर वो क्या कहती थी , मैं नहीं जानता था , या फिर समझ नही पाता था /शायद वजह यही थी के , मैं जिस स्कूल में था , वो co-education वाला स्कूल नही था / इसलिए नैन मटक्का आता नही था मुझे / मैं खुद अपने नज़रें नीची कर लेता था / दोस्तों के बीच मैं एक समझदार व्यक्ति कि भूमिका निभाता / झगड़े निपटता , सुझाव देता , साथ पढने को प्रेरित करता ,नोट्स बनाने के तरीके , और याद करने के तरीके इजाद करता / मेरे प्रश्नों को याद करने का तरीका बड़ा अलग था / मैं रट्टा नही मारता था , मैं Answer को  , लाइन by लाइन याद करता , उसे rough में लिखता जाता , जब सारी lines याद हो जाती तो फिर उसे बिना देखे पूरे को दुबारा लिखता फिर 5 min  रुक के , fare करता / थोडा समय तो लगता , लेकिन वो मुझे कंठस्त याद हो जाते थे / मैं लिख के याद करता था / शायद लगातार लिखना ही , मेरे अच्छी handwriting का राज था / मुझे पढाई करने में कोई परेशानी नही थी , मुझे तो लालसा थी अच्छे से अच्छे नंबरों से पास होने कि , पर घर के हालात अब बिगड़ रहे थे , और मेरा दिमाग भी अब विचलित होने लगा था /उस वक़्त इन्टरनेट वगैरह की सुविधा उपलब्ध थी नही , बस एक ही सहारा था , किताबें, जिन्हें पढ़ पढ़ कर मैं अपना दिमाग पढाई के अलावा कही और लगाता / मुझे याद है , पिता जी का एक बक्सा हुआ करता था जिसमे , गुरु दत्त , प्रेम चंद, इत्यादि जाने माने लेखको की किताबे हुआ करती थी / अब मैं उपन्यास भी पढने लगा था / मोटे मोटे उपन्यास २ दिन में ख़तम कर दिया करता था /

ये वो दौर था , जब पिता जी के clients केवल गिने चुने ही रह गये थे , और जेनेरल स्टोर से ही कुछ आमदनी होती जो घर चलाने के कम आती / अब घर में कटौती शुरू हो चुकी थी / जहाँ 5 लीटर का तेल का डब्बा आता वो केवल २ किलो का रह गया / कई चीजें तेज़ी के साथ बदलने लगी / पिता जी को अनुभव था नही इस तरह किसी दुकान को चलाने का , इसलिए वो भी धीरे धीरे उधारी के भेंट चढ़ रहा था / इन सब परिस्थितियों के बीच भी मैं अपना ध्यान अपने लक्ष्य पे लेके चल रहा था / पढाई पूरे मनोयोग के साथ कर रहा था / 

दो और चीजें मनोयोग के साथ चल रही थीं , पेंटिंग और क्रिकेट / पेंटिंग अब मैं कर सकता था , मैं बड़ा होने लगा था , और पिता जी भी धीरे धीरे बदल गये थे , मेरे प्रति / एक बार फिर उन्होंने मुझे micky mouse का बड़ा सा पोस्टर बनाते देखा , मैं फिर डर गया / लेकिन उन्होंने कुछ कहा नही , बस इतना के पढाई पे ध्यान दो , केवल पढाई ही कम आयेगा / मैं उनके कमरे में गया और समझाने कि, अपना पक्ष रखने कि कोशिश करने लगा /
उन्होंने एक संस्कृत का दोहा बोला था , जो आज तक मुझे याद है " लालयेत पञ्च वर्षानी , दश वर्षानी ताडयेत , प्राप्ते तु षोडशे वर्षे , पुत्र मित्र वदा चरेत " अर्थात - बालक को पांच वर्षों तक दुलार प्यार करना चाहिए , इसके बाद  10 वर्षों तक उसकी गलतियों कि उसे सजा देनी चाहिए , और जब पुत्र सोलह बरस का हो जाये तो उसके साथ मित्र कि तरह व्यवहार करना चाहिए / हालाँकि मैं अभी 13 - 14 के बीच ही था मगर उन्होंने इशारा कर दिया था के अब , पिटाई कि संभावना कम है /
जूनून क्रिकेट का भी ऐसा था के , रोज़ सुबह गाँधी मैदान मुंह अँधेरे उठना और जाना , गर्मी हो , बरसात हो ठण्ड हो /मैं अच्छा कर रहा था , हमारी टीम ने भीम राव आंबेडकर अंडर 16 क्रिकेट टूर्नामेंट में हिस्सा लिया / पहली बार मैं स्टेडियम में खेला , उसी में जिसमे बाद में अन्तर्रष्ट्रीय मैच भी हुए / बहुत हीं अच्छा अनुभव रहा , काफी सराहना हुई , सबसे ज्यादा मेरी फील्डिंग कि , स्लीप और पॉइंट मेरे पसंदीदा spot थे / उस समय jonty rohdes का आगमन ही हुआ था और वो क्रिकेट जगत में छाया हुआ था / हर टीम अब फील्डिंग में विशेष ध्यान देने लगी थी , हर किसी को एक जोंटी रोड्स चाहिए था / मैं वैसे बैटिंग करता था , और कभी कभार स्पिन बोलिंग भी/ मुझे याद है क्वाटर फ़ाइनल मैच में , हमारा ओपनर batsman नही आया और मुझे भेज दिया गया / मैंने 24 रन बनाये , बाद में बोलिंग भी कि और तीन विकेट भी चटकाए , मुझे man of the match मिला हम सेमीफाइनल में थे/ मुझे एक छोटा सा पीतल का कप मिला , मुझे याद है जब मैं घर वापस आ रहा था तो बारिश होने लगी थी और मैं लम्बे लम्बे डग भरता हुआ उत्साह के साथ घर जा रहा था , हाथ में मेरा वही कप था , जो उस बारिश कि ठण्ड में मुझे तपिश देने का काम कर रहा था  / उस दिन मैं बड़े हर्ष के साथ घर आया और पहले माँ को और फिर पिता जी को सब कुछ अति उत्साह के साथ बताया / माँ ने तो शाबाशी दी मगर पिता जी के विचार मुझे नेक नही लग रहे थे / 
मेरा टार्गेट था उस ट्रेनिंग सेशन में अपने को साबित करना जिसमे मेरी एंट्री सीधी हुई थी , मेरे पिछले टूर्नामेंट के आधार पर / वो ट्रेनिंग सेशन सबा करीम के द्वारा दिया जाना था , जो उस वक़्त इंडियन क्रिकेट टीम में विकेट कीपर भी चुने गये थे / मौका अच्छा था , सुखदेव नारायण खेलने का , रणजी से पहले , सुखदेव नारायण ही सीढ़ी थी / बड़ा ही महत्वपूर्ण मौका था /मेरे पास अपनी किट नही थी , लेकिन मैंने अपनी टीम मेम्बेर्स से एक एक चीजें उधार लेकर अपनी किट तय्यार कर ली थी /दुगने उत्साह के साथ सुबह मैं प्रक्टिस के लिए निकला , ये क्या , नीचे गेट के पास आ कर देखा तो , गेट लौक था , मैं ऊपर गया , माँ सो रही थी, मैंने उसे जगाया और पूछा के ताला क्यूँ लगा है ? माँ ने कहा के , तेरे पापा ने मना  कर दिया है, क्रिकेट बंद /
मेरे ऊपर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा , मुझे वजह ही नही समझ आई के हुआ क्या है ? माँ आधी नींद में थी , गुस्से और दुःख के मारे मेरी सांसे तेज़ तेज़ चल रही थी / मैं समझ नही पा रहा था के मैंने किया क्या है ? मैंने माँगा क्या है , पढाई भी कर रहा हूँ सब कुछ , मगर ये है क्या ? मैं चुप चाप छत पे चला गया , और फूट फूट के रोने लगा / मेरे समझ में नही आ रहा था के कैसे समझाऊं मैं पिता जी को /

थोड़ी देर बाद पिता जी जगे , मैं गुस्से में था , रोया बहुत था लेकिन टेंशन ख़त्म नही हो रहा था / अच्छा मौका था मेरे लिए , किसी भी कीमत में मुझे उसे खोना नही था / मैंने बात करने का फैसला लिया , थोड़ी देर बाद मैं सीधा पिता जी के पास पहुंचा और पूछा के उन्होंने मुझे क्यूँ रोका प्रक्टिस से ? उन्होंने दो टूक जवाब दे दिया के क्रिकेट अमीरों का खेल है , मैं तुम्हारे लिए एक bat भी नही खरीद सकता ,  क्या फायेदा उस काम में समय बर्बाद करने का , जहाँ तुम पहुँच ही नही सकते / मैंने कहा के मैं आपसे कुछ नही मांग रहा हूँ, सिर्फ इज़ाज़त , अगर कामयाब हुआ तो अपने दम पे ही होऊंगा / उन्होंने अपने पडोसी दोस्त के बेटे का उदाहरण दिया , जो क्रिकेट खेलते थे , काफी कोशिश और पैसे खर्च किये पिता जी के मित्र ने , मगर उनके बेटे रणजी तक भी नही पहुच पाए, ( वो अभी रांची यूनिवर्सिटी में कोच के रूप में कार्यरत हैं ) / मैंने लाख समझाया के जमाना बदल गया है, क्रिकेट बदल गया है , लेकिन वो खुद क्रिकेट के दीवाने थे , नही माने / मेरा दिल अन्दर से चकना चूर हो गया , उसके टूटने की आवाज़ केवल मैं सुन पा रहा था और कोई नही / मैं उम्र के उस पड़ाव में था , जब रगों का खून उबलने में ज्यादा वक़्त नही लगता , हालाँकि मैं बड़ा शांत प्रवृति का था , मगर इस घटना ने मुझे पूरी तरह से बदल के रख दिया / 
मुझे अच्छी तरह याद है के , उसदिन मैं साइकिल नही ले गया स्कूल / केवल चुप चाप गुस्से में स्कूल की तरफ पैदल चला जा रहा था /  मन में विचार उठ रहे थे , मैं कही से गलत नही, मेरे साथ गलत हो रहा है , मुझे क्या करना चाहिए? मन बड़ा दुखी था / स्कूल पहुँचते पहुँचते मैंने तय कर किया , मैं अपने आप को पूरी तरह से बदल दूंगा , ये अच्छाई पालने से कुछ नही होगा / मुझे जो नही मिलेगा , अगर मैं सही हूँ , तो पुरजोर विरोध करूँगा , विद्रोह कर दूंगा / जीवन में पहली बार , मैं स्कूल की चार दिवारी फांद कर लंच से पहले ही ,   बाहर आ गया / मेरे साथ कुछ और भी मित्र थे जो अक्सर भागा करते थे , वास्तव में उन्होंने ही मेरी मदद की स्कूल से कैसे भागते है , बताने में / बाहर भाग तो आया , मगर करूँगा क्या ? फिर उन्हीं हमदर्द मित्रों ने बताया के वो फिल्म देखने भागा करते थे , उन्होंने साथ चलने का प्रस्ताव रखा / मैं विद्रोही तो बनना ही चाहता था , मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया / हम स्कूल से करीब 3 KM  दूर एक सिनेमा हॉल पहुंचे / आज भी है वो हॉल , ASHOK , वहां पिक्चर लगी थी , AJOOBA स्टारिंग अमिताभ बच्चन ,बैग वगैरह उन तजुर्बेकार स्कूल भगोड़ो ने पहले ही ठिकाने लगा दिया था / मैंने जीवन में पहली बार , बिना फॅमिली के पिक्चर देखी, अजूबा / बड़ा मजा आया , DOLPHIN को देख कर , और फिल्म के  जादुई तमाशों को देख कर / सोंचने लगा , काश कुछ ऐसी ही जादुई चीज़ मेरे हाथ लग जाती तो मैं सब ठीक कर लेता / पिक्चर देखने के बाद कुछ अजीब से तसल्ली हुई दिल को , शायद दिल को ऐसा लगा हो , के मैंने आज विद्रोह किया है , नफे नुकसान की चिन्ता किसे थी ? घर आया , किसी से कुछ नही कहा बस अपने समय से रात को सो गया / ऑंखें बंद करने के बाद AJOOBA के जादुई दुनियां में खो गया और कल्पना करने लगा के , अगर कोई जादुई चीज़ मेरे पास आ जाये तो मैं कैसे अपना और लोगों का भला करता , पता नही सोंचते सोंचते कब आंख लगी/ 
उस जादुई चीज़ की कल्पना या इच्छा केवल उस समय की नही थी / मैं आज भी इसकी कल्पना और इच्छा करता हूँ , काश वो मुझे मिल जाती और मैं सब ठीक कर देता ...काश............



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