मैं अपने भाई , और तीन और मित्रों के साथ दिल्ली की यात्रा पर निकला | इस बार पता नहीं क्यूँ मेरे अन्दर एक अलग सा आत्म विश्वास और आशा जग रही थी | मुझे ऐसा महसूस हो रहा था , के संघर्ष तो बचा है अभी , मगर अब मैं संघर्ष को हँसते हँसते झेल जाऊंगा | शायद इसकी वजह मेरे अन्दर आध्यात्म का जगना था | 17 घंटे की यात्रा के दौरान पूरे समय मैं आत्म केन्द्रित था , सारी घटनाये मेरे दिमाग के अन्दर घूम रही थी | अब मेरा चीजों को देखने का नजरिया धीरे धीरे बदल रहा था , अब मैं सोंचने लगा था , के जो भी सब कर रहे थे , वो कर्म के वशीभूत हो कर कर रहे थे | कोई भी बचपन से छली नहीं होता , वक़्त , परिस्थितियाँ , लालच अधिक धन कमाने की इक्षा इत्यादि , उन्हें ऐसा बना देती हैं | उनके अन्दर का अध्यात्म मरा हुआ होता है , और सांसारिक प्रवृति हावी होती है | मैं अब अपने आप को बदलना चाहता था , पूर्ण रूप से , ज्योत तो मेरे अन्दर जग चुकी थी | मुझे न किसी से बदला लेना था , न हीं किसी बात की चिंता करनी थी , मुझे बस अपने काम पर ध्यान देना था | मैं थक चुका था अब मैंने सोंच लिया था , के परिस्थितियां चाहे जो भी हों मैं , वहां से भागूँगा नहीं , न ही लडूंगा , आखिरी कोशिश करूँगा के मैं एक स्थान पर स्थिर हो कर काम कर सकूँ | मैं पूरे रास्ते बस किताबें पढता रहा , महामृतुन्जय मंत्र का जाप करता रहा | मेरे पास मेरी Diary भी थी , उस पर भी मैं कुछ कुछ लिखता रहा , जीवन के लक्ष्य , जीवन के मूल्यों और जीवन जानने की मेरी इक्षा के बारे में, जीवन से जो मुझे अनुभव मिले खट्टे मीठे , सब के बारे में कुछ कुछ लिखता रहा |
महिना नवम्बर का था ठण्ड भी बहुत थी , मैं अपनी मंडली के साथ , नई दिल्ली रेलवे स्टेशन उतरा | एक बार फिर से पहाड़गंज की यादें ताज़ा हो गयी , और एक अहसास भी , के शायद दिल्ली से मेरा कोई पुराना रिश्ता तो है , बार बार इस जगह आना मुझे कोई संकेत सा देता हुआ लगता | ट्रेन से उतर कर फिर से बस की थकाऊ यात्रा पे जाना था | पालम दिल्ली के दुसरे छोर पर था | हम करीब 4 बजे शाम को पालम स्थित सुलभ इंटर नेशनल के हेड ऑफिस पहुंचे | करीब दो घंटे लगे थे पालम पहुँचने में | वहां का नज़ारा देख कर ऐसा लगा जैसे पूरा बिहार वहां आ गया हो | चारों तरफ लड़के , जवान , बुजुर्ग भी , भीड़ लगी थी वहां , लोगों का ताँता लगा था | हमें सारी कागजाती कार्यवाही कराते कराते शाम के 6 बज गये , तब जा कर कहीं हेड क्वाटर में अन्दर घुसने का मौका मिला | ट्रेन और बस की यात्रा के बाद , दो घंटे बाहर बैग कंधे पर टांगे टांगे थक चुका था |अन्दर का नज़ारा तो और भी विचित्र था , बाहर से 3 गुने लोग अन्दर थे | चारों तरफ शोर ही शोर था | बहुत बड़ी जगह थी अन्दर में , चारों तरफ शेड थे , और उसके नीचे एक लाइन से जमीं पर लोग अपनी अपनी जगह बना रहे थे | कोई लेटा हुआ था , कोई बिस्तर लगा रहा था , कोई अपने सामान को सहेज रहा था ....भीड़ थी वहाँ, 700 लोगों की भीड़ थी वहां | इतनी बड़ी रिक्तियां देख कर मैं हैरान था , हमने भी अपने लिए जगह बनायीं , ठण्ड थी , मगर जमीन पर बिछावन करना मजबूरी थी | मजबूरियां क्या क्या नहीं करवाती | बहुत शोर गुल था , यहाँ आकर असल में पता लगा के , बिहार के लोगों के लिए एक "विशेष स्थान" क्यूँ है दिल्ली के लोगों में | कोई अनुशाशन नही दिखा मुझे वहां , ज्यादातर लोग अपनी बपौती समझ रहे थे उस जगह को | जिसको जहाँ मन आता वही सामान फ़ेंक देता, कहीं भी थूक देता | शरीर थक कर चूर हो चुका था , बाहर भी नही जा सकता था , भूख लगी थी , घर से कुछ सामान लाया था , जैसे तैसे खा के अपनी क्षुधा शांत की | तभी माइक पर घोषणा हुई और वहां धमा चौकड़ी मच गयी | वहां की स्थिति सँभालने के लिए 8-10 कर्मचारी लाठी और डंडे ले के आये और बड़ी मुश्किल से लोगों को संभाला | एक बड़े से हॉल में एक stage बना था और वहां 6-7 कर्मचारी बैठे थे | फिर से एक थकाऊ प्रक्रिया शुरू हो गयी , सबके नाम पता इत्यादि नोट करने का | 7 बजे शाम से शुरू हुई प्रक्रिया 9 बजे तक चली और केवल 150 लोगों का विवरण नोट हो पाया | इसके बाद घोषणा हुई के , सुबह 4:30 बजे सबको जागना होगा , क्यूँ की हेड क्वाटर में इतने लोगों के नित्य क्रिया एवं स्नान ध्यान की कोई व्यवस्था नही थी , इसलिए उनके विभिन्न सेंटर पर जाना होगा , जो लोग लेट हो जायेंगे वो रह जायेंगे | मैं इतनी ठण्ड में अपने जीवन में कभी भी इतनी सुबह नही उठा था , मगर करना तो था ही | इसके बाद घोषणा हुई के आप सब को खाना यहाँ दिया जायेगा , कृपया लाइन से ब्लाक नंबर १ में चले जाएँ , इतना सुनना था के फिर वही धमा चौकड़ी और फिर वही शोर और डंडे | चूँकि मैं नियम और अनुशाशन पर विश्वास रखता था , इसलिए खाने के लिए लाइन में लग गया | करीब १ घंटे बाद मेरा नंबर आया , जहाँ खाना खिलाया जा रहा था वहां केवल 30 लोगों के बैठने की जगह मात्र थी | एक दल खा कर जाता तो दूसरा दल 30 लोगों का अन्दर आता |इसलिए काफी इंतज़ार और धक्का मुक्की थी वहां , खाने में पूरी और आलू की सब्जी दी गयी | उस समय स्वाद और कच्चे पक्के का कोई मतलब ही नही था | जैसे तैसे खाना खाया और अपने बिस्तर पर आया | चारों तरफ शोर ही शोर और लड़के ही लड़के थे , वहां कुछ हल्के फुल्के पल बिताये जा रहे थे | लोग एक दुसरे से परिचय कर रहे थे , अंतराक्षरी खेल रहे थे , या फिर ताश के पत्ते | मैंने कुछ देर अपनी diary लिखी , फिर किताब पढ़ी , ताके कुछ माहौल कुछ शांत हो , क्यूँ की मुझे तो ध्यान करना था | कुछ देर बाद लाइट ऑफ कर दिया गया , और एक दो बल्ब रोशनी के लिए छोड़ दिया गया | मैं अपने ध्यान में आ गया , वज्रासन एक ऐसा आसन है योग का जिसे आप खाना खाने के बाद कर सकते है , और कितनी भी ठण्ड हो अगर अपने 10 मिनट कर लिया तो आन्तरिक ऊष्मा महसूस होती है | मैं पूरी तरह से ध्यान तो नही लगा पाया मगर मेरी दिन भर की थकान मिट गयी और मुझे नींद आ गयी | हालांके ठण्ड को देखते हुए न ही बिस्तर पर्याप्त था और न ही ओढने का वस्त्र , मगर किसी तरह से रात बिताई , नीद आई थोड़ी देर के लिए फिर करीब ३ बजे ही ऑंखें खुल गयी |
सुबह 4:30 पर हमें उठाया गया , टाटा 407 गाड़ी आयी थी हमें लेने , एक गाड़ी में लगभग 100 के हिसाब से हमें भेड़ बकरियों की तरह भरा गया , गाड़ी २ ही थी और लोग 700 इसलिए उन्हें कई चक्कर लगाने थे | हमें वहां से करीब 5 - 10 km दूर एक सेंटर पर उतरा गया , टाइम दिया गया २० mnt , वहां नित्य क्रिया निपटा के , खुले में स्नान करना पड़ा , जो मैंने जीवन में कभी भी नही किया था | खैर , जैसे तैसे तय्यार हो गये | मुझे अब तक वो हड्डियों की अन्दर तक गुजरने वाली ठंडी हवा याद है , जो सुबह जाने के वक़्त और , वापस नहा के आने के वक़्त लगती थी | वापस आने के बाद फिर से वही , एक जगह इकठ्ठा होना और सबका नामांकन , उबाऊ प्रक्रिया | मगर , अभी तो और तमाशा होना बांकी था , लगभग ३०० लोग अगले दिन फिर से आ गये , अब तो जैसे वो जगह भी छोटी पड़ने लगी| एक और तमाशा हुआ के , २ दिनों में जो नामांकन हुए थे , वो प्रक्रिया फिर से शुरू की गयी | 12 बजे के आस पास फिर से खाने ले लिए लाइन और डंडा भी | २ बजे से फिर से वही पकाऊ प्रक्रिया | २ दिन तक ऐसा ही चलता रहा और मेरे साथ आये दोस्तों में से २ लोग वापस भाग गये | २ दिन तक तो मुझे भी कोई इतनी बड़ी दिक्कत नहीं हुई मगर मैं अपने साथ जो खाना लाया था , वो ख़त्म हो चुका था | अब नाश्ते के लिए मुझे बाहर का खाना खाना पड़ता , लोगों के बढ़ जाने और मेरे अनुशाशन प्रिय होने के कारण मेरा नंबर अंत में ही आता | अंत में खाने में कई मिलावट होती , सब्जी ख़त्म होती जो उसमे सीधे आटा मिला दिया जाता कच्ची पक्की पूरियां होतीं | एक टाइम दिन में , और एक रात में खाना मिलता| नाश्ते और चाय में रोजाना 40-50 रूपए खर्च हो जाते थे | न सही से सो पाता , न ही खा पाता था | घर पर STD से बात होती ,मैं कहता सब ठीक है , अभी ट्रेनिंग शुरू नही हुई है | करीब 5 दिन लगे , ऐसे ही समय बिताते हुए , तब जा कर एक दिन घोषणा हुई के , रिक्त स्थान केवल 250 थे और लोग थे 1100 , सुनते ही वहां हंगामा हुआ , पुलिस बुलानी पड़ी और लगभग 400 लोगों का पलायन उसी दिन हुआ | इसके बाद शुरू हुआ , Introduction जो के एक interview की शक्ल में लिया गया , ताके लोगों को चिन्हित किया जा सके , और लिस्ट शोर्ट की जा सके | ये सिलसिला भी अगले दो दिनों तक चला , अब मेरी जेब की हालत ख़राब होने लगी थी और मेरी सेहत की भी | मेरा वजन रोज़ तेज़ी से घट रहा था , जब मैं पटना से चला था , तब से अब तक लगभग 5 किलो वजन घट चुका था | मगर इस बार मैं ठान के आया था के हिम्मत तो हारनी नहीं है | इस बीच वहां रहते रहते मैंने अपने कुछ मित्र बनाये थे , मगर मैं उम्र में उनसब से छोटा था | वो मेरे शेर , मेरा गाना सुनते और मेरे विचार , वो सब मुझे बहुत पसंद करते , मेरी कहानी सुन के मेरा हौसला बढ़ाते | उसमे से एक फ़ौज से भी थे , जो रिटायर हो चुके थे | वो बहुत सम्मान करते मेरा | हमने लगभग 15 लोगों का एक गुट बना रखा था , साथ ही रहने की कोशिश करते हम सदा | introduction खत्म होने के बाद , सिलसिला शुरू हुआ , प्रश्न और उत्तर का , 50 - 50 लड़कों का गुट बनाया गया और , उनसे प्रश्न पूछे गये , प्रश्न पूछने के बाद हाथ उठाने को कहा जाता, अधिकारी जिसे खड़ा करते उसे उत्तर देना पड़ता | यहाँ मेरा बचपन से सामान्य ज्ञान की पढाई बहुत ही काम आयी और मेरा प्रदर्शन बहुत ही अच्छा रहा | प्रश्नोत्तर काल के बाद मुझे stage पर बुलाया गया और मुझसे कई सवाल मेरे बारे में पूछे गये और फिर मेरे शौक | मैंने बोला गाना, फिर क्या था , उन्होंने मुझे गाने को कहा | १० मिनट के अन्दर वहां ढोलक , हारमोनियम इत्यादि आ गये | वहां की स्थिति को देखते हुए मैंने गाना गया "चिट्ठी आयी है आयी है ,,चिट्ठी आयी है " मैं बता नही सकता के वहां का एक एक बन्दा , आवेदकों से ले कर और कर्मचारियों तक , सबने , शांति पूर्वक पूरा गाना सुना , और इसके बाद , बहुत बड़ी तालियों की गडगडाहट , मेरे पैर कांपने लगे थे , और ख़ुशी मेरे से संभल नही रही थी | उन्होंने एक और गाने की पेशकश की , और मैंने फिर "दुनियां बनाने वाले " गा कर सुनाया | बहुत प्रशंशा मिली और फिर मुझे कल से सबसे आगे बैठने को कहा गया , मैंने गुजारिश की के मैं अपने मित्रों के साथ ही बैठना चाहूँगा , वहां के अधिकारिओं ने हम सब को आगे की सीट दी | अब तो जैसे वहां रोज़ का धंधा हो गया था , सुबह से शाम तक सब का interview और टेस्ट चलता और शाम को मुझे गाने को कहा जाता | शाम में तो जैसे महफ़िल सी सज जाती थी | पर इसका कोई ज्यादा फायदा नही हो रहा था , घर से निकले हुए 14 दिन हो चुके थे और मेरा वजन 8 किलो घट चुका था , कारण था समय पर खाना न मिलना , और जेब में पैसे न होने के कारण बाहर से पेट भर खाना न खा पाना | मेरे साथ के जितने भी भाई बंधू थे सभी वापस चले गये , मगर मैं तो इस बार ठान के आया था के अब वापस नही जाना है | मुझे वहां की प्रक्रिया में एक बात तो समझ में आई के वो लोग जान बूझ कर देरी कर रहे थे , ताकि जो विषम परिस्थितियों में टिक सके उन्हीं में से चुनाव हो | लगभग 400 लड़के लौट चुके थे |
मुझे याद है के घोषणा की गयी थी , कल से सब को बाहर ट्रेनिंग में भेजा जायेगा,, जो भी उसमे सफल होंगे , उनका अंतिम चुनाव होगा | मैं बहुत खुश हुआ था के चलो मेहनत रंग लाई | इसके लिए मुझे अपनी तस्वीर जमा करानी थी , मैंने फोटो खिचवाई , और जब मैंने अपनी तस्वीर देखि तो मैं रो पड़ा | अक्सर हमें शीशा देखने को नही मिलता था , जब तस्वीर देखि तो अहसास हुआ के कितना कमजोर हो चुका हूँ मैं |
अगले दिन ट्रेनिंग के लिए सेंटर के चयन की प्रक्रिया चली | सब को 10-10 के ग्रुप में बांटा गया , और उनमे से एक को ग्रुप लीडर बनाया गया , जो के हेड ऑफिस से सीधे संपर्क में रहता और सभी प्रक्रिया की देख भाल करता | मुझे अपने ग्रुप का लीडर बना दिया गया , उम्र में मैं सबसे छोटा था | मुझे सेंटर दिया गया ख्याला मंडी , वहां के बारे में अधिकारीयों ने मुझे बताया के वहां का सुलभ का सेंटर लोकल लोगों का अड्डा है , सोने का और शराब पीने का , वहां की व्यवस्था सुधारनी है | किसी भी मुश्किल में हेड ऑफिस से संपर्क करने का नंबर दे दिया गया | हमें वहां का पता दे दिया गया और सुबह 6 बजे रिपोर्ट करने को कहा गया |
हम सुबह सुबह खयाला मण्डी पहुचे , सुबह के 5:30 तक हम पहुँच चुके थे | अन्दर जाने के बाद देखा तो कुछ बाहरी लोग वहां सो रहे थे | हमने वहां के वर्तमान स्टाफ से पूछा तो उसका जवाब था के आप खुद ही हटा लो | मैंने उन्हें जगाया और वहां से तुरंत जगह खाली करने को बोला | वो अड़ गये और उन्होंने हमारा परिचय जाना , मैंने उन्हें बताया के हम यहाँ 15 दिनों की ट्रेनिंग पर आए हैं , और वो यहाँ की व्यवस्था सुधारने में हमारी मदद करें , मेरी बातों का असर हुआ या मेरे परिचय का , जो भी हो उन्होंने वो जगह खाली कर दी | मैंने वहां की व्यवस्था देखी, जो की छिन्न भिन्न थी | वहां का केयर टेकर शायद खुद की भी केयर नही कर पा रहा था | ऑफिस , कमरा , काउंटर , सब का एक जैसा हाल था | मैं अपने ग्रुप में चाहे सबसे छोटा सही , कुछ मुझे ब्राह्मन मान के , और कुछ मेरे ग्रुप लीडर मान के , मेरा सम्मान करते थे | वो सभी मेरे कथा अनुसार काम में जुट गये | सब ने साफ सफाई , कागजात , फाइलिंग इत्यादि का काम अलग अलग शुरू कर दिया| ऑफिस के बाहर हीं कुछ दूरी पर काउंटर था , मैंने वहां भी दो लोगों की ड्यूटी लगा दी |सभी वहां अपने काम में व्यस्त हो गये , थोड़ी देर बाद मैं बाहर उस जगह के आसपास की चीजों को देखने निकला | गेट से बाहर आते ही मुझे एक दुकान मिली , जो गैर क़ानूनी रूप से बनाई हुई थी, उसमे रोज़मर्रा के सामान के अलावा , चाय इत्यादि मिलती थी | उसमे वही सब लोग दिखे , जिन्हें मैंने सुबह वहां से निकाला था , मैं वहां रुका और एक चाय का आर्डर दे दिया | बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो पता चला के , ये सभी लोग बिहार से थे, 6 भाई थे ये सब , और सभी दबंग थे | इनका वहां के राजनीतिक पार्टियों के नेताओं इत्यादि से सम्बन्ध था और ये , वोट बैंक को बना के रखने का काम करते | रैलियों इत्यादि में लोगों की भीड़ इकट्ठा करते | कुल मिला के ये वहां के सफ़ेद पोश गुंडे टाइप थे , जिनकी समाज में पैठ थी | मैंने अपने टीम के आने का कारण , और अपनी बात भी साफ साफ बता दी , ये भी बोल दिया के मैं किसी से डरने वाला नहीं और ये भी के , उनका सहयोग चाहिए , क्यूँ की हम चंद दिनों के लिए हैं | आस पास के एरिया को देखा , पास में ही पुलिस थाना था , मैंने महत्वपूर्ण न. अपनी डायरी में नोट किये | क़स्बा सा था वो , एक जगह बोर्ड लगा देखा खयाला गाँव , वहां की स्थिति देख कर लगा के , ये गाँव था, हाल में ही मूलभूत सुविधाएँ जो शहरों को मिलती है , यहाँ मिली हैं | मगर मानसिकता के मामले में ये थोड़े , पिछड़े है , दिल्ली के और जगहों के मुकाबले | कुछ और बातें पता चली वहां के , चाकू छुरी चलना छोटी छोटी बातों पे वहां आम घटना थी | कैची से क़त्ल होते थे वहां , क्यूँ की कैची एक ऐसा हथियार है , जो हथियार नही , पकडे जाने पे कोई केस नही बनता था अगर कैची ले कर जा रहा है कोई | वहां गुंडे , मवाली टाइप लोगों की बहुतायत थी और शिक्षा की कमी थी , क्यूँ की बहुत ही कम बसें देखि मैंने स्कूल की |
सेंटर का सिस्टम ऐसा था के , रोज़ के हिसाब से वहां की आमदनी बांध दी गयी थी , उतने पैसे तो शाम को हमें देने थे | उसमे से प्रत्येक आदमी को रोज़ के २० रूपए के हिसाब से खाने के पैसे मिलते , जिसमे नाश्ता , चाय , दिन और रात का भोजन शामिल था , उसके ऊपर के बचे हुए पैसे , स्टाफ की उपरी कमाई थी | वहां का 530 रु , फिक्स थे , पहले दिन ही , केवल 450 रु , के आस पास आमदनी हुई , 80 रु का नुकसान , वो हमारे खाने के खर्चे से कटने थे | मैंने सबको विश्वास में लिया और उस दिन का खर्च 120 रु . में ही चलाने का निर्णय लिया , हमने खाने के पैसों में कटौती कर दी | पैसे बचाने के लिए हम सब खुद ही खाना बनाने का फैसला किया , हीटर और खाने के बर्तन वहां उपलब्ध थे | हम शाम को , सब्जी बाज़ार पहुंचे खाने का सामान लेने , मैं देख के दंग रह गया के वहां औरतें खुलेआम अपने गोद में पाउच में पैक देसी शराब रखे हुई थी जगह जगह और वो सब्जियों की तरह बिक रही थी | पुलिस वाले भी उनसे शराब खरीद रहे थे | वाह रे व्यवस्था , देख के हसीं भी आई और ये भय भी के , शायद ये जगह मेरे लायक नही है | वैसे तो काम भी मेरे लायक नही था , भले ही मेरा काम ऑफिस और वहां की व्यवस्था को संभालना हो मगर, संभालना तो "सुलभ शौचालय" की व्यवस्था थी | मगर मन में ये विश्वास था के, ट्रेनिंग खत्म होने के बाद मुझे ओफ्फिसिअल काम के लिए मुझे रख लिया जायेगा , या अच्छी जगह भेज दिया जायेगा | इसलिए मैं काम को छोटा बड़ा न समझते हुए , बस काम को पूरी लगन और ईमानदारी के साथ करना चाहता था| मैं दिन भर गाना गाता , अपने साथियों का मन बहलाता , और खुद का भी | शाम का लोकल लोगों के शराब पीने का धंधा थोड़ी बहुत मुश्किलों के बाद हमने बंद करवा दिया|
घर से आए हुए लग भग 20 दिन हो चुके थे , std फ़ोन पे ज्यादा बात नही कर पाता था ,इतने पैसे नही होते थे , हमेशा pulse पे ही ध्यान रहता | STD वालों ने भी ऐसा कर रखा था के pulse कुछ ज्यादा ही तेज़ चलता , बस कुशल मंगल पूछता और घर की स्थितियों का अवलोकन करता | मैंने दो चीज़ नही छोड़ी थी , वो था , महा मृत्युंजय मंत्र का जाप और , अपना ध्यान लगाना , शायद यही मेरी ताकत थी |
अगले दिन collection manager आए , उन्होंने सारी व्यवस्था देखी, और हिसाब किताब| उन्होंने हमारे काम की तारीफ तो की , मगर वो खाने का पैसा बढ़ाने को राज़ी नही हुए , हमें निराशा हुई | हमें जरुरी निर्देश दे कर वो चले गये | हमें वहां लगभग चार पाँच दिन हो चुके थे , सब अच्छा चल रहा था , मगर collection नही | मैंने फैसला किया के , मैं काउंटर पर आज खुद ही बैठूँगा | सुबह सुबह मैं काउंटर पर बैठ गया, बड़ा आश्चर्य हुआ देखा कर के वहां के लोकल लोग सुविधाओं को लेते मगर सुविधा शुल्क नही देते थे , मैंने पहले दिन उन्हें छोड़ दिया और ताकीद की के अगले दिन से वो पैसों के साथ सुविधाओं के लिए आयें , ऐसे लोगों की संख्या लगभग 25 के आसपास थी | जब मैंने और लोगों को जो पहले से काउंटर पर बैठते थे इस बाबत पूछा तो उन्होंने मुझे बताया के शुरू से ही ऐसा करते हैं , लोकल हैं , हम क्या कर सकते हैं ? मैंने उन्हें समझाया के हमें भेजा ही इसलिए गया है , और इसमें हमें सुधार करना होगा , वरना हमारी ट्रेनिंग अधूरी है | इस बीच दो लोग हमारी टीम छोड़ के चले गये , वो संघर्ष नही कर पाए | कुछ ऐसी भी ख़बरें मिलती की, अन्य सेंटर पर , लोकल लोगों ने , नये कर्मचारियों को मारा पीटा, कभी खबर मिलती की कोई लापता ही हो चुका है , कभी कुछ कभी कुछ , इस वजह से भी , लोग डरते थे | ज्यादा तर सुलभ के सेंटर ऐसी जगह ही हुआ करते थे , जहाँ , मूलभूत सुविधाओ का अभाव हो , या यूँ कहें के जो पिछड़े इलाके थे | इसलिए वहां अक्सर घटनाये आम बात थी| अगले दिन मैं पुनः काउंटर पर पहुंचा , बहुत सारे लोकल लोगों ने , जो पहले मुफ्त की सुविधाएँ लेते थे , उन्होंने पैसे दिए और व्यवस्था की तारीफ भी की , एक दो बड़े बुजुर्गों को मैंने छोड़ दिया | लगभग 11 बजे 4 लड़कों का झुण्ड आया और बिना सुविधा शुल्क दिए हुए , बाहर जाने लगा , मैंने उन्हें टोका | उनमें से एक जो उनका हेड लग रहा था , और जिसके शरीर में इतनी भी ताकत नहीं थी के , मेरा एक झापड़ भी सह ले , उसने बड़े स्टाइल में चुटकी बजाने के बाद , मेरी तरफ ऊँगली कर के बोला " आज के बाद से पैसे मांगे तो काट के यही गाड़ दूंगा, हमें जानता नहीं है तू " | मेरी उनसे काफी कहा सुनी हो गयी और , थोड़ी बहुत हाथा पाई भी , मगर, मैंने अपने ऊपर जितना हो सका , नियंत्रण रखा | वो लड़के शाम को "देख लेंगे " की धमकी दे कर चले गये | थोड़ी देर बाद मैंने , हेड ऑफिस फ़ोन किया , और जानकारी दी , उनका जवाब मिला के तुम वहां 8 लोग हो , जो गुंडा गर्दी करे उसे मारो , बाकि हम देख लेंगे | मेरी हिम्मत बढ़ गयी , मैंने अपने साथियों को बुलाया और कहा के शाम को सारे के सारे काउंटर पर रहेंगे और जो गुंडा गर्दी दिखायेगा , उसकी बैंड बजा देंगे | साथियों ने कहा के इसके लिए थोडा मूड बनना चाहिए , मैंने हामी भर दी और शराब मगाई गयी | हमने थोड़ी थोड़ी शराब पी , और उनका इंतज़ार करने लगे | शाम के वक़्त करीब 5 बजे वो चारों लड़के आये और फिर से बिना सुविधा शुल्क दिए जाने लगे , मैंने उन्हें रोका | उनके "सरदार" ने मेरे से कहा के तू नही मानेगा और मेरे गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया | फिर क्या था , वैसे भी गुस्सा किये हुए काफी दिन हो चुके थे , मैंने सबसे पहले अपने साथिओं को जो प्लानिंग के तहत पहले से ही गेट पर थे , गेट बन्द करने को कहा और फिर , हमने उन चारों की बढ़िया धुलाई की | इसके बाद निर्देश दे दिया के आगे से ऐसा मत करना और छोड़ दिया | हम काउंटर के आस पास बैठ कर अपनी तेज़ चलती सांसों को थामने में लगे थे , तभी बाहर की चाय दुकान वाला लड़का भागता भागता वहां आया , और मुझे बोला के हाथ पैर नहीं तुडवाने तो जल्दी से गेट बन्द कर लो ., इससे पहले की मैं कुछ समझता वो भाग गया| हम में से एक बाहर निकला सड़क पर देखने के माज़रा क्या है , वो तुरन्त भाग कर आया और गेट बन्द कर दिया | गेट लोहे का था जिसमे से बाहर का नज़ारा देखा जा सकता था , बाहर देखते हीं मेरे होश उड़ गये , करीब 15 - 20 लड़के लाठी डंडों के साथ हमारे काउंटर की तरफ आ रहे थे | गेट में मजबूत ताला थे जो उसी में फिक्स हो जाता था , सबसे पहले मैंने उसे बंद कर दिया | वो लड़के गालियाँ देते हुए गेट तक पहुँच गये और , उसपर डंडे जोर जोर से मरने लगे, बाहर भीड़ जमा होने लगी थी , शोर बढ़ता जा रहा था , स्थिति बिगड़ रही थी,कई और लोकल लोग भी उनके साथ हो लिए | हमारे साथी भी बहुत ज्यादा डर गये थे , और एक तो कांप भी रहा था और रो भी रहा था | तभी बाहर से वो ईंट और पत्थर फेंकने लगे , मैंने अपने को पहले शांत किया और साथियों के साथ कुछ बातचीत की और अपने फौजी साथी के साथ कैम्पस के पीछे की तरफ गया , और साथियों की मदद से पीछे की दीवार फांद कर हम सबसे पहले बाहर आये , चूँकि हम पीछे की तरफ थे , इसलिए किसी ने हमें देखा नही| मुझे याद है के , जब हम और फौजी बाहर कूद रहे थे तो , सभी साथी बार बार जल्दी वापस आने का आग्रह कर रहे थे , उन्हें शक था के शायद हम भाग जायेंगे बाहर ही बाहर ...उनकी आँखों में डर भी था और दर्द भी |
हम बाहर निकले , उस समय मोबाइल फ़ोन का प्रचलन इतना नहीं हुआ था | सबसे पहले हमने हेड ऑफिस फ़ोन मिलाया और सारी स्थितियों को बताया , मगर वो उल्टा फ़ोन पर मुझे ही डांटने लगे | मैंने बताया के आदेश हमें एक्शन लेने का हेड ऑफिस से मिला था , और बाद में सुरक्षा का आश्वाशन भी , मगर उन्होंने एक न सुनी और फ़ोन काट दिया | मैं समझ चुका था के , ये ऑफिस वाले केवल भीड़ कम करने की कोशिश कर रहे हैं | मैंने दो चार मिनट सोंचा और पुलिस की सहायता लेने का निश्चय किया ,शाम ढल चुकी थी , हमने शराब भी पी रखी थी , मगर और कोई चारा भी नही था | मैं फौजी को लेकर थाने पहुंचा , वहां एक SI थे जो सिख थे , उन्होंने बड़े आराम से फौजी और हमारी बात सुनी | चूँकि फौजी साथ थे और उन्होंने अपना परिचय इत्यादि भी दिया , SI ने तुरंत वहां से एक जिप्सी को वायरलेस से सूचना दी और , हमारे साथ थाने की गाड़ी में घटना स्थल पर पहुँच गये | जिप्सी पहले ही पहुँच चुकी थी , इसलिए भीड़ पहले ही खत्म हो चुकी थी , और हमारे पहुँचने तक , वहां कोई भी नहीं था, बस ईंट पत्थर के टुकड़े और लाठियों के निशान गेट पर थे | मगर मैंने उनसे आग्रह किया के वो दुबारा रात में ऐसा नही करें इसकी कोई व्यवस्था होनी चाहिए | उन्होंने गाँव के कुछ बड़े बुजर्गों से बातचीत की , और मुझे आश्वाशन दिया के , कुछ नहीं होगा,,आप लोग अपनी ट्रेनिंग करो |
हम ऑफिस में आ गये , सभी लोग इक्कठा हो गये थे | ऑफिस के व्यवहार से हम दुखी थे , और सबसे ज्यादा मैं , क्यूँ की मैं ही ग्रुप लीडर था | बहुत मेहनत की थी पिछले 20 - 25 दिनों में , कुछ बनने के लिए , कुछ करने के लिए , मगर एक बार फिर वही धोखा मिला | मैं उदास हो चुका था और टूट भी चुका था , मैंने हेड ऑफिस फ़ोन लगा कर फिर एक बार बताया के यहाँ क्या क्या हुआ | ऑफिस से जवाब आया के अगर काम नहीं कर सकते तो जा सकते हो ,मुझे बहुत बुरा लगा ऐसे बात करना | रात के करीब आठ बज चुके थे , मैं सोंच में डूबा था के करना क्या चाहिए , ऐसी कंपनी में काम करने का कोई फायेदा नहीं है , जो बार बार अपनी बातों से मुकर जाये | मैंने इस बार बहुत मेहनत की थी, न शरीर का ध्यान रखा था , न हीं समय का , पूरी लगन से अब तक सब किया था , मगर चाहे गलती किसी की भी हो , मैं पुनः एक ऐसी जगह खड़ा था , जहाँ से कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा था, न ही कुछ समझ में आ रहा था | रात भर मैंने बहुत दिमाग लगाया , सोंचता रहा , सो नहीं पाया और सुबह कब निकल गयी पता ही नहीं चला| सुबह के 6 बजे मैंने अंततः ये जॉब भी छोड़ने का फैसला किया , और यह भी के मैं अब कुछ दिन अपने को समय दूंगा , शांति पूर्वक बैठूँगा और केवल आराम दूंगा अपने शरीर को, लेकिन मैं जाऊंगा कहाँ , ये भी एक प्रश्न था | अचानक मुझे ध्यान आया के मेरा एक रिश्तेदार जो मेरे से २ साल बड़ा था , किसी "ग्रेटर नोएडा " नामक जगह पर रहता था | कई बार उसने शिकायत की ,के मैं बार बार दिल्ली आता हूँ पर उससे मिल कर नहीं जाता| मेरे पास एक लैंड लाइन न. था ,जो के उसके स्कूल जिसमें वो पढाता था , उसके मालिक के घर पर था | मैंने वहां बात की और मुझे मेरे रिश्तेदार ने वहां तक आने का रास्ता , बस वगैरह के बारे में बताया , मैंने बोल दिया के मैं आ रहा हूँ | मुझे दादरी नामक जगह पर पहुंचना था | मैंने अपने साथियों को समझाया , उनसे गले मिला और उन्हें सब कुछ सौंप कर , हेड ऑफिस पहुंचा | वहां मैंने अपना आवेदन दिया , के मुझे पैसे दिए जाएँ जितने दिन भी मैंने काम किया , वहां के अधिकारी ने मुझे ऊपर से नीचे देखा और , कुछ कागजाती काम के बाद मुझे 650 रु. मिले | मैंने "सुलभ इंटर नेशनल " को अलविदा कहा और फिर से निकल पड़ा , एक नये सफ़र की ओर.....|
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