मैं चलता जा रहा था ,सोंचता हुआ ,मन में बस एक ही चीज़ चल रही थी / मुझे कुछ करना है, यहाँ नही हो सकता , मुझे निकलना होगा यहाँ से / मेरी किस्मत में घर से बाहर निकल के ही कुछ करना था ,कुछ बनना था शायद / मेरी मंजिल फिलहाल मेरी ननिहाल थी, जो पटना से 70 k.m. दूर है / मैं वहां का रास्ता जानता था , मगर शाम को वहां के लिए पटना से कोई बस नही थी / रात काटनी थी मुझे , वो पूस की रात / सबसे पहले मैं "महावीर स्थान " पटना पहुंचा ये सोंच कर की यहाँ की भीड़ छिपने की अच्छी जगह है , जल्दी कोई ढूंढ़ भी नही पायेगा , और जब तक मंदिर खुला है , मैं यहाँ safe हूँ ,वहां की घंटियों और करतालों के आवाज़ से मुझे कुछ याद आने लगा / भारत का एक जाना माना हनुमान मंदिर / इसके निर्माण की भी एक छोटी और रोमांचक कहानी है /
महावीर मंदिर , एक प्राचीन मंदिर है / मैं पिता जी के साथ वहां उस वक़्त जाया करता था , जब उसके दरवाजे झुके हुए थे , और मंदिर काफी जीर्ण शीर्ण अवस्था में था / एक IPS हुए पटना शहर में जिनका नाम था कुणाल, जुर्म के खिलाफ वो बहुत सख्त थे , और उतने ही अच्छे इन्सान , वो निसंतान थे / किसी ने उन्हें हनुमान पूजन के बारे में बताया / उन्होंने बीड़ा उठाया , हनुमान मंदिर के जीर्णोधार करने का / चंदा इकठ्ठा किया जाने लगा / "कर सेवा " शुरू की गयी /बड़ी संख्या में लोगों ने श्रम दान दिया / मैं भी उनमे से एक था / छोटा ही सही मगर जैसे एक गिलहरी भी एक छोटा सा पत्थर डाल रही थी , राम सेतु बनाने वक़्त , ऐसा ही कुछ था मैं उस समय /मंदिर पूरे ज़ोर शोर से बना / लोगों ने सोने चाँदी, नयी गाड़ी , रूपए पैसे , बहुत दान दिया / भव्य मंदिर तैयार हो गया /
आज घर से भाग के उस नए और भव्य मंदिर में आ कर ग़ज़ब की स्फूर्ति महसूस हुई / मेरे वहां पहुँचने के कुछ ही देर बाद हीं एक बालक को , ठंढ में half paint और half shirt में , bag कंधे पे टंगे देखकर , लोगों ने मुझे देखना शुरू कर दिया / किसी ने कमेन्ट भी किया था , " देखो लगता है tution class से भाग कर (bunk) आया है / धीरे धीरे दबाव बढ़ने लगा , मैं सबसे उपरी मंजिल पे चला गया, जहाँ कीर्तन हो रहा था / वहीँ एक कोना पकड़ा और ताली बजा कर कर कीर्तन का नाटक करने लगा / वही बगल वाले अंकल से confirm भी किया की मंदिर कब बंद होगा , उन्होंने बताया 11 बजे रात्रि तक / करीब 10:30 बजे मैं ,वहां से बाहर आ गया और बाकि की रात मैंने स्टेशन पे बिताने की सोंची /उस वक़्त मेरी उम्र 10 -11 वर्ष से अधिक नही होगी , मगर मैं पूरी तरह गंभीर था / ठंढ बढ़ रही थी , मैंने सबसे पहले एक चाय पी, फिर स्टेशन की ओर चल दिया क्यूँ की , स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म से बढ़ कर रात बिताने के लिए कुछ नही होता / वो भी सस्ते में / स्टेशन पहुँच कर मैं "व्हीलर्स " के पास पहुंचा वहां से रात बिताने के लिए कुछ किताबें खरीदी , पेमेंट के लिए मैंने 100 का नोट निकला / मेरे पास 50 का भी था , 20 का भी , मगर मुझे खुल्ले चाहिए थे / पिता जी अक्सर जब झारखण्ड जाते थे , तो पैसों को जेब में रख कर ले जाते थे /उसवक्त plastic money नही हुआ करती थी / वो अक्सर पैसों को अलग अलग बाँट कर जेबों में रखते थे / मैंने भी यही किया था क्यूँ की , 89-90 के समय 150 rs अच्छी रकम थी , मेरे लिए मोटी रकम / मैंने किताब खरीदी ,प्लेटफ़ॉर्म टिकट ख़रीदा और प्लेटफ़ॉर्म न. 3 पे चल दिया / १ न . या दो न . पर पकडे जाने का डर था /वहां मैंने एक खाली बेंच देखि और किताब खोल कर पढने लगा , मैं कुछ भी याद नही करना चाहता था/ जिस वक़्त मैं किताब खरीद रहा था , उस वक़्त किसी की नज़र उस 100 के नोट पर पड़ चुकी थी और वो मेरे पीछे लग चुका था / वो मेरे पीछे पीछे उस बेंच तक पहुंचा और मेरे से कुछ सवाल जवाब किये मैंने बता दिया मुझे सुबह जाना है , रात काटनी है बस / उसने मुझसे बोला के स्टेशन के फर्स्ट फ्लोर पे गेस्ट हाउस है वो 100 rs में कमरा दिलवा देगा / मैंने मना कर दिया मैंने कहा के मेरे पास 100 रूपए नही हैं , लेकिन उसने तो मुझे ठगने का पूरा प्लान बनाया था , उसे लगा के मेरे पास 100 का नोट था , अब मेरे पास बस 70 ही बचे हैं, अब उसे हडपने के लिए उसने कहा के , वहां 50 rs में bedding system मिलता है / उसने मुझे अपनी मीठी बातों में फंसा लिया, ठंढ भी धीरे धीरे बढ़ रही थी , और मैं उसके पीछे वो bedding सिस्टम देखने पुनः 1 न. प्लेटफ़ॉर्म चल दिया / उसके सभी आदमी मिले हुए थे , मैं सावधान तो था , लेकिन था तो बच्चा, मन का सच्चा , अक्ल का कच्चा /
Guest house पहुँच कर उसने मुझे bedding दिखाई , एक बड़ा सा कमरा था ,जिसमे 8-10 बेड लगे थे , अन्दर कमरे में आकर मुझे अच्छा लग रहा था , क्यूँ की बहार ठण्ड थी और कमरे में गर्माहट / मैंने ओके कर दिया , उसने कहा के बेड उसे भी लेना था पर पैसे कम थे उसके पास , इसलिए मैं उसे कम से कम 70 रुपये दे दूँ , ताकि वो भी एक बेड लेले / मैंने सावधानी बरतते हुए ऑफर किया के , हम एक हीं बेड में कम चला सकते हैं,मैं तो थोड़ी जगह लूँगा बस छोटा हीं हूँ , और उसके पैसे भी बच जायेंगे / अन्दर का तो पता नही , मगर बाहर से वो बड़ा खुश हुआ / उसने कहा के पर्ची कटवानी पड़ेगी नीचे १ न . प्लेटफ़ॉर्म पे जाके /मैंने कहा चलो मैं भी चलता हूँ / नीचे भीड़ थी , लाइन लगी हुई थी , उसने जल्दी से 50 rs मांगे और लाइन में खड़ा हो गया , मैं अलग से उसपर नज़र रखे हुए था / तभी एक ट्रेन आई और १ न. प्लेटफ़ॉर्म पे भीड़ जमा हो गयी / मेरी नज़रें कुछ देर के लिए ही उससे हटी , मगर धोखा देने वालों के लिए तो , एक पल ही काफी होता है / भीड़ के बीच से रास्ता बना कर किसी तरह लाइन के पास पहुंचा जहाँ उसे छोड़ के गया था , लेकिन वो तो भाग चुका था / मैंने बिना समय गवाएं दौड़ लगाई, चारों तरफ देखा , आधे घंटे तक दौड़ भाग करने के बाद मैं समझ गया के मैं उल्लू बन चुका हूँ / मुंह लटकाए मैं अपने 3 न. वाले बेंच पर पुनः वापस आ गया / अब मैं गंभीर था , मेरा मन किताब पढने में नही था / सबसे पहले तो मैंने ऑंखें बंद करके , हनुमान जी को याद किया , और दुहाई दी के हे प्रभु , अगर मैंने आपके लिए कुछ भी किया होगा , तो मेरे पैसे मुझे वापस लौटा दो , बजाप्ता मैंने उन्हें टाइम दिया के मैं मन में 100 तक गिनूंगा बस / मैं ऑंखें बंद करके 100 तक गिनने लगा , 100 बड़ा जल्दी ख़तम हो गया मैंने सोंचा के हनुमान जी को थोडा और टाइम मिलना चाहिए , मैंने 500 तक गिनने की सोंची , और ऑंखें बंद करके गिनती करने लगा / गिनती ख़तम हो गयी ,पर कुछ हुआ नही , न ही होना था / मुझे अब गुस्सा आ रहा था और , अब मैं केवल शुन्य को निहार रहा था / इस बच्चे का सच्चा दिल , घर और ज़माने की लापरवाही और धोखे से , धीरे धीरे सच्चाई खो रहा था , ये धोखे और विश्वाश घात की पहली घटना थी / मैं सोंच में डूबा था , रात गहरी होती जा रही थी , और ठण्ड बढ़ रही थी / मेरे पैर धीरे धीरे कांप रहे थे / उस वक़्त तो नही मगर आज मुझे ये महसूस होता है के , मेरा हनुमान जी को ध्यान करना व्यर्थ नही गया था , उन्होंने एक और व्यक्ति को मेरे पास भेजा / मैं तो पहले से ही जला भुना हुआ था , मुझे लगा के एक और आ गया चूना लगाने / मैंने सही ढंग से उससे बात नही की / लेकिन वो भला आदमी था , उसने बड़े प्यार से , मेरे से बात की , आज आंसू पोछने वाले तो बहुत मिल जाते हैं , मगर वो कन्धा नही मिलता जिसपे सर रख कर हम रो सकें / मैं भावनात्मक तो था ही , उनकी बातों में , मैं और भी भावुक हो गया और , फिर सच उगलने लगा / मैंने सारी बातें बतायीं और उन्होंने ध्यान से सुनी / उन्होंने अपने बारे में भी बताया , वो भारत के पहले रेल इंजन फैक्ट्री में काम करते थे जिसका नाम था "चितरंजन " जो आज भी है / दरअसल मेरी हिंदी की किताब में भी एक पाठ था जिसका शीर्षक था "चितरंजन का कारखाना " यही वजह थी की उनकी बात मैंने ध्यान से सुनी थी , और अपनी बातें भी बताई थी / फिर उन्होंने मुझे घर वापस चलने को कहा / मैं कहाँ जाने वाला था , लेकिन उस व्यक्ति ने , जो सच में भगवान का ही भेजा हुआ कोई दूत था , लगभग १ घंटे के समझाने के बाद आखिरकार मुझे वापस घर चलने को मना ही लिया / रात के लगभग १ बज चुके थे / वो मुझे मेरे घर तक छोड़ने को मेरे साथ चल दिया / अब मेरी मनोवृति दूसरी हो चुकी थी / अब मेरे दिमाग में बस पिता जी का वो डंडा घूम रहा था , जो अन्दर से अलुमिनियम का तार था और ऊपर से उसपे प्लास्टिक का कवर चढ़ा हुआ था / लेकिन जब प्रयाश्चित करना था , तो डंडे से क्या डरना था / घर मेरा नजदीक ही था / मैं उनके साथ घर के नजदीक पहुंचा और उनसे वादा लिया के अगर पिता जी मुझे पीटेंगे तो मैं घर नही जाऊंगा , मैं कुछ दूर पहले ही एक ओट में छिप गया / उन्होंने मेरे घर का दरवाज़ा खटखटाया , माँ ने दरवाजा खोला , उनके बीच क्या बात- चीत हुई मुझे नही पता पर , उन्होंने आश्वाशन देते हुए आवाज लगाई मैं बाहर निकला और सर झुका के सीधा अपने कमरे में चला गया / घर के अन्दर आग जल रही थी, पिता जी ने , माँ ने उनसे बातें की , वो बाद में आने को कह कर चले गये / पिता जी और माँ ने उन्हें बहुत सारा धन्यवाद् दिया / मुझे नीद कहाँ आ रही थी , मुझे तो बस वो डंडा याद आ रहा था , सोंच रहा था हे हनुमान जी , कम से कम अभी नही , बहुत ठण्ड है / रात को किसी ने कुछ नही कहा , सुबह माँ और पिता जी ने मेरे से कोई बात नही की , बस माँ ताने मरती रही , एक ही बेटा है,क्या क्या आशाएं लगाई हैं, पर ये किसी काम का नही , कितना रोई मैं इसके लिए , अगर कुछ हो जाता तो वगैरह वगैरह / पापा कुछ नही बोल रहे थे , मुझे ये तूफान से पहले की शांति लग रही थी / तीन चार दिन बाद वो वक़्त भी आ गया /
मुझे ऐसा लगता है के मैं भगवान् से जो भी मांगता हूँ वो मुझे मिल ही जाता है / उस वक़्त फिल्मो के पोस्टर में हीरो , जिसका माथे पे पट्टी बंधी होती थी , उसे देख कर मुझे लगता था , के काश मेरे सर पे भी ऐसी पट्टी बंधी होती , बाल पट्टिओं के ऊपर से गिरे गिरे होते , किन्ना स्मार्ट लगता मैं / भगवान ने मेरी सुन ली , मेरे से कोई सामान पापा का , गिर कर टूट गया और फिर , पापा ने जो मार लगाई, उफ्फ्फ्फ़ / मगर गलती से , एक वार गलती से मेरे सर पर पड़ा और सर फट गया / सब घबरा गये , मुझे हस्पताल ले जाया गया , रास्ते भर समझाते रहे , वहां ये मत बोलना के पिटाई से सर फटा है / पट्टी बंध गयी , मनोकामना पूर्ण हो गयी / वहां से आने के बाद , मम्मी और पापा के बीच मुझे लेकर कुछ बातें हुई / उसके बाद से पिता जी का मारना कम हुआ /
पापा धीरे धीरे मेरे प्रति बदल रहे थे , अब वो मुझे चेस सिखाने लगे , और रोज़ हराने लगे / लेकिन मैं भी ,हारता भी था और सीखता भी / अब मेरे अन्दर जूनून था किसी को हराने का / मगर मेरी उम्र का तो क्या, थोड़े बड़े भी , मेरे घर के आस पास चेस खेलना नही जानता था / मैं दीवाना हो चुका था , मैंने "शतरंज के खिलाडी " देखी उस वक़्त दूरदर्शन पर , और एक आईडिया आया के , मैं अकेला भी इसे खेल सकता हूँ / मैं नहा धोके सन्डे के दिन , शतरंज की बिसात बिछा कर खेलने बैठ गया / दोनों तरफ की बाज़ी मैं खुद खेल रहा था / मेरी दीदी , इसे बड़े ध्यान से देख रही थी / पता नही मेरी दीवानगी देख कर उसे एक शैतानी सूझी , मुझे तो कुछ पता ही नही चला / वो मेरे पास आई और बोली की , मैं तुम्हारे साथ शरतंज खेलूंगी , मैं बड़ा खुश हुआ के इसे तो मैं हरा ही दूंगा , क्यूंकि मुझे पता था इसे ठीक से खेलना नही आता, मगर उसने मेरे साथ एक शर्त रखी, वो ये के वो तभी खेलेगी जब मैं उसके कहे अनुसार करूँगा , मैंने हामी भर दी / मैं , जब तक मेरी मूछें नही आई थी , दिखने में लड़की की तरह दीखता था , उसने मुझे लड़कियों की तरह सजाना शुरू किया / चोटी बांधी , साधना की तरह माथे पे बाल को झुकाया , काजल , बिंदी , lipstick , कान की बाली , रूज़ , इत्यादि लगायी , मैं चुप चाप सारा करने दिया उसे , ये सोंच कर के वो मेरे साथ शरतंज खेलेगी / लेकिन वो तो कोई और ही शतरंज खेल रही थी मेरे साथ / वो बिलकुल भी नही हंसी जब तक मुझे पूरी तरह तय्यार नही कर लिया , और फिर बोली की हिलना मत यहाँ से , मैं आती हूँ अभी थोड़ी देर में / इसके बाद वो ज़ालिम, माँ को, आस पड़ोस की लड़कियों और महिलाओं को , ये कह कर बुला के लायी मुझे दिखने कि, उसके घर एक नई लड़की आई है / हे भगवान सब मुझे देखने आये , जोर जोर से हंस रहे थे , दीदी भी/ माँ कह रही थी , कितना सुन्दर लग रहा है / मैं अन्दर से खीज़ रहा था , मगर ये विश्वास था , के सब के जाने के बाद , वो जरुर खेलेगी , पर ज़ालिम मुझे उल्लू बना गयी , नही खेली मेरे साथ / और दुखी होकर सलवार कुर्ती उतरने लगा , और अपना makeup भी / आज भी उस घटना को सोंचता हूँ तो हँसी आती है /
समय तेज़ी के साथ बीत रहा था / धीरे धीरे पिता जी का कारोबार मंदा पड़ रहा था , मगर मुझे ज्ञान नही था / उन्होंने अतिरिक्त आमदनी के लिए , एक GENERAL STORE भी खोल लिया / बढ़िया उदघाटन किया / इसी बीच दीदी का रिश्ता तय हो गया / पिता जी का शहर में शादी करने का ये पहला अनुभव था / लड़के वाले भी , हम से बड़े रसूख वाले थे / मगर पिता जी ने कोई कमी नही होने दी और अपनी चादर की लम्बाई का अनुभव उन्हें नही रहा / बिज़नस के भरोसे उन्होंने उस ज़माने में 1990 - 91 में करीब 5 लाख रुपये खर्च कर दिए / मुझे इसलिए याद है के बाद में खर्चों का calculator पर मैंने ही टोटल किया था / पिता जी का अपना बैंक बैलेंस यूँ nil करना , उन्हें आने वाले समय में बहुत हीं भारी पड़ा / इसका अंदाजा मुझे अगले साल हुआ , जब लालू जी के राज में बिज़नस बिलकुल आधा रह गया , और पहली बार दशहरा में , हमारे लिए उन्होंने नये कपडे नही ख़रीदे /
अब मैं आठवी कक्षा में आ चुका था , और धीरे धीरे चीजों को , जो घर में चल रही थी, अच्छी तरह समझने लगा था / वैसे तो मेरे स्कूल में कोई विशेष फीस नही लगती थी , मगर फिर भी मैंने निर्णय लिया के मैं अब अपने पढाई का खर्च स्वयं उठाऊंगा / वो मौका मुझे जल्द ही मिल गया /मेरे नीचे वाले फ्लैट में एक साउथ इंडियन फॅमिली रहा करती थी , जो क्रिस्चन थे , और उनकी बच्ची , Smitha S. john तीन साल की हो चुकी थी / मैंने उसे हिन्दू विधि विधान के सरस्वती पूजा के दिन से पढाना शुरू कर दिया / मुझे बदले में महीने के 150 rs मिलने लगे / मैं 5th तक उसे पढाता रहा , शायद teaching की वो पहली ट्रेनिंग थी मेरी / वो हमेशा अच्छे नंबर से पास हुई /आज Smitha , Gurgaon IBM में काम कर रही है और अपनी पढाई भी कर रही है / आठवी कक्षा में जाने के बाद से मैंने पिता जी से अपनी पढाई का कोई भी पैसा नही लिया /
समय बिताता चला जा रहा था , पिता जी का बिज़नस भी धीरे धीरे खत्म होता जा रहा था / किसी तरह मैं अपनी पढाई की जरूरतों को पूरा कर रहा था , और पिता जी अपने घर के खर्चे को /अब मेरा और मेरे परिवार का सबसे मुश्किल समय आने वाला था /
jeevan khud ek sangharash hai....jeevan mein mushkil na ho to insaan kabhi shakti arjit nai kar sakta....aapki himmat aapke isi bachhpan ki kashmkash ki den hai........zalim ji
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