एक तरफ मैं IPS के लिए मन लगा कर पढ़ रहा था , लोगों का मेरे ऊपर विश्वास देख कर , मैं बहुत उत्साहित था /
दूसरी तरफ मेरे सारे बुखार भी मेरे साथ साथ चल रहे थे / दिनचर्या कुछ यूँ थी :- सुबह 5 बजे कुंगफू (घर में , दौड़ लगाने जा रहा हूँ बोलता था ) , 6 - 7 :30 क्रिकेट , स्कूल जाने के दौरान 3 km के रास्ते में गाना (आने और जाने वक़्त ) , शाम को पढाई के बाद Drawing बनाना , और खाने के बाद सोने से पहले कॉमिक्स पढ़ना/
चाचा चौधरी का दिमाग , सुपर कमांडो ध्रुव का एक्शन और नागराज की फंतासी मुझे काफी रोचक लगती थी /कॉमिक्स के ग्राफिक्स से मैं हमेशा प्रभावित होता था , और अपने drawing में उन्हें उतारने की कोशिश करता था /मुझे याद है इस कॉमिक्स के शौक ने मुझे बचपन के अपने पहले business स्टार्ट करने की प्रेरणा दी / Business Model को बजाप्ते एक सादे पेपर पे लिखा /उसमे लिखा था " A. एक नयी कॉमिक्स के बदले 2 पुरानी कॉमिक्स पढने को दी जाएगी ,B , एक पुराने dizest के बदले भी २ कॉमिक्स मिलेंगी C . नयी कॉमिक्स share हमेशा नई के साथ ही की जाएगी / नहीं लौटने पर जुर्माने इत्यादि का भी जिक्र था / अब ठीक से याद नहीं उसका मजमून / फिर मैंने उसे फोटो स्टेट करवाया और दोस्तों में बाँट दिया / मेरा बिज़नस चल निकला और मेरे पास करीब 150 कॉमिक्स हो गये / पास के कॉमिक्स दुकान वाले से १-२ रूपए प्रत्येक के हिसाब से बेच दिया /कुछ अपने जेब खर्च के लिए रखा और बाकि की नई कॉमिक्स और dizest , इस तरह एक circle शुरू हो गया / मैं अपने धंधे पर पूरा समर्पित था / जो भी जेब खर्च मिलता मैं बहुत थोडा खर्च करता और अपने business में इन्वेस्ट करता ,इसका सिलसिला तब थमा जब मेरे कॉमिक्स की संख्या 250 तक पहुँच गयी / मेरे पढाई की अलमारी का निचला Floor पूरी तरह भर गया था / एक दिन पिताजी का मेरे टेबल के पास आना हुआ , उनकी नज़र अलमारी के नीचे पड़ी और मेरे बुलावा दुसरे कमरे में हुआ / उन्होंने मेरे घुसते ही पूछा के सारे कॉमिक्स यहाँ पे लाओ , मैं सारी कॉमिक्स उनके पास ले गया / दिल माधुरी की तरह धक् धक् कर रहा था , पापा पीटते तो नहीं थे जल्दी मगर जब पीटते थे तो मुझे सारे भगवान याद आ जाते थे / पापा ने सारे कॉमिक्स के rates देखे , सबको टोटल किया , मेरे से पूछा " पैसे कहाँ से आये इतने सारे ?" मैंने अपनी पूरी बात बताई , लेकिन उनको मेरा business plan समझ नहीं आया और वो शक में आ गये की कहीं मैं गलत संगत में तो नहीं /उन्होंने कड़ाई से पूछ ताछ की , मैं speak asia (a company ) के सीईओ मनोज कुमार की तरह अपना business plan समझाता रहा / उनके सब्र का बांध टूट गया और मेरे ऊपर उनका डंडा भी , उन्होंने कॉमिक्स का भूत उतार दिया / मेरा business फेल हो गया /
अब मैं ज्यादा ध्यान Drawing पे देने लगा,जहाँ जहाँ डंडा लगा था , उसका दर्द कुछ दिनों और असर कई महीनों तक रहा /बाकि चीजें चल रही थीं/ उसी दौरान मेरी दोस्ती एक ऐसे लड़के से हुई जो घर के पास का हीं था और उसकी sign board पेंटिंग की दुकान थी / उससे मेरे दो फायेदे हुए , एक वो साइकिल से स्कूल जाता था , मैं उसके साथ , दोनों साथ लौटते थे /सन्डे को उसके घर जाता था घर का बाहर के हिस्से में दुकान थी / वहां मैं आर्ट सीखता था देख देख के , कैसे वो किसी की पोट्रेट बनाते हैं / घर आ कर प्रक्टिस करता था / जल्द ही मैं छोटे फोटो से , किसी का भी पोट्रेट बनाने लगा , लोग पसंद करते थे / थोड़ी कमियां हुआ करती थी , लेकिन मेरी उम्र देख के लोग उसे इग्नोर कर देते थे / एक बार मैं पूरा मन लगा कर अपनी फेवरेट हेरोइन ASHA PAREKH की पिक्चर बना रहा था , मैं इतना डूबा हुआ था के मुझे ध्यान हीं नहीं रहा के पापा कब मेरे पीछे से मुझे देख रहे हैं / अचानक उन्होंने पूछा "क्या कर रहे हो " मैंने कुछ बोला नहीं , उन्होंने ये कह कर उस पेंटिंग को फाड़ दिया के मैं पढाई पे ध्यान नहीं देता और ये सब बेकार की चीजें हैं /मेरा करियर पेंटिंग में नहीं है / मेरी कई घंटों की मेहनत बेकार हो चुकी थी / वो फटी हुई तस्वीर मुझे इस तरह लग रही थी , जैसे किसी में मेरे चेहरे , मेरे अस्तित्व को फाड़ कर फ़ेंक दिया हो / अब मैं धीरे धीरे बड़ा हो रहा था और मेरे अन्दर का विद्रोह अब जाग रहा था / मुझे अहसास हो चला था के पढाई और डिग्री के अलावा जो भी मेरे अन्दर गुण हैं वो मैं पूरा नहीं कर पाउँगा , क्यों की मुझे पापा का सहयोग मिलने वाला नहीं / मेरा विरोधाभास अब मुझ पे हावी होने लगा था , अब मैं बड़ा हो रहा था / बड़ों की किताबें बड़ों का ज्ञान सब ध्यान से सुनने समझने के कारण, जल्दी ही मेरे अन्दर का विद्रोही भी जल्दी बड़ा हो चुका था / अपने सपनों को यूँ परों तले रोंद्ता हुआ देख ,अब उससे बर्दाश्त नहीं होता था /
मैंने अपने ही बलबूते पर बिना सीखे कुछ prize भी जीते , लेकिन उसका मूल्यांकन कोई नहीं कर पाया / जब इस लायक हुआ के अपना मूल्यांकन खुद कर सकूँ,समय रेत की तरह मुट्ठी की तरह फिसल चुका था / अब बहोत देर हो चुकी थी / मेरा ये शौक चित्रकारी का 2003 तक रहा , अब तो समय हीं नहीं रहा /लेकिन मैं कूची पकड़ना अभी भुला नहीं हूँ /
मैंने अपने ही बलबूते पर बिना सीखे कुछ prize भी जीते , लेकिन उसका मूल्यांकन कोई नहीं कर पाया / जब इस लायक हुआ के अपना मूल्यांकन खुद कर सकूँ,समय रेत की तरह मुट्ठी की तरह फिसल चुका था / अब बहोत देर हो चुकी थी / मेरा ये शौक चित्रकारी का 2003 तक रहा , अब तो समय हीं नहीं रहा /लेकिन मैं कूची पकड़ना अभी भुला नहीं हूँ /
कुंगफू के लगभग आठ महीने हो चुके थे / मुझे अपग्रेड होना था / जब तक yellow बेल्ट था , तब तक अपने मास्टर और दोस्तों की ड्रेस से काम चलाया मगर अब मुझे नई ड्रेस चाहिए थी , एक ननचक और एक तलवार जो खासतौर पे ट्रेनिंग के लिए बनाई जाती थी / पैसा लगना था कोई चारा नहीं था पापा से बात करने के अलावा /मास्टर ने बोला के मैं कोशिश करूँगा लेकिन 800 /- rs तो देना ही देना था / मेरे पास कोई चारा नहीं था / मैंने शाम को पापा का मूड देख के बात करने की कोशिश की / मैंने सब सच बता दिया कब से जा रहा हूँ , क्या क्या सिखा , मास्टर तारीफ करते हैं वगैरह / पापा ने सारी बातें बड़े ध्यान से सुनीं / पहले हँसे , मुझे गौर से देखा , फिर मेरे पास आये , बोले अब लड़ मेरे से कराटे, उन्होंने मेरा गिरेबान पकड़ लिया और झुलाने लगे / अरे लड़ न , बार बार वो बोल रहे थे / मैं चाहता तो एक सेकंड में अपना गिरेबान छुड़ा सकता था , लेकिन मुझे सिखाया गया था मास्टर के द्वारा के सम्मान क्या होते है, ये विद्या क्या है / जब मैंने कुछ नहीं किया तब उन्होंने मुझे थप्पड़ मार दिया , बोले अब तो लड़ के दिखा , चला कराटे / उस समय उस बच्चे के दिल पे क्या बीत रही होगी , जिसका हर सपना कुचला जा रहा हो , रोंदा जा रहा हो / अन्दर एक तूफान सा चल रहा था , पढ़े लिखे लोगों के इस व्यव्हार से मैं चकित था , जो गाना तो सुनते थे , गाने नहीं देते थे , ओलंपिक्स में कराटे देखते थे , महत्व भी जानते थे मगर सिखने नहीं देते थे / शायद मेरी सुरक्षा और करियर इसका कारण हो सकती थीं / मुझे पे कुछ नहीं बना / मैंने पहली बार अपनी आँखों से अपने पिता को विद्रोह भाव से देखा , और अपने रूम में वापस चला आया / सारी बातें माँ को बताई , सांसे तेज़ चल रहीं थीं / सारी बातें बोलीं . उसने सिर्फ इतना कहा , तेरे भले के लिए था / तुझे चोट लग सकती थी /मैंने बाद में अपनी क्लास जारी रखने की कोशिश की , मगर कर न सका / वो सपना भी अधुरा रह गया /
Cricket पिता जी को बहुत पसंद था रेडिओ के ज़माने से हीं पांच पांच दिनों तक टेस्ट मैच सुनते देखा था मैंने जब मैं 4 - 5 साल का रहा होऊंगा /क्यूँ के मैं घर से हमेशा दौड़ लगाने के बहाने अपने दोनों कम करता था / मेरा सुबह जाना भाई बंद करवा दिया गया / काफी मिन्नतों और माँ की सहायता से गाँधी मैदान दोबारा जाना शुरू हुआ / क्रिकेट का दीवानापन मेरे अन्दर बढ़ता जा रहा था /
ऐसा नहीं था के केवल मुझे कॉमिक्स पढने का ही शौक था , वो मेरे लिए मनोरंजक हुआ करती थी / लेकिन ज्ञान वर्धक भी पढता था , नंदन , सुमन सौरव, प्रतियिगिता दर्पण इत्यादि / उसी दौरान एक किताब से मेरा परिचय हुआ जिसका नाम था , धर्मयुग/ ये किताब बच्चों के लिए नहीं थी / इसमें उस समय के सामायिक विषय (current affairs ) राजनीती इत्यादि की बातें होती थीं / लेकिन वो धरमवीर भारती के संपादन का जादू था हरेक पन्ना अच्छा लगता था / सभी ये देख कर आर्श्चय चकित होते थे के ये बड़े लोगों की किताब इतने ध्यान से क्यूँ पढता है ? कुछ लोग छींटा -कशी भी करते थे , पढ़ाकू, विद्वान , एक दिन प्रधान मंत्री बनेगा आदि इत्यादि /मगर मुझे पता था , मुझे IPS की तय्यारी करनी है, जितना ज्ञान हो सके लेना है / मोहर सर की बातें याद थीं मुझे , किताबें सबसे अच्छी मित्र और ज्ञान का स्रोत होती हैं / मैं सारी चीजें एक साथ कर रहा था / लेकिन टार्गेट याद था मुझे, IPS बनना /
धर्मयुग में , एक कार्टून कोना भी आता था , जिसके मुख्य पात्र का नाम था ढब्बू जी / तब जाके मुझे पता चला के पापा मुझे ढब्बू जी क्यूँ बुलाते हैं ?
मेरे नामों की लिस्ट भी लम्बी है , जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ेगी , पता चलता जायेगा / अब तक तो स्कूल और दोस्तों के बीच रवि , पापा और ननिहाल में ढब्बू जी , माँ के लिए लालो , और बड़ी बहिन के लिए बाबु था / कुछ लोग पंडित जी भी बोलते थे /
इधर पटना में लालू जी की सरकार में धीरे-धीरे जाती वाद बढ़ने लगा था /उच्च जाती और पिछड़े वर्ग के लोगों के बीच दूरियां बढती जा रहीं थीं / उच्च जातियों के प्रभाव , सम्मान घटते जा रहे थे ,और घटती जा रही थी , बिहार की अर्थ और कानून व्यवस्था , मगर ये तो अभी शुरुआत थी / अभी तो बिहार को बहुत कुछ देखना बाकि था ,और मुझे भी /
मेरे नामों की लिस्ट भी लम्बी है , जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ेगी , पता चलता जायेगा / अब तक तो स्कूल और दोस्तों के बीच रवि , पापा और ननिहाल में ढब्बू जी , माँ के लिए लालो , और बड़ी बहिन के लिए बाबु था / कुछ लोग पंडित जी भी बोलते थे /
इधर पटना में लालू जी की सरकार में धीरे-धीरे जाती वाद बढ़ने लगा था /उच्च जाती और पिछड़े वर्ग के लोगों के बीच दूरियां बढती जा रहीं थीं / उच्च जातियों के प्रभाव , सम्मान घटते जा रहे थे ,और घटती जा रही थी , बिहार की अर्थ और कानून व्यवस्था , मगर ये तो अभी शुरुआत थी / अभी तो बिहार को बहुत कुछ देखना बाकि था ,और मुझे भी /
पिता जी का Fire bricks (एक प्रकार की ईंट जिसका इस्तेमाल very high temperature वाली जगहों पे होता है ) का व्यवसाय था / अच्छी कमाई थी , मगर धीरे धीरे Industrial Area के कारखाने बिहार छोड़ के जा रहे थे , जो हमारे ग्राहक थे , उनका बिज़नस धीरे धीरे मंदा पड़ रहा था , मेरे आने वाले संघर्ष की बुनियाद तय्यार हो रही थी/
इसी बीच एक और घटना हुई , डंडे की मर का असर कम हो चुका था , और एक नए कॉमिक्स पे मेरा दिल आ गया / मैंने चुप चाप खरीदी और अपने स्कूल बैग में रख लिया / मुझे याद है वो 13 जनवरी थी , बहुत ठण्ड थी / लेकिन बचपन से हीं मुझे एक बीमारी है , मौसम के उल्टा रहना , शायद मेरा शरीर ही ऐसा है / मई की गर्मी में में आज भी मैं बिना fan के रह सकता हूँ अगर जरुरत पड़े तो , सो भाई सकता हूँ अगर मच्छर न हो एक भी / ऐसे ही ठण्ड में ज्यादा कुछ लादने की जरुरत नही पड़ती , बहने मुझे कभी कभी A/C और माँ मुझे बाबाजी भी बोल देती हैं /
मैं कॉमिक्स लेकर आया और बैग रख कर खेलने चला गया /मेरा प्लान था के अगले दिन मकर संक्रांति की छुट्टी है स्कूल में , पापा भी घर से बाहर अपने business के सिलसिले में गये है / कल जब माँ कम में व्यस्त होगी मैं चुपके से उसे पढ़ लूँगा / किस्मत ख़राब थी या होनी थी , माँ ने बैग धोने के लिए उसे खाली किया और मेरा कॉमिक्स पकड़ा गया /शाम को जब आया , माँ ने बहुत कुछ सुनाया , बोली आने दे तेरे पापा को कल , तेरी वही खबर लेंगे , तू नही सुधरेगा / उस दिन मैंने सारी रात डर के गुजारी / अगले दिन बहुत सोंचा और अंत में फैसला किया , रोज़ रोज़ के पिटने से अच्छा घर ही छोड़ देना चाहिए / मेरे पास 50 rs थे ,प्लान बनाया , चुप चाप अपने स्कूल बैग में कुछ कपड़े डाले /माँ के purse से 100 rs और निकाले और तय किया मैं बिना किसी को बताये अपने ननिहाल चला जाऊंगा , एक वही जगह थी जो मैंने देखि थी और जहाँ जा सकता था / शाम को करीब 5 बजे मैंने घर छोड़ दिया , वो मंजर अभी आँखों के आगे घूम रहा है , सफ़ेद half shirt , और नीली half paint , कंधे पे बैग , और मैं चला जा रहा हूँ तेज़ तेज़ / वो मेरे विद्रोह का पहले कदम था /
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