बुधवार, 30 नवंबर 2011

SAFAR - II

पहाड़गंज एक ऐसी जगह , जहाँ सब कुछ था /गरीबी और लाचारी में रहते हुए लोग , पुल के नीचे बैठे चरसी , जिसे कोई कानून, पता नही क्यूँ किसी सुधर गृह नहीं भेजता था , और जिसे देख के ये एहसास होता के क्यूँ केवल भारत की लाचारी और बेबसी की ही तस्वीरे दिखाते हैं विदेशी लोग / इसलिए के कानून और व्यवस्था  बड़े बड़े काम करती और ये सब तो उनके लिए छोटी बात थी / उस जगह खाना 20 rs का भी मिल जाता और 200 का भी / अर्थात , मिला जुला समाज था वहां का, हर तरीके के लोग थे / मेरी जिससे भी बात होती , मैं अपने टोन पर विशेष ध्यान रखता , और कुछ नये शब्द सीखने की कोशिश करता / मैं अलग अलग प्रान्तों के लोगों से मिलकर उनके संस्कार विचार इत्यादि का अवलोकन करता / हमारा कार्यालय पहले तल्ले पे था , और नीचे एक चाय की दुकान थी /वहां मेरा बैठना होता सुबह शाम / चाय वाले अंकल जी बाहर से थे कही से , वो मुझे हरियाणवी समझते थे / क्यूँ की दिल्ली की भाषा मिली जुली थी और बोलने के प्रयास में , हरयाणवी का असर मेरी टोन में अधिक था /मेरे सामने ही वो बिहारियों का मजाक उड़ाते और मैं उनकी तरफ देख के हँसता/

मैंने वहां ऑफिस की व्यवस्था देखि , बिलकुल लचर व्यवस्था थी, किसी भी चीज़ का कोई रिकॉर्ड नही / 2 रूपए की कॉपी में , हिसाब लिखा हुआ था , जैसे किसी बच्चे के maths की नोट बुक हो / खैर मैंने चीजों को सही करना शुरू किया ,stationary वगैरह ला के / वहां के मेनेजर साहब , बड़े ही उदास , शांत और आलसी टाइप चीज़ लगे मुझे / मैंने उनको ज्ञान दिया , वो चुप चाप सुनता रहा . न तो हाँ बोला और न ही ना / मुझे दाल में कुछ काला नज़र आया / विशेष रूप से पूछने पर पता चला के , उसकी शिकायत ये है की उसकी तनख्वाह बहुत कम है / लेकिन मैं इस जवाब से संतुष्ट नही हुआ , वो कुछ छुपा रहा था /  शाम के वक़्त पता चला के ये ऑफिस तो शाम को , वहां के लोगों के लिए शराब पीने का अड्डा था / मुझे गुस्सा तो बहुत आया मगर , मैं भी यही चाहता था के मेनेजर साहब शराब पी लें और फिर असलियत बयाँ करें / मुझे तो वैसे ही सब सम्मान दे रहे थे , मेनेजर साहब ने बता दिया होगा उन्हें पहले से ही / उनलोगों ने दबाव डाला और मैंने हामी भर दी, मेरे लिए भी गिलास भर दिया गया / वहां मनोरंजन हुआ , मैंने गाने भी सुनाये , और अपने विचार भी ,सबने मजे किये / महफ़िल उठ गयी / सब के जाने के बाद मैंने , मेनेजर साहब से फिर से बात छेड़ी, उसने सिर्फ इतना ही कहा के वो मजबूरी में काम कर रहा है, और मुझे जल्द ही सब पता चल जायेगा / मैंने बहुत कोशिश की मगर असली बात पता नही चली / अगले दिन मैं वहां के कुछ offices में गया और कुछ clients बनाये / मुझे यही नही पता चलता था के मेनेजर साहब दिन भर गायब कहाँ रहते हैं??? मेरा दो दिनों बाद का टिकट हो गया , और उसी दिन मुझे सारे गोरखधंधे का पता चल गया / दरअसल ये co कुरियर co के आड़ में स्मगलिंग करती थी , इलेक्ट्रोनिक्स का / मेरे पाँव तले की ज़मीं खिसक गयी , मुझे मेनेजर साहब ने बताया के बहुत लम्बा खेल होता है/ माल चीन से आता और रेलवे के द्वारा , पटना और फिर वहां से , अलग अलग जगहों पर जाता / मेरे साथ ये तीसरा धोखा था /मैं दिखने में भोला भला और अछे खानदान का लगता था इसलिए मुझे इस कम के लिए चुना गया था / मैंने इस बार , इनको सबक सिखाने की सोंची , और पूरा मामला और खेल क्या है , समझने के लिए तैयार हो गया /

अगले दिन मेनेजर साहब मुझे पहाड़ गंज से करीब एक किलोमीटर आगे ले गये , रेलवे ट्रैक के किनारे किनारे / जहाँ हम रुके शायद वहां ट्रेन की सफाई वगैरह की जाती थी / वहां एक ट्रेन का इंजन लगा था , मेनेजर साहब ने ड्राईवर से मेरी बात करवाई , जान पहचान के बाद उन्होंने मुझे नियत समय आने को बोल दिया / मुझे धीरे धीरे खेल समझ में आ रहा था / शाम को मेनेजर साहब दो बड़े बड़े बैग ले कर आये और मुझसे कहा के , यही ले जाना है , कोई दिक्कत नही होगी , ड्राईवर खुद लेके जायेगा engine में रख कर / मैंने रात को पुरे सामान को चेक किया , कही इलेक्ट्रोनिक्स के नाम पे कुछ और तो नही / मगर उसमे कुछ भी नहीं निकला , केवल automatic कैमरों से भरे थे  दोनों बैग / दरअसल ये टैक्स की चोरी थी , ये गोरखधंधा करते थे ये लोग / खैर मैं नियत समय पर बैग ले कर ड्राईवर को दे आया / वापस स्टेशन आकर ट्रेन पकड़ी , जिसके engine में वो सामान रखा था / पटना पहुँचने के बाद मैं सीधा ऑफिस पहुंचा , और किसी को कुछ भी ऐसा नही कहा जिससे ये शक हो के मुझे ये गैर कानूनी काम अच्छा नही लगा / शाम के वक़्त मैंने police control रूम में फ़ोन किया , और बताया के क्या गोरखधंधा चल रहा है / मेरे इस प्रयास का कोई फायेदा मुझे अगले दिन दिखाई नही दिया / शायद सब पहले से ही तय था / मैंने ऑफिस पहुँच कर नौकरी छोड़ने की बात की , उन्होंने कई तरह का लालच दिया मुझे मगर ,मैंने वो नौकरी भी छोड़ दी /


फिर से एक सप्ताह के करीब का ब्रेक लग गया , और फिर वही दोस्तों के साथ मस्ती  और कॉलेज किया मैंने / दिमाग में बस एक चीज़ चलती के , क्या दुनिया है ये, सभी सब का केवल इस्तेमाल करना जानते हैं बस / स्वार्थी दुनिया है ये और जिसके पास अपना धन नही वो किसी कम का नही इस दुनियां में / एक दिन अचानक मेरे सबसे पहले ऑफिस से एक व्यक्ति मेरे घर आया , और बताया के मुझे मालिक ने बुलाया है / मेरी समझ में कुछ आया नही / बाद में पता चला के वो मुझे दुबारा नौकरी पर रखना चाहते थे , दरअसल उन्हें कोई काम मिला था , जिसमे 24 hrs में दिल्ली में document डेलिवर करने थे , और सारे highly confidential थे / उन्हें मुझपर अब भी विश्वास था , मुझे ये जान कर ख़ुशी हुई / लेकिन काम ये अलग तरीके का था , शाम की ट्रेन से दिल्ली जाना था, अगले दिन दिल्ली पहुँच के , documents deliver करने थे , और फिर शाम को ट्रेन पकड़ कर वापस आना था / पैसों की कमाई तो थी , मगर मेहनत बहुत थी /मैंने तय किया , कुछ न करने से कुछ करना अच्छा है ,मैंने हामी भर दी / अब सिलसिला शुरू हुआ , हर दिन दिल्ली पटना करने का / दिल्ली के बहुत सारे स्थान से परिचित हुआ , क्यूँ की document भी मुझे खुद ही ले जाना होता था / मेरा दुनिया को देखने का , समझने का नजरिया भी बदला / मगर इन सब के बीच मैं बहुत थक जाता , रोज़ ट्रेन में सफ़र आसान काम नही था / करीब एक महीने हो गये थे लगातार ऐसा ही करते करते , मैं अब किसी दुसरे विकल्प की तलाश में था /


उधर घर की हालत में कोई विशेष सुधार नही था / वैसा ही था सबकुछ/ दोनों बहने बड़ी हो रही थी और उनकी डिमांड भी / क्यूँ की उनकी पढाई का खर्च भी बढ़ रहा था / महंगाई भी बढ़ रही थी , उस हिसाब से मेरी कमाई नही / किसी भी तकनिकी पढाई के लिए न मेरे पास समय था , न ही पैसा / मुझे elcetronics से लगाव था / मैं इसमें कुछ करना चाहता था ,मगर मजबूरी थी / मैं ये नही चाहता था के , मेरे जैसी दिक्कत मेरी बहनों को आये , इसलिए मैं बस पैसे कमाना चाहता था / मेरा सपना अब बदल चुका था ,क्यूँ की मुझे पता था के मेरे पास समय नही है पढने का / मुझे किसी अच्छे से मौके की तलाश थी , दिक्कत ये थी के , मैंने अभी इंटर भी पास नही किया था / वैसे मैं फॉर्म भरता रहता , मगर कई बार व्यस्तता अथवा पैसों के अभाव में नही जा पता था परीक्षा के लिए / कई परीक्षाएं दी भी मगर बात नही बनी / एक दिन मैंने अपने को गौर से आइने में देखा , आँखों में ऑंखें डाल के , लगातार / उस रात मैंने सोंचा के मेरे पास कस्टमर्स भी हैं और काम कैसे करना है इसका तरीका भी / क्यूँ न मैं अपना काम खुद शुरू कर दूँ /ये विचार आते ही मेरी आँखों में चमक आ गयी / मैं  रात भर यही प्लानिंग करता रहा के सुबह मुझे किस प्रकार इसे अंजाम देना है / सुबह मैं अपने दो चार कस्टमर्स  के पास गया , वो ऐसे कस्टमर्स थे जिन्हें  मेरे ऊपर पूरा भरोसा था / मैं किस कंपनी से उनका काम करूं इनसे उन्हें कोई मतलब नही था ,मतलब बस ये था के काम मैं कर रहा हूँ / उन्होंने मुझे आश्वाशन दे दिया , मेरा साथ देने का / अब मैं अपने courier मार्केट पहुंचा , और विभिन्न लोगों के साथ बातें की / मैंने लगभग पूरे बिहार और पूरे नोर्थ इंडिया की सेट्टिंग कर ली / दुसरे कंपनी के द्वारा काम करने से बचत तो कम थी , मगर , मेरे लिए काफी थी / जितनी मेहनत , उतना ही फायेदा / शाम को मैं अपने मित्र मंडली के पास पहुंचा और अपना प्लान बताया / सब ने अपने सुझाव दिए और , मुझे प्रोत्साहित भी किया / अगले दिन मैंने अपनी कंपनी का नाम सोंचा , और बिल बुक छपने को दे दिया , नाम रखा "saarc express" / एक sign board बनवाया और अपने घर के बालकोनी में टांग दिया / अपने रूम को मैंने अपना ऑफिस बना लिया / ये सारे खर्च मैंने इधर उधर से जुगाड़ बाजी कर के कर ली / अपने लिए दो ड्रेस और एक executive बैग ख़रीदा / अगले चार दिन बाद , मैंने ओपनिंग कर दी अपने काम की / नौकरी छोड़ दी एक बार फिर से / सुबह तय्यार होके, हाथ में बैग और आँखों में धूप का चश्मा लगा कर , निकल पड़ा नई मंजिलों की ओर/ दोस्तों के अलावा किसी को विश्वास नही था के मैं इस प्रकार कुछ कर पाउँगा, मगर मुझे अपने आप पर पूरा भरोसा था / मेरे जितने भी कस्टमर्स थे , सब ने पहले मुझे लोकल पटना के documents से try किया / पहले दिन ही मुझे लगभग 100 docs  मिले , मतलब २०० रूपए का काम / अगले दिन से मेरी दिन चर्या यही बन गयी ,सुबह 8 :30 में घर से डोक्स लेके निकलना , और शाम तक उसे बाँटना , फिर शाम में अगले दिन के लिए डोक्स बुक करना , और अगले दिन फिर वही / मैं रोज़ लगभग 20-25 किलोमीटर पैदल चलता / मगर न तो अपनी चाल काम होने देता , न अपनी presentation / जहाँ भी मैं डोक्स लेकर जाता , अपनी कंपनी के बारे में बताता / मैं बिना किसी  registration और किसी भी कानूनी कार्यवाही  के कंपनी चला रहा था/ मैंने कभी टैक्स भी नही दिया था / लेकिन बिहार की अवस्था ऐसी थी के सब चलता था / मेरी मेहनत धीरे धीरे रंग लायी , और मुझे आउट स्टेशन का भी काम मिलने लगा / मैं अपने को ओफिसेस में इस तरह प्रस्तुत करता , के मेरी वाक् पटुता के कारण मुझे कुछ न कुछ काम मिल ही जाता / मेरा काम बढ़ गया था , और लोकल पटना के डोक्स भी ज्यादा होते जा रहे थे , जिन्हें मैं अकेला संभाल नहीं पा रहा था / एक और वजह थी, मैं साइकिल से ज्यादा पैदल ही चल के जाना पसंद करता कही भी , या  फिर ऑटो से / मैंने अपने दो साथियों  को अपने साथ जोड़ लिया , उन्हें भी पार्ट टाइम कुछ डोक्स डेलिवर करने को देता / उनकी भी कुछ कमाई हो जाती / पहले महीने मैंने लगभग 6 हज़ार की कमाई की / जो मेरे लिये एक अच्छी कमाई थी , उस वक़्त ये एक अच्छी रकम भी थी / मैंने सबसे पहले जरुरत का सामान ,बच्चों के कपडे वगैरह , माँ के लिए साडी इत्यादि खरीदी / मैं खुश था , क्यूँ की एक तो अपना काम था दूसरा मुझे धोखा  भी नहीं दे सकता था अब कोई , सिवाए किस्मत के /  मार्केट में भी ये बात फ़ैल चुकी थी के , मैंने अपना काम कर लिया है / मेरा काम बढ़ता जा रहा था , लेकिन आश्चर्य तो ये था , के पटना के अलवा मेरा कहीं भी ब्रांच नही था , फिर भी मैं पूरे इंडिया के डोक्स को डेलिवर करवा देता था, समय से / दरअसल मैं जितने में डोक्स बुक करता , आधे पैसे में उन agencies को दे देता जिनका वहां ब्रांच हो / आधे पैसे उसके , आधे मेरे / इसी तरह काम चल रहा था / लगभग तीन महीने में मेरे पास 15 से ज्यादा कस्टमर्स हो गये / मेरे कपडे , स्टाइल सब बदल चुके थे , मैं अपने को बिज़नस मैन के लुक में रखने की कोशिश करता , बातें professional करता / मैंने कई कोरिअर वालों के कस्टमर्स को तोडा था , और उनके लिए खतरा बन रहा था / मैं था तो असलियत में झोला चाप ही / सारा ऑफिस तो मेरे बैग में ही था , मैं खुद ही ऑफिस था / धीरे धीरे courier वालों ने मेरा काम बंद करने के लिए मेरे डोक्स को लेट करना शुरू कर दिया / मेरे समझ में बात आने लगी थी /मुझे कहीं से ये भी सुनने को मिला के कुछ लोग मेरे घर पर छापा मरवाना चाहते हैं ताके registration एक्ट के तहत मेरा काम बंद करवा सकें /  इससे पहले के मार्केट में और कस्टमर्स में मेरी बदनामी होती , मुझे अपना काम बंद करना पड़ा / क्यूँ की मैं रिश्ते ख़राब नही करना चाहता था , किसी और काम का अनुभव भी तो नहीं था मेरे पास / मैंने ये रिश्ता आगे के लिए बना कर रखा /


एक बार फिर मैं बिना काम का हो चुका था / पिछले तीन महीनो में , मैंने बहुत कुछ किया था , घर को पूरा संभाला था , लेकिन मैं फिर से वही पहुँच गया / मैं बार बार नाकाम हो रहा था, कहीं भी सही दिशा नही मिल रही थी , फिर भी मैं डटा हुआ था , कोशिश जारी थी /  मैं अंतर मंथन रोज़ ही करता , स्थितियों का अवलोकन करना और अगला कदम लेना , सब खुद सोंचना पड़ता / जब आदमी के पास पैसों की कमी होती है, तो सब साथ छोड़ देते हैं / पिछले 8 सालों से यही देख रहा था / जो रिश्तेदार मेरे घर आके , महीनो रह कर , अपना काम यहाँ करके जाते , आज झांक कर देखने तक नही आते थे / संपर्क करने पर , हमें देखते हीं खुद का रोना ले कर बैठ जाते ताके हम कोई डिमांड न कर दें उनसे / बड़ी अजीब सी स्थिति थी , सारा कुछ खुद ही करना पड़ता, कोई दिशा निर्देश देने वाला भी नहीं था / इसी बीच मैंने अपना फर्स्ट इयर पूरा किया /

इसी तरह मैंने दो और कुरिएर कंपनी में लगभग 6 महीने और काम किया , लेकिन मैं संतुष्ट नही था /इसके बाद  जीवन का एक नया मोड़ आया / एक नए तरह का काम , वो था , एक होटल में मेनेजर का / दरअसल उस होटल के मालिक मेरे पिता जी के शिष्य थे / बातों बातों में उन्होंने पिता जी से मेरे बारे में पूछा और मुझे बुलवाया / मुझे रात्रि में मेनेजर की ड्यूटी मिल गयी / हालांके जितनी कमाई मैं खुद कर लेता था अपने काम में , उतनी तनख्वाह नही थी , फिर भी नए तरीके के काम के लिए मैंने हामी भर दी / वो होटल स्टेशन के पास था , और कस्टमर्स का आना जाना लगा रहता / मैं करीब एक सप्ताह में पूरा काम सीख गया / मेरी ड्यूटी रात्रि के आठ बजे से सुबह के आठ बजे तक थी / वहां मेहमान नवाजी ही सबसे महत्व पूर्ण थी / मैंने वहां भी अपने ढंग से चीजों को बदलना शुरू किया / मैं रात को हर दो घंटे पे round लगाता / कस्टमर्स के फ़ोन पर तुरंत reaction देता / अगर कोई वेटर लेट करता तो उसे कड़ाई से उसके काम और ज़िम्मेवारियों के बारे में बताता / धीरे धीरे मैं वहां भी सबका चहेता बनता जा रहा था / वहां एक और अच्छी बात थी के  , वहां कस्टमर्स अक्सर official  काम से आते और , बिल की रकम बढ़ा के बनवाते , बढ़ी हुई रकम का 50 % मेनेजर का होता /मेरी कमाई भी हो रही थी वहां /

एक दिन मुझे पता चला के वेटर अकेले क्यूँ नही जाते हैं रात को round  लगाने / दरअसल उस होटल में एक क़त्ल हो चुका था / किसी कस्टमर ने किसी महिला का क़त्ल कर दिया था , और लाश कई दिनों तक बाथरूम में ही रही थी , बेदर्दी से काट के हत्या की गयी थी / पूरे होटल के स्टाफ के बीच ये अफवाह थी के , यहाँ उसकी आत्मा भटकती है / दरवाजे पे तंत्र मंत्र का भी कुछ टंगा हुआ था / मालिक ने भी इस बात की पुष्टि की , मगर , मैं न तो भगवान को मानता था , न ही भूत को / मैं बेधड़क अपना काम कर रहा था / मेरे इस तरह सबका ख्याल रखने के कारण मालिक भी खुश थे और कस्टमर्स भी / वहां कुछ ही दिनों में कस्टमर्स से इतना घुल मिल गया के वो अक्सर मुझे अपने पास बुला लेते / अपनी बातों को शेयर करते , मुझसे भी मेरे बारे में जानते / मेरी कहानी सुन के मुझे आश्वाशन देते की , मेरे अन्दर कुछ बात है और एक दिन मैं नाम करूँगा / ऐसे कस्टमर्स की संख्या बढती जा रही थी / वो जाते जाते अलग से मुझे टिप भी देते / कुछ ही दिनों में मेरी उपरी कमाई रोज़ की 500 के लगभग होने लगी , कभी कभी हज़ार की भी हो जाती / मैं वहां अपनी पहचान बना चुका था / सब अच्छा होने लगा था / कमाई हो रही थी तो मैंने अपने लिए एक स्टील plated नई साइकिल खरीदी / वो मेरे अपने पैसों की खरीदी हुई थी / संगीत के शौक को पूरा करने के लिए डेक ख़रीदा / अब मैं घर का सारा खर्च उठा रहा था , और सबकी जरूरतों को पूरा भी कर रहा था / मगर इनसब अच्छी अच्छी चीजों में एक बुरी चीज़ भी हो रही थी / अक्सर कस्टमर्स के दिल जीतने के लिए उनके साथ शराब पीनी पड़ती / क्यूँ की शराब ही वो चीज़ थी जिसके बाद कस्टमर भावनाओ को व्यक्त करता और मैं उसका अपने हिसाब से उत्तर देता , या सम्बंधित कोई गाना वगैरह सुनाता, और बदले में जाते जाते मोटी टिप मिलती मुझे  / मुझे ये अहसास था , और इसलिए मेरी कमाई भी रोज़ ब  रोज़ बढ़ रही थी /अब मैं लगभग रोज़ शराब पीता , और रात्रि की ड्यूटी भी देता / घर में भी किसी को पता नही चलता / सब मजे में चल रहा था / मैंने लगभग १० हज़ार रूपए डेढ़ महीने में इक्कठा कर लिया था / मगर घर में किसी को इस बात का पता नही था / माँ कभी कभी पूछती थी , के इतना पैसा कहाँ से आ रहा है , उसे शक सा होता मेरे पे / मगर मैंने बता दिया के कस्टमर्स कैसे बिल बनवाते हैं और कैसे टिप देके जाते हैं / मगर मेरी इतनी कमाई है, उसे विश्वास नही होता इसलिए मैंने विशेष कुछ बताया नही / होली बहुत ही अच्छे से मनी / सबके लिए कपडे वगैरह लिए / कुछ राहत मिली मुझे , मैं और पैसे इक्कठे करना चाहता था , और कुरिएर की agency लेना चाहता था और लीगल रूप से काम करना चाहता था / मैंने लगभग 6 महीने में 25 रूपए जोड़ लिए / चुकीं मैं अभी काम कर ही रहा था , मैंने इसे किसी और धंधे में इन्वेस्ट करने का सोंचा ताकि मैं अपने पैसों को बढ़ा सकूँ / मेरा एक मित्र नोर्थ बिहार में पोस्ट ऑफिस डिपार्टमेंट में stationary supply करता था / वो ठेके पे काम लेता टेंडर भरता और सेट्टिंग से पास भी करवा लेता / उसने भरोसा दिया के 25 हज़ार का तीन महीने में लगभग 30 - 35 हज़ार बन सकता है अगर किस्मत ने साथ दिया तो / मैंने कई और मित्रों और मेरे से उम्र में बड़े मित्रों से सलाह लिया / उन्होंने भी कहा के कोई दिक्कत नही है इसके साथ काम करने में / मैंने अपनी सारी बचत अपने मित्र के धंधे में लगा दी /

उधर होटल में एक दिन एक घटना हुई / मुझे शक हुआ के मालिक के लड़के वहां दोस्तों के साथ कुछ गड़बड़ करते हैं / वेटर से पता चला के जिस दिन मैं आता नही वहां लड़की वगैरह ले के आते थे वो लोग / मुझे इससे कोई मतलब तो नही था , मगर एक दिन मेरे रहते उन्होंने ऐसा करने की कोशिश की , जो मैंने नही होने दी / उसी दिन से , उनका व्यवहार मेरे प्रति बदल गया / मैं उनकी आँखों का कांटा बन गया था / मगर मैं अपने काम से मालिक,  स्टाफ और कस्टमर्स का दिल जीत चुका था / उन्हें मुझ पर हावी होने का कोई मौका नही मिल पा रहा था / सन्डे को मेरी छुट्टी हुआ करती थी , अगले दिन सुबह ही मालिक ने मुझे बुलाया / मुझसे पूछा के शनिवार को कौन कौन आया था , और drawer (जिसमे पैसे रखे होते थे ) किसने किसने खोला था / मैंने कहा के चाबी तो केवल आपके पास रहती है , फिर और कौन खोल सकता है ? मैंने पूछा के बात क्या है , पूछने पर पता चला के , लगभग 50 हज़ार रूपए के आस पास चोरी हुए हैं वहां से / मेरा तो दिमाग घूम गया / मैं वहां थोड़ी देर रहा और मालिक को होने वाली घटनाओ के बारे में सब बता दिया / मुझे जाने की आज्ञा मिल गयी / रास्ते में मेरी समझ में आ गया के ये सब खेल केवल मुझे हटाने के लिए था , और किसने किया होगा ये / शाम को मैं गया ड्यूटी पर , रात को मेरी बहुत बहस हुई मालिक के लड़कों के साथ , उन्होंने मार पीट की भी कोशिश की , मगर स्टाफ के बीच बचाओ के कारण मामला शांत हो गया / वो सभी बड़े बाप के बिगडैल बेटे थे , वहां काम करना अब उचित नही था / मैंने वो नौकरी भी छोड़ दी /


मैंने अपना  ध्यान कुछ दिन stationary वाले काम पर देने की सोंची / मैं उसी काम में जुट गया , कैसे काम होता है सीखने लगा / पहले महीने मुझे अच्छी आमदनी हुई / मैंने कुछ दवा वगैरह का भी काम किया , और छोटे छोटे ऑफिस में stationary supply भी की /दो महीनो तक सब ठीक चलता रहा , मगर 2 महीनो के बाद , मेरे मित्र के नियत में खोट आने लगी / वो मुझे टालने लगा / पैसे कमाने का जरिया केवल वही एक धंधा था , उसकी नियत मुझे अच्छी नही लगी / मैंने अपने पैसे वापस मांगे , मगर कई लोगों को बुला कर , उसने तय कर दिया के वो मेरे पैसे हर महीने के हिसाब से , 4 महीनो में देगा / मेरी पूंजी टूट चुकी थी , और एक बार फिर से मुझे नौकरी करने की आवश्यकता थी / क्यूँ कि चार महीनो का समय ले लिया था उसने और मैं बेकार बैठा था / चूँकि मैं कॉमर्स से था , मुझे एक जगह पार्ट टाइम accountant की नौकरी मिल गयी / लगभग चार महीने मैंने वहां कम किया और अपने पैसे निकलने की कोशिश की , जो मेरे मित्र के पास फँस गये थे / कई कई दिन दौड़ना पड़ता उसके पास , 10 दिन दौड़ा कर एक दिन पैसे देता वो , वो भी बड़ी मुश्किल से / उसका व्यवहार बिलकुल बदल गया था मेरे प्रति /

मैं अब 18 साल का हो चुका था / इंटर पास कर चुका था , मगर समय के आभाव के कारण distance education से graduation का दाखिला ले चुका था /मैं बार बार धोखे और नाकामी से मैं तंग आ चुका था / मैं दुखी रहने लगा और उस नाज़ुक सी उम्र में मेरा सहारा बनी शराब / मैं सप्ताह में चार दिन शराब पीता, मेरा ठिकाना था एक बार / मैं जल्द ही उस बार का रोज़ का ग्राहक बन चुका था / उस बार में मैं इस कदर अज़ीज़ बना , के कॉर्नर का टेबल मेरे लिए हमेशा खाली रहता / वजह थी , मेरी सबसे मीठी बोली , चाहे वो वेटर हो या मेनेजर / मुझे एक और आदत लगी वहां , वो थी ग़ज़लों और  शेरों की / उस वक़्त Kumar Shanu की एक album निकली थी जिसका नाम था "नशा "/ उसकी प्रत्येक ग़ज़ल मुझे अच्छी लगती / उस बार में बड़े बड़े तुर्रम खान आते थे , मगर मेरे आते ही, चाहे कोई भी गीत बज रहा हो , वो हटा दिया जाता और" नशा " लगा दिया जाता / ये मेरा डर नहीं , मेरे प्रति वहां के स्टाफ का प्यार था  / स्वयं बार के मालिक , जो कि एक बहुत ही धनि व्यक्ति थे , मुझसे व्यक्तिगत रूप से मिले , और मुझे ज्यादा शराब न पीने की सलाह दी / मगर उन्हें पता था के मैं हमेशा लिमिट में ही रह कर शराब पीता हूँ / मैं धीरे धीरे शराब की चपेट में आता जा रहा था / घर देर से पहुंचना , मेरी आदत बन चुकी थी / मेरे से कोई भी कुछ भी पूछता या समझाने की कोशिश करता तो मैं बहस करता / अपने तर्क को सही करके बताता , सिद्ध करने की कोशिश करता के मैं सही हूँ / परिवार की गलत नीतियों , और गलत निर्णय के कारण मेरा ये हाल है / मेरे लिए किसी ने कुछ नही किया , कुछ नही सोंचा मेरी करियर का / मैं मशीन हूँ और इसे चलने के लिए खुराक चाहिए / घर में टेंशन सी रहने लगी /पापा से भी बहस हो जाती थी कभी कभी , मेरे अन्दर का रावण कभी भी  जाग जाता  था / मैं घर को तो किसी तरह चला रहा था , मगर मेरी बिना मेहनत के पैसे जो मुझे बक्शीश में मिले थे धीरे धीरे ख़त्म होते जा रहे थे / मैं एक नये तरीके का जीवन जी रहा था , जिसे party life बोलूँगा मैं / हर वो क्षण जो आनंद दे मैं उस क्षण को जीता था / कोई भी अवसर शादी विवाह, घुमने फिरने , मौज मस्ती का नही छोड़ता था / मगर जब भी मैं तन्हा होता , हमेशा अपने साथ हो रहे अन्याय से दुखी होता , लगता के इन सब का कारण केवल पैसा है /    मैं अवसाद का शिकार होता जा रहा था / गुस्सा अब इस हद तक बढ़ने लगा के छोटी छोटी बातों पे अपना हाथ दीवाल पर मार देता , या किसी भी चीज़ पे , और तब तक मरता जब तक की खून न निकल जाये / आँखों में हमेशा खून सा तैरता रहता /

एक बार की घटना है , मैं अपने घर का टीवी इत्यादि खुद ही ठीक कर लेता अगर , छोटी मोटी गड़बड़ी हो या बड़ी  / मैंने देख देख से बहुत कुछ सीख लिया था / कई बार ऐसा होता के , किसी अच्छे प्रोग्राम से पहले मैं मेहनत कर के TV को देखने लायक बना देता , मगर अगर वो थोड़ी देर बाद फिर से ख़राब हो जाये तो पिता जी मुझे दोष देते / अकारण ऐसा बोलने से मैं चिढ जाता / मगर फिर कभी , सिस्टर या माँ के कहने पे , फिर से बना देता , मगर पिता जी की ताने मारने की आदत नही जाती थी / एक दिन ऐसा ही हुआ , और मैंने गुस्से में पूरा टीवी उठा के ज़मीन पर पटक दिया / माँ का भी हाल कुछ ऐसा ही था, जब भी मैं उसे परिवार के लिए अपने संघर्ष और बलिदान की दुहाई देता / वो सीधा बोल देती की तूने  कुछ विशेष नही किया , पूरी दुनियां ऐसा करती है / दुनियां ने मेरी मेहनत की तो क़द्र नही की थी मगर , घर में भी यही हाल  देख कर मेरा दिमाग ख़राब हो जाता , मैं बहुत मुश्किल से अपने ऊपर कण्ट्रोल कर पाता / एक दिन घर में मैं और पिता जी अकेले थे , किसी बात पे कहा सुनी हो गयी और मैंने गुस्से  में आकर अपनी जीवन लीला समाप्त करने की ठान ली / रात को सोते समय मैंने नींद की चार पांच गोलियां खायी , और सोने से पहले अपना हाथ ब्लेड से काट डाला ताके बचने का कोई चांस न रहे /रात को करीब 9 बजे के आसपास सोया हूँगा मैं / मगर अगले दिन करीब 9 बजे रात को फिर मेरी आंख खुल गयी / मेरा हाथ चादर और गद्दे से चपका हुआ था , खून वहां जमा हुआ था / सर बहुत ही भारी था और मुझे समझ नही आ रहा था के मैं बच कैसे गया ? धीरे धीरे सब याद आ रहा था , और समझ में भी / नींद की वजह से , मैं सही जगह हाथ नही काट पाया था , मुझे पता भी नही था के कहा काटने से मरते है /नींद की गोलियों के असर के कारण मेरे शरीर का पानी कम हो गया , और खून गाढ़ा, इसलिए मेरा हाथ जहाँ से खून गिर रहा था , चादर और गद्दे से चिपक गया / चादर ने कपडे और गद्दे ने रुई का कम किया और सोते वक़्त , मेरा ज्यादा खून नही निकला , न ही बिस्तर पर ज्यादा फैला / पिता जी सुबह अपने काम पे चले गये और मैं सोता रहा था / इतना गुस्सा था मेरे अन्दर , किसी से भी नहीं डरता था /पहले मैं गुस्से को पी जाता था , मगर अब मैं कभी भी अपने गुस्से को दबा नही पा रहा था / अब अपने आप को आइने में देख कर मैं अपने आप को चिढ़ता नही बल्कि ज्यादा से ज्यादा गुस्से से देखता / मैं पूरी तरह से बर्बाद हो रहा था / मैं उस सब का विरोध करता जो सही नही / अगर ticket window से बिना लाइन के कोई टिकेट  लेने की कोशिश करता तो उसे मेरे गुस्से का सामना करना होता ,  दादा बनने की कोशिश करता तो , लात और घूसों से उसका स्वागत करता , पब्लिक भी मेरे साथ होती / मैं कभी सही काम करने वालों से नही उलझता बल्कि गलत करने और दादा बनने वालों को ढूंढता फिरता /  मैंने इस हद तक ये सब किया के अब जब मुझे याद आता है तो विश्वास नही होता / मुझे दो बातों से बड़ी एलर्जी थी , एक अगर मैं शांति पूर्वक शांत रहने के लिए बोल दूँ , और फिर भी सामने वाला चिल्लाता रहे , दूसरा , जब कोई मेरी मेहनत का कोई मूल्य न लगाए , मैं तारीफ नही चाहता था , मगर ये अहसास भी नही के मैंने कुछ नही किया /

लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी मैंने , किताब पढनी  नही छोड़ी थी / पिता जी के पुराने बक्से से , एक दिन मुझे विवेकानंद की किताब मिली / मैंने इससे पहले कभी उनको नही पढ़ा था / उनके चित्र , और उनकी आँखों को देख कर उनके बारे में जानने का सम्मोहन सा उत्पन्न हो गया / शायद इसकी वजह केवल उनकी ऑंखें थी , या कोई ईश्वरीय प्रेरणा / उस रात मैंने विवेकानंद को पढना शुरू किया , जान कर आश्चर्य हुआ के , वो घोर नास्तिक इन्सान थे पहले , और उस ज़माने के एक बहुत ही पढ़े लिखे विद्यार्थी / मेरी जिज्ञासा और बढ़ गयी / मैंने वो किताब पूरी खत्म कर दी , रात भर पढता रहा / उनके सिद्धांत मुझे काफी पसंद आये / सबसे अच्छी बात मुझे उनका वो प्रसंग लगा के , " अगर तुम्हें भौतिकी का कोई अविष्कार करना है , तो पहले भौतिकी पढनी पड़ेगी , गुरु के सानिध्य में प्रक्टिकल करना पड़ेगा , परिणाम निकलने पड़ेंगे और बार बार असफल होने के बाद सफल प्रयास से ही एक दिन अविष्कार में तुम कामयाब हो सकते हो" / उस पुस्तक ने मेरे ऊपर बहुत ही गहन प्रभाव डाला / अगले ही दिन से मैं गहराई से एक के बाद एक , अध्यात्मिक पुस्तकें पढने लगा , मुझे बड़ी शांति महसूस हुई / लेकिन इश्वर पे विश्वास अभी भी नही जागा था / मैंने रामायण , गीता , ओशो , विवेकानंद , श्री राम शर्मा , इत्यादि को पढ़ा / तुलसी दास जी की एक लाइन जो  मेरे अन्दर कुछ हद तक , इश्वर पर विश्वास जगाने का का कारण बना वो ये था के " किसी भी कार्य में पारंगत होने से पहले उसका ढोंग करना पड़ता है " / मेरी जिज्ञासा अब बढती ही जा रही थी / विवेकानंद और अन्य ने जिस प्रकार सारे जगत , मनुष्य , जन्म मृत्यु , आकाश- वायु , सौरमंडल और उससे भी आगे का वर्णन किया था , मैं उसे महसूस करना चाहता था / मुझे दिन प्रति दिन ये अहसास होने लगा , "तुम अगर इश्वर की तरफ एक कदम बढाओगे तो वो तुम्हारी तरफ दो कदम बढ़ाएगा " , मुझे कोई चुम्बकीये शक्ति प्रेरित कर रही थी  , और चीजों को नियंत्रित भी कर रही थी  / उसी दौरान मुझे एक और पुस्तक जो योग पे थी , और जिसे परम पूज्य डॉ. नारायण दत्त श्रीमाली ने लिखा था , पढने को मिली / उस पुस्तक ने मेरे जीवन को बदल दिया/उनकी मन्त्रों , तंत्रों , योग , इश्वर , अनुभूति , सम्मोहन , हस्तरेखा इत्यादि की पुस्तकें पढनी शुरू की / मेरे अन्दर एक अद्भुत बदलाव हो रहा था / एक महीने लगभग १० - १० घंटे , मैं इन्हीं सब चीजों को पढता रहा / एक दिन मुझे अहसास हुआ के , मुझे ध्यान करना चाहिए , जिसके फायदे सभी ने बताये थे / मैं ध्यान करने लगा , रात को मैं घंटों ध्यान करता , मेरी मानसिक स्थिति में भी धीरे धीरे सुधार हो रहा था , और ये अनुभूति भी के इश्वर है / मैंने अपने पूर्वजों की कुछ पांडुलिपियों का भी अध्ययन किया , और मुझे ये जान कर घोर आश्चर्य हुआ के , पौराणिक विज्ञान आज के विज्ञान से अधिक सार्थक और अद्भुत था / मेरी जिज्ञासा बढती गयी / मैंने हस्तरेखा , सांख्य ज्योतिष ,पंचांग जो भी मिल रहा था ,सब को पढता और धीरे धीरे मैं उसकी प्रक्टिस करता / मैं बदलने लगा था , इश्वर को जानने की समझने की इक्षा बलवती होती जा रही थी , मगर अभी इश्वर पर विश्वास पूर्ण रूप से नही कर पा रहा था  / कारण शायद यह था के बाकि सभी चीजें वैज्ञानिक थी , और इश्वर एक अनुभूति / मेरा मन अब एक ऐसे स्थान पर जाने के लिए छटपटा रहा था , जहाँ का वातावरण प्राकृतिक हो और मुझे कोई भी तंग करने वाला न हो / मैं इस अद्भुत ज्ञान पे शोध करना चाहता था / लेकिन शहर के वातावरण में ऐसा संभव नही हो पा रहा था /

एक बार फिर से छठ पूजा आ गयी , और मेरा जाना अपने ननिहाल में हुआ / मेरे मामा जी देवी के भक्त थे , और नाना जी प्रकांड पंडित , मगर नाना जी ने कभी भी अपना नाम को जग के आगे जाहिर नही किया , न ही अपने ज्ञान को / मैंने मामा जी से कुछ जानकारियां ली , अपने मनो भाव को बताया / उन्होंने बहुत कुछ बताया मुझे , अनुभव , कर्म कांड , इत्यादि /वहां प्राकृतिक वातावरण में रह कर मैंने अपने ऊपर ज्योतिषिये प्रयोग किये और मुझे ज्ञात हुआ के मेरे ऊपर 22 वे वर्ष मृत्यु तुल्य कष्ट है , या फिर मृत्यु ही / पहले जो एक बार मैं प्रयास कर चुका था वो भी सामने में आया / मैंने उसी वक़्त से प्रयोग के तौर पे , महा मृत्युंजय मंत्र का मानसिक जाप करता / कुछ ही दिनों में ऐसी आदत हो गयी के , मैं जब कोई और काम भी कर रहा होता , मेरे दिमाग में अपने आप वो मंत्र चलता रहता /

छठ पूजा में ही मेरे मौसी के लड़के का आना हुआ था  , जिसने मुझे ये बताया के sulabh international में जॉब के लिए कुछ रिक्तियां निकली हैं / ये संस्था श्री विन्द्वेश्वर पाठक जी की थी , जो एक प्रसिद्द समाज सेवी हैं / उन्होंने देश से मैला ढ़ोने की प्रथा समाप्त की थी , और कई पुरस्कारों से देश और विदेश में अलंकृत भी हुए थे / मुझे यह भी ज्ञात हुआ के नेपाल और भूटान राष्ट्रों सहित भारत के विभिन्न राज्यों के लिए रिक्तियां निकाली गयी हैं / चूँकि श्री पाठक का जन्म स्थान बिहार था , अतः वो यहाँ छठ पूजा में आये थे और उन्हीं के द्वारा ये जानकारी यहाँ दी गयी थी / सुलभ का मुख्य कार्यालय पालम, दिल्ली में स्थित था / मैं भी कोई अच्छी संस्था से जुड़ना चाहता था / अतः मैंने वहां जाने का फैसला कर लिया / छठ के बाद मैंने अपने घर में इस बाबत बात की और थोड़े से पैसे , एक बिछाने का , एक ओढने का , कुछ पहनने के वस्त्र और कुछ किताबों को लेकर चल पड़ा मैं फिर से एक दिल्ली की सफ़र की तरफ , इस आशा के साथ के अब तब तलक लौट के नही आना है , जब तक मैं कुछ बन न जाऊं , अपनी एक अलग पहचान न बना लूँ / 

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

SAFAR

सुबह मैं जल्दी से उठा , पूरे जोश में था , आज जीवन के पहले जॉब के लिए जाना जो था / कुछ सफ़ेद कागज़ और पेन लेकर , मैं अपने पहली interview के चल पड़ा / कदम तेज़ थे , मन में फिर वही गाना चल रहा था "जीत जायेंगे हम ....." / मैं ऑफिस पहुंचा ,घर से ज्यादा दूर नही था , co का नाम था " डोल्फिन कुरिअर सर्विस प्राइवेट लिमिटेड "/ मैं अन्दर पहुंचा , कुछ तेज़ धड़क रहा था मेरा दिल / वहां के manager साहब से मेरी मुलाकात हुई , मैंने अपना परिचय दिया और जिन्होंने भेजा था , उनका रेफरेंस भी / उन्होंने मुझसे bio data  लिखने को बोला / मैंने अपनी जेब से सफ़ेद कागज़ निकला और bio data लिखने लगा , उस वक़्त हस्तलिखित और स्वयं के लिखे हुए bio data ही प्रचलित था / उन्होंने मेरी handwriting , स्पीड वगैरह देखि और फिर मेरे से कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछे / co के मालिक ब्रांच ऑफिस में थे , मुझे मेनेजर ने वहां जाने को बोला , उन्होंने मेरे सामने ही उन्हें फ़ोन कर दिया और मैं चल दिया ब्रांच ऑफिस / ब्रांच ऑफिस पहुंचा तो देखा के वो वहां थे नही , मैं उनका इंतज़ार करने लगा / मेरी  समझ तो आ गया था के ये एक बड़ी courier कंपनी है , और डाकखाने की तरह का काम है / मैं ब्रांच ऑफिस में बैठा था , और वहां के reception पर बैठे लड़के से बातें कर रहा था / उसके आगे करीब 30 - 35  चिट्ठियां रखी थी , वो उसे बुक कर रहा था , मैं ध्यान से देख रहा था , के वो कैसे बुक कर रहा है उसे, शिपमेंट कैसे बना रहा है / मैंने उससे आग्रह किया के क्या मैं एक दो चिट्ठियां बुक करूँ , वो सहर्ष तैयार हो गया , मैंने चिट्ठियों को बुक करना शुरू किया /लगभग 5 min में मैंने सारी चिट्ठियां बुक कर दी , मैं इतना मगन था के मुझे पता नही चला के मालिक आ भी चुके थे और अपने केबिन में जा चुके थे / वहां से सबसे पहले उन्होंने शिपमेंट बुक मगाई , रिसेप्सन वाले लड़के से / लड़का उनकी केबिन में गया और थोड़ी बाद मुझे बुला कर उनके पास ले गया / मैं अभिवादन के साथ उनके आगे खड़ा हो गया , अब केबिन में मैं , मालिक और मेनेजर साहब थे / उन्होंने  मुझसे पूछा , पहले कहाँ काम किया है ? मैंने कहा कही नही / उन्होंने कहा , " तो फिर तुमने इतनी जल्दी ये सारे document कैसे बुक कर लिए , मैंने कहा के 'देख कर सिखा सर , अभी अभी '/ फिर उन्होंने मुझे फ़ोन directory दी जिसके मुख्य पृष्ठ पर बहुत सारी इंग्लिश लिखी थी , उन्होंने मुझे पढने को कहा / मैंने बेहिचक पढना शुरू किया / उन्होंने फिर मुझसे पूछा के काम कितनी जल्दी सीख सकते हो , मैंने कहा , 4 -5 दिनों में / उन्होंने मुझे 5 रुपये दिए और पान लाने को कहा , वो पान खाते थे / मैं पैसे लेकर बाहर तो निकल गया लेकिन मुझे लगा के ये मेरी कोई परीक्षा है/ मैं वहां के नजदीक मगर एक अच्छे दिखने वाले पान की दुकान पर पहुँच गया और उसे ऑफिस का नाम बता के वहां के मालिक के लिए पान बनाने को कहा / मैं पान लेकर जब सज्जन जी (co के मालिक ) के पास आया तो उन्होंने आश्चर्य से मुझे देखा और कहा के , तुम्हें कैसे पता के मैं यही पान खाता हूँ / मैंने कहा , सीधी सी बात है सर , यहाँ के पान वाले से ही पान आता होगा , उन्हें जरुर पता होगा आप क्या खाते हो, मैंने आपका नाम लिया और पान ले आया /वो मेरे कॉमन सेन्स से प्रभावित हुए और मुझे नौकरी पर रख लिया गया/

वो अप्रैल, सन 1995 की , बात थी ,,,मेरी तनख्वाह रखी गयी , 1000 /- rs महिना , 12 घंटे की नौकरी , महीने में चार छुट्टियाँ / उस वक़्त 1000 /- rs का महत्व हुआ करता था / मैं खुश था , कल से आने को बोल के मैं ख़ुशी ख़ुशी घर पहुंचा , और घर आके ये बताया / सब को ख़ुशी ही हुई , किसी ने ये सोंचा नहीं के , मेरी पढाई , करियर का क्या होगा , क्यूँ की अभी सबसे बड़ी प्राथमिकता पैसों की थी /दोस्तों के पास भी गया , बताया के अब मैं उनसे कम मिल सकूँगा,मगर सभी मेरी नौकरी से खुश थे / सभी मुझे आगे बढ़ता देखना चाहते थे / रात को मैं घर आया /सब ने कहा के भगवान को प्रसाद चढ़ा देना / मैंने फिर भगवान की हंसी उडा दी / रात को सोने वक़्त मैंने अपने को आइने में निहारा , देखा के क्या मैं बड़ा हो गया हूँ, नौकरी करने लायक ? मूछें देखीं , जो अभी आई नही थी सही ढंग से , आँखों में ऑंखें डाल कर मुस्काता , अपने को चिढाता और खुद को ही शाबाशी देता / मैंने अभी तक जो भी घर में देखा जो भी स्थितियां सब का अवलोकन कर रहा था / सोंच रहा था के चलो , अब नौकरी तो मिल ही गयी , जल्द ही सब ठीक कर लूँगा /एक विश्वास तो था ही अपने ऊपर /

सुबह नहा धो के , तेज़ कदमो के साथ पहले दिन ऑफिस पहुंचा / मेनेजर साहब नही आये थे , छोटे बड़े सभी स्टाफ को मैं नमस्कार करता , मुझे नही पता था के मेरी पोस्ट क्या है ? मैं भले ही उस वक़्त 15 साल का था , मगर , जज्बा मेरा बड़ा था / करीब 10 बजे co के मालिक आये , उन्होंने मुझे केबिन में बुलाया , और मुझे उसी दिन मैनेजमेंट का पहला ज्ञान मिला / उस co में पहले से एक asst manager था , करीब 6 साल पुराना स्टाफ ,उसी के हाथ में ऑफिस के सारे  इन्टरनल वर्क थे / मगर इधर वो लालची हो गया था, चीजों को इस तरह से गूँथ रखा था उसने के , कोई अन्य व्यक्ति उसके बिना ऑफिस में काम ही न कर सके / उसकी बहुत चलती थी , मालिक से भी सही व्यवहार , जो होना चाहिए नही था / वहां काम इस तरह का था के , रोज़ सैकड़ों चिट्ठियां आती थी , पुरे बिहार में बटने के लिए , और शाम को सैकड़ों चिट्ठियां भेजी जाती , देश के विभिन्न राज्यों में / इसका पूरा काम वही देखता , बिल्स वगैरह भी / मालिक ने मेरे सामने प्रस्ताव रखा , के उसका काम जल्द से जल्द सीख जाओ , उन्हें उस शख्स को अपनी co से हटाना था , और विकल्प के रूप में वो मेरा इस्तेमाल चाहते थे / मुझे उस वक़्त मैनेजमेंट की ये चाल अच्छे से समझ नही आई / मैंने अति उत्साह पूर्वक , 10 दिनों में पूरा काम सिखने की हामी भर दी , मालिक ने आश्वाशन दिया के अगर ऐसा मैं कर पाया , तो मुझे asst manager बना दिया जायेगा और तनख्वाह भी बढ़ा दी जाएगी /

उस दिन के बाद से मेरा एक ही लक्ष्य रह गया, कोई और विशेष कार्य नही था मेरे लिए , बस उसके काम को देख के सीखना था , मालिक मेरे से रोज़ शाम को अपडेट लेते / काम सीखना आसान नही था , सैकड़ों चिट्ठियों को राज्य के विभिन्न जगहों पे सही समय भेजना , और शाम को राज्य से देश के विभिन्न स्थानों पे भेजना, सबका रिकॉर्ड रखना , 15 स्टाफ को संभालना और शिकायतों का निपटारा करना , क्यूँ की कुरिअर का काम ही जल्द से जल्द चिट्ठियों और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को पहुचना होता है , लोग एक्स्ट्रा पैसे इसी लिए देते थे / मैंने मेहनत की और 7 दिनों के भीतर काम सीख गया / एक सप्ताह के अन्दर ही , पुराने asst manager को हटा दिया गया और मुझे बना दिया गया / उस वक़्त लेबर law इतना प्रचलित नही था , सब सेट्टिंग से होता ,वरना एक प्राइवेट लिमिटेड co का asst manager 15 साल का हो ही नही सकता था /

मेरी जिम्मेवारियां बढ़ गयी , मुझे महत्वपूर्ण चाभियाँ इत्यादि सौप दिए गये / मैं सुबह 8 बजे आ कर ऑफिस खोलता और रात के आठ बजे तक एक मशीन की तरह काम करता / धीरे धीरे एक महीने में ही मैं मालिक का सबसे मेहनती और वफादार स्टाफ बन गया / मेरी तरक्की की स्पीड देख के ,मेनेजर साहब को भी अचम्भा होता और , अब शायद वो भी डरने लगे थे मुझसे , क्यूँ की accounts तो वही देखते थे , मगर मुझे कुछ घपलों का पता चल चुका था के ये लोग , co को कैसे चूना लगाते थे / शायद इसी वजह से डेली अकाउंट देखने का काम भी मालिक ने मुझे सौप दिया / मैं था तो उस वक़्त बच्चा ही , कच्ची उम्र में ही उस जगह आ गया था जिसे मार्केट बोलते हैं , जहाँ मैनेजमेंट के तीर कमान चलते थे / सब एक दूसरे के कंधे पे पैर रख कर आगे बढ़ना चाहते थे , और मैं एक कोमल और आसान कन्धा था / मेनेजर साहब ने मुझे मोहरा बनाने की तय्यारी कर ली थी / उन्होंने धीरे धीरे मेरे से नजदीकियां बढाई, और पहले मुझे विश्वास में लिया / मेरे दिमाग में उन्होंने भरा , के co. , co. होती है , मालिक , मालिक होता है, लेकिन स्टाफ को आपस में मिल कर रहना चाहिए और , एक दूसरे की गलतियों लो ढकना छुपाना चाहिए / धीरे धीरे वो मेरा इतना घनिष्ट हो गया के , मैं मैनेजमेंट के दाव - पेंच उनसे सिखने लगा / ये मेरे लिया बड़ा रोचक भी था , और एक नया तजुर्बा भी , क्यूँ के ये दाव - पेंच आगे बहुत काम आने वाले थे / मगर वो तो पुराने घाघ थे / एक दिन वो मुझे एक बार (Bar) में ले गये , मैं हर स्थिति में जल्दी से जल्दी आगे बढ़ना चाहता था / जीवन में पहली बार उस दिन मैंने बियर पी / मैं वो हर चीज़ करने को तय्यार था जो मुझे तरक्की दे सके , मेरे पास समय कम था , ऐसा मुझे लगता था / कुछ दिनों बाद ही मैं उनके साथ कभी कभी शराब भी पीने लगा , उम्र अभी भी 16 की नही हुई थी मेरी / मैं ये जान ही न पाया के सब के पीछे एक खेल है , मैं उस खेल को समझ नही पा रहा था , मुझे उनपे विश्वास जो था / मगर वो तो एक प्रोफेशनल गेम खेल रहा था , उसकी सत्ता के लिए मैं खतरा जो बनता जा रहा था /

मेरा रिजल्ट भी अभी आया नही था , कही खो गये थे इस मार्केट और वयस्तता के बीच मेरे सपने / मैं अपने को काम काजी आदमी सा महसूस करने लगा / सुबह 8 से शाम को 8 तक काम, फिर मेनेजर साहब  के साथ दाव पेंच सीखना और घर आके सोना / मैं घर से फ्री हो चुका था , १०-११ बज जाते घर आते आते / सन्डे को दोस्तों से भी नही मिल पता था , एक ही चीज़ याद थी बस , पैसा / मेरी हालत ३ महीने में ऐसी हो गयी के , मुझे २-३ दिनों तक घर के सभी सदस्य देख नही पाते थे / देर रात आता और सुबह जल्दी निकल जाता / मैंने काम पूरा संभाल लिया था , घर के खर्च में आधी हिस्सेदारी भी करने लगा था / नई नई पार्टियाँ पकड़ के अपना कमीशन बढ़ा रहा था / मैं पूरा खर्च उठाना चाहता था , मगर २ हज़ार रुपये में उस वक़्त भी , 5 सदस्यों का भरण पोषण आसान नही था /

मैंने ऑफिस में काम करने का अपना अलग ही तरीका निकला , क्यूँ की मैं MBA तो था नही , न ही मैंने कही से ट्रेनिंग ली थी / मैंने अपने ढंग से तीन महीनो में हर चीज़ व्यवस्थित कर दी , और सबसे महत्व पूर्ण कार्य किया वो था कस्टमर्स और विभिन्न राज्यों के ऑफिस के शिकायतों का निपटारा / मैंने समय सीमा तय की , शिकायतों के निपटारे की उस वक़्त/ये एक नया प्रयोग था , जो आज कल के ज्यादा तर कॉल सेंटर्स आजमाते  हैं / मेरा शिकायतों के निपटारे की समय सीमा अधिकतम 48 घंटे थी / अगले २ महीनो में , पटना का  हर प्रमुख कुरियर सर्विस , और मेरा हेड ऑफिस और ब्रान्चेज़ , रवि शंकर को जानने लगे / मेरे काम करने के तरीके को ले कर सब प्रभावित थे , मैं one man army था / बात उड़ते उड़ते हेड ऑफिस तक पहुंची दिल्ली , और रीजनल ऑफिस कलकत्ता , मेरी सीधी बात होने लगी कलकत्ता के हेड से / हमारा ब्रांच उन्हीं के अन्दर था /

इधर पिता जी का व्यवसाय समाप्ति की ओर अग्रसर था / आखिर कर उन्होंने नौकरी करने को ठान ली , घर बैठने से तो यही अच्छा था / उन्होंने एक जगह जॉब कर ली / मुझे अहसास हुआ था , के समय कैसे करवटें बदलता है , जो co का मालिक रह चुका हो वो आज खुद नौकरी कर रहा है किसी के यहाँ / वक़्त अपना काम कर रहा था , और किस्मत अपना , गुज़ारा किसी तरह से चल रहा था / इसी बीच मेरा मैट्रिक का रिजल्ट आ गया , उम्मीद 70 % से ऊपर की थी मगर , 67 % ही नंबर आये / लगभग सभी सब्जेक्ट में 75 से 80 % नंबर थे , मगर बस संस्कृत  , जिसमे मुझे अच्छे नंबरों की उम्मीद थी उसी में बस 49 % ही रह गया / खैर मैं संतुष्ट हो गया नम्बरों से / मैंने अपनी परिस्थितियों को देखते हुए कॉमर्स चुना और कॉलेज में दाखिला ले लिया / मेरा उस वक़्त मनोरंजन का एक ही साधन था, दोस्तों के साथ फिल्म देखना और सन्डे को क्रिकेट खेलना / उम्र धीरे धीरे बढ़ रही थी , और नया जोश बन रहा था / मैं अपने आप को स्मार्ट समझता , देखता के नज़रें पीछा करती हैं, मगर मेरे पास उन नज़रों का पीछा करने का वक़्त कहाँ था / लगभग मेरे सारे मित्र कही न कही किसी न किसी के साथ प्रेम सम्बन्ध में डूबे थे , मगर मेरा केस अलग ही था , तन्हा अकेला / कभी कभी इस विषय पर मैं सोंचता , मगर केवल गाना गा के , या सुन के अपने को बहला लेता /
 
हमारी co  उस वक़्त नोर्थ के लिए एक और co से जुड़ गयी , जिसका पूरे भारत में 500 से ज्यादा शहरों तक पहुँच थी / उसका नाम पुष्पक प्राइवेट लिमिटेड था / उसके मालिक से मेरी कुछ ही दिनों में घनिष्टता हो गयी / हमारी co की नीति के तहत हम पहले अपने co. के document को प्राथमिकता देते थे और इस वजह से ,पुष्पक का काम यहाँ ठीक ढंग से नही हो पा रहा था / पुष्पक अपना खुद का ब्रांच खोलना चाहती थी , और एक बंगाली बाबु इसी सिलसिले में पटना आये / मैंने ही उनके रहने खाने इत्यादि का बंदोबस्त किया / रात को होटल में उन्होंने मेरे से बात की , मेरी जानकारी को परखा और मुझे बधाइयाँ दी / मैं उनकी सेवा में दो दिन रहा , वो मेरे से प्रभावित हुए / उनके जाने के करीब 2-३ दिनों बाद , मेरे ऑफिस के फ़ोन पर ही पुष्पक के मालिक का कलकत्ता से फ़ोन आया , उन्होंने मुझे STD से रात में बात करने को कहा / शाम को ऑफिस से छूटने के बाद मैंने उनसे बात की / मेरी ख़ुशी का ठिकाना नही रहा के वो मुझे पटना ब्रांच सौपना चाहते थे , incharge बना के , और तनख्वाह 5 हज़ार महिना / अंधे को क्या चाहिए थी , दो ऑंखें / मैं खुश था , मगर उनकी एक शर्त थी , जमानत राशी जमा करने की , 20 हज़ार रूपए / मगर मैं तय्यार था , मैं उधेड़ बुन में लग गया ,और मैंने तय किया के , इसके बारे में मैं अपने मेनेजर जिसे मैं गुरु मानता था , उससे बात करूँगा / शाम को मैंने उनसे बात की , उसकी आँखों में चमक आ गयी , उसे वो हाथ लग गया जिसका उसे इंतज़ार था / उस वक़्त उसने मुझे आश्वाशन दिया और आधे पैसे देने का वादा भी / मैं अब बाकि के पैसे के लिए सोंचने लगा , सारी कोशिशे जो हो सकती थी की मैंने , जब मुझे लगा के मैं कर लूँगा मैंने शाम को पुष्पक के मालिक को फ़ोन लगाया और बात पक्की कर ली , मुझे एक सप्ताह के अन्दर पैसे जमा करने थे , उसकी भी यही शर्त थी की इसके बारे में मेरे मालिक को कुछ पता नही चले / मगर किस्मत को तो कुछ और मंजूर था ,,,,इस मार्केट के उसूल अब धीरे धीरे पता चलने थे , मुखौटे के अन्दर का चेहरा अब सामने जो आना था /

अगले दिन जब ऑफिस गया तो मालिक ने मुझे केबिन में बुलाया , मुझसे  पूछ ताछ की , मैंने सब बता दिया / उन्होंने मुझसे बोला के तुम मेरा ही बिज़नस चौपट करना चाहते हो , मैंने कहा के नही , मैंने दूसरी co.  के लिए बात की थी , न की आपकी / ये भी कहा के , मैंने नही उन्होंने मुझसे संपर्क किया / उन्होंने मुझे उस वक़्त कुछ नही कहा , मगर मुझे पता चल चुका  था के , इस विषय पे मेनेजर साहब ने ही उन्हें सूचित किया था , ताकि मुझे नौकरी से  निकाल दिया जाये और उनकी सत्ता पर से खतरा हट जाये / अगले चार पाँच दिनों में ही एक नया लड़का रख लिया गया , और उसे ट्रेनिंग देने को मुझसे कहा गया / मैंने ट्रेनिंग दी , और चूकी चीजें व्यवस्थित थी , लड़का भी काम सीख गया , काम चलाने लायक / मुझे नौकरी से हटा दिया गया / मैं शाम को मेनेजर से मिला और बस यही कहा के अपने धोका किया है , और ये ठीक नही है /वो मुस्कुरा कर बोला के , उसने co के प्रति वफादारी दिखाई है और मैंने गद्दारी / खैर मैं बुझे मन से घर वापस चला आया / एक बार फिर से मुझे नई नौकरी की तलाश करनी थी / मैंने घर में किसी को कुछ नही बोला ,, शांति पूर्वक छत पे जाकर , विचार करने लगा / एक बार फिर बना बनाया सपना टूट चुका था / मैंने करीब 8 महीने नौकरी की थी वहां , मगर वहां से बहुत कुछ सीखा था / ये भी के लोग जो अपने दिखते है वो कितने स्वार्थी हो सकते हैं / मेरे साथ कितना बड़ा खेल खेला था मेनेजर साहब ने , लेकिन मुझे सीख भी बहुत बड़ी मिली थी /

अगले दिन मैं फिर से नई नौकरी की तलाश में निकल गया / मेरे पास स्किल तो था ही और मार्केट में मेरी पहचान भी / अगले दिन ही अपेक्षाकृत छोटी नौकरी मैंने ढूंढ़ ली / मुझे चार पाँच दिनों बाद ज्वाइन करना था / इस खाली समय में मैंने , कॉलेज के क्लास किये / पहले दिन ही कॉलेज में घुसते ही नज़ारा देखा के , एक लड़के हो , 10 लड़के मिल कर पीट रहे हैं / संवादों से पता चला के , किसी लड़की वगैरह का चक्कर था / उसे अनदेखा कर मैं कॉलेज में गया / चुप चाप क्लास की , और वापस आ गया / शाम को दोस्तों के साथ मस्ती की , और घर आकर बताया के मैंने नौकरी छोड़ दी है और ये भी के दूसरी पकड़ ली /

चार पाँच दिनों घर पे रहने के बाद अहसास हुआ के , नौकरी छूटने  के बाद , आदमी की क्या हालत हो जाती है घर में / लोगों का नजरिया भी बदल जाता है / मैं ये भी सोंच रहा था , के पिता जी पे क्या बीती होगी , शायद इसी सब परेशानी से बचने के लिए पिता जी ने , नौकरी की है ताकि वो व्यस्त रह सकें / दोस्तों के पास दो चार दिन बिताये तो पता चला के , 8 महीनो में स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं / बिहार में युवा बर्बाद हो रहे थे , काम और रोजगार की काफी कमी थी / नौजवान पीढ़ी गलत रास्ते पर तेज़ी के साथ बढ़ रही थी , चारों तरफ अंधकार का ही बोलबाला हो रहा था / रोज़ अपहरण , क़त्ल , लूट की घटनाये सुनने को मिलती / ये सब देख से मेरा मन यही होता के , मेरा भविष्य यहाँ नही कही और है / मगर अभी चारा भी कुछ नही था / मेरी उम्र ही कितनी थी , अभी 17  साल भी पूरे नहीं हुए थे /

उसी दौरान एक दिन मेरे घर  उन दोस्तों की टीम पहुंची जिनकी उम्र मेरे से चार पाँच साल बड़ी थी / उन्होंने सीधे मुझसे कहा के दिल्ली चलना है , पूछने पर कारण ये पता चला के रक्त दान करने / पता चला के , हमारे एक मित्र के सम्बन्धी दिल्ली के AIMS में भर्ती थे , उन्हें खून की सख्त जरुरत थी / उस वक़्त दिल्ली में खून बेचने का व्यापर बड़ी तेज़ी के साथ चल रहा था / AIMS ने सुरक्षा कारणों से , केवल निजी सम्बन्धियों से ही खून लेना शुरू कर दिया था, किसी भी blood bank इत्यादि से खून लेना बंद कर दिया था / वो जितना खून लेते उतना ही खून मरीज़ के ग्रुप के हिसाब से अपने निजी बैंक से दे देते थे / मामला गंभीर था , हम 8 लोग थे , मैंने हामी भर दी / घर आया और कुछ कपडे वगैरह पैक करने लगा , घर वालों ने जब पूछा तो बता दिया मैंने के दिल्ली जा रहा हूँ, खून देने / पहले तो उन्होंने आश्चर्य किया मगर , जब मैंने बताया के मैं अच्छा काम करने जा रहा हूँ , तो सब ने हामी भर दी / शाम की ट्रेन से मैं दिल्ली के लिए दोस्तों के साथ रवाना हो गया / मैं पहली बार इतने लम्बे सफ़र पर था, और दिल्ली के भी / ये ट्रेन यात्रा भी मेरे लिए एक सीख ही रही / जैसे जैसे मैं दिल्ली के नजदीक पहुँचता गया , वैसे वैसे मुझे अहसास होने लगा के, बिहार के लोगों की क्या इज्ज़त रह गयी है बाहर, मजाक का पात्र है वो / अलीगढ स्टेशन पे वहां के लोकल लोगों ने स्लीपर बोगी पर कब्ज़ा कर लिया  , जो भी बोलता उसे बिहारी और पता नही क्या क्या बोलते थे वो लोग / हमारी संख्या भी कम नहीं थी , आठ लड़के थे हम , हमारी जबरदस्त झड़प हुई उनसे / खैर हम दिल्ली पहुंचे , मेरी बोलने की शैली पहले से ही थोड़ी अलग थी , और थोडा बहुत मैंने रास्ते में भी सीख लिया था / दिल्ली , कही साफ कही बहुत ही गन्दी थी , बड़े बड़े नालों के ऊपर बने घरों में रह रहे लोगों को देख कर दुःख हुआ , क्या यही है हमारी राजधानी / चारों तरफ भाग दौड़ , शोर शराबा , ऊँचे बिल्डिंग्स को छोड़ कर कोई भी अंतर नहीं लगा मुझे दिल्ली और पटना में / हम वहां बिहार भवन में रुके , जो के कनाट प्लेस के पास था / वो बहुत ही बढ़िया जगह थी / वहां आकर ये लगा के हाँ , ये राजधानी जैसा लग रहा है /पालिका बाज़ार गया , वहां भी बहुत अच्छा लगा , मज़ा आया , भूमिगत मार्केट में घूम के / सबसे अजीब मुझे वहां पानी बिकता हुआ देख कर लगा / पानी की किल्लत उन दिनों भी थी दिल्ली में / यमुना को देख कर अहसास हुआ के विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से एक क्यूँ कहा जाता है दिल्ली को /

अगले दिन हमें AIMS में जाना था , सुबह हम सारे लोग AIMS में पहुंचे , वहां पहुँच कर यमलोक जैसा अहसास हुआ / पर्चियों की इतनी लम्बी कतार देख कर बड़ा अचम्भा हुआ / किसी किसी की पर्ची तो 4 दिनों से वहीँ थी / बड़ा अजब गजब माहौल था वहां का / वहां खून देने वालों का पहले एक वरिष्ठ डॉक्टर साक्षात्कार लिया करते थे, ताकि वो सुनश्चित कर सकें के ये मरीज़ के अपने ही रिश्तेदार हैं , किराये के नहीं / हमें साक्षात्कार के लिए ले जाया गया , वो कोई लेडी डॉक्टर थी / मगर उनके केबिन में जाने की, मेरे वरिष्ट मित्रों को हिम्मत नही हुई , और मुझे ही बात करने को कहा / मैं डॉक्टर साहिबा के सामने उपस्थित हुआ / उनका व्यक्तित्व बड़ा ही अच्छा था , बाल कन्धों तक कटे हुए , और चश्मा नाक के नोक पे टंगा हुआ , उन्होंने मुझे घूरते हुए मेरा नाम पूछा / मैंने बताया , मुझसे पूछा के मरीज़ मेरा कौन है, मैंने बताया के मेरे मित्र का सम्बन्धी / उन्होंने मेरे से कुछ देर बात की , फिर बोली की मेरी बात करने की शैली  बिहार के लोगों जैसी नही है / मुझे हंसी आ गयी , वो अब तक गंभीर थी , मगर वो भी हंस पड़ी / मैंने उन्हें अपना टिकट और पहचान पत्र दिखाते हुए कहा के मैडम अगर भगवान ने मुझे बिहार में पैदा किया तो इसमें मेरी क्या गलती है ? वो फिर से हंसी , और मुझे कुर्सी पे बैठने को कहा / वो किसी चीज़ को लिखने में व्यस्त हो गयी और थोड़ी देर बाद मुझे परचा थमाते हुए बोली के, इसे blood bank ले जाओ , तुम्हें blood मिल जायेगा , किसी को भी blood देने की जरुरत नही है / मैं खुश तो हो गया , मगर मैं स्वयं तो अपना रक्त दान देना ही चाहता था / मैंने अपनी इक्षा ज़ाहिर की , उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी एक नर्स को निर्देश दे दिया / मैंने अपने दोस्तों को बताया के बिना blood दिए ही बैंक से blood मिल जायेगा , एक दो को छोड़ के बाकि बहुत खुश हुए क्यूँ की , वो वैसे भी डर रहे थे खून देने से / बाकि जो खुश नही हुए मेरे साथ हो लिए ,मैंने अपना पहला रक्त दान AIMS में किया , भारत की राजधानी में आकर / वहां हम लोग दो तीन दिन रहे , बहुत मस्ती की , और वापस पटना आ गये /



अगले दिन मैं नयी co में गया , जहाँ मैंने नई joining  की थी /पुरानी co  के मुकाबले वो छोटी थी , मगर उसका मालिक उसे बढ़ाना चाहता था , और मेरे अनुभव का इस्तेमाल करना चाहता था / मैंने वहां के सिस्टम को बदला , co के delivery एरिया को अपनी पुरानी जान पहचान से बढ़ाना शुरू किया /वहां भी मैंने लगभग 6 महीने नौकरी की , मगर फिर से वही हुआ , जब सारा सिस्टम दुरुस्त हो गया तो  , मालिक की नज़र बदल गयी , उसने मेनेजर पोस्ट के लिए अख़बार में विज्ञापन दे दिया , और एक लड़की को मेरे सर के ऊपर बैठा दिया / मोहतरमा को भले ही ऑफिस का काम नहीं आता था मगर , मेकप करना और कान भरना अच्छी तरह आता था / ऑफिस का माहौल गन्दा होता जा रहा था , मैंने वो नौकरी भी छोड़ देने का फैसला किया / लेकिन इस बार मैं एक दिन भी खाली  बैठना नही चाहता था , सो मैंने पहले ही नौकरी की तलाश की / एक और कुरिअर co जो हाई फाई थी, उसके रेट्स काफी महंगे थे , वहां मेरा आना जाना लगा रहता था / कारण था के वो हवाई जहाज़ से documents भेजते थे , इसलिए अधिकतर शहरों में 24 घंटे में डाक पहुँच जाती थी / अगर कोई urgent document होता तो हम उसपे एक्स्ट्रा चार्ज करते और , उस कुरिअर द्वारा भेज देते /उनकी मालकिन एक पंजाब की लेडी थीं , वो अक्सर अपने यहाँ काम करने का ऑफर देती थी / मैंने उनसे सम्पर्क साधा और मैंने अगले सप्ताह ही उसे ज्वाइन कर लिया / पिछले डेढ़ साल में मेरी ये तीसरी नौकरी थी / वहां कुछ ही दिन काम करने के बाद पता चला के इनका मुख्य काम दिल्ली , मुंबई , बंगलौर जैसे केवल बड़े शहरों में चलता है / अगले चार पाँच दिनों बाद ही , मालकिन ने मुझे बुलाया , और उसी दिन मुझे पता चला के मुझे रखने का इनका क्या उद्देश्य था / उन्होंने मुझे बताया के उनका दिल्ली ऑफिस सही ढंग से काम नही कर रहा है, और मुझे वहां जा कर उनके ऑफिस की व्यवस्था सही करनी है / समझा ऐसी रही थी , जैसे मुंह से शहद टपक रहा हो, असलियत जानने के बाद मैंने तुरंत मना कर दिया , मगर उन्होंने समझाया के , 10 - 15  दिनों के लिए मुझे जाना चाहिए और , मेरे लिए ये एक अच्छा अनुभव होगा /इतनी जल्दी जल्दी मैं नौकरी नही बदलना चाहता था  , और अनुभव लेने वाली बात भी मेरे समझ में आ गयी / मैंने हामी भर दी / 

घर आ कर मैंने बताया के मैं 10 दिनों के लिए दिल्ली जा रहा हूँ , काम के सिलसिले में /  दो चार दिनों बाद मैं लगभग 17 साल की उम्र में , नौकरी के लिए दिल्ली टूर पे था / आज मैं सोंचता हूँ , के कितने कम उम्र में , मैंने अपना पहला ओफ्फिसिअल टूर किया था / मैं इससे पहले हाल ही में दिल्ली आ चुका था , और बिहारियों की स्थिति भी देख चुका था/ पिछली बार तो मैं साथियों के साथ था , मगर इस बार अकेला /   इसलिए रास्ते भर मैंने , दिल्ली की टोन को सीखने की कोशिश की / अलीगढ के पास फिर से लोकल लोगों की दादा गिरी देखने को मिली /मुझे बताया गया था के , दिल्ली स्टेशन के पास पहाड़गंज में शीला सिनेमा हॉल के ठीक सामने ऑफिस है , जहाँ मुझे जाना है /मैं स्टेशन से बाहर निकला और , taxi , ऑटो , होटल चिल्लाते दलालों को अनदेखा करता हुआ , जैसे मैं यहाँ का पुराना बंदा हूँ , बाहर आया और , अपने दिल्ली के टोन का पहला प्रयोग रिक्शे वाले से शीला टाकिज पूछने में किया / उसने तुरंत मुझे बता दिया , वहां से पैदल का रास्ता था , सड़क पार करते हीं / मैं दिल्ली पहुच चुका था , इस बार दिल्ली के लोगों के बीच , दिल्ली को और अच्छे से जानने के लिए / मुझे रुकना ऑफिस में ही था , वही रुकने की व्यवस्था थी , वहां का मेनेजर एक पहाड़ी लड़का था / दिखने में काफी शांत और सीधा / खाना वगैरह खाने के बाद मैं ऑफिस की खिड़की से बाहर पुल को देख रहा था , रात के एक बज चुके थे , मगर , शहर अभी भी जगा हुआ था / मेरे दिमाग में अपने पिछले सफ़र की यादें आ रही थी, घर की, और माँ के हाथ के आलू के पराठों की भी / मैं काफी समय तक शुन्य को निहारता रहा था , तभी एक गाड़ी ने तेज़ ब्रेक लगाया, और उसकी आवाज़ से मेरी तन्द्रा टूटी / मैं सो गया , अगले दिन के सफ़र पे दुबारा चलने के लिए / 

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

NAYI PEHCHAN

मैंने कभी भी पढाई को एक बोझ की तरह नही लिया था / मुझे maths के सवाल puzzle लगते और मुझे उसे बनाने में मज़ा आता था , history  एक कहानी की तरह लगती उसे कहानी की किताब की तरह पढता / किसी भी subject  से डर नही लगता था , और न मैं कभी पढाई पढाई करता / हाँ टाइम टेबल बना लिया था अब , 6 hrs एक दिन में काफी समझता था मैं , और बाकि चीजें भी साथ साथ चलती रहती थी / मुझे उस वक़्त कुछ ऐसा लगने लगा था , जैसे मेरे अन्दर कुछ कांफिडेंस की कमी सी है , इसे कैसे बढ़ाना है समझ नही आता था / मैंने उस वक़्त टीवी पे एक प्रोग्राम देखा जिसमे सेल्फ कांफिडेंस को बढ़ाने के कई तरीके थे , जिसमे एक तरीका था बड़े से आईने के सामने बैठ कर अपनी ही आँखों में ऑंखें डाल कर देखना / यही मुझे सबसे सस्ता और आसान सा लगा / मैंने प्रक्टिस शुरू की , 1 मिनट , दो तीन फिर 15 min तक लगातार देखने की आदत हुई, करीब 4-5 महीने मैंने ये प्रक्रिया अपनाई थी / मुझे अपने आप में परिवर्तन दिखा था / आज भी करता हूँ कभी कभी , ये अचूक है /

मैं भगवान् को मानना छोड़ चुका था  इसलिए मैं भूत को भी नही मानता था / मगर एक अनुभव ऐसा है जिसे मैं बताना चाहूँगा / हम जिस मकान में थे , इधर कुछ अजीब अजीब घटनाएँ होने लगी थीं / कभी किसी फ्लैट का दरवाजा अपने आप खुलने बंद होने लगता / कभी कुछ सुनने को मिलता कभी कुछ / मकान के पश्चिम दिशा में एक दूसरा मकान था / उसमे एक युवती ने आत्म हत्या की थी / वैसे तो शहरों में ऐसी अफवाह नही उडती मगर उस वक़्त आस पड़ोस के कई घरों में किसी साये का आतंक महसूस किया गया था / हमारा मकान ऐसा बना था जिसमे एक कमरा पश्चिम की तरफ और एक पूरब की तरफ था / हमारे फ्लैट के नीचे  स्मिता (मेरी शिष्या) का फ्लैट था , उसके पश्चिम वाले कमरे में एक बार स्मिता की आंटी जोरों से चिल्लाते हुए भागी थी , उसका कहना था के उसने एक हाथ दीवाल से निकलते देखा / हालत ये थी के पश्चिम की ओर वाले कमरे में कोई सोता ही नही था अकेला ,पूरे मकान में , सिवाय मेरे / क्या था पता नही , मै तो  भूत मानता नही था , इसलिए डरता भी नही था , छत पे अकेले रात को कोई नही जाता था , मगर मैं कभी भी चला जाता , हाँ किसी अनहोनी के लिए तैयार रहता , अपने को मजबूत बना के चलता / लोग जब पूछते के तुम्हें डर नही लगता ,तो बताता के भूत बक्टेरिया है , बस आँखों से दिखाई नही देते , अगर वो मुझे छू पायेगा तो मैं भी उसे लात घुसे मार सकता हूँ ,पर अन्दर से मैं उनके अस्तित्व को नकारता था /  बार बार मन में यही चलता के , भगवान् नही तो भूत भी नही / मगर इधर कुछ दिनों से , एक काली बिल्ली का आतंक मकान में हो गया था / कई लोगों को डरा चुकी थी वो बिल्ली, बंद रूम , अलमारी कही से भी अचानक प्रकट होके डरा देती थी / मेरा सामना मगर अभी तक उससे नही हुआ था / 
मेरी आदत थी अक्सर मैं रात को खाना खाने के बाद कोई जासूसी उपन्यास पढता , इससे मेरे दिमाग की कसरत होती थी / कमरे में अकेला सोता था , ११-११:३० तक जगता था / रात मुझे बहुत पहले से पसंद है दिन के मुकाबले / पूरी किताब दो रातों में ख़त्म कर दिया करता था / एक दिन की बात है , मैं किताब पढ़ते पढ़ते  बाथ  रूम जाने के लिए उठा , रूम का दरवाजा खोला बाथरूम गया , वापस आके दरवाजा लगाना चाहा तो देखा के , Door Stopper (पहले वो चौखट के बीच में हुआ करता था ) लगा हुआ है , केवल एक दरवाजे में / मैंने सोंचा , ये कौन लगा सकता है , पर मैंने ज्यादा ध्यान  नही दिया / दरवाजा लगाया , लाइट ऑफ की और सो गया / अगले दिन मैं फिर उपन्यास पढ़ रहा था , मगन था , पूरा ख़त्म किया/ मैं खुश था के आखिर इस बार भी मैंने उपन्यास में कातिल को पहले ही पहचान लिया , और सोने से पहले बाथरूम जाने के लिए उठा , मगर अचानक मुझे कल की बात याद आ गयी / मैंने इस बार ढंग से देखा के door stopper लगा है या नही, फिर मैं बाथरूम गया ,वापस आया और जैसे ही दरवाजा लगाना चाहा ........, दरवाजा नही लगा , door stopper फिर से लगा हुआ था / मेरे दिल में  ऐसा महसूस हूँ जैसे अचानक मेरा शरीर किसी गहरी खाई में चला गया है , शायद इसी परिस्थिति को देख कर किसी ने लिखा होगा, पैरों तले ज़मीन खिसक जाना , कुछ ऐसा ही  हाल था मेरा /
मैं डर तो गया था , मगर मैंने ज्यादा कुछ नही किया बस , उस दिन लाइट ऑफ नही की , और देर रात तक जगा रहा / अगले दिन मैं इस बारे में गहराई से सोंचता रहा ,किसी को बताया नही कुछ भी इस बारे में / मैंने फैसला किया के मैं आज इसका हल निकाल के ही रहूँगा के ये है क्या चीज़ ?
रात को मैंने एक गुप्ती (एक पतली और लम्बी बिलकुल सीधी तलवार जो छड़ी के अन्दर रहती है ) अपने बिस्तर पे रखी, दरवाजा केवल भिड़का कर छोड़ दिया , थोडा खुला भी छोड़ा , और उपन्यास पढने लगा / आज मैंने युद्ध करने की सोंच रखी थी , किसी अनजान ताकत से / मैं ऐसे लेटा था के दरवाजा मेरी दाहिनी तरफ था / करीब 12 बजे के आस पास दरवाजे के पास कुछ आहट हुई , पर मैंने केवल कान उधर कर रखा था , देख नही रहा था / तभी एक काली बिल्ली ने मुंडी अन्दर की और सीधे मेरी और देखा , मैंने भी उसे देखा , मैं उसकी आँखों में देख रहा था , और वो भी मेरे / लगभग 10 min तक यही हाल रहा , न वो भाग रही थी , न मैं नज़रें हटा रहा था / मैं समझ गया के ,ये ऑंखें नही झुकाने वाली , मैंने उसे हड़का दिया और वो भाग गयी / लेकिन इस बिल्ली का आगमन थोडा अजीब सा लगा / मैंने दरवाजा बंद किया और , गुप्ती को निकाल लिया , अपनी बगल में गुप्ती को लिटा के रखा , लाइट ऑफ की और लेट गया / कमरे में थोड़ी थोड़ी लाइट बाहर से आ रही थी , इतनी की कोई साया हो या चहल पहल हो तो देखि जा सके / पलंग जिस पर मैं लेटा था उसकी ठीक बगल में पैरों की तरफ एक टेबल था जिसपर एक पानी से भरा जग था जो के  प्लेट से ढका हुआ था, टेबल और पलंग के बीच लगभग एक फीट का फासला था / लगभग आधे घंटे मैं लेटा रहा अब  नींद मेरी आँखों पर सवार हो रही थी / लगभग अर्ध निंद्रा में मैं पहुँच चुका था , अचानक सामने टेबल पे रखे हुए पानी के जग का प्लेट गिरा और मेरी ऑंखें खुल गयी / मगर मैं अचानक से उठा नही , वैसे ही लेटा रहा , बस सामने देखने की कोशिश करने लगा के है क्या वहां , मेरी नज़रें टेबल पर जम गयी / वहां अँधेरे में मुझे जग के पीछे कुछ दिखा , एक ढेर सा रखा था , मैं वैसे ही चुप चाप लेटा था और मेरा दाहिना  हाथ गुप्ती पर था / शरीर में एक अजब सी हलचल हो रही थी , रोयें खड़े हो गये थे उस ढेर जैसी चीज़ को देख कर , पर मैं साँस भी धीरे धीरे ले रहा था / करीब १ min बाद , वो ढेर धीरे से उठा , वो एक बिल्ली जैसी चीज़ थी जो बिल्ली से आकार में बड़ी थी ...उसे देखते ही मेरे दिमाग से कोई तरंग निकल कर अन्दर ही अन्दर मेरी रीढ़ की हड्डियों में दौड़ने लगी / मेरा हाथ गुप्ती पर कस चुका था , वो बिल्ली जैसी चीज़ अब धीरे धीरे अपने पाँव टेबल से पलंग की और बढ़ाने लगी / उसने एक पाँव पलंग पर रखा , उसकी  पीठ का हिस्सा अब पलंग और टेबल की बीच के गैप पर था , और पिछले दोनों पैर टेबल पर /अब स्थिति ऐसी थी की अगर वो अपना अगला कदम बढाती तो सीधे मेरे पैर पे उसका पैर पड़ता , और उसने कदम उठा दिया , इससे पहले के वो अगला कदम रखती , मैंने पूरी ताकत के साथ गलियां देते हुए उसकी पीठ पर वार किया / चूँकि उसकी पीठ गैप के ऊपर थी , ऐसा लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है और वो , बीच से मुड़ के गैप के रास्ते, पलंग के अन्दर चली गयी / मुझे गुप्ती से किसी मांसल चीज़ से टकराने का पूरा पूरा अहसास हुआ / मैंने लाइट जलाई, सांसें तेज़ थी , और गलियां लगातार दे रहा था , गुप्ती में कोई खून वगैरह नही लगा था / मैं डरा भी हुआ था और आक्रामक भी था , मैंने पलंग पर बैठे बैठे ही पलंग के नीचे देखा, वहां कुछ नही था , टेबल के नीचे भी नही, कहीं नही / मैं और डर गया , मैंने वहीँ से माँ को आवाज़ लगाई मगर , माँ पूरब के तरफ वाले रूम में थी, बीच में गैलरी थी , आवाज़ पहुंची नही / हिम्मत कर के मैं नीचे उतरा , दुबारा पूरा रूम चेक किया , ऊपर नीचे सभी जगह देख , ज्यादा सामान भी नही था मेरे रूम में और फिर ...दरवाज़ा खोल कर बाहर निकला , और बाहर से कुण्डी लगा दी / मेरे रोंगटे खड़े थे , दिल की धड़कन कानो में सुनाई पड़ रही थी और नसों में खून की गति तेज़ थी , गैलरी से गुजरते हुए ऐसा लग रहा था जैसे मेरे पाँव को धरती अपनी तरफ खीच रही है / भारी लग रहा था हर कदम , मैंने माँ को जगाया , सारी बात बताई , माँ ने रूम खोला , पापा भी आ गये , सबने ढूंढा मगर कुछ नही मिला / उस रात पिता जी कमरे में ही सोए/ उस रात डर रहा था थोड़ी देर तक , पर अगले दिन से नही , हाँ ,  सुरक्षा कारणों से लाइट जला के सोता था , एक और अजीब बात हुई के , उस दिन के बाद से , उत्पात ख़त्म हो गये बिल्डिंग में / पता नही शायद उसे मेरे हाथों ही कोई मुक्ति टाईप चीज़ मिल गयी हो ?किसी को /

इसी बीच छठ पर्व आ गया और मुझे फिर से अपने ननिहाल जाने का मौका मिला / हर साल की तरह इस साल भी नाटक का मंचन होना था / मैं फिर से रिहर्सल  में पहुंचा मामा जी के साथ / मैं रोज़ रिहर्सल जाता था , और देखता के लोग कैसे एक्टिंग करते हैं / कहानी लगभग पूरी याद हो गयी थी रोज़ वहां जाते जाते /लेकिन नाटक के ठीक दो दिन पहले एक पात्र की तबियत ख़राब हो गयी / सब चिंतित थे के अब क्या होगा , क्यों की वो पात्र   ही सूत्रधार था पूरी कहानी का , वही कहानी की शुरुआत करता है और पूरी कहानी उसी के background में चलती थी / कहानी में वो रघुवीर बना था , जो हवेली का सबसे पुराना कारिन्दा होता है , पहले सीन में वो लगभग नब्बे साल का होता है , और वो ही दर्शको को कहानी सुनाता है, background  में भी वो 60  साल का होता है / रोल भी आसान नही था / मुझे याद है शाम को सभी बड़े कलाकार आपस में विचार विमर्श कर रहे थे , के रोल तो वही कर सकता है , जिसे कहानी की थीम पता हो , और संवाद भी / अचानक उन्होंने मुझे बुलाया और पहला सीन करके दिखने को कहा , मैंने किया , उन्होंने देखा , थोड़ी देर बाद फरमान आ गया के ये रोले मैं करूँगा / मैं हैरान था , नब्बे साल के बूढ़े का रोल 14  साल की उम्र में , मगर मुझे चुनौतियाँ पसंद थी / मैं जुट गया अपने एक्ट में / नाटक के दिन मैं ग्रीन रूम में अपना मेकअप कर रहा था / मैंने अपने हाथो से जूट की मूछ बनाई , गालों पे गोंद लगा कर , जूट के रेशे चिपकाये ताकि वो दाढ़ी जैसे लगे/ झुर्रियों के लिए फविकोल लगा के , पूरी बत्तीसी निकाली ताकि जहाँ जहाँ झुर्रियां पड़नी हो पड़ जाएँ / धोती कुर्ता पहन कर , गमछे को लपेट कर मैं पुरे मेक अप में  , बूढ़े जैसे चलने की प्रक्टिस कर रहा था , तभी वहां मामा जी आये और मुझसे बोले ,,,बाबा आप यहाँ क्या कर रहे है , दर्शक दीर्घा में जाइये , यहाँ केवल कलाकार ही रह सकते हैं , मैंने हँसते हुए कहा के , मामा जी मैं हूँ / वो मुझे पहचान नही पाए थे / तब से ही जब भी कोई नाटक मंचन होता है, मेक अप मैन मुझे ही बनाया जाता है / वो मेरे जीवन का इतने बड़े स्तर पर पहला stage एक्ट था / मेरी एक्टिंग की तारीफ हुई कई लोगों का स्नेह और आशीर्वाद मिला , क्यूँ की मैंने सफलता पूर्वक एक बुजुर्ग की भूमिका छोटी उम्र में ही निभा ली थी / मुझे लगा के हाँ , मैन एक्टिंग कर सकता हूँ / कालांतर में मैंने बहुत सारे अभिनय किये , मगर हर बार मै अपने पहले अभिनय को नहीं भूलता / बड़ा मज़ा आया उस साल ननिहाल में / 

मैं वापस घर आ गया था ननिहाल से , स्कूल की वार्षिक परीक्षा में अच्छे नंबर आये , मगर मैं संतुष्ट नही था , मुझे 75 % से ज्यादा नंबर चाहिए थे / मुझे पता नही क्यूँ , सुबह जल्दी जल्दी उठ के पढने से ज्यादा , रात को पढने में मजा आता था , सब कुछ शांत शांत सा रहता था / मैंने अपनी परीक्षा के अंतिम महीने में बहुत मेहनत की , लगभग 14 -15 घंटे पढ़ा करता था / सुबह 4 से 10 सोता और बाकि समय पढता था / मैंने रोज़ 1 - 2 घंटे क्रिकेट खेलना नही छोड़ा , परीक्षा के 1 दिन पहले तक भी, वो मेरी पढाई की थकान मिटा दिया करता था / रात को रोज़ एक थर्मस चाय रखता अपने पास और पढाई करता , सारी रात /  कोई कोचिंग नही टयूशन नहीं , सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत / कोशिश करता के , घरेलु समस्याएँ मेरे दिमाग पे हावी न हो जाएँ / 

बिहार के हालात अच्छे नही थे, राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका था / ऐसे में ही हमारी परीक्षा की डेट निकल आई / हमें संगीनों के साये में परीक्षा देनी थी / सेंटर घर से 12 कम दूर था , रोज़ ट्रेन पकड़ के जाना होता था, ऑटो से नही जा सकता था / सेंटर पर ढेर सारे जवान वहां बन्दूक लिए खड़े होते , बहुत छानबीन होती थी / मेरे रूम में किसी मिनिस्टर के बेटे का भी exam  पड़ा था / पुलिस वाले खुद उसके पास चिट लेके जाते थे , दुसरे दिन ही उस रूम का माहौल गन्दा हो गया था , चोरी होने लगी थी , चीटिंग करते थे, खुलेआम नही, पर होती थी, और किसी रूम में नही होती थी , पर वहां होती थी / वहां एक परीक्षक था , जो रोज़ मुझे देखता , और ये भी , के मैं इधर उधर बिलकुल भी ध्यान नही देता और बस लिखता रहता / इंग्लिश के पेपर के दिन वो मेरे पास आया और मुझसे पूछा के , तुम तांक झांक क्यूँ नही करते ? मैंने बिना उनकी तरफ देखे हुए कहा , सर मैंने पढाई में मेहनत की है , मुझे जरुरत नही , और वैसे भी मुझे अपने शब्दों में ही उत्तर लिखना है /वो बहुत प्रभावित हुए , और कहा के कभी कोई हेल्प चाहिए तो बताना / परीक्षा ख़त्म होने के बाद उन्हों ने मुझसे कुछ देर बात की , बताया के मैंने तुम जैसा विद्यार्थी आज तक नही देखा, कहाँ पढ़े , घर में कौन कौन हैं आदि इत्यादि / अगले दिन से लंच में वो मुझे teachers रूम में ले जाने लगे और वही मैं लंच करता / सभी परीक्षकों से मेरा परिचय करवाया / मेरे मित्र इस बात को जानते थे के मैं चोरी नही करता इसलिए मुझे इतना प्यार मिल रहा है , मगर वो साले फिर भी चोरी करते थे /  इतने के बावजूद   मैंने कोई मदद नही ली परीक्षक महोदय से, शायद इसका एक कारण ये भी था , के जो विश्वास एक बार बन जाये , मैं उसे कम नही करना चाहता था / लास्ट का पेपर बचा था संस्कृत का , जो मेरा एक अच्छा विषय था , दो दिन बचे थे परीक्षा के ख़त्म होने में / 
मैं अपनी ओर से बात चलाता रहता सब से की मुझे कोई नौकरी चाहिए , परीक्षा के तुरंत बाद /मुझे तसल्ली मिलती रहती थी / मैं किसी भी तरह की नौकरी के लिए तैयार था / लास्ट पेपर देने मैं परीक्षा भवन में आया / संस्कृत में  50 no, के वैकल्पिक प्रश्न हुआ करते थे उस वक़्त / परीक्षा शुरू हो गयी /परीक्षक महोदय आये और मुझसे मेरा प्रश्न पत्र माँगा , मैंने दे दिया , उन्होंने उसे बदल कर वापस कर दिया मुझे / अब जो प्रश्न पत्र मेरे पास था , उसमे सारे वैकल्पिक प्रश्नों के विकल्पों पे निशान लगा था , मैंने उनकी ओर आश्चर्य से देखा , मगर उन्होंने धीरे से कहा के , सारे उत्तर सही हैं , आज अंतिम दिन है , सोंचा मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूँ / अंतिम दिन मैंने वो गलती कर ही दी , मैंने सारे  वैकल्पिक उत्तर बिना दिमाग लगाये वैसे ही लिख दिए जैसे परीक्षक महोदय ने दिए थे , गलती मैं इसलिए बोल रहा हूँ , रिजल्ट में संस्कृत में ही सबसे कम अंक आये , जबकि मेरा प्रिय विषय था वो / परीक्षा ख़त्म हो चुकी थी / परीक्षक महोदय ने अंतिम दिन मुझे कुछ पुलिस वालों से भी मिलवाया , मेरी तारीफ की, मैंने नमस्कार किया और आशीर्वाद लेके घर की ओर वापस चल दिया / 
 रास्ते भर एक नए अहसास , आँखों में एक नई चमक से सराबोर रहा /  लगता  था जैसे मैं जल्द ही अब सब संभाल लूँगा , मैं बड़ा हो गया हूँ अब / मैं एक नए जोश में था , घर आया , रात को मुझे स्मिता के पिता जी ने मुझे बुलाया और पूछा ,क्या तुम नौकरी करोगे ?  अंधे को क्या चाहिए , दो ऑंखें , आज ही परीक्षा दे के आया और आज ही नौकरी का ऑफर , मैंने तुरंत हाँ कर दी /उन्होंने मुझे एड्रेस दिया और बोला कल 10 बजे चले जाना , और मेरा नाम बोलना/
रवि शंकर रात भर नहीं सोया , सपने देखता , मिटाता , फिर देखता , ऐसे ही पूरी रात काटी , 15 साल की उम्र में पहली बार किसी जॉब के interview के लिए जाना था , एक नई राह बनानी थी , एक नई पहचान /