सोमवार, 26 सितंबर 2011

MERE MAHATWAPURN 5 SAL

इंदिरा गाँधी के कत्ल के वक़्त curfew बहुत लम्बे समय तक चला / कई लोगों के धंधे चौपट हो गये /पिता जी के काम पे भी इसका प्रभाव पड़ा / बिज़नस आधा रह गया था / इसी बीच मेरी एक और बहन का जन्म हुआ /मुझे खेलने को , खुश होने को एक खिलौना मिल गया / अब मैं आठ साल का का हो चुका था , कक्षा पांचवी / उस वक़्त भी मैं अपने पापा के बिज़नस के बिल्स वगैरह बना लेता था , Quantity , रेट वगैरह verify कर लेता था /कुल मिला कर , उनके न रहने पर ,माँ की सहायता से , सारा कम देख लेता था / जो भी आता यही कहता के ये लड़का एक दिन कुछ करके दिखायेगा / 

4th क्लास में हिं मुझे एक शिक्षक मिले थे , मोहर सर नाम था उनका / वो GK  की पढाई कराते थे / उन्होंने सब से पहले मेरे अन्दर IPS exam पास करने के जज्बे को जन्म दिया / उनको मेरे ऊपर पूरा भरोसा था / पुरे दो साल जब तक मैं उस कॉन्वेंट स्कूल में रहा , उन्होंने मेरी GK इनती स्ट्रोंग कर दी के मैं 10th  तक के बच्चों को भी , GK में मात दे दिया करता था / मोहर सर बड़े ही अच्छे और बच्चों को प्यार से समझाने वाले teacher थे , उनका ये स्वाभाव  मेरे ऊपर बहुत गहरी छाप छोड़ गया , जो बाद में मेरे खुद के शिक्षक जीवन में काम आया / 

मेरे प्रिंसिपल सर का नाम श्री विजय सर था /वो बहोत ही कड़क और "पढाते नहीं गुरु जी , पढ़ाती छड़ी है " को मानने वाले थे / मेरा उनके डंडे से सामना बहुत कम होता था , लेकिन जब होता था तो बहुत कष्ट दायक होता था , क्यों की मैं थोडा कोमल टाइप का लड़का था / मुझे याद है मेरी पहली क्लास उन्होंने Parts of Speech ना याद करके  लाने के लिए ली , "कुर्सी " बना कर (जिसमे आप ना खड़े रह सकते और ना बैठ ही सकते ) 30  मिनट में पूरा Parts of Speech याद करा दिया , खड़े होने की कोशिश में , डंडे उपहार स्वरुप मिले / मेरा शरीर लाल पड़ गया / उस रात मुझे बुखार भी चढ़ा /लेकिन मेरे माता पिता स्कूल में कभी इस बात की शिकायत ले कर नहीं जाते थे के मेरे बच्चे को क्यूँ मारा , वजह सही होनी चाहिए / आज के समय में अगर ऐसा किया जाये तो गुरु जी को जेल की चक्की पीसनी पड़ सकती है /

पटना में एक बहुत ही नामी स्कूल है "Sir G.D. Patliputra High School" जिसकी स्थापना 1917 में हुई /इस विद्यालय ने कई  IAS , IPS और ना जाने कितने doctors  , engineers और बहुमुखी प्रतिभाओं के भविष्य की बुनियाद रखी/ इसमें दाखिला entrance exam  के बाद ही होता था / दाखिला 6th क्लास से लिया जाता था /अब मुझे अपना कॉन्वेंट स्कूल छोड़ना था, और अगला पड़ाव इस विद्यालय में दाखिला लेना था  / मोहर सर को छोड़ने का  दुःख तो था पर , एक तरह की ख़ुशी भी , क्यूंकि मैं 6 कमरों के स्कूल को छोड़ कर 100 कमरों के स्कूल में जा रहा था /दाखिले का exam 4 subjects का हुआ ,हिंदी , इंग्लिश , मैथ और GK , मैं फेल हो गया / वजह थी हिंदी , मैं कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ा था और यहाँ question Govt के Text बुक की थी / पहली बार मुझे फेल होने का अहसास हुआ , मैं बहुत रोया , सभी ने  समझाया तुम्हारी गलती नहीं , तब जाके माना/ लोगों ने सलाह दी मुझे एक और स्कूल में डाला जाये जहाँ Govt Text Books के हिसाब से पढाई होती हो / मुझे एक pubic  स्कूल में दाखिला 5th class में ही दिला दिया गया / मेरी पढाई का एक साल इस तरह बर्बाद हो गया / अगले साल हजारों विद्यार्थियों ने दाखिले की परीक्षा दी /मैंने भी पुनः परीक्षा दी / मैं पास हो गया , मेरा नंबर 103 वां था / मैं अपना नाम देख कर इतना खुश हुआ के स्कूल से दौड़ते हुए घर पहुंचा , ३ km बिना रुके / बिना किसी tutuion  के ये मेरी पहली छोटी सी उब्लाब्धि थी , जिसने मुझे बहुत ख़ुशी दी / 

स्कूल में मेरा section  मिला E और रोल No 102 , section F  तक था , और प्रत्येक section में 105 विद्यार्थी / इतने बड़े स्कूल में आकर मैं खुश था / पहले दिन ही introduction में मैं अपनी क्लास Teacher की नज़र में आ गया / 2 month में ही मोनिटर बना दिया गया / 

उधर घर पे सब ठीक चल रहा था / मुझे क्रिकेट का , और पेटिंग का बुखार चढ़ चुका था लेकिन मैंने घर में इसकी चर्चा नहीं की थी , बस स्कूल तक ही सीमित था /दो और बुखार चढ़े , गाने का और कॉमिक्स पढने का / इतने सारे बुखारों के बाद भी , मैं अपनी पढाई और स्कूल में अच्छा कर रहा था / इतने बच्चों के बीच अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था / 

इसी बीच एक और घटना हुई , रामानंद सागर की रामायण का आना हुआ / हमारे घर पर उस समय TV नहीं था , मैं पड़ोस में TV देखने जाया करता था , हर रविवार , रामायण ......./ पिता जी को ये पसंद नहीं था फिर भी मैं चोरी से चला जाता था , मुझे रामायण से प्रेम था / एक दिन किसी जरुरी काम से पापा ने मुझे याद किया , मैं मिला नहीं , पता चला मैं रामायण देख रहा हूँ /पापा ने मुझे बुलाया  , बहुत पिटाई की / मेरे अन्दर की विद्रोही प्रवृति धीरे धीरे जागने लगी थी , बेकार की पिटाई (मेरे हिसाब से ) मुझे अच्छी नहीं लगी / शाम को ही पिता जी घर में टीवी ले आये/ मैं नाराज़ था , लेकिन खुश हो गया / 

मैं सातवीं कक्षा में पहुँच चुका था / धीरे धीरे मेरे अन्दर का व्यक्तित्व उभरने लगा था / मैं उस समय भी किसी की शिकायत लिखित रूप से प्रिंसिपल रूम में देता था , जिससे अन्य शिक्षक और प्रिंसिपल की नज़र में मैं आ चुका था / प्रिंसिपल रूम में 9 th - 10th  के भी विद्यार्थी जाने से घबराते थे , और किसी की लिखित शिकायत के बाद , उस लड़के के बड़े भाई इत्यादि मोनिटर की पिटाई भी करते थे / लेकिन सत्य के लिए लड़ना शायद खून में था / विद्रोही तो मैं था हीं/एक ऐसे हीं मौके पे स्कूल से आने वक़्त मुझे कुछ बड़े लड़कों ने घेर लिया , और मेरी लात घूसों से पिटाई की / मैंने घर जा कर किसी को कुछ नहीं बताया , पर गुस्से में खाना भी नहीं खाया / रात भर सोंचता रहा , फिर प्लान बनाया / अगले दिन स्कूल नहीं गया / स्कूल की छुट्टी 4 :20 में हुआ करती थी / करीब 2 बजे से हीं अपनी तैयारी में लग गया /अब मैं युद्ध के लिए कवच इत्यादि धारण कर रहा था / पहले एक स्टील की पतली चादर अपने शर्ट के अन्दर डाली (ताकि पेट में चोट न लगे ) , दोनों हाथों में साइकिल के चेन, बांधी, ऊपर से शर्ट पहना और चल दिया शहंशाह , युद्ध लड़ने / ये मेरे ऊपर फिल्म का प्रभाव भी था , और पहली बार सच के लिए लड़ने की इक्षा भी / ठीक 4 बजे उस गली के नुक्कड़ पे पहुँच गया , जहाँ से वो लड़के गुजरते थे / उनका आगमन हुआ और शहंशाह टूट पड़ा उनपर / मेरे मुंह पे जो घूंसे पड़े , वो तकलीफ देने वाले थे , लेकिन और कहीं जो उन्होंने मारा , उनके लिए तकलीफ देने वाले थे / वो भाग गये , जाते जाते कल की धमकी दे गये / 

कल होके मैंने दो काम किया , एक अपना दाखिला बिना घर वालों से पूछे हुए (मुझे पता था पापा मारेंगे भी और जाने भी नहीं देंगे ) , कुंगफू ट्रेनिंग सेंटर में लिखा लिया / वहां भी एक छोटा सा entrance exam देना पड़ा / वो थे केहुनी के बल खुरदुरी जमीन पर चलने का , जब तक थोडा खून न निकले / वो मैंने पास कर लिया /  मुझे लग गया था के इस ज़माने में जीने के लिए आत्म रक्षा जरुरी है / दूसरा काम था उन लड़कों के खिलाफ प्रिंसिपल को तगड़ी चिट्ठी लिखना / सुबह application दी और लंच तक उनके guardian आ गए / मामले को ख़तम किया गया /

 एक और घटना हुई जो बिहार के इतिहास में पता नहीं किन अक्षरों में लिखी लाएगी , लेकिन मेरे लिए तो बाद में ये घटना , मेरे सारे सपने , सारे करियर , मेरे पिता के कारोबार सब के लिए एक तीखा मोड़ साबित हुई ......

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