रविवार, 25 सितंबर 2011

JALIM SINGH KA JANM

कहानी शुरू होती है 1952 से जब श्री सत्य नारायण झा का पटना शहर में आगमन होता है / उनकी पढने की बहुत ही जबरदस्त इक्षा थी / एक गाँव में जन्म हुआ और उन्हें पढाई के लिए प्रेरित करने वाला कोई भी नही था / अपने बलबूते पर , अपने दोस्तों की सहायता से वो पटना आये , क्यूँ की उस वक़्त नवी कक्षा की परीक्षा भी बोर्ड हुआ करती थी / गाँव में आठवी कक्षा तक हीं पढाई की सुविधा  थी / पढाई की इक्षा उन्हें पटना जैसे शहर में ले आई जब उम्र केवल १४ साल की थी /उसी उम्र में उन्होंने tution पढ़ाना शुरू कर दिया , और अपना और अपने पढाई का खर्च निकालने लगे /वो मेरे पूज्य पिता थे / 

चूँकि हमारे दादा जी एक मामूली किसान थे , और उन्होंने साफ बोल दिया था के , अगर पढना है तो मेरे पिता को खुद ही मेहनत करनी पड़ेगी / पिता जी बताते हैं , के वो रोज़ लगभग २५ किलोमीटर रोज़ घूम घूम कर बच्चों को टयूशन पढाया करते थे / फिर खुद भी पढ़ते थे / वो बताते हैं कभी कभी , भूखा भी सोना पड़ता था , किराये के लिए पैसा न होने पर , गाँधी मैंदान (एक बड़ा पार्क जिसका इस्तेमाल बड़े आयोजनों में आज भी होता है ) में बेंच पर सोया करते थे / उन्होंने बताया एक बार वो २ दिन से भूखे थे और भगवान की दया से कैसे उन्हें २ रुपये का एक नोट मिला , जो उस वक़्त बहुत हुआ करता था / 

उन्होंने संघर्ष किया और दसवी की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की / उस वक़्त दसवी पास करना एक बड़ी बात थी / पापा बताते है के , जब वो पांचवी कक्षा में थे तब उनकी कक्षा में एक युवक पढ़ा करता था जिसकी मूछें और घनी दाढ़ी थी , जब पिता जी ने उनसे पूछा " पंडित जी शादी हो गयी क्या " उस महोदय ने जवाब दिया " हाँ २ बच्चे भी हैं "/ वो जमाना कुछ और था , पढाई पे विशेष ध्यान नही दिया जाता था और बचपने में ही शादी कर दी जाती थी / 

क्यूँ  के शहर में वो काफी दिनों से थे , और शिक्षक बन कर उन्होंने अच्छा नाम कमाया था / इसलिए उनकी जीविका अच्छी चलने लगी / उन्होंने अब पढाई के साथ साथ Typwritting and Short Hand का course भी लेना शुरू कर दिया /उस जमाने में ये सबसे आधुनिक तकनीक एवं ज्ञान था , जिसकी सहायता से कोई भी व्यक्ति विशेष अच्छी नौकरी पा सकता था / पिता जी भले ही गाँव से थे , लेकिन आधुनिकता उनके रग रग में थी / उस वक़्त के सारे आधुनिक पोशाकें , स्टाइल सब को अपने अन्दर ढलने का बड़ा शौक था उन्हें / 

जल्द ही उन्हें एक प्राइवेट संस्था में clerk की नौकरी मिल गयी , और केवल २ साल के अन्दर ही , अपनी आधुनिकता और Typewriting and Short Hand Skill के कारण वो संस्था के manager बन गये / ये उनकी बड़ी उपलब्धि थी / उनका विवाह माया मिश्रा से हो गया , और वो माया झा बन गयी , मेरी माँ/ 

पिता जी मास्टर साहेब के नाम से प्रसिद्ध थे / नौकरी के बाद भी उनका नाम यही रहा / उनका रहन सहन और भी अच्छा हो गया , उस वक़्त की सभी बुनियादी चीजें अब घर में थीं / 1972 में उन्हें पुत्री की प्राप्ति हुई , मेरी बड़ी बहिन इंदु , और उसके 7 साल बाद 1979 में बड़ी मन्नतों और पूजा पाठ के बाद , मेरा जन्म हुआ / मेरा नाम रखा गया / रवि , रवि शंकर /

 
 
















3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बदिया भाई ......पर आप ने भरद्वाज टाइटिल क्यों लगा है फिर ........वैसै आपका ब्लॉग बहुत अच्छा बना है ........

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  2. jeevan khud hi ek sangharash hai..koi mukaam pana aasan bhi nahi jis himmat se aapke pita ji.ne ek sahi mukaam hasil kiya..wo tareef ke hi nahi naman ke kabil hai....himmat aur safalta...

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