मैंने वापस लौटने के पहले , सब के लिए कुछ न कुछ ख़रीदा था । मैं काफी दिनों बाद घर जा रहा था , मैं बदला था , मैं वो नहीं रहा था जो मैं था । मेरे अन्दर का नास्तिक इन्सान , आस्तिक बन चुका था । सोंच बदल चुकी थी , पर इस सफ़र का अंत तो कहीं नज़र हीं नहीं आ रहा था । मैं फिर से वापस पटना जा रहा था , वहीँ खड़ा था जहाँ से चलते चलते मुझे लगभग 5 साल बीत चुके थे । पूरे रास्ते मैं फिर से अपने बारे में ही सोंच रहा था , एक नई विचार धारा ने मेरे अन्दर अपनी पैठ बनाई थी , वो थी देश के लिए समाज के लिए कुछ करना । दरअसल मैं घर से बाहर इतने लम्बे समय के लिए कभी गया नहीं था , और सच में समाज के बारे में तभी पता चलता है जब आप एक नई संस्कृति और समाज का हिस्सा बनते हैं , घर के पारिवारिक माहौल से दूर हो कर अपनी पहचान ढूंढने की कोशिश करते हैं । जहाँ देखने वाला आपके आस पड़ोस का कोई व्यक्ति नहीं , एक सुदूर प्रान्त का व्यक्ति/समाज होता है , जो आपको जानता नहीं है , न ही आपकी संस्कृति और विचारों से अवगत होता है । ऐसी परिस्थितियों में अपना एक सामाजिक स्तर बनाना , अपने आप को वहां ढालना ही मेरी समझ से समाजिकता को समझने का प्रमाण है । कुछ अध्यात्मिक और कुछ सामाजिक जिम्मेवारियां मुझे सोंचने पर मजबूर कर रही थीं । मैंने रास्ते भर चिंतन ,मनन किया , मेरे अन्दर का आदमी मेरे से कहने लगा था के जीवन में केवल पैसा कमाना , शादी विवाह कर लेना , बंगला गाड़ी का मालिक बन जाना पर्याप्त नहीं है , कुछ सार्थक होना चाहिए जो सब के हित में हो । सोंच तो बहुत कुछ रहा था मगर , लौट के फिर से वापस अपने परिवार की तरफ ही ध्यान चला जाता था ।
ट्रेन सुबह १०:३० के आस पास पटना पहुंची , अपनी मिट्टी की खुशबू , आबो हवा में अपने पन , अपने बचपन का अहसास सब महसूस हुआ । मैंने घर आने की अपनी निश्चित तारीख घर वालों को नहीं बताई थी , मैं उन्हें अचानक से जाकर उन्हें अचंभित करना चाहता था । स्टेशन से बाहर निकलते हीं हनुमान मंदिर को देखा , जिसमे लगी ईटों में मेरा भी श्रम दान था , अभिवादन करके मैं घर की तरफ चला । रास्ते में चारों तरफ नज़रें घुमा कर देखता , देखता के क्या क्या बदलाव आया है यहाँ इतने दिनों में । मगर मुझे कोई खास बदलाव नज़र नहीं आया । मैं घर पहुँच कर दबे पाँव आकर पलंग के अन्दर घुस गया , एक एक करके सब को surprise दिया ..बड़ा मज़ा आया । दो चार दिन वहां की बातें घर में और दोस्तों के साथ बाँटने में हीं बीत गये । मैं अक्सर दिनभर इधर उधर घूम कर आता और सोने के वक़्त चिंतन करता के मैं अब क्या करूँ ? एक तरफ परिवार की मुश्किलें , मेरी पढाई मेरा कैरिएर , दूसरी तरफ मेरे अन्दर बैठा एक दूसरा इन्सान जो इस धरती पर आने का अपना कारण ढूंढ़ रहा था और देश और समाज के लिए अपनी आत्म संतुष्टि के लिए कुछ करना चाहता था । मेरे लिए पैसा कमाना एक मात्र लक्ष्य नहीं था ।
बिहार का माहौल उस वक़्त और भी बिगड़ चुका था । चारों तरफ भय , अराजकता का ही माहौल व्याप्त था , एक खास वर्ग के लोगों का बोलबाला था । पुलिस और प्रशासन जैसे गुलाम बने हुए थे । वहां से बड़े कारोबारियों का पलायन जारी था , नए काम में कोई निवेश नहीं करना चाहता था । वहां प्राइवेट जॉब के लिए भी , रिश्वत की मांग थी । मेरा निजी काम जो मैंने अपने मित्र के साथ किया था , उसके पैसे भी पुरे नहीं मिले थे मुझे , मैं लगातार उसके संपर्क में रहता और जैसे तैसे वसूली करता , और अपना और घर का खर्च चलने की कोशिश करता । ऐसा करते हुए लगभग 1 महीने बीत गये , मगर न तो मैं अपना कोई काम हीं शुरू कर पाया न हीं कोई जॉब ही हासिल कर पाया। दोस्तों में भी केवल मैं ही फ़िलहाल ऐसा था जिसके पास इतना अनुभव था और संघर्ष भी । मैं उनके बीच जब भी होता तो उन्हें अच्छा लगता , फिल्म देखना हो या पार्टी या कोई अन्य आयोजन मैं उसके बीच एक प्रमुख की भूमिका निभाता , मुझे विश्वास था के वो मेरे सच्चे और अच्छे दोस्त हैं ।मैं पटना में भी विभिन्न आयु वर्गों के लोगों का मित्र था , और कई तो ऐसे थे जिनसे मेरा शाम को मिलना रोज़ होता था । सब से मेरी बात होती मगर कोई भी कम मिलना मुश्किल सा लग रहा था , परिस्थितियां पुनः विपरीत होती जा रही थीं ।कुछ काम मिले भी , जिसमे पैसे तो थे , मगर या तो वो गैर कानूनी थे , या फिर समाज के हित में नहीं थे । इसलिए मैंने ऐसे कार्यों को मना कर दिया , आज मुझे लगता है के अगर मैं आस्तिक न बना होता तो ऐसे ही किसी काम में संलिप्त होता । किसी शहर का कोई दबंग, गुंडा होता , या किसी पुलिस की गोली का शिकार , कौन जाने ?
उधर जुनपत से , स्कूल के मालिक नवाब सिंह और प्रिंसिपल का बार बार फ़ोन आ रहा था मेरे वहां वापस आने को लेकर । मैंने वहां 3 - 4 महीने में जो अपनी पहचान बनाई थी , उसका काफी प्रभाव पड़ा था , और मेरे वापस आने के बाद मेरी चर्चा वहां होती थी । लोग मुझे वहां वापस चाहते थे । मेरे अन्दर का सकून, मेरे बाहरी ताम झाम पर हावी हो गया । मैंने सोंच लिया के , कुछ दिन मैं जुनपत में रह कर ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा देने का काम करूँगा । दरअसल ये सब उस अध्यात्म ज्ञान का , या यूँ कहें के मेरे ऊपर अध्यात्मिक विचारों का इतना गहरा प्रभाव पड़ा था , के मैं सोंचता के अगर इन्सान किसी भी कार्य को मन लगा कर करे तो उसी में सफलता उसकी निश्चित है । वैसे भी पटना में 1999 - 2000 में 4-5 हज़ार की कमाई तो इंजिनियर को भी नहीं थी , मैंने हिसाब लगाया , और सोंचा के वहीँ कुछ तकनिकी शिक्षा लूँगा । मेरे इस निर्णय से मुझे कई फायदे मिलने थे , एक तो ब्राह्मन होने का कर्म , शिक्षा लेना और देना पूर्ण होता , देश की सेवा होती , शिक्षण करने का एक नया अनुभव प्राप्त होता , वहां रहकर मैं अपने अध्यात्म ज्ञान को भी बढ़ा सकता था । कई पहलुओं पर गौर करने के बाद मैंने आखिर में जुनपत वापस जाने का फैसला कर लिया । मैंने घर वालों से बात की और जाने को तैयार हो गया । मैंने सभी को सुचना दे दी के मैं आ रहा हूँ । पंडित जी भी खुश हो गये थे , उनके यहाँ घर का कम करने वाला एक आदमी कम पड़ गया था , अब मै जा रहा था तो उन्हें राहत मिलने की पूरी उम्मीद थी ।
मार्च सन 2000 को मैं वापस जुनपत आ चुका था ।जुनपत पहुँचने पर मैंने स्कूल ज्वाइन कर लिया , और पहले जिन परिवारों में मैं ट्यूशन पढाता था उन्हें भी पकड़ लिया । मैंने भाई से बात की के मुझे अब पंडित जी के यहाँ नहीं रहना है। भाई ने मुझे आश्वाशन दिया और हम शाम को नवाब सिंह के घर पहुंचे , मैंने अपनी परेशानी उसे बताई । उनका एक पुराना मकान था जो वही गाँव के बीचों बीच था , उसमे तीन कमरे थे मगर वो पिछले 10-15 सालों से बंद पड़ा था। आस पड़ोस की महिलाएं और बच्चे रात को उस मकान के पास से अकेले नहीं गुज़रते थे । कई तरह की अफवाह थी , के वहां भूत प्रेतों की छाया है । सब बातें मुझे बताई गयी , मैंने उसी घर में रहने का फैसला किया ।
अगले दिन सुबह अपने दो चार बड़े छात्रों को ले कर पुराने मकान पंहुचा जिसे लोग "हवेली" बोलते थे । दरवाजा बमुश्किल खुल पाया , क्यूँ की अन्दर की ओर से बहुत सारे जंगल झाड उग आये थे । हम अन्दर पहुंचे , हमारे हाथ में जंगल झाड को काटने के हथियार थे । मकान की बनावट साधारण सी थी , एक साथ तीन कमरे , ऊपर पक्की छत , एक जीना, आगे बड़ा सा अहाता उसमे एक नीम का पेड़ जो बड़ा था, आंगन भी कच्चा था और कमरे का फर्श भी । आंगन में भांग के 6-7 फीट बड़े पेड़ जम चुके थे , बहुत सारा जंगल भी , हमें साफ सफाई करते करते शाम हो गयी , 2 - 3 बड़े सांप और लगभग 8-10 बिच्छुओं का सफाया हुआ और एक कोने में उनका दफना के अंतिम संस्कार । सब थक चुके थे हम उस दिन वापस चले आये । अगले दिन रूम की सफाई हुई , गोबर और मिट्टी से तीनों कमरों को लीपा गया । पड़ोस से एक बड़ी खाट मंगाई गयी , मैंने बीच वाले कमरे में रहने का फैसला किया था , उसकी पुताई की गयी । मैंने पूजा की और वहां रहना शुरू कर दिया । वहां दो चीजों की कमी थी , न तो उस मकान में टॉयलेट था , न ही उसमे हैण्ड पंप । वहां केवल शाम को लाइट आती थी । शाम को लाइट आ गयी । आस पड़ोस के लोग खुश थे के मैंने फिर से उस घर को जिन्दा किया । शाम को पड़ोस से खाना आ गया । मै बरसों बाद खाट पर सोया, अकेला , मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा वहां पर, बस एक नया अहसास था , सोंच रहा था अपने रूम को जहाँ मैं सोया करता था । मुझे अपने बड़े वाले आईने की बहुत याद आ रही थी ।
मेरा स्कूल में आना कुछ ऐसा था जैसे के किसी नए सिस्टम का आना। मैंने स्कूल में आते ही प्रिंसिपल साहब से विचार विमर्श करके सबसे पहले अध्यापकों की नियमावली बनाई । स्कूल का रुटीन बनाया , पहले वहां पढ़ाने की व्यवस्था ऐसी थी के जो जहाँ बैठता घंटो पढाता रहता । उस वक़्त स्कूल 7 वीं क्लास तक ही था । मैथ्स में तो फिर भी मेरा भाई पढ़ा लेता था , पर इंग्लिश तो 4 थी कक्षा का भी और कोई पढ़ा नहीं पाता था । मैंने धीरे धीरे अनुशासन बनाना शुरू किया । मैंने अपने पुराने शिक्षकों से ही बच्चों को नियंत्रित करने की कला की सीख ली , उनका गंभीर होना , आँखों से , बातों से मारना। वैसे भी मै पिछले 6 महीनों से बच्चों को पढ़ा रहा था , धीरे धीरे मै अपनी खुद की भी विशेषता बनाता जा रहा था । स्कूल में मैंने 1 सप्ताह बड़े प्यार से बच्चों को पढाया , समझा कर दुलार से , और मै वार्निंग भी देता जाता के मै आपका मित्र जरुर हूँ पर यदि बताये हुए समय के अन्दर कोई सुधरा नहीं तो ठीक नहीं होगा । स्कूल में बच्चे तो वही थे जिनका दिमाग पढाई में लगता ही नहीं था , एक से एक बिगड़े हुए केस , वजह वहां की ग्रामीण संस्कृति और 75% लोगों का अभी भी ये मानना के दो चार दिन स्कूल न जाके घर या खेत का काम उनसे करा लेंगे तो कुछ बिगड़ेगा नहीं ।
मैं बच्चों को पीटने के बिलकुल भी हक़ में नहीं था , पर वहां का माहौल अब भी ऐसा था के घर वाले खुद जानते थे के अगर उन्हें सजा न दी गयी तो वो बिलकुल भी नहीं पढ़ पाएंगे इस लिए वहां के सरकारी और प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं के ऑफिस में बजाप्ता 5-6 कट्ठे (एक प्रकार का पौधा जिसकी छड़ी लचीली और बहुत मजबूत होती थी ) की छड़ियाँ रखी होती थी । शिक्षक खुल के पीटते बच्चों को , और बिगड़े हुए केस रोज़ रोज़ की मार खा के , ढीट बन चुके थे । मुझे बच्चों के शरीर पर नहीं उनके दिमाग पर चोट करनी थी , ताके वो पढाई के महत्व को समझें और पढ़ें । मैंने इसके लिए एक नुस्खा निकाला , सुबह प्रार्थना के बाद PT करवानी शुरू की , इसके बाद प्रतिदिन सभी बच्चों को वहीं हममे से एक टीचर उन्हें , पढाई , अनुशासन और जीवन के मूल्यों के बारे में बताता , कहानी इत्यादि सुनाता । मैंने शिक्षकों से अनुरोध किया के अभी कुछ दिन किसी बच्चे को पीटा न जाये । अगले चरण में मैंने संगीत , चित्रकला , चुटकुले , कहानी , अन्त्राक्ष्री और ऐसे ही पीरियड सप्ताह में तीन दिन शुरू कर दिए । हमने वहां हर शनिवार को आधा समय साप्ताहिक टेस्ट और आधा समय गीत संगीत इत्यादि के लिए तय कर दिया ।लगभग 30 दिनों में हीं उन बच्चों में रूचि जगी जो पढना तो चाहते थे मगर उबाऊ शिक्षा पद्दति से पढने में रूचि खो चुके थे । अब बारी थी बिगड़े हुए केस का । कक्षा 4 से 6 के जितने बिगड़े हुए केस थे उनकी सूची बनाई , उनके परिवार के सदस्यों से मिला और घर में बच्चों को कैसे सहयोग करना है , इसका निवेदन किया । अब मेरे दुसरे रूप की बारी थी । मैंने हर क्लास में एक छोटा सा टास्क दिया ये कह के कल इसे अवश्य कर के लाना है । ये एक सुखद घटना थी के , प्रयोगों के कारण कई बिगड़े केस में सुधार था मगर कई ऐसे थे जैसे ढाक के तीन पात । मुझे याद है के करीब 12-13 ऐसे बिगड़े केस थे जिन्हें क्लास से बाहर मैंने निकला था और ग्राउंड में ले जा कर पहली बार डंडे से दंड का प्रयोग किया । उस दिन ऑफिस में रखे 3 के तीन डंडे टूट गए थे। पहले भी जब में विद्यालय आता और शोर होने पर एक बार चिल्लाता तो शोर शांत हो जाता था , लेकिन थोड़ी देर बाद पुनः शुरू हो जाता था, मगर इस पिटाई की घटना के बाद कई परिवर्तन हुए । एक तो ये के छुट्टी के बाद जब मै विद्यालय से घर की ओर जाता तो , रास्ते में जो भी बच्चा होता , देख के भाग खड़ा होता । सुबह स्कूल की बगल वाली सड़क पे मेरे आते ही पूरा विद्यालय शांत हो जाता , जब तक मै घूम के स्कूल के मुख्य द्वार पर आता , तब तक सब अनुशासित हो जाते ।
स्कूल की बदली हुई कार्य प्रणाली को देख कर अभिभावक बहुत ही खुश थे । सभी अपने बच्चों को मुझसे ही पढाना चाहते थे , पर मेरा ध्यान अभी बिगड़े हुए केस पर था । मैंने उन्हें विद्यालय के बाद अतिरिक्त कक्षाएं देनी शुरू की । मै जान बुझ कर पढ़ाने के दौरान सबको हँसता, क्यूँ की फिर पिटाई खाने के बाद उन्हें दिल पे ये अहसास हो , क्यूँ की जब हँसाने वाला रुलाता है तो दुःख ज्यादा होता है, चाहे वो बच्चा हो या बड़ा । इसी बीच मैंने 10 वीं के बच्चों का ट्यूशन शुरू कर दिया ।
अब मेरी दिनचर्या कुछ इस प्रकार हो गयी थी , सुबह 5:30 में जगना , 6:15 तक फ्रेश होना , 6:30 से 7:30 एक ट्यूशन लेना , 7:40 स्कूल , फिर 2-6 अलग अलग जगहों पर ट्यूशन , और 7-9:30 10 वीं के बच्चों की क्लास । घर में पानी की व्यवस्था न होने के कारण बहुत परेशानी होती थी । सामने के मकान के बाहर हैंडपंप था , सुबह दो बाल्टी पानी वहां से भर के लाना और स्नान के बाद फिर पानी भर के रखना । रविवार के दिन कपडे धोने में ज्यादा परेशानी होती , क्यूँ की मै अपने निजी कार्य खुले में बाहर करने का आदि नहीं था , न ही किसी और से करवाने का । इसलिए उस दिन कई बाल्टी पानी बार बार ढो के लाना पड़ता । रात को अक्सर लाइट भी चली जाती , बच्चों को गैस के लैंप में पढाना होता । वैसे तो लगभग एक महीने मैंने नवाब सिंह के अनुरोध पर उनके यहाँ ही भोजन किया , और बीच बीच में पडोसी भी खाना दे जाते अगर कुछ अच्छा बनता तो , जैसे पूरी या आलू के पराठे, पर स्वभाव के कारण मैंने खुद से खाना बनाने की ठानी , मै खाने को ही लेकर सही , किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता था । अगले ही दिन मै दादरी गया,वहां से खाने के कुछ बर्तन और जरुरी सामान लेकर आया । मैंने पहले ही जिक्र किया था के मै चीजों को देख कर सीखता था , घर में माँ को खाना बनाते देख के मैंने खुद अब खाना बनाने की सोंची। पहली चीज़ जो मैंने बनाई थी वो थी सोया भेज बिरियानी । इसके बाद से मेरी दिनचर्या में एक चीज़ और शामिल हो गयी , खाना बनाना ।
धीरे धीरे मै सबसे पहले अपने आस पड़ोस , स्कूल के बच्चों और धीरे धीरे पूरे गाँव का चहेता बन गया , चूँकि मै सभी बड़े बूढों का सम्मान करता इसलिए मुझे भी सम्मान मिलता, और सबसे बड़ी बात ये थी के मै उनकी भाषा अच्छी तरह बोलने लगा था , कोई भी ये नहीं जान पाता के मै बिहार से हूँ । चाहे जो भी हो ब्राम्हण होने का सम्मान मैंने वहां जितना पाया उतना कही भी नहीं । मै जाति वादी नहीं हूँ , पर उनमे कुछ ऐसा था जो मेरे लिए सम्मानिये था । धीरे धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी स्कूल में । मुझे रिश्ते भी मिले , नवाब सिंह जैसा भाई , भाभी और मेरे सामने के मकान में रहने वाली बीबी (वहां माँ को इसी नाम से संबोधित करते थे ) वो बिलकुल मेरा ऐसा ख्याल रखती जैसे की माँ ।
वहां के बारे में पहले ही कह चूका हूँ के वहां सुन्दरता हर जगह कूट कूट के भरी थी , और पहले की कुछ घटनाओं के कारण लोग वहां परदेशियों खास कर के बिहारियों पर भरोसा नहीं करते थे , ये और बात है के मेरे जैसा बिहारी अभी तक उन्हें वहां नहीं मिला था जिसने गाँव के सबसे बड़े दुकानदार से आते ही पैंटीन शैम्पू , हेयर जेल , सव्लोन साबुन जैसे ब्रांडेड उत्पादों की मांग की थी , जो उसके पास उपलब्ध नहीं थी वो ग्रेजुएट था , और योग इत्यादि करता था , उससे भी मेरी अच्छी मित्रता हो गयी । वहां की सुबह बहुत सुहानी लगती , मेरा स्वास्थ्य भी अच्छा होता गया ।
वहां के समुदाय में एकता की कमी तो नहीं थी , पर गाँव में एक ही जाति में भी कई समुदाय थे , सब के विभिन्न नाम भी थे । ये नाम उस गाँव में बसने वाले समयानुसार थे , जो पहले आये वो अगेड़े बाद में आये पछोले , कुछ अन्य विधि से भी नाम थे । सभी समुदायों के नवयुवकों से मेरी अच्छी जान पहचान हो चुकी थी , अक्सर शाम को "हवेली" में उनका आना होता , हंसी मजाक भी होता , बातों का आदान प्रदान भी । ताश का एक खेल जिसे "सीप" बोलते थे वो भी खेला जाता था । मेरे से व्यक्तिगत रूप से भी लोग बात करते , एक दुसरे के बारे में भी पर कभी ऐसी नौबत नहीं आई थी के मेरे द्वारा बात इधर से उधर होती ।
इतना व्यस्त होने के बावजूद मै हनुमान मंदिर जाने का और आरती में शामिल होना का कोई भी मौका नहीं गंवाता था। न तो मेरे पास कंप्यूटर था न टीवी इसलिए जब भी खाली समय मिलता कुछ न कुछ आध्यात्मिक पढता या सीखने की कोशिश करता । आज जो भी आध्यात्मिक , या व्यक्तिगत ज्ञान मेरे अन्दर है वो इसी समय की बदौलत है। आज मै सोंचता हूँ के उस वक़्त मै 16 घंटे काम करता था , पर फिर भी खुद के लिए समय था , आज उतना काम तो नहीं पर खुद के लिए वक़्त निकलना बड़ा मुश्किल है बावजूद इसके के आधा काम तो अब टेबल पर बैठे बैठे हो जाता है । पड़ोस में एक गाँव था जो क्षत्रियों का था , वहां के एक बुजुर्ग रामायण के प्रेमी थे , और हर महीने 5-6 रामायणों का आयोजन कराते थे , वो अक्सर हनुमान मंदिर आया करते थे हम 5-6 लोगों का एक ग्रुप बन चुका था जो रामायण पाठ करने आस पास के गाँव में भी जाते । मेरे अन्दर रामायण प्रेम बढ़ता ही जा रहा था और मै एक भी मौका रामायण का मै छोड़ता नहीं था , अक्सर मेरा समय रात 8 के बाद का होता था जो की सुबह के 4-5 बजे तक चलता था , बीच बीच में अक्सर चाय वगैरह का लघु विराम होता । ये समय ऐसा समय होता के कई बार खुद आयोजन करने वाले भी सो जाते थे , चूँकि रामायण अखंड होती थी इसलिए वो खंडित न हो इसकी पूरी जिम्मेवारी हम तीन चार लोगों पर ही होती । मैंने अपने पूरे प्रवास के दौरान लगभग 100 रामायण से भी ज्यादा में हिस्सा लिया होगा ।
मुझे अक्सर लोग हवेली के बारे में डराने की कोशिश करते , पर जब कुछ बड़े बुजुर्गों ने भी ऐसा कुछ वहां होने की बात कही थी तो मैंने इसका अलग ही निदान निकल लिया था ।मेरे अन्दर इतना भरोसा हो गया था ईश्वर पर के मुझे बिलकुल भी डर नहीं लगता था । यद्यपि वहां भूत प्रेतों के हमले और ऐसी कई कहानियां अक्सर सुनने को मिलती थी , तथापि मैंने कभी भी कुछ सामने से अभी तक नहीं देखा था , हाँ ये जरुर मानता था के भूत और आत्माओं का अस्तित्व इश्वर और मानव की तरह है । मैंने अपने बाकि के दोनों कमरों में से एक पूरी तरह भूतों के नाम कर रखा था ,उसका दरवाजा हमेशा बंद करके रखता था । उसमे यदा कदा ही सफाई होती , न उसमे कभी धुप दीप जलाता ।
घरवालों से फ़ोन पर हर तीसरे चौथे दिन बात होती , हर 10 दिनों पर चिट्ठियों का आदान प्रदान होता। मुझे अपनी बहन अपर्णा पर भरोसा था के वो पढ़ाई में ज्यादा नाम करेगी , इसलिए उसकी जो भी जरूरतें होती मै पूरी करने की कोशिश करता था । वो पढाई में अच्छा कर रही थी । मै तो अब ऐसी स्थिति में फंस चुका था के मै फ़िलहाल अपनी पढाई पूरी नहीं कर सकता था । अभी मेरे दिमाग में केवल दो चीजें थी , यहाँ रहकर यहाँ के बच्चों का विकास , खुद के ज्ञान का विकास और बहनों की पढाई ।
विद्यालय बहुत अच्छा चल रहा था । मैंने विज्ञानं पढ़ाने के दौरान अधिक से अधिक प्रयोगों को , जो संभव हो सकते थे वहां बच्चों को दिखाया ,खास करके बायोलॉजी के , पेड़ पौधों सम्बंधित । बिगड़े केस भी सुधार पर थे । महीने में एक बार डंडा चलाना पड़ता जो अगले एक महीने के लिए प्रयाप्त होता । मेरी ज्यादातर क्लास 4थी सी ऊपर की ही थी , पर छोटी क्लास के नन्हें बच्चों के बीच भी मै अक्सर बैठता उन्हें हँसाना , उनके साथ हँसना मुझे बहुत ही अच्छा लगता था । नन्हें बच्चे मुझे बहुत चाहते थे ।
इसी बीच 4 सितम्बर आ गया , जिस दिन मेरा जन्मदिन था । बहुत कम ही लोगों को इसके बारे में पता था । मैंने उस दिन कुछ विशेष नहीं सोंच रखा था , विद्यालय में भी कोई विशेष बधाई नहीं मिली , मै घर के बारे में सोंच रहा था जहाँ अब तक हर जन्म दिन पर केक आता था , और नए कपडे मिलते । सुबह मैंने माँ और बाबा को फ़ोन करके उनका आशीर्वाद ले लिया था । स्कूल के ख़त्म होते ही , पड़ोस का युवक जिसके घर के नल से मै पानी भर के लाता था , स्कूटर ले कर आ गया और मुझे दादरी चलने को कहा । मैंने भी सोचा के चलो थोडा घूम ही लिया जाये । पर रास्ते में पता चला के उसे पता चल गया है के आज मेरा जन्मदिन है और हम पार्टी करने जा रहे थे। हम दादरी से भी दूर निकले , क्यूंकि शिक्षक होने की कुछ मर्यादा थी , बहुत दिनों बाद मैंने बियर पिया और फिल्म देखि , शायद वो मेला या बागी थी । हमें वापस घर आते आते 8 बज गये थे , गाँव में बिजली नहीं थी , जैसे ही हम स्कूटर से मोहल्ले में घुसे , दो छोटे बच्चे "गुरु जी आ गये " बोल के मेरे घर के अन्दर भागे। मै अपने घर के दरवाजे को खोला , मगर वो अन्दर से बंद था , मै कुछ समझा नहीं मैंने दस्तक दी और जैसे ही दरवाजा खुला सामने जो देखा वो अविस्मर्णीय था । लगभग 30-40 नन्हें बच्चे अन्दर थे अहाते में , मेरे दरवाजा खोलते हीं उन्होंने चिल्ला कर "हैप्पी बर्थ डे टू यू " दो तीन बार कहा और बारी बारी से मेरा चरण स्पर्श करने लगे । मै चकित था , अन्दर कई मोमबतियां जल रही थीं , एक बड़ा तिरपाल बिछा था जिसपे वो सारे बच्चे बैठे थे । सामने एक स्टूल रखा था , जिसपर मिल्क केक (खोये की बनी मिठाई ) एक प्लेट में रखी थी , बिलकुल ऐसे जैसे केक रखा जाता है , उसमे कैंडल्स भी लगे थे । मै सारी चीजें देख कर भावुक हो गया , आँखों में ख़ुशी के आंसू थे , मेरी बाँहों में जितने भी बच्चे समां सकते थे , सब को एक साथ पकड़ कर ऑंखें बंद करके मुस्कुरा रहा था , और आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे । मै उठा, पहले केक काटा और बच्चों के लिए चॉकलेट मंगवाई और सब में बाँटा , फिर उनके साथ बैठ कर हंसी मजाक में समय बिताया । बातों के दौरान पता चला के ये सारा कुछ बच्चों ने अपने पैसों से किया था , और लगभग एक घंटे से मेरे इंतज़ार में बैठे थे । उनके विदा होने के बाद मै अपने कमरे में पहुंचा ईश्वर के समक्ष पहुँच कर उनका बहुत बहुत धन्यवाद् किया , ये घटना मेरे लिए ऐसी है जो मै कभी भूल नहीं सकता ।
अक्टूबर के महीने में एक और विचित्र घटना हुई , मै रात में सोया हुआ था तभी मुझे एक पायल जैसी आवाज ने मुझे चौकाया , मैंने घड़ी देखी रात के करीब 1:30 हो रहे थे । वहां की ज्यादा तर महिलाएं पायल पहनती थी , मगर रात के 1:30 बज रहे थे और ये आवाज भी पास से आती महसूस हो रही थी । मै बाहर निकला , पर जैसे ही दरवाजे की कुण्डी नीचे गिराई आवाज बंद । पर मै हाथ में एक छोटा गंगा जल से भरा बर्तन ले कर चारों तरफ देखा , छत पर गया पर कुछ भी नहीं मिला । मै पुनः अपने कमरे में आया , थोड़ी देर बाद लाइट चली गयी , माहौल और भी भयावह हो गया और पुनः वो आवाज बिलकुल ऐसी लगी जैसे मेरे दरवाजे के ठीक बाहर से आ रही हो । मेरे अपनी रीढ़ की हड्डी में कुछ दिमाग की तरफ चलता सा महसूस हुआ , शायद ये डर था। रात भर मै परेशां रहा , मेरी नीद पूरी नहीं हुई थी और सुबह मै बहुत गुस्से में था । अगले दिन सुबह सुबह हनुमान मंदिर पहुंचा , वहां से गंगा जल और उनपे चढ़े हुए कुछ फूल उठा कर लाया , सीधा अपने घर पहुंचा और उस रूम में घुसा जिसे मैं बंद रखता था , मैंने हाथ में गंगा जल और फूल लेकर तेज़ आवाज़ में कहा " मै यहाँ हमेशा के लिए रहने नहीं आया हूँ , और मैंने यदि यहाँ कोई है तो उनके लिए अलग से कमरा दे रखा है , मैंने कभी भी उन्हें तंग करने की कोशिश नहीं की है , और यदि मुझे आगे से तंग करने की कोशिश की तो गंगा जल की कसम है , मै तो जाऊंगा ही , पर तुम्हें सबक सीखा के जाऊंगा " और ये कह कर मैंने गंगा जल छिड़कने को हाथ उठाया पर फिर कुछ सोंच कर शांत हो गया । इस घटना के बाद मुझे कभी भी कुछ महसूस नहीं हुआ पर मेरे कुछ रिश्तेदार , मेरे पिता जो बाद में यहाँ आये सब को महसूस हुआ जो आगे जिक्र में आयेगा ।
नवम्बर का महिना चल रहा था , अब मेरा ध्यान बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाने के ऊपर था । मैंने तय किया के 26 जनवरी को मै स्टेज शो करूँगा बच्चों का , क्यूँ की विद्यालय में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था । मै अब इसकी तय्यारी में जुट गया ।
ट्रेन सुबह १०:३० के आस पास पटना पहुंची , अपनी मिट्टी की खुशबू , आबो हवा में अपने पन , अपने बचपन का अहसास सब महसूस हुआ । मैंने घर आने की अपनी निश्चित तारीख घर वालों को नहीं बताई थी , मैं उन्हें अचानक से जाकर उन्हें अचंभित करना चाहता था । स्टेशन से बाहर निकलते हीं हनुमान मंदिर को देखा , जिसमे लगी ईटों में मेरा भी श्रम दान था , अभिवादन करके मैं घर की तरफ चला । रास्ते में चारों तरफ नज़रें घुमा कर देखता , देखता के क्या क्या बदलाव आया है यहाँ इतने दिनों में । मगर मुझे कोई खास बदलाव नज़र नहीं आया । मैं घर पहुँच कर दबे पाँव आकर पलंग के अन्दर घुस गया , एक एक करके सब को surprise दिया ..बड़ा मज़ा आया । दो चार दिन वहां की बातें घर में और दोस्तों के साथ बाँटने में हीं बीत गये । मैं अक्सर दिनभर इधर उधर घूम कर आता और सोने के वक़्त चिंतन करता के मैं अब क्या करूँ ? एक तरफ परिवार की मुश्किलें , मेरी पढाई मेरा कैरिएर , दूसरी तरफ मेरे अन्दर बैठा एक दूसरा इन्सान जो इस धरती पर आने का अपना कारण ढूंढ़ रहा था और देश और समाज के लिए अपनी आत्म संतुष्टि के लिए कुछ करना चाहता था । मेरे लिए पैसा कमाना एक मात्र लक्ष्य नहीं था ।
बिहार का माहौल उस वक़्त और भी बिगड़ चुका था । चारों तरफ भय , अराजकता का ही माहौल व्याप्त था , एक खास वर्ग के लोगों का बोलबाला था । पुलिस और प्रशासन जैसे गुलाम बने हुए थे । वहां से बड़े कारोबारियों का पलायन जारी था , नए काम में कोई निवेश नहीं करना चाहता था । वहां प्राइवेट जॉब के लिए भी , रिश्वत की मांग थी । मेरा निजी काम जो मैंने अपने मित्र के साथ किया था , उसके पैसे भी पुरे नहीं मिले थे मुझे , मैं लगातार उसके संपर्क में रहता और जैसे तैसे वसूली करता , और अपना और घर का खर्च चलने की कोशिश करता । ऐसा करते हुए लगभग 1 महीने बीत गये , मगर न तो मैं अपना कोई काम हीं शुरू कर पाया न हीं कोई जॉब ही हासिल कर पाया। दोस्तों में भी केवल मैं ही फ़िलहाल ऐसा था जिसके पास इतना अनुभव था और संघर्ष भी । मैं उनके बीच जब भी होता तो उन्हें अच्छा लगता , फिल्म देखना हो या पार्टी या कोई अन्य आयोजन मैं उसके बीच एक प्रमुख की भूमिका निभाता , मुझे विश्वास था के वो मेरे सच्चे और अच्छे दोस्त हैं ।मैं पटना में भी विभिन्न आयु वर्गों के लोगों का मित्र था , और कई तो ऐसे थे जिनसे मेरा शाम को मिलना रोज़ होता था । सब से मेरी बात होती मगर कोई भी कम मिलना मुश्किल सा लग रहा था , परिस्थितियां पुनः विपरीत होती जा रही थीं ।कुछ काम मिले भी , जिसमे पैसे तो थे , मगर या तो वो गैर कानूनी थे , या फिर समाज के हित में नहीं थे । इसलिए मैंने ऐसे कार्यों को मना कर दिया , आज मुझे लगता है के अगर मैं आस्तिक न बना होता तो ऐसे ही किसी काम में संलिप्त होता । किसी शहर का कोई दबंग, गुंडा होता , या किसी पुलिस की गोली का शिकार , कौन जाने ?
उधर जुनपत से , स्कूल के मालिक नवाब सिंह और प्रिंसिपल का बार बार फ़ोन आ रहा था मेरे वहां वापस आने को लेकर । मैंने वहां 3 - 4 महीने में जो अपनी पहचान बनाई थी , उसका काफी प्रभाव पड़ा था , और मेरे वापस आने के बाद मेरी चर्चा वहां होती थी । लोग मुझे वहां वापस चाहते थे । मेरे अन्दर का सकून, मेरे बाहरी ताम झाम पर हावी हो गया । मैंने सोंच लिया के , कुछ दिन मैं जुनपत में रह कर ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा देने का काम करूँगा । दरअसल ये सब उस अध्यात्म ज्ञान का , या यूँ कहें के मेरे ऊपर अध्यात्मिक विचारों का इतना गहरा प्रभाव पड़ा था , के मैं सोंचता के अगर इन्सान किसी भी कार्य को मन लगा कर करे तो उसी में सफलता उसकी निश्चित है । वैसे भी पटना में 1999 - 2000 में 4-5 हज़ार की कमाई तो इंजिनियर को भी नहीं थी , मैंने हिसाब लगाया , और सोंचा के वहीँ कुछ तकनिकी शिक्षा लूँगा । मेरे इस निर्णय से मुझे कई फायदे मिलने थे , एक तो ब्राह्मन होने का कर्म , शिक्षा लेना और देना पूर्ण होता , देश की सेवा होती , शिक्षण करने का एक नया अनुभव प्राप्त होता , वहां रहकर मैं अपने अध्यात्म ज्ञान को भी बढ़ा सकता था । कई पहलुओं पर गौर करने के बाद मैंने आखिर में जुनपत वापस जाने का फैसला कर लिया । मैंने घर वालों से बात की और जाने को तैयार हो गया । मैंने सभी को सुचना दे दी के मैं आ रहा हूँ । पंडित जी भी खुश हो गये थे , उनके यहाँ घर का कम करने वाला एक आदमी कम पड़ गया था , अब मै जा रहा था तो उन्हें राहत मिलने की पूरी उम्मीद थी ।
मार्च सन 2000 को मैं वापस जुनपत आ चुका था ।जुनपत पहुँचने पर मैंने स्कूल ज्वाइन कर लिया , और पहले जिन परिवारों में मैं ट्यूशन पढाता था उन्हें भी पकड़ लिया । मैंने भाई से बात की के मुझे अब पंडित जी के यहाँ नहीं रहना है। भाई ने मुझे आश्वाशन दिया और हम शाम को नवाब सिंह के घर पहुंचे , मैंने अपनी परेशानी उसे बताई । उनका एक पुराना मकान था जो वही गाँव के बीचों बीच था , उसमे तीन कमरे थे मगर वो पिछले 10-15 सालों से बंद पड़ा था। आस पड़ोस की महिलाएं और बच्चे रात को उस मकान के पास से अकेले नहीं गुज़रते थे । कई तरह की अफवाह थी , के वहां भूत प्रेतों की छाया है । सब बातें मुझे बताई गयी , मैंने उसी घर में रहने का फैसला किया ।
अगले दिन सुबह अपने दो चार बड़े छात्रों को ले कर पुराने मकान पंहुचा जिसे लोग "हवेली" बोलते थे । दरवाजा बमुश्किल खुल पाया , क्यूँ की अन्दर की ओर से बहुत सारे जंगल झाड उग आये थे । हम अन्दर पहुंचे , हमारे हाथ में जंगल झाड को काटने के हथियार थे । मकान की बनावट साधारण सी थी , एक साथ तीन कमरे , ऊपर पक्की छत , एक जीना, आगे बड़ा सा अहाता उसमे एक नीम का पेड़ जो बड़ा था, आंगन भी कच्चा था और कमरे का फर्श भी । आंगन में भांग के 6-7 फीट बड़े पेड़ जम चुके थे , बहुत सारा जंगल भी , हमें साफ सफाई करते करते शाम हो गयी , 2 - 3 बड़े सांप और लगभग 8-10 बिच्छुओं का सफाया हुआ और एक कोने में उनका दफना के अंतिम संस्कार । सब थक चुके थे हम उस दिन वापस चले आये । अगले दिन रूम की सफाई हुई , गोबर और मिट्टी से तीनों कमरों को लीपा गया । पड़ोस से एक बड़ी खाट मंगाई गयी , मैंने बीच वाले कमरे में रहने का फैसला किया था , उसकी पुताई की गयी । मैंने पूजा की और वहां रहना शुरू कर दिया । वहां दो चीजों की कमी थी , न तो उस मकान में टॉयलेट था , न ही उसमे हैण्ड पंप । वहां केवल शाम को लाइट आती थी । शाम को लाइट आ गयी । आस पड़ोस के लोग खुश थे के मैंने फिर से उस घर को जिन्दा किया । शाम को पड़ोस से खाना आ गया । मै बरसों बाद खाट पर सोया, अकेला , मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा वहां पर, बस एक नया अहसास था , सोंच रहा था अपने रूम को जहाँ मैं सोया करता था । मुझे अपने बड़े वाले आईने की बहुत याद आ रही थी ।
मेरा स्कूल में आना कुछ ऐसा था जैसे के किसी नए सिस्टम का आना। मैंने स्कूल में आते ही प्रिंसिपल साहब से विचार विमर्श करके सबसे पहले अध्यापकों की नियमावली बनाई । स्कूल का रुटीन बनाया , पहले वहां पढ़ाने की व्यवस्था ऐसी थी के जो जहाँ बैठता घंटो पढाता रहता । उस वक़्त स्कूल 7 वीं क्लास तक ही था । मैथ्स में तो फिर भी मेरा भाई पढ़ा लेता था , पर इंग्लिश तो 4 थी कक्षा का भी और कोई पढ़ा नहीं पाता था । मैंने धीरे धीरे अनुशासन बनाना शुरू किया । मैंने अपने पुराने शिक्षकों से ही बच्चों को नियंत्रित करने की कला की सीख ली , उनका गंभीर होना , आँखों से , बातों से मारना। वैसे भी मै पिछले 6 महीनों से बच्चों को पढ़ा रहा था , धीरे धीरे मै अपनी खुद की भी विशेषता बनाता जा रहा था । स्कूल में मैंने 1 सप्ताह बड़े प्यार से बच्चों को पढाया , समझा कर दुलार से , और मै वार्निंग भी देता जाता के मै आपका मित्र जरुर हूँ पर यदि बताये हुए समय के अन्दर कोई सुधरा नहीं तो ठीक नहीं होगा । स्कूल में बच्चे तो वही थे जिनका दिमाग पढाई में लगता ही नहीं था , एक से एक बिगड़े हुए केस , वजह वहां की ग्रामीण संस्कृति और 75% लोगों का अभी भी ये मानना के दो चार दिन स्कूल न जाके घर या खेत का काम उनसे करा लेंगे तो कुछ बिगड़ेगा नहीं ।
मैं बच्चों को पीटने के बिलकुल भी हक़ में नहीं था , पर वहां का माहौल अब भी ऐसा था के घर वाले खुद जानते थे के अगर उन्हें सजा न दी गयी तो वो बिलकुल भी नहीं पढ़ पाएंगे इस लिए वहां के सरकारी और प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं के ऑफिस में बजाप्ता 5-6 कट्ठे (एक प्रकार का पौधा जिसकी छड़ी लचीली और बहुत मजबूत होती थी ) की छड़ियाँ रखी होती थी । शिक्षक खुल के पीटते बच्चों को , और बिगड़े हुए केस रोज़ रोज़ की मार खा के , ढीट बन चुके थे । मुझे बच्चों के शरीर पर नहीं उनके दिमाग पर चोट करनी थी , ताके वो पढाई के महत्व को समझें और पढ़ें । मैंने इसके लिए एक नुस्खा निकाला , सुबह प्रार्थना के बाद PT करवानी शुरू की , इसके बाद प्रतिदिन सभी बच्चों को वहीं हममे से एक टीचर उन्हें , पढाई , अनुशासन और जीवन के मूल्यों के बारे में बताता , कहानी इत्यादि सुनाता । मैंने शिक्षकों से अनुरोध किया के अभी कुछ दिन किसी बच्चे को पीटा न जाये । अगले चरण में मैंने संगीत , चित्रकला , चुटकुले , कहानी , अन्त्राक्ष्री और ऐसे ही पीरियड सप्ताह में तीन दिन शुरू कर दिए । हमने वहां हर शनिवार को आधा समय साप्ताहिक टेस्ट और आधा समय गीत संगीत इत्यादि के लिए तय कर दिया ।लगभग 30 दिनों में हीं उन बच्चों में रूचि जगी जो पढना तो चाहते थे मगर उबाऊ शिक्षा पद्दति से पढने में रूचि खो चुके थे । अब बारी थी बिगड़े हुए केस का । कक्षा 4 से 6 के जितने बिगड़े हुए केस थे उनकी सूची बनाई , उनके परिवार के सदस्यों से मिला और घर में बच्चों को कैसे सहयोग करना है , इसका निवेदन किया । अब मेरे दुसरे रूप की बारी थी । मैंने हर क्लास में एक छोटा सा टास्क दिया ये कह के कल इसे अवश्य कर के लाना है । ये एक सुखद घटना थी के , प्रयोगों के कारण कई बिगड़े केस में सुधार था मगर कई ऐसे थे जैसे ढाक के तीन पात । मुझे याद है के करीब 12-13 ऐसे बिगड़े केस थे जिन्हें क्लास से बाहर मैंने निकला था और ग्राउंड में ले जा कर पहली बार डंडे से दंड का प्रयोग किया । उस दिन ऑफिस में रखे 3 के तीन डंडे टूट गए थे। पहले भी जब में विद्यालय आता और शोर होने पर एक बार चिल्लाता तो शोर शांत हो जाता था , लेकिन थोड़ी देर बाद पुनः शुरू हो जाता था, मगर इस पिटाई की घटना के बाद कई परिवर्तन हुए । एक तो ये के छुट्टी के बाद जब मै विद्यालय से घर की ओर जाता तो , रास्ते में जो भी बच्चा होता , देख के भाग खड़ा होता । सुबह स्कूल की बगल वाली सड़क पे मेरे आते ही पूरा विद्यालय शांत हो जाता , जब तक मै घूम के स्कूल के मुख्य द्वार पर आता , तब तक सब अनुशासित हो जाते ।
स्कूल की बदली हुई कार्य प्रणाली को देख कर अभिभावक बहुत ही खुश थे । सभी अपने बच्चों को मुझसे ही पढाना चाहते थे , पर मेरा ध्यान अभी बिगड़े हुए केस पर था । मैंने उन्हें विद्यालय के बाद अतिरिक्त कक्षाएं देनी शुरू की । मै जान बुझ कर पढ़ाने के दौरान सबको हँसता, क्यूँ की फिर पिटाई खाने के बाद उन्हें दिल पे ये अहसास हो , क्यूँ की जब हँसाने वाला रुलाता है तो दुःख ज्यादा होता है, चाहे वो बच्चा हो या बड़ा । इसी बीच मैंने 10 वीं के बच्चों का ट्यूशन शुरू कर दिया ।
अब मेरी दिनचर्या कुछ इस प्रकार हो गयी थी , सुबह 5:30 में जगना , 6:15 तक फ्रेश होना , 6:30 से 7:30 एक ट्यूशन लेना , 7:40 स्कूल , फिर 2-6 अलग अलग जगहों पर ट्यूशन , और 7-9:30 10 वीं के बच्चों की क्लास । घर में पानी की व्यवस्था न होने के कारण बहुत परेशानी होती थी । सामने के मकान के बाहर हैंडपंप था , सुबह दो बाल्टी पानी वहां से भर के लाना और स्नान के बाद फिर पानी भर के रखना । रविवार के दिन कपडे धोने में ज्यादा परेशानी होती , क्यूँ की मै अपने निजी कार्य खुले में बाहर करने का आदि नहीं था , न ही किसी और से करवाने का । इसलिए उस दिन कई बाल्टी पानी बार बार ढो के लाना पड़ता । रात को अक्सर लाइट भी चली जाती , बच्चों को गैस के लैंप में पढाना होता । वैसे तो लगभग एक महीने मैंने नवाब सिंह के अनुरोध पर उनके यहाँ ही भोजन किया , और बीच बीच में पडोसी भी खाना दे जाते अगर कुछ अच्छा बनता तो , जैसे पूरी या आलू के पराठे, पर स्वभाव के कारण मैंने खुद से खाना बनाने की ठानी , मै खाने को ही लेकर सही , किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता था । अगले ही दिन मै दादरी गया,वहां से खाने के कुछ बर्तन और जरुरी सामान लेकर आया । मैंने पहले ही जिक्र किया था के मै चीजों को देख कर सीखता था , घर में माँ को खाना बनाते देख के मैंने खुद अब खाना बनाने की सोंची। पहली चीज़ जो मैंने बनाई थी वो थी सोया भेज बिरियानी । इसके बाद से मेरी दिनचर्या में एक चीज़ और शामिल हो गयी , खाना बनाना ।
धीरे धीरे मै सबसे पहले अपने आस पड़ोस , स्कूल के बच्चों और धीरे धीरे पूरे गाँव का चहेता बन गया , चूँकि मै सभी बड़े बूढों का सम्मान करता इसलिए मुझे भी सम्मान मिलता, और सबसे बड़ी बात ये थी के मै उनकी भाषा अच्छी तरह बोलने लगा था , कोई भी ये नहीं जान पाता के मै बिहार से हूँ । चाहे जो भी हो ब्राम्हण होने का सम्मान मैंने वहां जितना पाया उतना कही भी नहीं । मै जाति वादी नहीं हूँ , पर उनमे कुछ ऐसा था जो मेरे लिए सम्मानिये था । धीरे धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी स्कूल में । मुझे रिश्ते भी मिले , नवाब सिंह जैसा भाई , भाभी और मेरे सामने के मकान में रहने वाली बीबी (वहां माँ को इसी नाम से संबोधित करते थे ) वो बिलकुल मेरा ऐसा ख्याल रखती जैसे की माँ ।
वहां के बारे में पहले ही कह चूका हूँ के वहां सुन्दरता हर जगह कूट कूट के भरी थी , और पहले की कुछ घटनाओं के कारण लोग वहां परदेशियों खास कर के बिहारियों पर भरोसा नहीं करते थे , ये और बात है के मेरे जैसा बिहारी अभी तक उन्हें वहां नहीं मिला था जिसने गाँव के सबसे बड़े दुकानदार से आते ही पैंटीन शैम्पू , हेयर जेल , सव्लोन साबुन जैसे ब्रांडेड उत्पादों की मांग की थी , जो उसके पास उपलब्ध नहीं थी वो ग्रेजुएट था , और योग इत्यादि करता था , उससे भी मेरी अच्छी मित्रता हो गयी । वहां की सुबह बहुत सुहानी लगती , मेरा स्वास्थ्य भी अच्छा होता गया ।
वहां के समुदाय में एकता की कमी तो नहीं थी , पर गाँव में एक ही जाति में भी कई समुदाय थे , सब के विभिन्न नाम भी थे । ये नाम उस गाँव में बसने वाले समयानुसार थे , जो पहले आये वो अगेड़े बाद में आये पछोले , कुछ अन्य विधि से भी नाम थे । सभी समुदायों के नवयुवकों से मेरी अच्छी जान पहचान हो चुकी थी , अक्सर शाम को "हवेली" में उनका आना होता , हंसी मजाक भी होता , बातों का आदान प्रदान भी । ताश का एक खेल जिसे "सीप" बोलते थे वो भी खेला जाता था । मेरे से व्यक्तिगत रूप से भी लोग बात करते , एक दुसरे के बारे में भी पर कभी ऐसी नौबत नहीं आई थी के मेरे द्वारा बात इधर से उधर होती ।
इतना व्यस्त होने के बावजूद मै हनुमान मंदिर जाने का और आरती में शामिल होना का कोई भी मौका नहीं गंवाता था। न तो मेरे पास कंप्यूटर था न टीवी इसलिए जब भी खाली समय मिलता कुछ न कुछ आध्यात्मिक पढता या सीखने की कोशिश करता । आज जो भी आध्यात्मिक , या व्यक्तिगत ज्ञान मेरे अन्दर है वो इसी समय की बदौलत है। आज मै सोंचता हूँ के उस वक़्त मै 16 घंटे काम करता था , पर फिर भी खुद के लिए समय था , आज उतना काम तो नहीं पर खुद के लिए वक़्त निकलना बड़ा मुश्किल है बावजूद इसके के आधा काम तो अब टेबल पर बैठे बैठे हो जाता है । पड़ोस में एक गाँव था जो क्षत्रियों का था , वहां के एक बुजुर्ग रामायण के प्रेमी थे , और हर महीने 5-6 रामायणों का आयोजन कराते थे , वो अक्सर हनुमान मंदिर आया करते थे हम 5-6 लोगों का एक ग्रुप बन चुका था जो रामायण पाठ करने आस पास के गाँव में भी जाते । मेरे अन्दर रामायण प्रेम बढ़ता ही जा रहा था और मै एक भी मौका रामायण का मै छोड़ता नहीं था , अक्सर मेरा समय रात 8 के बाद का होता था जो की सुबह के 4-5 बजे तक चलता था , बीच बीच में अक्सर चाय वगैरह का लघु विराम होता । ये समय ऐसा समय होता के कई बार खुद आयोजन करने वाले भी सो जाते थे , चूँकि रामायण अखंड होती थी इसलिए वो खंडित न हो इसकी पूरी जिम्मेवारी हम तीन चार लोगों पर ही होती । मैंने अपने पूरे प्रवास के दौरान लगभग 100 रामायण से भी ज्यादा में हिस्सा लिया होगा ।
मुझे अक्सर लोग हवेली के बारे में डराने की कोशिश करते , पर जब कुछ बड़े बुजुर्गों ने भी ऐसा कुछ वहां होने की बात कही थी तो मैंने इसका अलग ही निदान निकल लिया था ।मेरे अन्दर इतना भरोसा हो गया था ईश्वर पर के मुझे बिलकुल भी डर नहीं लगता था । यद्यपि वहां भूत प्रेतों के हमले और ऐसी कई कहानियां अक्सर सुनने को मिलती थी , तथापि मैंने कभी भी कुछ सामने से अभी तक नहीं देखा था , हाँ ये जरुर मानता था के भूत और आत्माओं का अस्तित्व इश्वर और मानव की तरह है । मैंने अपने बाकि के दोनों कमरों में से एक पूरी तरह भूतों के नाम कर रखा था ,उसका दरवाजा हमेशा बंद करके रखता था । उसमे यदा कदा ही सफाई होती , न उसमे कभी धुप दीप जलाता ।
घरवालों से फ़ोन पर हर तीसरे चौथे दिन बात होती , हर 10 दिनों पर चिट्ठियों का आदान प्रदान होता। मुझे अपनी बहन अपर्णा पर भरोसा था के वो पढ़ाई में ज्यादा नाम करेगी , इसलिए उसकी जो भी जरूरतें होती मै पूरी करने की कोशिश करता था । वो पढाई में अच्छा कर रही थी । मै तो अब ऐसी स्थिति में फंस चुका था के मै फ़िलहाल अपनी पढाई पूरी नहीं कर सकता था । अभी मेरे दिमाग में केवल दो चीजें थी , यहाँ रहकर यहाँ के बच्चों का विकास , खुद के ज्ञान का विकास और बहनों की पढाई ।
विद्यालय बहुत अच्छा चल रहा था । मैंने विज्ञानं पढ़ाने के दौरान अधिक से अधिक प्रयोगों को , जो संभव हो सकते थे वहां बच्चों को दिखाया ,खास करके बायोलॉजी के , पेड़ पौधों सम्बंधित । बिगड़े केस भी सुधार पर थे । महीने में एक बार डंडा चलाना पड़ता जो अगले एक महीने के लिए प्रयाप्त होता । मेरी ज्यादातर क्लास 4थी सी ऊपर की ही थी , पर छोटी क्लास के नन्हें बच्चों के बीच भी मै अक्सर बैठता उन्हें हँसाना , उनके साथ हँसना मुझे बहुत ही अच्छा लगता था । नन्हें बच्चे मुझे बहुत चाहते थे ।
इसी बीच 4 सितम्बर आ गया , जिस दिन मेरा जन्मदिन था । बहुत कम ही लोगों को इसके बारे में पता था । मैंने उस दिन कुछ विशेष नहीं सोंच रखा था , विद्यालय में भी कोई विशेष बधाई नहीं मिली , मै घर के बारे में सोंच रहा था जहाँ अब तक हर जन्म दिन पर केक आता था , और नए कपडे मिलते । सुबह मैंने माँ और बाबा को फ़ोन करके उनका आशीर्वाद ले लिया था । स्कूल के ख़त्म होते ही , पड़ोस का युवक जिसके घर के नल से मै पानी भर के लाता था , स्कूटर ले कर आ गया और मुझे दादरी चलने को कहा । मैंने भी सोचा के चलो थोडा घूम ही लिया जाये । पर रास्ते में पता चला के उसे पता चल गया है के आज मेरा जन्मदिन है और हम पार्टी करने जा रहे थे। हम दादरी से भी दूर निकले , क्यूंकि शिक्षक होने की कुछ मर्यादा थी , बहुत दिनों बाद मैंने बियर पिया और फिल्म देखि , शायद वो मेला या बागी थी । हमें वापस घर आते आते 8 बज गये थे , गाँव में बिजली नहीं थी , जैसे ही हम स्कूटर से मोहल्ले में घुसे , दो छोटे बच्चे "गुरु जी आ गये " बोल के मेरे घर के अन्दर भागे। मै अपने घर के दरवाजे को खोला , मगर वो अन्दर से बंद था , मै कुछ समझा नहीं मैंने दस्तक दी और जैसे ही दरवाजा खुला सामने जो देखा वो अविस्मर्णीय था । लगभग 30-40 नन्हें बच्चे अन्दर थे अहाते में , मेरे दरवाजा खोलते हीं उन्होंने चिल्ला कर "हैप्पी बर्थ डे टू यू " दो तीन बार कहा और बारी बारी से मेरा चरण स्पर्श करने लगे । मै चकित था , अन्दर कई मोमबतियां जल रही थीं , एक बड़ा तिरपाल बिछा था जिसपे वो सारे बच्चे बैठे थे । सामने एक स्टूल रखा था , जिसपर मिल्क केक (खोये की बनी मिठाई ) एक प्लेट में रखी थी , बिलकुल ऐसे जैसे केक रखा जाता है , उसमे कैंडल्स भी लगे थे । मै सारी चीजें देख कर भावुक हो गया , आँखों में ख़ुशी के आंसू थे , मेरी बाँहों में जितने भी बच्चे समां सकते थे , सब को एक साथ पकड़ कर ऑंखें बंद करके मुस्कुरा रहा था , और आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे । मै उठा, पहले केक काटा और बच्चों के लिए चॉकलेट मंगवाई और सब में बाँटा , फिर उनके साथ बैठ कर हंसी मजाक में समय बिताया । बातों के दौरान पता चला के ये सारा कुछ बच्चों ने अपने पैसों से किया था , और लगभग एक घंटे से मेरे इंतज़ार में बैठे थे । उनके विदा होने के बाद मै अपने कमरे में पहुंचा ईश्वर के समक्ष पहुँच कर उनका बहुत बहुत धन्यवाद् किया , ये घटना मेरे लिए ऐसी है जो मै कभी भूल नहीं सकता ।
अक्टूबर के महीने में एक और विचित्र घटना हुई , मै रात में सोया हुआ था तभी मुझे एक पायल जैसी आवाज ने मुझे चौकाया , मैंने घड़ी देखी रात के करीब 1:30 हो रहे थे । वहां की ज्यादा तर महिलाएं पायल पहनती थी , मगर रात के 1:30 बज रहे थे और ये आवाज भी पास से आती महसूस हो रही थी । मै बाहर निकला , पर जैसे ही दरवाजे की कुण्डी नीचे गिराई आवाज बंद । पर मै हाथ में एक छोटा गंगा जल से भरा बर्तन ले कर चारों तरफ देखा , छत पर गया पर कुछ भी नहीं मिला । मै पुनः अपने कमरे में आया , थोड़ी देर बाद लाइट चली गयी , माहौल और भी भयावह हो गया और पुनः वो आवाज बिलकुल ऐसी लगी जैसे मेरे दरवाजे के ठीक बाहर से आ रही हो । मेरे अपनी रीढ़ की हड्डी में कुछ दिमाग की तरफ चलता सा महसूस हुआ , शायद ये डर था। रात भर मै परेशां रहा , मेरी नीद पूरी नहीं हुई थी और सुबह मै बहुत गुस्से में था । अगले दिन सुबह सुबह हनुमान मंदिर पहुंचा , वहां से गंगा जल और उनपे चढ़े हुए कुछ फूल उठा कर लाया , सीधा अपने घर पहुंचा और उस रूम में घुसा जिसे मैं बंद रखता था , मैंने हाथ में गंगा जल और फूल लेकर तेज़ आवाज़ में कहा " मै यहाँ हमेशा के लिए रहने नहीं आया हूँ , और मैंने यदि यहाँ कोई है तो उनके लिए अलग से कमरा दे रखा है , मैंने कभी भी उन्हें तंग करने की कोशिश नहीं की है , और यदि मुझे आगे से तंग करने की कोशिश की तो गंगा जल की कसम है , मै तो जाऊंगा ही , पर तुम्हें सबक सीखा के जाऊंगा " और ये कह कर मैंने गंगा जल छिड़कने को हाथ उठाया पर फिर कुछ सोंच कर शांत हो गया । इस घटना के बाद मुझे कभी भी कुछ महसूस नहीं हुआ पर मेरे कुछ रिश्तेदार , मेरे पिता जो बाद में यहाँ आये सब को महसूस हुआ जो आगे जिक्र में आयेगा ।
नवम्बर का महिना चल रहा था , अब मेरा ध्यान बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाने के ऊपर था । मैंने तय किया के 26 जनवरी को मै स्टेज शो करूँगा बच्चों का , क्यूँ की विद्यालय में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था । मै अब इसकी तय्यारी में जुट गया ।
himmat se insaan apni taqdeer badal hi deta hai...aapki ye kahani padh kar himmat aur dukhon se paar pane ka honsla milta hai ravi sir
जवाब देंहटाएंबहुत ही गजब रवि भाई ...
जवाब देंहटाएंक्या लिखूँ , शब्द नहीं मिल रहे , बस इतना ही की क्या गजब हवेली मे दिन गुज़ारे और बच्चों का लाया मिल्क केक का नाम पढ़ कर मुंह मे पानी आ गया :)
वहा क्या बात है 🤞
जवाब देंहटाएं