हर इन्सान के जीवन में दो तीन ऐसे मौके आते हैं , या यूँ कहें के , समय का एक ऐसा अन्तराल आता है जिसमे जीवन , उसकी क्षमताओं , उसके विवेक और उसके प्राप्त संस्कारों की परीक्षा लेता है । कई बार इन्सान अपने अन्दर छिपी विशेषताओं के बारे में अनभिज्ञ होता है और कई बार इन्सान के अन्दर में छिपी यही विशेषताएं , उनके जीवन में आगे चल कर उनकी पहचान बनाने में सहायक होती हैं , ये उन विशेषताओं से अलग होती हैं जो उसने किताबें पढ़ कर और परीक्षा पास करके हासिल की गयी हों ।ये तो वो विशेषताएं हैं जो पता नहीं कब से उनके अन्दर ही थीं पर अभी तक उभर कर बाहर नहीं आ पाई थीं ।
इसी बीच पिता जी को कुछ हृदय सम्बंधित समस्या हुई , और डॉक्टर के अनुसार उन्हें किसी पहाड़ी स्थल पर कुछ दिनों रहने का सुझाव डॉक्टर ने दिया । चूकिं यहाँ का वातावरण काफी अच्छा था और समुद्र से काफी ऊंचाई पर भी , अतः मैंने फैसला किया के पिता जी को यही बुला लूँ । हम कभी ऐसे अकेले साथ नहीं रहे थे , पर मेरे पास इससे अच्छा कोई रास्ता नहीं था । मैंने पिता जी को अपने पास बुला लिया । यहाँ आने के बाद उन्हें प्रारंभिक परेशानियाँ हुईं , सबसे ज्यादा खाने को लेकर क्यूँ की यहाँ खाने की संस्कृति हमारे यहाँ से पूर्णतः भिन्न थी । अक्सर हम दोनों मिल कर खाना बनाते थे । परन्तु मैं किसी भी तरीके से उन्हें ठीक देखना चाहता था , जहाँ तक हो सकता था मै उनका ख्याल रखने की कोशिश करता था ।
मेरा लक्ष्य अब बच्चों के आत्मविश्वाश के विकास पर था । इसके लिए उनका भीड़ के सामने अपनी क्षमता दिखानी थी , ये दिखाना था के वो किसी से कम नहीं हैं । कई बार ऐसा देखा था के जो बच्चे गाँव से बाहर पढने जाते थे , वो 15 अगस्त या 26 जनवरी के समय तय्यारिओं को लेकर ज्यादा उत्साहित रहते । एक प्रतिस्पर्धा सी थी , बच्चों में भी और साथ ही साथ अभिवावकों में भी । शहरों में पढ़ाने वाले अभिभावक खुद को ज्यादा गौरान्वित महसूस करते । मुझे ये प्रतिस्पर्धा और बढ़नी थी , मुझे ये दिखाना था के बच्चे यही रहकर सब कर सकते हैं , उन्हे अच्छे नेत्तृत्व और समाज के सहयोग की आवश्कता थी ।
बच्चों के लिए मैंने प्रोग्राम बनाने की प्रक्रिया पर काम करना शुरू कर दिया । मेरे द्वारा पहले स्टेज पर किये गये काम का अनुभव मेरे लिए प्रोग्राम बनाने में बड़ा मददगार रहा । मैंने इस प्रोग्राम को तीन भागों में बाँटा , एक भाग में भाषण , कवितायेँ , वंदना एवं गाने थे , दूसरा भाग था नाटक खेलना , तीसरा भाग था रिकॉर्डिंग डांस । दूसरा एवं तीसरा भाग वहां के बच्चों के लिए बिलकुल ही नया था । न तो पहले कभी किसी ने अभिनय किया था स्टेज पर , और न ही कभी रिकॉर्डिंग डांस । इन दोनों भागों की पूर्ण जिम्मेवारी मेरी थी , मज़े की बात ये थी के मैंने न तो कभी किसी नाटक का स्क्रिप्ट लिखा था , न ही कभी किसी ग्रुप डांस को निर्देशित किया था । वहां की स्थिति को देखते हुए मैंने स्वयं ही स्क्रिप्ट लिखने का निर्णय लिया ताके संवाद की भाषा छोटी और सरल हो जिससे बच्चों को वो ठीक ढंग से याद हो सकें और संवाद बोलते समय उन्हें संवाद याद करके बोलने से ज्यादा अभिनय पर ध्यान केन्द्रित करने में सुविधा हो ।
अगले दिन से ही मैं अपने काम में जुट गया। स्क्रिप्ट लिखने से पहले अभिनय की संभावनाओं को तलाशने का काम मुझे पहले करना था , ताके उपलब्ध पात्रों के अनुसार मै पटकथा लिख सकूँ । तीन चार दिनों की मेहनत के बाद मुझे अपने पात्र मिलते नज़र आये । मैंने एक पटकथा लिखनी शुरू की , जिसका सारांश था के झूठे आरोप में नरम दल के गांधीवादियों को क्रान्तिकारी और लुटेरे सिद्ध करके अंग्रेजी सरकार 7 देशभक्तों को फांसी की सज़ा सुना देती है , और बाद में एक मुस्लिम उन्हें गीता की दुहाई और उसके कुछ ज्ञान को बता कर उन्हें आज़ाद करता है और फिर सभी दोषियों को सारे मिलकर अलग अलग नाटकिय ढंग से मौत के घाट उतार देते हैं । इस नाटक का नाम मैंने "सात हिन्दुस्तानी " रखा था । सारे पात्र तो मिल चुके थे पर बटलर (अंग्रेज अफसर ) अफसर का अभिनय करने वाला कोई नहीं मिल रहा था।वजह ये थी के उसे पहला संवाद ही यही बोलना था " महाटमा गांडी को टो हम बाड में डेकेगा पहले टुमको डेकटा है " ये अंग्रेजों वाली हिंदी बोलने वाला कोई मिल नहीं पा रहा था । मै बहुत परेशान था , एक विद्यार्थी जो अत्यधिक गोरा था पर , अक्सर हीं उसे मैंने एक कोने में चुप चाप पाया , मेरा ध्यान उसकी तरफ बिलकुल भी नहीं था । परन्तु वो मेरी परेशानी समझ रहा था , अचानक ही वो मेरे पास आया और बोला के वो ये कर सकता है , और आश्चर्यजनक ढंग से उसने पहली बार में ही बिलकुल सटीक संवाद बोला , मै इतना अभिभूत हुआ के " बटलर " को गले से लगा लिया । एक और समस्या थी वो थी , "खान " की , जो देशभक्तों को सही राह दिखता है और जेल से उन्हें रिहा करता है , ये अभिनय मैंने खुद करने का निर्णय किया , मेरी सोंच थी की मेरी उपस्थिति बच्चों का हौसला बढ़ाएगी ।
अगले ही दिन से विद्यालय का एक कोना साहित्य कला मंदिर में बदल गया । एक तरफ गाने की तय्यारी हमारे प्रिंसिपल साहब करवा रहे थे, एक शिक्षक पी.टी. , मै बच्चों के साथ नाटक की तय्यारी । अभिनय सिखाने के लिए खुद को भी अभिनय करना पड़ता था , बच्चे शुरू में बहुत हँसते पर जब खुद की बारी आती तो वो गंभीर हो जाते फिर मै उनके साथ हँसता । बहुत मुश्किल था बच्चों को पहली बार नाटक के लिए तैयार करना , लेकिन सबसे मुश्किल काम था रिकॉर्डिंग डांस । इसके लिए मैंने 6 बच्चे चुने और गाना चुना "कही आग लगे लग जा वे" - फिल्म ताल से , गाना करीब 7 मिनट लम्बा था और ग्रुप डांस, जिसमे सब में तालमेल जरुरी है , उसको तय्यार करना आसान नहीं था । पर मेरे ऊपर तो जैसे जुनून सा चढ़ चुका था , मै रोज़ सारे काम करते हुए रात को गाने के एक एक बीट पर , एक एक स्टेप तैयार करता रोज़ घंटों । करीब एक महीने की मेहनत के बाद आखिर वो दिन अ गया जब बच्चों को परफॉरमेंस देना था । 24 तारीख की शाम को एक नई समस्या शुरू हुई ,वो था स्टेज । मुझे 30 फीट X 30 फीट का स्टेज चाहिए था ,इतना बड़ा स्टेज वहां क्या वहां के आसपास के भी किसी गाँव में नहीं लगा था , न ही ऐसा स्टेज बनाने वाला वहां कोई प्रोफेशनल था । इसका निवारण सुबह किया गया , एक विद्यार्थी ने भैसा बुग्गी ली और साथ में वानर सेना , 2 घंटे के अन्दर हमारे पास 12 चौकियाँ थी , जिसे अच्छे तरीके से लगा कर शाम को रिहर्सल कर उसकी मजबूती सुनिश्चित की गयी ।
अगले दिन प्रभात फेरी से समारोह की शुरुआत हुई, इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में स्थानीय विधायक मौजूद थे । प्रारंभिक वंदना और गान के बाद , नाटक का पहला दृश्य शुरू हुआ और समारोह के अंत तक मौजूद दर्शक गण प्रत्येक दृश्य पर आश्चर्यचकित और अभिभूत होते रहे । मै परदे के पीछे रहकर सारा काम कर रहा था , पर अभी एक धमाका और बाकि था वो था डांस। डांस के परफॉरमेंस के वक़्त मै स्टेज के पीछे से निकल कर बिलकुल स्टेज के सामने आ गया । बच्चों का ताल मेल गड़बड न हो इसलिए मैंने रिहर्सल में हीं प्रत्येक स्टेप को हाथों के इशारों में कैद कर लिया था जो बच्चों को पता था , मेरा निर्देश था के थोड़े संदेह में भी मेरी तरफ देखें और इशारों को समझें । उन्होंने मेरी आशा से बढ़ कर काम किया , चारों तरफ तालियों की गडगडाहट , स्वयं विधायक महोदय में खड़े होकर तालियाँ बजाई । वो दिन हमारे स्कूल के लिए मील का पत्थर साबित हुआ |
मैंने उस दिन अंपनी कुछ क्षमताओं को पहली बार महसूस किया , मसलन नेतृत्व की क्षमता , निर्देशन की क्षमता , नृत्य के बीट को पहचानने की क्षमता और सबसे बड़ी चीज़ के ऐसे किसी आयोजन को आयोजित करने की क्षमता । ये आयोजन मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ । अब गाँव के कुछ ऐसे लड़के जो मुझसे कटे से रहते थे वो भी धीरे धीरे मेरे संपर्क में आने लगे । वो अक्सर अपनी समस्याओं का साझा मुझसे करते और मैं यथासंभव उचित उपाय बताने की चेष्टा भी करता ।
इधर पिता जी कुछ ठीक हो रहे थे , पर अकेले उनका मन नहीं लगता था । मैंने पास के ही एक गाँव में बात की और वहां पापा एक अध्यापक के रूप में जाने लगे । गाँव दो किलोमीटर दूर था , रोज़ का उनका टहलना भी हो जाता था और अपने खर्चे भी निकलने लगे उनके । सब ठीक ठाक ही चल रहा था ।
विद्यालय पहले से अच्छे तरीके से चल रहा था ,अगले सत्र में बच्चों की संख्या काफी बढ़नी थी | कई अभिवावकों का आश्वाशन मिला था|मगर उनका कहना था के विद्यालय में कुछ चीजों का आभाव है ,और वो सही भी थे |अभी विद्यालय की कई समस्याएँ थी ,जैसे पूरा फर्नीचर न होना | शिक्षकों के उचित वेतन का न होना ,जिसके कारण हम बहुत अच्छे टीचर रखने में असमर्थ थे | विद्यालय का किराया नहीं वसूला जाता था संस्थापक के द्वारा ,परन्तु फिर भी मूलभूत सुविधाओं के लिए विद्यालय के पास पैसा नहीं था |बरसात के मौसम में छत टपकती थी विद्यालय भवन के मरम्मत की आवश्यकता थी |इन सब बातों को लेकर शिक्षकों ,अभिभावकों एवं प्रबंधन से चर्चा होती |तभी मैंने सुझाव दिया के बच्चों को कोर्स की किताबें हम सीधे प्रकाशन से मंगवा कर विद्यालय द्वारा वितरित करें ,और लाभ का इस्तेमाल हम विद्यालय की जरुरी चीजों को पूरा करने में करें |ये विचार सभी को पसंद आया |अगले सत्र के लिए ऐसा ही करना है इसपर सब राज़ी हो गये|
किसी भी विद्यालय में छोटी क्लास के बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ऐसा मैं सोंचता था|मैंने फैसला किया के मैं छोटे बच्चों की क्लास भी लिया करूँगा |मेरे घर के थोड़ा हट कर ही एक घर था जहाँ एक नन्हा शैतान रहता था जिसका नाम था “गुल्लू”,मैं अक्सर उसे गली में शैतानी करते देखा करता था |एक दिन गुल्लू के पिता जी ने मेरे पास आ कर गुल्लू की स्कूल में दाखिले की बात की ,और कल से गुल्लू स्कूल |गुल्लू बहुत ही शैतानी करता स्कूल में ,कभी किसी से शर्ट के अन्दर ,कभी सर पर धूल मिट्टी डाल देना ,कभी किसी की चिकोटी काट लेना कभी कुछ कभी कुछ |डरता वो किसी से भी नहीं था ,वो केवल ४ साल का रहा होगा उस वक़्त |गोल चेहरा और मज़बूत शरीर ,आँखों में हमेशा एक शैतानी चमकती रहती थी उसकी |उसकी शिकायतों से परेशान हो कर एक दिन हमारे प्रिंसिपल साहब ने उसे बुलाया और उसे एक थप्पड़ मारा,थप्पड़ दमदार था पर गुल्लू से ज्यादा नहीं ,वो भावहीन खड़ा रहा वहीँ पर जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं हो | प्रिंसिपल साहब का गुस्सा अब सातवें आसमान पर था , उन्होंने उसे मुर्गा बना दिया ,पर 5 मिनट बाद भी उसके ऊपर कोई असर नहीं हुआ , दरअसल व उसे कान पकड़ कर अपने गाल पर थप्पड़ लगाने को बोल रहे थे जो गुल्लू को कतई नामंजूर था |अब तो गुस्से से मरे प्रिंसिपल साहब ने डंडा मंगाया और कर दी उसकी धुलाई शुरू ,पर मजाल के एक आंसू भी आ जाएँ गुल्लू की आँखों में | थक कर और गुस्से से कांपते हुए प्रिंसिपल साहब ऑफिस में आये ,हम सभी शिक्षक वही बैठे थे , और अपने कान में तीन उमेठीयां देते हुए बोले “ एक ,दो ,तीन – आज के बाद से इस लड़के को हाथ नहीं लगाऊंगा ,इतनी से उम्र में इतना ढीठ ! ये लड़का तो आतंकवादी निकलेगा आगे जा कर |”
शाम को घर जाने पर गुल्लू की बड़ी बहिन ने बताया ,जो उस समय कक्षा ४ में रही होगी के गुल्लू प्रिंसिपल साहब का नाम लेकर कह रहा था के अगर वो इधर से गुज़रे तो वो उनका ईंट से सर फोड़ देगा |मैं मुस्का दिया |शाम को गुल्लू के पिता जी आए और इस बाबत मेरे से बात की ,मैंने उनसे एक हप्ते का समय माँगा और आश्वाशन दिया के सब ठीक कर दिया जायेगा |
अगले दिन से मेरी एक नयी चाल शुरू हो गयी ,मैंने अल्पेन्लिबे चॉकलेट ख़रीदे ४-5 और पहुँच गया स्कूल सीधा गुल्लू की क्लास में |मैं उसे बहुत प्यार करने लगा ,रोज़ टॉफ़ी खिलाता और उसके साथ खेलता ,हँसाता ,२ दिनों में ही वो मेरे से काफी घुल मिल गया ,मेरे घर आते ही वो मेरे पास चला आता और १-२ घंटे मेरे पास ही रहता |घर पर कभी कभी मेरे कंधे पर भी चढ़ जाता था,उसे मैं टीचर नहीं एक दोस्त जैसा दिखने लगा था |पर उसकी शैतानियाँ कम नहीं हो रही थी |होम वर्क तो कभी करता ही नहीं था वो |मैं गुल्लू को होम वर्क करने के लिए प्रोत्साहित करता और बार बार समझाता ,पर गुल्लू तो गुल्लू था वो नहीं माना |मैंने जब देख लिया के अब वो मेरे से घुल मिल गया है तब मैंने अपनी चाल का अगला दाव खेला |मैंने उस दिन गुल्लू को थोड़ा सख्त होते हुए कहा के कल तुम्हें होमवर्क कर के ही लाना है वरना बहुत पिटाई होने वाली है |अगले दिन क्या होना है कुछ अंदेशा था पहले मुझे , मैं उस दिन टॉफ़ी लेकर नहीं गया ,क्लास में पहुंचा और गुल्लू को सबसे पहले बुलाया |यह सोंच कर के अब टॉफी मिलने ही वाली है ,गुल्लू खुश होकर मेरे पास आया | मेरा उस दिन मिजाज़ सख्त था ,जिसे शायद गुल्लू भी भांप गया था ,उसके नजदीक आते ही मैंने उससे पूछा के क्या वह होमवर्क बना के लाया है ?उसने जैसे ही ‘ना’ बोला मेरा एक थप्पड़ गुल्लू के गुलगुले गाल पर पड़ा ,और इसके बाद जो आंसू और हिचकियाँ शुरू हुई गुल्लू की ,करीब आधे घंटे तक रोता रहा वो |मैं फिर से क्लास में पहुंचा उसे चुप कराने और उससे बोला के आज के बाद से मैं उससे कभी बात नहीं करूँगा अगर उसने ऐसा दुबारा किया तो |गुल्लू में इसके बाद आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए ,मैं स्वयं हैरान था के इतना ढीठ बालक एक थप्पड़ में ऐसे कैसे रो सकता हैं ,पर शायद मेरी सोंच मेरी चाल सफल हुई थी |बच्चे का ह्रदय कोमल होता है ,अगर उसमे किसी के लिए प्यार हो तो वो उसे खोना नहीं चाहता और अगर वो उसे कोई तकलीफ दे तो उसे दिल तक चोट पहुंचाती है |गुल्लू मेरे से हिल मिल गया था इसलिए मेरा एक थप्पड़ उसके गाल पर नहीं उसके सीधे दिल पर लगा था |गुल्लू अब मेरे पास पढता ,अब उसकी स्थिति ऐसी थी के अगर उसने कोई शैतानी की और जैसे ही किसी ने बोला के गुरु जी आ गये ,वो फ़ौरन या तो सावधान हो जाता या घर के अन्दर भाग जाता |
मुझे याद है एक दिन रात के दस बजे दरवाजे पर गुल्लू के पिता जी ने दस्तक दी पता चला उसे बुखार है दवा दूध के साथ खानी है पर गुल्लू खा नहीं रहा |मैं उसके घर गया देखा गुल्लू नहीं है , सब ने बता दिया था उसे के मै आ रहा हूँ ,उसकी बड़ी बहिन ने मुझे इशारे से बताया के वो पलंग के नीचे छुपा हुआ है | मैंने उसे निकला और गोद में बैठाया ,बोला दवा और दूध लाओ |गुल्लू बिना किसी शिकायत के आज्ञा करती बच्चे की तरह सारा दूध दावा सहित पी गया |आज गुल्लू कॉलेज में है और संस्मरण में हमेशा रहेगा |
इस प्रकार मोहल्ले और गाँव में मैं एक अच्छे टीचर के रूप में स्थापित हो चुका था |मेरे पास समय बहुत कम रह पता था खुद के लिए ,सुबह ६ बजे से रात के ११ बजे तक सिर्फ और सिर्फ पढाई |
दसवीं की परीक्षा शुरू हो चुकी थी , बच्चों के पेपर अच्छे जा रहे थे क्यूँ की मेरे बताये हुए ज्यादातर प्रश्न ही आये थे ,मैं निश्चिन्त था परिणाम को लेकर |एक महीने के बाद सत्र बदलने वाला था ,हमने भी अपने विद्यालय की परीक्षा ली |
एक दिन पुनः एक बेहद आश्चर्यजनक घटना हुई ,मैं मोहल्ले में ही टयूशन दे रहा था ,तभी एक बच्चे ने खबर दी के मुझे बुलाया गया है स्कूल के मालिक के पास ,मैं तुरंत वहां से चल दिया | वहां देखा के गाँव के कई बड़े बुजुर्गों का वहां जमावड़ा था ,और हमारे साथी टीचर और प्रिंसिपल साहब भी वहां मौजूद थे |साथ ही वहां हमारे स्कूल के मननिये संस्थापक महोदय भी उपस्थित थे , मुझे थोड़ी आशंका हुई के यहाँ मुझे क्यूँ बुलाया गया है ?जान कर आश्चर्य हुआ के मुझे विद्यालय का कार्यभार सौपने के लिए बुलाया गया है |संथापक महोदय ने मेरे साथी टीचर और प्रिंसिपल साहब से पूछा तो उन्होंने कोई आपत्ति नहीं जताई |मैं आश्चर्य मिश्रित आनंद का अनुभव कर रहा था , मुझे इतना सम्मान मिला ये मेरे लिए एक सुखद क्षण था |एक साल में ही एक बिहारी होकर भी जो उपलब्धि मैंने हासिल की थी वो औरों के लिए भी एक सबक थी जो यहाँ बरसों से रह रहे थे | मैंने अपने को कभी एक राज्य का नहीं माना था |इन सब के होने के पीछे की वजह वहां के युवा जिन्होंने मुझे जाना, वहां के बुजुर्ग जिन्होंने मुझे परखा,वहां के अभिभावक जिन्होंने मुझे समझा और मेरी छोटी सी कोशिश जो एक अच्छे कार्य के पीछे समर्पित थी | इस उपलब्धि से पिता जी को भी ख़ुशी हुई और मेरे जानने वालों को भी |
मैंने अपनी आगे की रणनीति तय की ,मैंने जरुरी चीजों की लिस्ट बनाई जो विद्यालय की आवश्यकता थी और इसके बारे में प्रबंधन से चर्चा की | तय हुआ के विद्यालय से ही बच्चों की किताबें सप्लाई होंगी ,इसके लिए १००००/- की सहायता राशी संस्थापक महोदय ने मुझे सौपी ,जो वापस करनी थी,लाभ लेने के बाद |
मैं किताबों की पहली खेप लेने सीधे दीपक प्रकाशन मेरठ पहुंचा |मैंने किताबों की लिस्ट दी ,मेरे किताबों की संख्या कम थी ,इसलिए उन्होंने २० % से ज्यादा डिस्काउंट देने से इंकार कर दिया , जब की ४०% डिस्काउंट तो वही दादरी में ही मिलता था |पता चला की मैं डायरेक्ट विद्यालय से आया था ,एजेंसी से नहीं इसलिए डिस्काउंट नहीं मिलेगा ,मुझे मेरे सारे सपने ख़त्म होते दिखे , मैंने प्रबन्धक से बात करने की इक्षा जताई |प्रबंधक एक बुजुर्ग थे मैंने संक्षेप में अपनी ,विद्यालय और ये पुस्तक यहाँ से सीधा ले जाने का कारण बताया |उन्होंने मेरी बात समझी और मुझे ४५% का डिस्काउंट दिया |मैं बहुत खुश हुआ |
अगले दिन से ही मैंने विद्यालय के कुछ अनुसाशन सम्बन्धी नियम में बदलाव किये , और विद्यालय के मरम्मती का कुछ काम शुरू किया |मैंने ये गौर किया के मेरे प्रिंसिपल बनने से भूतपूर्व प्राचार्य महोदय और अन्य शिक्षकगण में एक असंतोष सा व्याप्त था मैंने सब को एक साथ बुलाया और कहा के मुझे किसी कुर्सी का लोभ नहीं आप लोग केवल मेरा साथ दें हम सब मिलकर इस विद्यालय को एक नयी ऊंचाई तक पहुँचाने में कामयाब होंगे |हम सब का विकास होगा |परन्तु फिर भी मुझे महसूस हुआ के मैं अलग थलग सा पड़ गया हूँ |मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और काम करता रहा |
इन सब के बावजूद मैंने नयी चीजों को सिखने और उसका प्रयोग करना नहीं छोड़ा था |योग इत्यादि भी करता और साधू संतों से मिलता रहता था ,उनसे प्रश्न करता और आकलन करता | कुछ पुरानी किताबें मसलन शिव पुराण ,भृगु संहिता ,पतंजलि की पुस्तकें इत्यादि पढ़ी और आश्चर्य चकित हुआ के इन किताबों में भौतकी ,रसायन ,खगोल विज्ञान और अन्य विशेष विज्ञान के अद्भुत उदाहरण थे |कुछ बातें ऐसी भी थी जो हमेशा घूमती जिसका उत्तर मुझे नहीं मिला था और मैं उसके उत्तर ढूंढने की कोशिश करता | मेरी उस वक़्त की स्थिति एक जुनूनी व्यक्ति की थी ,जिसे अध्यात्म का अधूरा ज्ञान था ,और जिसका केवल एक ही जूनून था ,इस गाँव के बच्चों में छिपी हुई प्रतिभा को जगाना ,उन्हें दुनिया में होने वाली तरक्की से अवगत कराना और एक नयी सोंच को विकसित करना ताके वो आने वाली पीढ़ी को कम से कम अच्छी शिक्षा दे सकें|कई बार मेरे साथ ऐसा होता के लोगों के भीड़ में बैठा हुआ होऊं और मैं अपनी हीं धुन में खोया रहूँ | कई बार लोगों ने मुझे टोका भी ,के मैं क्या सोंचता रहता हूँ |वहां के मेरे मित्र अक्सर ऐसा कहते के “घना मत सोंचें कर ,बावला हो जावेगा” |
मई का महिना आ चुका था ,अब छुट्टियाँ पड़ने ही वाली थी |सत्र के अंत में बकाया फीस उगाहने का बहुत दवाब था ,सभी टीचर्स को पैसे देने थे |कोई साथ भी नहीं दे रहा था ढंग से ,इसी बीच १०वि कक्षा का परिणाम आ गया |एक भी बच्चा पास नहीं हुआ ,सारे के सारे फेल ,बहुत ही ज्यादा दुखी हो गया मैं|कई तरह के दवाब का सामना कर रहा था मैं |इसी बीच एक अन्य घटना हुई ,वह घटना मेरे लिए फिर से एक नया मोड़ साबित हुई | हमारे भाई साहब जो वहां रहते थे और ,एक मेरे ममेरे भाई के साथ कुछ ऐसी व्यक्तिगत घटना हुई जिसका जिक्र मैं यहाँ नहीं कर सकता क्यूँ के ये उनका व्यक्तिगत मामला है और हो सकता है के उन्हें आपत्ति हो इसका जिक्र आने पर |पर इस घटना का असर इस प्रकार से हुआ के मेरा भाई जिसे मैं एक छोटे भाई की तरह मानता था वो वहां से यह कह कर वापस बिहार आ गया के अगर मैं अगले महीने की चार तारीख तक अगर बिहार नहीं पहुंचा तो वो खुद को ख़त्म कर लेगा |वो बहुत ही जिद्दी था और मेरे पास केवल 15 दिन थे |अब एक तरफ यहाँ की परिस्थितियां और दूसरी तरफ मेरा भाई |मैं काफी कशमकश में रहा |अभी तुरंत मेरे पर इतना भरोसा करके गाँव के लोगों ने मुझे फलक पर बिठाया था ,वहां मैं जाने का कारण भी नहीं बता सकता था क्यूँ की ये अत्यंत ही व्यक्तिगत था |यदि मैं बिना कारण बताये वहां से आऊं तो यह संभव नहीं था |अंत में मैंने निश्चय किया के मैं एक महीने के लिए यहाँ से चला जाऊंगा और उसे संभाल कर समझा कर वापस आ जाऊंगा|इसके लिए मैंने फ़ोन पर अपने भाई को सूचित किया एक फर्जी रजिस्ट्री भेजने को जिसमे मुझे ट्रेनिंग के लिए एक माह के लिए मुंबई जाने का आमंत्रण हो , एक अर्धसरकारी संस्था में |भाई ने वो रजिस्ट्री भेज दी ,वो यहाँ 1 तारीख में पहुँच गयी |मैंने ज्यादा से ज्यादा लोगों को वो पत्र दिखने की कोशिश की ताकि सब को लगे के मेरे लिए ट्रेनिंग का लैटर आया है |मैंने दो और पत्र लिखे एक भूतपूर्व प्रिंसिपल साहब के नाम ,जो मैंने अपने भाई को दिया पहुचने को और दूसरा नवाब सिंह को जो विद्यालय समिति के अध्यक्ष थे ,नवाब सिंह वाला पत्र मैंने पिता जी को दिया |
पिता जी से भी मैंने झूठ ही बोला के मैं ट्रेनिंग के लिए जा रहा हूँ क्यूँ की असली कारण मैं उन्हें भी नहीं बता सकता था ,क्यूँ की अगर मैं बताता तो वो समझते नहीं ,सारा कुछ झेलना तो मुझे ही था |एक बार फिर से मेरे जीवन में रिस्क आ गया था ,लेकिन ये रिस्क मैंने एक ऐसे रिश्ते को बचाने के लिए लिया था ,जिससे मैं अभी तक वंचित था ,वो था छोटे भाई का रिश्ता |२ तारीख को मैं बिना किसी को सच बताये ,निकल पड़ा पुनः एक नयी मंजिल की ओर ,एक नयी संभावना में , एक नयी कहानी बुनने में |मैंने जाते जाते पैसों का पूरा हिसाब नवाब सिंह और भूतपूर्व प्रिंसिपल को दे दिया था |
मुझे जाते वक़्त मेरे दिमाग ने मेरे से यह पूछा के मैंने सब को धोखा तो नहीं दिया,खुद को ,बच्चों को पिता जी को ?मेरे दिल ने उत्तर दिया नहीं ,ये धोका नहीं है ,तुम्हें फिर वापस आना ही होगा |
गजब रवि भाई ... बहुत ही सुंदर ढंग से लिखते ही , मज़ा आ गया , गुल्लू वाला प्रयोग मैं भी कई बच्चों पर कर चुका हूँ :)
जवाब देंहटाएंसबसे बढ़िया बात ये है कि कहानी मे लगातार रोमांच और रहस्य बना रहता है कि - अब क्या हुआ ??
अति नहीं , अति अति उत्तम ....