सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

MERE SAPNEY

सपनों को देखने की आदत तो बहुत ही पहले पड़ चुकी थी, अब तो ये समझना और करना था के , वो सपने पूरे  कैसे होंगे ? पिता जी का ये हर तरीके के काम में टांग अड़ाना अब अच्छा नही लग रहा था / मेरे अन्दर एक ग़ज़ब का विरोधा भास हावी हो रहा था / मैं अब बुरा बनना चाहता था , विरोध करना चाहता था , मैं अपने आप को अब बड़ा मानने लगा था / मैं 9 वीं में पहुँच चुका था , और मेरे कुछ मित्र सिगरेट पीने लगे थे, मैं पीता नही था , मगर मैं तो बुरा बनना चाहता था , मुझे लगता था के मैं नोर्मल लाइफ जियूँगा अब ,  सारे मित्र मंडली के बीच तालियों की गड़ गराहट के बीच मैंने पहली दफा कांग्रेस मैंदान में सिगरेट पी/ खाँसा भी , आँखों से आंसू भी निकले मगर , दिखावे के लिए ही सही , सिगरेट पी तो ली ही / शाम को जब घर आया तो कई सवाल घुमड़ रहे थे , सारी चीजों का पूर्वावलोकन किया , दुबारा / सभी चीजें याद की / वो नोटों के बिस्तर पे सोना , धीरे धीरे बिजनेस का ख़तम होना , हर चीज़ का दूर जाना जो बचपन की जरूरतें एवं खुशियाँ थी, छोटी छोटी खुशियों के लिए अपने को और अपनी बहनों के स्थिति देख कर पहले तो समझ ही नही आता था , मगर अब इन सब का  जिम्मेवार मैं अब पिता जी को मानने लगा / मैं बदल रहा था / मेरे रगों का गर्म खून और अब तक एक शांत , बहुमुखी और समझदार दिमाग पर हावी हो चुका था / मैं अब ये सोंचता के , ईमानदारी के बे वहज ढोंग का ही सब नतीजा है / जब वो पैसे कमा सकते थे वो ईमानदार बने रहे और आज जो भी हो रहा है , उनकी लापरवाही के कारण हो रहा है/ मुझे अहसास हुआ के , जो peon था आज उसके पास अच्छी दौलत है मगर मैनेजेर हो कर भी इन्होने कुछ नही किया / मुझे धीरे धीरे अपने पिता जी पे गुस्सा आ रहा था / सभी चीजों के दोषी वही नज़र आ रहे थे /

अब तय्यारी जोरों से करनी थी / मुझे जल्द से जल्द अपनी पढाई पूरी करनी थी , 10 th  पास करना था , नौकरी करनी थी और फॅमिली को सपोर्ट भी /घर का माहौल ऐसा हो चुका था के , पढाई का सही माहौल नही बन पाता था / घर पे आते ही समस्यायों से घिरे सब को देख के दिमाग एक जगह लग नही पता था / इतने पैसे भी नही थे के मैं कोई सपोर्ट जैसे tution  या कोचिंग ले सकूँ / जो करना था मुझे खुद ही करना था / मेरी सारी मित्र मंडली घर से दूर स्कूल के पास ही रहा करती थी / मैंने फैसला किया के मैं वहीँ जाकर पढाई किया करूँगा / वहीँ मुझे एक मित्र मिला , राजू / मैं उसके घर जाने लगा , वहीँ दोनों पढाई करते और खाली समय में , कैरम खेलते / उसके घर में मेरी के अलग ही पहचान थी /हम उसके घर पे ग्रुप बना के पढाई करते / अब तो ऐसा हो चुका था , के स्कूल से घर जाकर , वापस राजू के घर आता और देर शाम तक पढाई करता / जब तक वहां रहता अच्छे से पढता था /
उधर पिता जी का धंधा तो डूबता ही जा रहा था / अब मैं जेनेरल स्टोर का भी कुछ काम देखता था , साइकिल से मार्केट जाता और सारी मार्केटिंग करता शॉप के लिए / हालत अब इतनी बुरी हो चुकी थी के , बड़ी मुश्किल से काम  चल पा रहा था / बीच बीच में बचे खुचे फैक्ट्री वाले आते और पिता जी की कुछ सेल होती / एक वक़्त था जब पिता जी का टूर हर वीक लगता और महीने में 6 - 8 ट्रक की सेल होती / आज सेल की हालत ये थी के 1 ट्रक मॉल 6 महीनो के लिए काफी होता / बड़ा ही बुरा वक़्त था / जैसे तैसे समय बीत रहा था / घर ही हालत अब ऐसी थी के माँ की साड़ी से बहनों के लिए सूट बनता /  मैं उतारे हुए कपडे जो मेरे रिश्तेदारों या "स्मिता" (मेरी शिष्या) के पापा की हुआ करती थी , उल्टर करके पहनता / नए कपड़ों के लिए पैसे नही थे / पुराने दिन याद करता और रोता /घर में अगर एक सामान लाना होता तो बहुत पहले से प्लानिंग करनी पड़ती / दूध ,अख़बार, घी सब बंद हो चुका था , हमें सही ढंग से खाना भी नसीब नही था /मेरी माँ ने उस दौर में बहुत ही समझदारी से घर चलाया /  दिमाग काम नही करता था , सोंचता क्या होगा ? कैसे होगा ? कब होगा ?  लेकिन महापुरुषों की कहानियां पढ़ी थी , संघर्ष में भी खुश रहना , संतोष करना , आ गया था मुझे / हर हालात को , अपने गानों में भुलाने की कोशिश करता / गाना जरुर गाता था , और कोशिश करता के हालात मेरी पढाई पे हावी न हों / मगर अब मैं बच्चा नही था / चीजें परेशां करने लगी थी , और एक बहुत ही बुरी चीज़ मेरे अन्दर आ गयी , वो था गुस्सा / ढेर सारा गुस्सा ,तिल तिल कर बढ़ रहा था , और इक्कठा हो रहा था / ऐसा महसूस होता के दिल के अन्दर कोई समुद्र है , और उसके अन्दर कोई ज्वालामुखी , जो धीरे धीरे अपना विकराल रूप धारण कर रहा है /कब फूटेगा पता नही था /

बिहार का माहौल ऐसा हो चुका था के , पिस्टल , कट्टा रखना लडको के लिए आम हो गया था / बात बात पर अब गोलियां चलने लगी थी / लूट पाट अपहरण की घटनाये बढती जा रही थी / कई बार उस वक़्त ऐसा हुआ के , हम दो तीन लड़के एक चौराहे पे खड़े हों और पोलिसे की जिप्सी हमें चेक करने आती और पूरी तलाशी लेती, जब की हम केवल 9th  क्लास में आये ही थे  /मेरे ग्रुप के भी कुछ लड़के इस लाइन में आ चुके थे / मैंने उसने दूरी बना ली थी , मगर सम्बन्ध ख़तम नही हुए थे / मुझे याद है जब अख़बार में निकला था के , एक सेवेंथ क्लास के लड़के ने प्रेम प्रसंग के कारण अपने दोस्त को गोली मार दी / बहुत ही बुरा माहौल था / मुझे अब इस सिस्टम पे भी गुस्सा आने लगा था / वो पाटलिपुत्र जहाँ विश्व का सर्वप्रथम संविधान लिखा गया , वो आज अराजकता की चपेट में आ चुका था / हर बिज़नस करने वालों को गुंडों और नेताओ को चंदा देना पड़ता / हर जगह बदमाशों का बोलबाला था / दुकाने 9 बजे ही बंद हो जाया करती थी / 10 बजे के बाद कोई स्टेशन से कही और नही जा सकता था , लूट लिया जाता था /

दीपावली फिर से आने वाली थी / मैंने पहली बार बचत की सोंची , ताकि मैं सबके लिए पटाखे खरीद सकूँ , लगभग दो महीनो की मेहनत के बाद , मैंने करीब 250 rs  इकठ्ठा कर लिए / इस दीपावली के दो दिनों पहले , मैं जब स्कूल से घर आया , तो सामने का दृश्य देख कर मेरा दिमाग घूम गया / माँ पीतल और ताम्बे के कुछ बर्तनों को संदूक से निकल रही थी , और एक बोरी में रख रही थी / मेरे पूछने पर माँ ने बहुत धीरे से बोला के , पैसे नही हैं , इसलिए इसे बेच रहे हैं , चुप रहना , किसी को बताना नही / मेरा दिमाग घूम गया , घर के असली हालात के बारे में मुझे अब ज्ञान हुआ / हालात यहाँ तक आ गये थे के , हमें बर्तन तक बेचने पड़ रहे हैं / आँखों से एक आंसू की लकीर निकल आई और पिता जी पे ढेर सारा गुस्सा , के उन्होंने कोई LIC या कोई बचत क्यों नही की / प्लानिंग क्यों नही की , जब वो अच्छे ढंग से परवरिश नही कर सकते तो , हमें जन्म ही क्यूँ दिया / और बेटे की चाहत में दो और संतान क्यूँ पैदा किया ? मन में हजारों सवाल घूम रहे थे , मन में आता था के , उन लड़कों से मिल जाऊं जो छोटी मोटी घटनाएँ करते हैं , और अपना जेब खर्च निकल लेते है , पर मैंने अपने ऊपर कंट्रोल किया /मैं मानता हूँ के केवल अपने उन्हीं माता पिता के और पूर्वजों के संस्कार के कारण मैं अपने ऊपर इतना कण्ट्रोल कर पाया , वरना मेरे भटकने में अब कोई कमी नही थी / उम्र , परिस्थितियाँ एवं समाज का वातावरण सब अनुकूल थीं , मैं भटक सकता था ,,,,कच्ची उम्र थी /

मैंने मूड को बदलने की कोशिश की , बाज़ार जा कर , ढेर सारे पटाखे ख़रीदे / अपने बचत के पैसों से,  और भी कुछ कर सकता था , फॅमिली को दे सकता था , मगर मेरा टार्गेट था इसबार बहनों को पटाखों से खुश कर देना / इस बार की दीपावली भी अजीब थी, माँ और पिता जी अपनी जिम्मेवारियां पूरी कर रहे थे और मैं अपनी / दोनों का अंदाज़ अलग था , वो दाल रोटी खरीद रहे था , मैं चंद खुशियाँ / बहने बहुत खुश थी , चंद घंटे तक खूब हंगामा रहा , खूब पटाखे छोड़े / वो मेरे बच्चे जैसे थे ,उन्हें खुश देख कर , बहुत ही ख़ुशी हुई , लगा जैसे कुछ ना सही मगर , उनके लिए थोड़ी सी तो ख़ुशी खरीद ही डाली / पैसों से खुशियाँ खरीदी जाती है , उस दिन अहसास हुआ /

मैंने 9th पास कर लिया , अब मैं 10th क्लास में आ चुका था / हालात बदल रहे थे , उम्मीदें जग रही थी और सपने मरते जा रहे थे / फिर भी अभी तक आस नही छोड़ी थी , कहते हैं , जब तलक साँस है , तब तक आस है / मैं घर में सबको हिम्मत देने की कोशिश करता था / छोटे मोटे काम घर के करता , जहाँ तक होता सपोर्ट करता / एक और नई चीज़ आई थी मेरे अन्दर वो था , इलेक्ट्रोनिक्स से प्यार / मैं अपना रेडिओ , टीवी , टेप रेकॉर्डर खुद ही ठीक करता / नई नई चीजें करने की कोशिश करता / ख़राब tube light को diaod और बल्ब से जोड़ कर जलाता / छोटे मोटर से battery से चलने वाला पंखा बनाता/ पडोसिओं की भी मदद करता ,अगर उनका कोई सामान ख़राब हो जाता / मेरी सारी मेहनत और संघर्ष को राजू का परिवार बहुत सराहता , सपोर्ट करता मुझे , और हिम्मत देता के एक दिन सब ठीक हो जायेगा / मैं वहां जाकर अपने को खुश महसूस करता /मैं राजू की माँ को माँ ही बोलता , उसकी दीदी को दिदिया , भाई को भैया / परिवार जैसा था मेरा वो , और मुझे भी वो परिवार का सदस्य ही मानते थे / अपने दिल की साडी भड़ास मैं वहां निकलता , जो पिता जी पर थी / वो मुझे समझाते मगर मेरे तर्क के आगे चुप हो जाते और मुझे तसल्ली देते /

मुझे याद है वो दिल को झकझोरने वाला दिन , जब पिता जी ने मुझे बुलाया / उस कमरे में मैं , माँ और पिता जी थे , माँ ने किवाड़ लगा दी ताके बच्चे  न सुने /  पिता जी ने कहा , मेरे पास आज कुल नगद 20 rs हैं / मैं अब तुम लोगों के लिए नमक भी नही खरीद सकता , मेरे पास एक ही चारा है , मेरे साथ सब गाँव चलो , यहाँ मैं तुम सब का खर्च नही उठा सकता /ऐसा सुनते ही , मेरे पैरों तले तो जैसे ज़मीं ही निकल गयी / अब क्या करूँ ? मैंने कहा के ये कैसे होगा , जो कभी गाँव में नही रहे वो कैसे रहेंगे , सब की पढाई का क्या होगा ? मगर पिता जी कुछ नही बोले वो हिम्मत हार चुके थे , माँ बस रोये जा रही थी / मैं चुप चाप खड़ा था / बगल में ही एक कोने में पूजा घर था , मैं लगातार उनको देख रहा था जिनकी सुबह शाम , बिना किसी रुकावट के पिता जी ने पूजा की / कोई सहारा नही दे रहा था / मैंने अपने को संभाला , फिर कहा के , कुछ दिनों की बात है  , मैं जल्द ही घर संभाल लूँगा , आप चिंता न करो / पर मैं जानता था के ये सब कहना भर ही आसान था , करना बड़ा मुश्किल / फिर भी मैंने सांत्वना दी और छत पे जाके खाली आकाश को देखता रहा , मेरे सामने केवल बहनों के चेहरे घूम रहे थे / मैं ये सोंच रहा था के , कैसा अच्छा दिन बिताया था मैंने , बिना किसी कमी के , जो चाहा वो मिला था , मगर , ये कैसी घडी थी/ये कैसी परीक्षा थी , क्या हो रहा था , आज मैं अपने को अर्श से फर्श पे महसूस कर रहा था / वो दिन याद आते जब किसी बात की कोई कमी नही थी , एक एक चीज़ एक एक पल और आँखों में थे बस आंसू /
उस रात मैं घंटों छत पे रहा , मुझे भगवान से नफरत हो गयी / मुझे वो पत्थर की मूरत लगने लगे , और तर्क की बिनाह पर मैंने उन्हें केवल धोखा करार दे दिया , मैं नास्तिक बन गया /उस रात मैं सो न सका , diary  में लिखा , "बदनाम न होता हमारे इश्क से अगर , तो शायद खुदा भी इतना मशहूर न होता "/ पता नही क्यूँ नफरत हो गयी थी उससे उसी दिन से / 

सुबह उठते ही सभी चीजें जिनका सबंध भगवान् से था , सब बैग से निकल दिया , हर चीज़ जो शरीर पे धारण कर रखी थी सब कुछ /कोई तिलक नही , कुछ नही , एक मूर्ति रखी थी घर में , उसे छत पे ले गया , लातों से बहुत मारा उसे / टुकड़े टुकड़े कर दिए , पिसा मसला उसे , अपनी पूरी भड़ास निकाली , मेरे अन्दर इतना गुस्सा था के मैं खुद ही हैरान था / घर में सब ने पूछा के पूजा नही की ??? मैंने बोल दिया के मुझे अब ढोंग नही करना सब बकवास है , ये बन्दर की तस्वीर है, इन्सान ने इसे भगवान बना दिया है , मुझे नही करनी अब पूजा / उन्होंने कुछ समझाने की कोशिश की , मगर मेरा गुस्सा अब आँखों तक आने लगा था और मैं केवल उन्हें जहर भरी नज़रों से देखता हुआ निकल गया , मैंने पहली बार माँ को ऐसी गुस्से वाली नज़रों से देखा था, बस दो तीन सेकंड के लिए  / दिन में मैंने अपने मित्रों से बात चीत  की और कोई काम जिससे कमाई हो करने की सोंची / बहुत सोंचा मगर कोई हल न निकला / मैं एक ऐसे व्यक्ति से मिला जो वैसे तो वो दादा टाइप था , मगर मुझे एक समझदार लड़का , पढ़ाकू लड़का समझ कर बहुत प्यार करता था , मनोज नाम था उसका मगर लोग उसे "बॉम्बे सिटी " के नाम से जानते थे / वो अपने एरिया में , खोमचे , ठेले लगवाता , उनकी पोलिसे वगैरह से सेट्टिंग करता / मैंने अपनी हालत बताई , पहले तो उसने समझाया के पहले 10 वी कर ले , मगर मेरी जिद और तर्क के आगे झुक गया , और एक सिनेमा हॉल के आगे , एक बड़ा खोका देने का वादा कर दिया / वो स्टेशन के पास था , और मैं वहां से बहुत अच्छी कमाई कर सकता था / रोज़ हज़ार रूपए कमा सकता था , जगह मौके की थी /किराया था 1500 /- rs  महिना / मैं बड़ा खुश हुआ / तेज़ क़दमों से घर पहुंचा और अपनी बात माँ को बताई , उसने कोई reaction नही दिया , मैं कुछ समझा नही , पर इतना जरुर समझा के , माँ ने पहले की तरह मना नही किया / शायद परिस्थितियों से मजबूर थी / शाम को मैंने पिता जी से बात की , पहले उन्होंने सारी बातें सुनी और फिर एक शब्द में मना कर दिया .."नहीं "/ मैंने पूछा क्यूँ नही ? वो बोले दुनिया क्या बोलेगी के मास्टर साहब का लड़का एक खोका खोल के बैठा है , ये नही हो सकता / मेरी समझ में नही आ रहा था , क्या बोलूं बस अन्दर का लावा फुट पड़ा और मैं मैंने बोलना शुरू किया - " कौन से लोग और कौन सी दुनिया , कौन देखने आ रहा है अब ? हम यहाँ तिल तिल के मर रहे है और आप अब भी अपने आदर्शों को अपनी दिखावटी शान में जीना चाहते हैं / मैं कोई चोरी तो नही कर रहा न , मेहनत करूँगा , जब तक कुछ नही बनता तब तक के लिए है सब / आप ने अच्छा जीवन जिया है , मगर परिस्थितियां अब अलग है आपको भी पता है /"
(मुझे आज ये जरुर अहसास होता है के भले ही मेरे जीवन में थोडा कष्ट लिखा था मगर उस तरह का काम नही  , सो ऊपर वाले ने वो कम उस समय नही होने दिया / ) मुझे उस वक़्त बहुत ही बुरा लगा / मुझे लगा के मैं सब ठीक कर लूँगा, पैसा आने लगेगा तो मानगे कर लूँगा मैं /मेरी आवाज़ तेज़ थी , तेज़ सांसो के साथ मैंने ये सब बोला था / मगर पिता जी नही माने बल्कि ये बोल दिया अगर ऐसा किया मैंने तो वो घर छोड़ कर चले जायेंगे / मेरा दिमाग भन्ना गया , लग रहा था मानो दिमाग के अन्दर अचानक हजारों मधु -मक्खियाँ चल रही हों और उनका भयानक शोर , घन्न्न्नन्न्न्न ऐसा शोर / 

मेरी समझ में ये नही आया के , इतना रामायण , पुराण, प्रेमचंद , भारतेंदु हरिश्चंद्र और न जाने कितना साहित्य पिता जी ने पढ़ा , मगर मेहनत कर के खाने से इन्हें क्यूँ परहेज़ है ? क्या कहेगी दुनिया , और जो सब्जी बेचते हैं , खोका चलते हैं , हम से ज्यादा कमाते हैं , क्या कहती होगी उन्हें दुनिया ? क्या वो इस दुनिया के नही / एक बार फिर मेरी सोंच मेरा विचार , पिता जी के आदर्शों की भेंट चढ़ गया / मुझे गुस्सा , नफरत , असमंजस सब एक साथ आ रहा था / मैं वहां से चला गया / डर था के गुस्से में कही कुछ ज्यादा न बोल बैठूं / फिर एक बार मैंने भगवान को गुस्से से देखा , और मन ही मन गाली दी / मुझे अब नींद ही नही आती थी , घंटो जगता था , सिर्फ सोंचता , छत पे जाता , गाना गा कर अपने को बहलाता , फिर नीचे  आता और सोंचता / पढाई , टेंशन और ज्यादा सोंचने और जागने से मुझे एक बीमारी लग गयी .. "माइग्रेन" , सर में जब दर्द होता तो सर फटने सा लगता था /  माइग्रेन के दौरान गुस्से का मतलब होता , बेहिसाब गुस्सा , मैं दीवारों पे घुसे चलता , अपने बॉडी को हर्ट करता था / मैं , मैं नही रहा था /


फिर भी मैंने पढाई करनी नही छोड़ी थी / रोज़ पढाई करता और सोंचता , जल्दी से पास कर लूँ / स्कूल में सब छुट्टी के बाद कोचिंग जाते मैं अपनी कोचिंग खुद लेता / नोट्स बनता , लिख के याद करता / सभी कुछ न कुछ रोज़ खरीदते मैं अलग खड़ा रहता / जब सब रेस्टुरेंट जाते चौमिन खाने , मैं बोलता मुझे चौमिन अच्छा नही लगता , जबके मैंने चौमिन खाया ही नही था / बस सब के साथ हंस कर , सबकी प्रॉब्लम सोल्व करके खुश रहता /जब किसी की कोई प्रॉब्लम सोल्व करता तो मुझे treat मिलती थी / मुझे याद है मेरे एक मित्र को किसी कन्या से प्रेम हो गया था , उनका प्रेम पुराना था , मगर इधर कुछ झगडा हो गया था उनके बीच / दोनों के बीच कोई बात चीत नही थी / राकेश नाम था लड़के का , उसने मेरी handwriting देखी थी , उसने मुझसे उसके बदले प्रेम पत्र लिखने को बोला / मैं चूँकि हमेशा से सबकी मदद करने की कोशिश करता था ,वो चीज़ भी जो मैंने पहले कभी नही की , वो भी करता था / बचपन से ही ज्ञान पाने की इच्छा तो थी ही , नई चीजें करना और उसका अनुभव लेना मेरी आदत थी / मैंने उस बंधू की मनोस्थिति को समझा फिर एक कहानी , एक रूप रेखा भावनाओ , परिस्थितियों की बनाई और एक लव लैटर लिखा /मैंने बोल दिया के ऊपर अपना और नीचे उसका नाम लिख दे बस / शाम को सुन कर ख़ुशी हुई की उनकी सुलह हो गयी /शाम को ही treat  मिल गयी / मंडली में मेरी एक और चीज़ सामने आई / मैंने अपने दोस्तों के लिए 50 से भी ज्यादा लव लैटर लिखे होंगे , कारण था मेरी कल्पना शक्ति , मेरे शब्द और मेरी handwriting ./  मुझे हर लैटर के लिए treat  भी मिला , ये भी सत्य है , और ये भी के , मैंने औरों के लिए 50 लव लैटर तो लिखे मगर अपने लिए एक भी नही लिखा था  / ऐसा नही था के दूरियां मैंने बनाई हों,मगर दिक्कत बस इतनी थी के , शायद जो भी मिले कोई ऐसा मिला ही नही जिनके लिए कोई विशेष आकर्षण हो / वैसे भी मेरा दिमाग भी यही बोलता के , 10 th  है बेटा , पहले पढाई कर ले / अभी पूरी उम्र पड़ी है ये सब करने को , हाहाहा , ये सब ज्ञान मेरे पास पहले से ही फीड थे जैसे , ये सब कम उम्र में ही बड़ी बड़ी किताबें पढने का नतीजा था /


10th के registration का टाइम था / पैसे नही थे मेरे पास registration  के / बुक भी लेना था मुझे , कुछ लिए नही थे सोंचा था के लास्ट में ख़त्म कर दूंगा लेकिन अब बुक भी चाहिए थी .कुछ और भी / गेस पेपर वगैरह मुझे नही चाहिए था , मैं ninth  से ही formate इत्यादी पर ध्यान रखता था , important  questions  दोस्तों की गेस पेपर से उतरता था , answer घर आकर अपने स्टाइल में लिखता, अपने शब्दों के साथ /मगर फिर भी , दो हज़ार रुपये तो  चाहिए ही थे /उस दिन घर आकर मैं सोंच रहा था के मैं तो वहीँ आ गया जहाँ से पिता जी चले थे उन्होंने भी ऐसा ही कुछ झेला और फिर मैं भी ????कहीं समय अपने को दोहरा तो नही रहा ? मगर उस वक़्त भी मैंने यही सोंचा था के , अगर दोहरा रहा है तो जीवन में मौके तो मेरे पास भी आएंगे /अगर एक बार लाइफ में उनकी जितनी अमीरी और पैसा आ जाये तो मैं उसे ऐसे manage करूँ के वो ऐसे एकदम से ख़तम न होने पाए / मैंने हार नही मानी थी , न मैंने हर मानना सीखा था / खैर मैंने अपने रिश्तेदारों के पास जा कर पैसों की वयवस्था की , इसके लिए पहली बार घर से बाहर अकेले जाना पड़ा / रास्ते भर बस की खिडकियों से  बाहर देखता और सोंचता जाता , मेरे संग तो कोई नही था फिर भी एक गाना मेरे दिमाग में उस वक़्त सदा गूंजता "जीत जायेंगे हम तू अगर संग है ,,,ज़िन्दगी हर कदम इक नई जंग है  / 

3 महीने बाद 10 th की परीक्षा थी, अब मैं ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पढाई में लगाना चाहता था /

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

Naye Ahsas

 मुझे दीदी के शादी के समय पहली बार अपने दादा जी के धरती , यानि अपने पिता जी की जन्म स्थली जाने का मौका मिला / जो विद्यापति नगर के पास था / विद्यापति मैथली के एक प्रसिद्द कवी हुए और कहा जाता है के भगवन शिव शंकर स्वयं उनके घर पे आकर एक नौकर के रूप में रहे / मैं जीवन में पहली बार अपने पैतृक   गाँव आया था / बाद में मुझे पता चला के पिता जी यहाँ की जमीन बेचने के लिए आये हैं / क्यूँ के मेरे कोई चाचा ताऊ जीवित नही बचे थे , पिता जी गाँव का चक्कर लगा नही पाते थे /धीरे धीरे मेरे चचेरे भाइयों ने पिता जी से झूठ बोल बोल के , हमारी ज़मीन भी बेचनी शुरू कर दी / पापा जी जा नही पाते थे , सो उन्होंने घर के आसपास को छोड़ कर अपनी सारी ज़मीन बेच दी /इसका असर उस वक़्त तो नही लेकिन बाद में मुझे महसूस हुआ के ज़मीन का एक एक टुकड़ा खरीदना कितना मुश्किल भरा काम है /
मेरा जन्म दिन हर साल 4 सितम्बर को मनाया जाता था / हर साल केक आता था और बुलाये जाते थे रिश्तेदार / लेकिन इस साल कुछ गड़बड़ थी / हालात कुछ ज्यादा हिं ख़राब लग रहे थे मुझे / इस बार जैसे तैसे सब हुआ / मुझे ये महसूस होने लगा था के , पिता जी की हालत अब ज्यादा अच्छी नही शायद / फिर आया दशहरा , इस बार भी किसी के लिए नए कपडे नही ख़रीदे गये / अब धीरे धीरे मैं गंभीर होने लगा , और कोशिश की के बात करूँ पापा से के मैं एक दो और tution पकड़ लूँ , ताके मैं घर के खर्चों में हाथ बटा सकूँ / मगर माँ ने साफ मना कर दिया , बोली तू अपनी पढाई पे ध्यान  दे बस / मैं अब जल्दी से जल्दी पढाई ख़तम करना चाहता था , चाहता था के जल्दी से 10th पास कर लूँ ,फिर जॉब और पढाई एक साथ कर लूँगा / अब धीरे धीरे मेरा लक्ष्य बदल रहा था / समय और परिस्थितियां मुझे विचलित करने लगी थी / दीपावली भी आ गयी , इस बार पटाखों की संख्या भी काफी कम थी , छोटी बहने नाराज़ हो गयी / पहले तो माँ ने उन्हें समझाया फिर डांट दिया / चारों तरफ लोग एक से एक रंगीन और महंगे पटाखे चला रहे थे , और मेरी बहने रोती हुई आसमान में उसे छूटते  हुए देख रही थी /  मुझे पहली बार उस गरीबी का हल्का सा अहसास हुआ , मैंने सोंचा , शायद इसी को गरीबी कहते हैं /मुझे भी ग्लानी महसूस हो रही थी , मन कर रहा था , इनके लिए दुनियां भर के पटाखे ला कर दे दूँ , मगर करता क्या , मैं मजबूर और लाचार था / मैंने उन्हें समझाया के , अगले साल मैं ढेर सारे पटाखे ला कर दूंगा / मैंने उन्हें फुसला दिया  , और खुद को भी /


छठ पूजा बिहार और उसके आसपास के क्षेत्र का सबसे प्रमुख त्यौहार है / जिसमे महिलाएं व्रत करती हैं , अपने पूरे परिवार के लिए / बड़ा पर्व होता है और शहर में करना थोडा कठिन होता है / इसलिए माँ इस पर्व को अपने मायके में करती थी / कई लोगों का सहयोग वहां उन्हें मिल जाता था / एक और चीज़ अच्छी होती थी , वो ये के , सभी मौसियाँ अपने बाल बच्चों के साथ वहां पहुँचती थी और हमारा एक अच्छा सा "get together" हो जाता था / अक्सर हम दीपावली के एक दिन बाद वहां के लिए प्रस्थान करते थे / इस बार भी माँ हमें लेकर वहां के लिए चल दी / सुबह जल्दी उठकर , सब तैयार हो कर चल दिए / वो हलकी ठण्ड में बस पे ननिहाल जाना , वो सूरज का रस्ते में उगना , और मेरे बस के साथ साथ कुछ दूर उसका चलना मुझे बहुत अच्छा लगता / जब बस एशिया के सबसे बड़े नदी पुल "Gandhi setu" जो गंगा पे बना है , से गुजरता ,,,सभी का ध्यान गंगा को प्रणाम करने और उसमे सिक्के फेकने में लगा रहता ,मेरा गंगा के उस पानी में , लाल सूर्य से लाल हुए विशाल जलराशि को निहारने में /
मुझे प्रकृति से बड़ा प्रेम रहा है बचपन से हिं / मुझे पेड़ पौधे , नदी पोखर बड़े अच्छे लगते / सुबह की ओस , जो पत्तीओं के ऊपर मोतियों की तरह होती , उसे देख कर, मकड़ी के जाले जो गुलाब के पेड़ की टहनियों के बीच में बुने होते , और जब उसपर सूर्य की किरण पड़ती तो ओस जमे होने के कारण, सतरंगी से दिखाए देते , उसे देख कर , गुदगुदी से होती थी / बहुत ही अच्छा लगता था, सोंचता काश एक कैमरा होता और मैं इन्हें कैद कर लेता , मगर वो नही हुआ तो क्या हुआ , मैं अपने विचारों में उन्हें कैद करता था /
मेरा ननिहाल वैशाली जिले में है । भगवान महावीर की जन्म स्थली होने के कारण जैन धर्म के मतावलंबियों के लिये वैशाली एक पवित्र स्थल है। भगवान बुद्ध का इस धरती पर तीन बार आगमन हुआ। महात्मा बुद्ध के समय सोलह महाजनपदों में वैशाली का स्थान मगध के समान महत्वपूर्ण था। अतिमहत्वपूर्ण बौद्ध एवं जैन स्थल होने के अलावा यह जगह पौराणिक हिंदू तीर्थ एवं पाटलीपुत्र जैसे ऐतिहासिक स्थल के निकट है। मौर्य और गुप्‍त राजवंश में जब पाटलीपुत्र (आधुनिक पटना) राजधानी के रूप में विकसित हुआ, तब वैशाली इस क्षेत्र में होने वाले व्‍यापार और उद्योग का प्रमुख केंद्र था। भगवान बुद्ध ने वैशाली के समीप कोल्‍हुआ में अपना अंतिम संबोधन दिया था। इसकी याद में महान मौर्य महान सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दि ईसा पूर्व सिंह स्‍तंभ का निर्माण करवाया था।यह स्थान प्राकृतिक रूप से बड़ा ही मनोहर था , और मुझे अपने ननिहाल जाना बड़ा ही अच्छा लगता था /चारों तरफ पेड़ ही पेड़ , हरियाली खुले हुए खेत और मैंदान , भागता दौड़ता बड़ा ही अच्छा लगता / बकरी के , गायों के बच्चे , बड़े अच्छे लगते , उन्हें सहलाता और प्रेम वश उनका मेरा हाथ चाटना बड़ा अच्छा लगता , मैं बहुत खुश होता और हँसता/ यहाँ आ कर सब कुछ भूल जाता था / लगभग 70 लोगों का जमावड़ा होता था यहाँ / सुबह से देर रात तक केवल मस्ती धमाल / सभी मौसियाँ व्रत  रखती थी , माँ भी , महिलाएं लोक गीत गाती / हम सारे भाई , शाम को गाँव में घुमने जाते , हमारे शहरी पन को लोग घूर घूर के देखते , और हम छाती चौड़ी किये हुए , अपने को हीरो से कम न समझते / इठला इठला के चलते /

छठ वर्त के शाम को अर्ध्य देने के लिए घर से करीब पौने किलोमीटर की दूरी पर तालाब था , जहाँ हम सारे भाई सर पे अर्ध्य का टोकरा उठा कर ले जाते , टोकरा भारी हुआ करता था / तालाब तक नंगे पाँव पहुँचते पहुँचते ,सर गर्दन के अन्दर धसने सा लगता था , पर माँ कहती थी , जितना कष्ट होगा उतना ही आशीर्वाद मिलेगा / वैसे भी , सहन शीलता मुझमे बचपन से ही थी / अक्सर इसी वजह से मेरे भाई मेरे से दुखी रहते के , मैं ज्यादा चिढ़ता नही था , अच्छा बच्चा बन के रहता , और मौसियाँ मेरा उदाहरण देके , मेरे जैसा बनने का उन्हें उलाहना देतीं /
रात को अक्सर सारे भाई , बहने , भाभियाँ सब मिलके अंतराक्षरी खेलते थे , बड़ा मज़ा आता था , कभी कभी तो सुबह अर्ध्य के समय तक आपस में बातें करते रहते थे / इतने लोगों के सोने और ओढने की व्यवस्था न होने पर , पुआल के बिस्तर पे एक ही रजाई में 3 -3 लोग सोते थे , पर फिर भी उसका आनंद आता था /सब में कितना अपना पन हुआ करता था / सुबह अर्ध्य देने के लिए मुंह अँधेरे ही उठते और अर्ध्य देने तालाब पे जाते / अँधेरे में घाट के चारों तरफ जलते हुए दिए , कितने अच्छे लगते थे / केलों के पेड़ से बनाये हुए द्वार , और रंग बिरंगी साड़ियाँ पहनी हुई महिलाएं / अर्ध्य के बाद मैं अपना सबसे पसंदीदा फल , नारियल बड़े चाव से खाता और फिर गन्ना चूसता /
उस वक़्त आलू की खेती का समय होता / मुझे खेतों में कम करना अच्छा लगता / मैं खेतों में जा कर , आलू की बुआई में मामा जी की मदद करता , गायों  के लिए घास काटता, चारा काटता ,खेतो में खाद पानी लगाता, मुझे ये सब बड़ा अच्छा लगता , बाकि सब और खेल में रहते / मेरे लिए यही सबसे अच्छा खेल होता /
छठ के अवसर पे , ननिहाल में नाटक मंडलियाँ अक्सर नाटकों का आयोजन करती / मामा जी उनके डायरेक्टर हुआ करते थे / नाटकों के सीन के बीच में कुछ GAP हुआ करता था , ताकि अगले सीन की तय्यारी परदे के पीछे की जा सके / इस  साल मैं भी उनके रिहर्सल में उनके साथ जाता / वो मेरी एक्टिंग सीखने का पहला अनुभव था / मैं चीजों को देख के ही सीखा करता था / ध्यान से हाव भाव , संवादों को देखता , और ब्रेक्स में उन्हें गाना सुनाता / लोगों को आश्चर्य होता के ये लड़का नये फ़िल्मी गानों को छोड़ कर ,पुराने गाने इतना डूब कर कैसे गाता है ? सब सराहना करते / उस साल पहली बार नाटक मंचन के बीच मामा जी ने मुझे एक गाना गाने के लिए स्टेज पर खड़ा कर दिया / सामने सैकड़ों लोगों की भीड़ थी , मैंने गाया " दुनियां बनाने वाले , क्या तेरे मन में समाई ............." गाना ख़त्म होने के बाद तालियाँ भी मिली और पैसे भी / थोड़ी देर बाद दुबारा चढ़ाया गया , मैंने गया "सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है ....." /  शायद छोटी उम्र के  कारण लोग पसंद कर रहे थे / ये मेरा अनुभव मेरे बहुत कम आया बाद में , जिसका जिक्र आगे आयेगा /
अगले दिन शाम को दो तीन लड़कियाँ आयीं और पता नही दांत निकाल निकाल के मेरी बहनों  (मामा की लड़की ) के साथ क्या बातें कर रही थी , बार बार मेरी तरफ देख रही थीं , और मैं भावविहीन चेहरा बना कर , दायें बाएं देखता हुआ पोजे दे रहा था / कुछ देर बाद वो सारे मेरे तरफ आने लगे , और मेरे दिल की धरकन तेज़ होने लगी , पता नही क्यूँ ? उन्होंने शरमाते इठलाते हुए ,मुझसे  वो दोनों गाने उनके नोट बुक में लिखने का आग्रह किया , जो मैंने रात गाये थे /उस वक़्त मैं किसी स्टार के अपने को कम नही समझ रहा था / वो तो औटोग्राफ देते हैं , मैं पूरा गाना ही लिख रहा था , वो भी दोनों गाने , दोनों नोट बुक में / उन्होंने चारों तरफ से घेर रखा था / उनका मेरे handwriting  की तारीफ करना मुझे अच्छा लग रहा था / अजीब सा अहसास था , नया नया सा /
इसी साल मैंने एक और चीज़ सीखी अपने ननिहाल में , वो थी , साइकिल चलाना / हा हा हा हा , मुझे अभी भी हंसी आती है , अपनी sixth की हिंदी की किताब में मैंने एक पाठ पढ़ा था , साइकिल की सवारी / बस ऐसा ही कुछ हाल हुआ मेरा / घास से भरे एक मैदान में सुबह 8 बजे से लगा , और दोपहर 2 बजे तक कई बार गिरने के बाद आखिर कर साइकिल पे चढ़ के ही वापस घर आया , और पास पहुँच के फिर धड़ाम/ 
हम सब ननिहाल से वापस आ गये / अब मुझे एक और कीड़ा काटने लगा था / वो था साइकिल चलाने का , मैं चाहता था के स्कूल साइकिल से जाऊं/ मैंने डरते डरते एक दिन पिता जी से बात की , उन्होंने ऊपर से नीचे तक देखा फिर बोले की साइकिल चलाना कब सीखा? मैंने उन्हें बता दिया फिर उन्होंने मुझसे पूछा के ओवरटेक कैसे करते हैं ? मैंने वो भी बता दिया / उन्होंने इस शर्त पे साइकिल की चाभी दी के पहले मैं सुबह सुबह खाली सड़क पे इसे चलाने की प्रक्टिस करूँगा , फिर स्कूल जाऊंगा / मैंने बात मान ली / अब तो मैं हवा से बातें करता था , जहाँ जाना होता साइकिल से हीं जाता , दिन भर , हर फुर्सत में , साइकिल साइकिल और बस साइकिल / साइकिल भी उस वक़्त ठोस लोहे का हुआ करता था , भारी और ऊंचाई भी उसकी ज्यादा थी/ उस वक़्त मेरे दोनों पैर ज़मीन पर एक साथ नही टिक पाते थे , जब मैं साइकिल पर हुआ करता था / लेकिन मैं संभल लेता था / एक घटना याद है , मैं गोलचक्कर पे साइकिल मोड़ रहा था , और संतुलन न बना पाने के कारण सीधा एक पुलिस जिप्सी के पीछे साइकिल ठोक दी थी , सिपाही उतरा और जोर का चांटा मर कर बोला , " पहले गाँधी मैदान में जाकर चलाना सीखो , फिर रोड पर चलाना "/वो चांटा अब भी याद है , उस वक़्त से लेकर आज तक मैं हमेशा सावधानी से driving करता हूँ, भले ही आज उस साइकिल की जगह मेरे पास bike है / भगवान भला करे , मगर उसके बाद मैंने आज तक किसी को भी टक्कर नहीं मारी / ज़िन्दगी में कुछ छोटी मोटी घटनाएँ होती हैं , मेरा मानना है के , इन्हीं घटनाओ में जीवन जीने के रहस्य छुपे होते हैं / ये आप के ऊपर होता है , कि इन घटनाओं को अप अपने जीवन में कैसे उतारते हैं , उनसे क्या सीखते हैं, और उनका असर आपके जीवन में कब तक रहता है / 

अब मैं ninth में पहुँच चुका था / हलकी हलकी मूछें भी आनी शुरू हो गयी थी / रोज़ एक नया दिन लगता / आइने में अपनी बॉडी रोज़ निहारता / बाल कई बार संवारता , हर एंगल से अपना फेस देखता / चलने का तरीका बदल चुका था / बात करने का भी / उस वक़्त कुछ ज्यादा ही गोरा था / जब काला चश्मा लगा के चलता , तो लगता निगाहें घूर रही हैं मुझे / किसी भी रिश्तेदारी में जाता तो कुछ नज़रें पीछा करती थीं , पर वो क्या कहती थी , मैं नहीं जानता था , या फिर समझ नही पाता था /शायद वजह यही थी के , मैं जिस स्कूल में था , वो co-education वाला स्कूल नही था / इसलिए नैन मटक्का आता नही था मुझे / मैं खुद अपने नज़रें नीची कर लेता था / दोस्तों के बीच मैं एक समझदार व्यक्ति कि भूमिका निभाता / झगड़े निपटता , सुझाव देता , साथ पढने को प्रेरित करता ,नोट्स बनाने के तरीके , और याद करने के तरीके इजाद करता / मेरे प्रश्नों को याद करने का तरीका बड़ा अलग था / मैं रट्टा नही मारता था , मैं Answer को  , लाइन by लाइन याद करता , उसे rough में लिखता जाता , जब सारी lines याद हो जाती तो फिर उसे बिना देखे पूरे को दुबारा लिखता फिर 5 min  रुक के , fare करता / थोडा समय तो लगता , लेकिन वो मुझे कंठस्त याद हो जाते थे / मैं लिख के याद करता था / शायद लगातार लिखना ही , मेरे अच्छी handwriting का राज था / मुझे पढाई करने में कोई परेशानी नही थी , मुझे तो लालसा थी अच्छे से अच्छे नंबरों से पास होने कि , पर घर के हालात अब बिगड़ रहे थे , और मेरा दिमाग भी अब विचलित होने लगा था /उस वक़्त इन्टरनेट वगैरह की सुविधा उपलब्ध थी नही , बस एक ही सहारा था , किताबें, जिन्हें पढ़ पढ़ कर मैं अपना दिमाग पढाई के अलावा कही और लगाता / मुझे याद है , पिता जी का एक बक्सा हुआ करता था जिसमे , गुरु दत्त , प्रेम चंद, इत्यादि जाने माने लेखको की किताबे हुआ करती थी / अब मैं उपन्यास भी पढने लगा था / मोटे मोटे उपन्यास २ दिन में ख़तम कर दिया करता था /

ये वो दौर था , जब पिता जी के clients केवल गिने चुने ही रह गये थे , और जेनेरल स्टोर से ही कुछ आमदनी होती जो घर चलाने के कम आती / अब घर में कटौती शुरू हो चुकी थी / जहाँ 5 लीटर का तेल का डब्बा आता वो केवल २ किलो का रह गया / कई चीजें तेज़ी के साथ बदलने लगी / पिता जी को अनुभव था नही इस तरह किसी दुकान को चलाने का , इसलिए वो भी धीरे धीरे उधारी के भेंट चढ़ रहा था / इन सब परिस्थितियों के बीच भी मैं अपना ध्यान अपने लक्ष्य पे लेके चल रहा था / पढाई पूरे मनोयोग के साथ कर रहा था / 

दो और चीजें मनोयोग के साथ चल रही थीं , पेंटिंग और क्रिकेट / पेंटिंग अब मैं कर सकता था , मैं बड़ा होने लगा था , और पिता जी भी धीरे धीरे बदल गये थे , मेरे प्रति / एक बार फिर उन्होंने मुझे micky mouse का बड़ा सा पोस्टर बनाते देखा , मैं फिर डर गया / लेकिन उन्होंने कुछ कहा नही , बस इतना के पढाई पे ध्यान दो , केवल पढाई ही कम आयेगा / मैं उनके कमरे में गया और समझाने कि, अपना पक्ष रखने कि कोशिश करने लगा /
उन्होंने एक संस्कृत का दोहा बोला था , जो आज तक मुझे याद है " लालयेत पञ्च वर्षानी , दश वर्षानी ताडयेत , प्राप्ते तु षोडशे वर्षे , पुत्र मित्र वदा चरेत " अर्थात - बालक को पांच वर्षों तक दुलार प्यार करना चाहिए , इसके बाद  10 वर्षों तक उसकी गलतियों कि उसे सजा देनी चाहिए , और जब पुत्र सोलह बरस का हो जाये तो उसके साथ मित्र कि तरह व्यवहार करना चाहिए / हालाँकि मैं अभी 13 - 14 के बीच ही था मगर उन्होंने इशारा कर दिया था के अब , पिटाई कि संभावना कम है /
जूनून क्रिकेट का भी ऐसा था के , रोज़ सुबह गाँधी मैदान मुंह अँधेरे उठना और जाना , गर्मी हो , बरसात हो ठण्ड हो /मैं अच्छा कर रहा था , हमारी टीम ने भीम राव आंबेडकर अंडर 16 क्रिकेट टूर्नामेंट में हिस्सा लिया / पहली बार मैं स्टेडियम में खेला , उसी में जिसमे बाद में अन्तर्रष्ट्रीय मैच भी हुए / बहुत हीं अच्छा अनुभव रहा , काफी सराहना हुई , सबसे ज्यादा मेरी फील्डिंग कि , स्लीप और पॉइंट मेरे पसंदीदा spot थे / उस समय jonty rohdes का आगमन ही हुआ था और वो क्रिकेट जगत में छाया हुआ था / हर टीम अब फील्डिंग में विशेष ध्यान देने लगी थी , हर किसी को एक जोंटी रोड्स चाहिए था / मैं वैसे बैटिंग करता था , और कभी कभार स्पिन बोलिंग भी/ मुझे याद है क्वाटर फ़ाइनल मैच में , हमारा ओपनर batsman नही आया और मुझे भेज दिया गया / मैंने 24 रन बनाये , बाद में बोलिंग भी कि और तीन विकेट भी चटकाए , मुझे man of the match मिला हम सेमीफाइनल में थे/ मुझे एक छोटा सा पीतल का कप मिला , मुझे याद है जब मैं घर वापस आ रहा था तो बारिश होने लगी थी और मैं लम्बे लम्बे डग भरता हुआ उत्साह के साथ घर जा रहा था , हाथ में मेरा वही कप था , जो उस बारिश कि ठण्ड में मुझे तपिश देने का काम कर रहा था  / उस दिन मैं बड़े हर्ष के साथ घर आया और पहले माँ को और फिर पिता जी को सब कुछ अति उत्साह के साथ बताया / माँ ने तो शाबाशी दी मगर पिता जी के विचार मुझे नेक नही लग रहे थे / 
मेरा टार्गेट था उस ट्रेनिंग सेशन में अपने को साबित करना जिसमे मेरी एंट्री सीधी हुई थी , मेरे पिछले टूर्नामेंट के आधार पर / वो ट्रेनिंग सेशन सबा करीम के द्वारा दिया जाना था , जो उस वक़्त इंडियन क्रिकेट टीम में विकेट कीपर भी चुने गये थे / मौका अच्छा था , सुखदेव नारायण खेलने का , रणजी से पहले , सुखदेव नारायण ही सीढ़ी थी / बड़ा ही महत्वपूर्ण मौका था /मेरे पास अपनी किट नही थी , लेकिन मैंने अपनी टीम मेम्बेर्स से एक एक चीजें उधार लेकर अपनी किट तय्यार कर ली थी /दुगने उत्साह के साथ सुबह मैं प्रक्टिस के लिए निकला , ये क्या , नीचे गेट के पास आ कर देखा तो , गेट लौक था , मैं ऊपर गया , माँ सो रही थी, मैंने उसे जगाया और पूछा के ताला क्यूँ लगा है ? माँ ने कहा के , तेरे पापा ने मना  कर दिया है, क्रिकेट बंद /
मेरे ऊपर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा , मुझे वजह ही नही समझ आई के हुआ क्या है ? माँ आधी नींद में थी , गुस्से और दुःख के मारे मेरी सांसे तेज़ तेज़ चल रही थी / मैं समझ नही पा रहा था के मैंने किया क्या है ? मैंने माँगा क्या है , पढाई भी कर रहा हूँ सब कुछ , मगर ये है क्या ? मैं चुप चाप छत पे चला गया , और फूट फूट के रोने लगा / मेरे समझ में नही आ रहा था के कैसे समझाऊं मैं पिता जी को /

थोड़ी देर बाद पिता जी जगे , मैं गुस्से में था , रोया बहुत था लेकिन टेंशन ख़त्म नही हो रहा था / अच्छा मौका था मेरे लिए , किसी भी कीमत में मुझे उसे खोना नही था / मैंने बात करने का फैसला लिया , थोड़ी देर बाद मैं सीधा पिता जी के पास पहुंचा और पूछा के उन्होंने मुझे क्यूँ रोका प्रक्टिस से ? उन्होंने दो टूक जवाब दे दिया के क्रिकेट अमीरों का खेल है , मैं तुम्हारे लिए एक bat भी नही खरीद सकता ,  क्या फायेदा उस काम में समय बर्बाद करने का , जहाँ तुम पहुँच ही नही सकते / मैंने कहा के मैं आपसे कुछ नही मांग रहा हूँ, सिर्फ इज़ाज़त , अगर कामयाब हुआ तो अपने दम पे ही होऊंगा / उन्होंने अपने पडोसी दोस्त के बेटे का उदाहरण दिया , जो क्रिकेट खेलते थे , काफी कोशिश और पैसे खर्च किये पिता जी के मित्र ने , मगर उनके बेटे रणजी तक भी नही पहुच पाए, ( वो अभी रांची यूनिवर्सिटी में कोच के रूप में कार्यरत हैं ) / मैंने लाख समझाया के जमाना बदल गया है, क्रिकेट बदल गया है , लेकिन वो खुद क्रिकेट के दीवाने थे , नही माने / मेरा दिल अन्दर से चकना चूर हो गया , उसके टूटने की आवाज़ केवल मैं सुन पा रहा था और कोई नही / मैं उम्र के उस पड़ाव में था , जब रगों का खून उबलने में ज्यादा वक़्त नही लगता , हालाँकि मैं बड़ा शांत प्रवृति का था , मगर इस घटना ने मुझे पूरी तरह से बदल के रख दिया / 
मुझे अच्छी तरह याद है के , उसदिन मैं साइकिल नही ले गया स्कूल / केवल चुप चाप गुस्से में स्कूल की तरफ पैदल चला जा रहा था /  मन में विचार उठ रहे थे , मैं कही से गलत नही, मेरे साथ गलत हो रहा है , मुझे क्या करना चाहिए? मन बड़ा दुखी था / स्कूल पहुँचते पहुँचते मैंने तय कर किया , मैं अपने आप को पूरी तरह से बदल दूंगा , ये अच्छाई पालने से कुछ नही होगा / मुझे जो नही मिलेगा , अगर मैं सही हूँ , तो पुरजोर विरोध करूँगा , विद्रोह कर दूंगा / जीवन में पहली बार , मैं स्कूल की चार दिवारी फांद कर लंच से पहले ही ,   बाहर आ गया / मेरे साथ कुछ और भी मित्र थे जो अक्सर भागा करते थे , वास्तव में उन्होंने ही मेरी मदद की स्कूल से कैसे भागते है , बताने में / बाहर भाग तो आया , मगर करूँगा क्या ? फिर उन्हीं हमदर्द मित्रों ने बताया के वो फिल्म देखने भागा करते थे , उन्होंने साथ चलने का प्रस्ताव रखा / मैं विद्रोही तो बनना ही चाहता था , मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया / हम स्कूल से करीब 3 KM  दूर एक सिनेमा हॉल पहुंचे / आज भी है वो हॉल , ASHOK , वहां पिक्चर लगी थी , AJOOBA स्टारिंग अमिताभ बच्चन ,बैग वगैरह उन तजुर्बेकार स्कूल भगोड़ो ने पहले ही ठिकाने लगा दिया था / मैंने जीवन में पहली बार , बिना फॅमिली के पिक्चर देखी, अजूबा / बड़ा मजा आया , DOLPHIN को देख कर , और फिल्म के  जादुई तमाशों को देख कर / सोंचने लगा , काश कुछ ऐसी ही जादुई चीज़ मेरे हाथ लग जाती तो मैं सब ठीक कर लेता / पिक्चर देखने के बाद कुछ अजीब से तसल्ली हुई दिल को , शायद दिल को ऐसा लगा हो , के मैंने आज विद्रोह किया है , नफे नुकसान की चिन्ता किसे थी ? घर आया , किसी से कुछ नही कहा बस अपने समय से रात को सो गया / ऑंखें बंद करने के बाद AJOOBA के जादुई दुनियां में खो गया और कल्पना करने लगा के , अगर कोई जादुई चीज़ मेरे पास आ जाये तो मैं कैसे अपना और लोगों का भला करता , पता नही सोंचते सोंचते कब आंख लगी/ 
उस जादुई चीज़ की कल्पना या इच्छा केवल उस समय की नही थी / मैं आज भी इसकी कल्पना और इच्छा करता हूँ , काश वो मुझे मिल जाती और मैं सब ठीक कर देता ...काश............



शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

Sangharsh Ki Shuruat II

मैं चलता जा रहा था ,सोंचता हुआ ,मन में बस एक ही चीज़ चल रही थी / मुझे कुछ करना है, यहाँ नही हो सकता , मुझे निकलना होगा यहाँ से / मेरी किस्मत में घर से बाहर  निकल के ही कुछ करना था ,कुछ बनना था शायद / मेरी मंजिल फिलहाल मेरी ननिहाल थी, जो पटना से 70 k.m. दूर है / मैं वहां का रास्ता जानता था , मगर शाम को वहां के लिए पटना से कोई बस नही थी / रात काटनी थी मुझे , वो पूस की रात / सबसे पहले मैं "महावीर स्थान " पटना पहुंचा  ये सोंच कर की यहाँ की भीड़ छिपने की अच्छी जगह है , जल्दी कोई ढूंढ़ भी नही पायेगा , और जब तक मंदिर खुला है , मैं यहाँ safe हूँ  ,वहां की घंटियों और करतालों के आवाज़ से मुझे कुछ याद आने लगा / भारत का एक जाना माना हनुमान मंदिर / इसके निर्माण की भी एक छोटी और रोमांचक कहानी है /
महावीर मंदिर , एक प्राचीन मंदिर है / मैं पिता जी के साथ वहां उस वक़्त जाया करता था , जब उसके दरवाजे झुके हुए थे , और मंदिर काफी जीर्ण शीर्ण अवस्था में था / एक IPS हुए पटना शहर में जिनका नाम था कुणाल, जुर्म के खिलाफ वो बहुत सख्त थे , और उतने ही अच्छे इन्सान , वो निसंतान थे / किसी ने उन्हें हनुमान पूजन के बारे में बताया / उन्होंने बीड़ा उठाया , हनुमान मंदिर के जीर्णोधार करने का / चंदा इकठ्ठा किया जाने लगा / "कर सेवा " शुरू की गयी /बड़ी संख्या में लोगों ने श्रम दान दिया / मैं भी उनमे से एक था / छोटा ही सही मगर जैसे एक गिलहरी भी एक छोटा सा पत्थर डाल रही थी , राम सेतु बनाने वक़्त , ऐसा ही कुछ था मैं उस समय /मंदिर पूरे ज़ोर शोर से बना / लोगों ने सोने चाँदी, नयी गाड़ी , रूपए पैसे , बहुत दान दिया / भव्य मंदिर तैयार हो गया / 
आज घर से भाग के उस नए और भव्य मंदिर में आ कर ग़ज़ब की स्फूर्ति महसूस हुई / मेरे वहां पहुँचने के कुछ ही देर बाद हीं एक बालक को , ठंढ में half paint और half shirt में  , bag कंधे पे टंगे देखकर , लोगों ने मुझे देखना शुरू कर दिया / किसी ने कमेन्ट भी किया था , " देखो लगता है tution class से भाग कर (bunk) आया है / धीरे धीरे दबाव बढ़ने लगा , मैं सबसे उपरी मंजिल पे चला गया, जहाँ कीर्तन हो रहा था / वहीँ एक कोना पकड़ा और ताली बजा कर कर कीर्तन का नाटक करने लगा / वही बगल वाले अंकल से confirm  भी किया की मंदिर कब  बंद होगा , उन्होंने बताया 11  बजे रात्रि  तक / करीब 10:30 बजे मैं ,वहां से बाहर आ गया और बाकि की रात मैंने स्टेशन पे बिताने की सोंची /उस वक़्त मेरी उम्र 10 -11  वर्ष से अधिक नही होगी , मगर मैं पूरी तरह गंभीर था / ठंढ बढ़ रही थी , मैंने सबसे पहले एक चाय पी, फिर स्टेशन की ओर चल दिया क्यूँ की , स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म से बढ़ कर रात बिताने के लिए कुछ नही होता / वो भी सस्ते में / स्टेशन  पहुँच कर मैं "व्हीलर्स " के पास पहुंचा वहां से रात बिताने के लिए कुछ किताबें खरीदी , पेमेंट के लिए मैंने 100  का नोट निकला / मेरे पास 50 का भी था , 20 का भी , मगर मुझे खुल्ले चाहिए थे / पिता जी अक्सर जब झारखण्ड जाते थे , तो पैसों को जेब में रख कर ले जाते थे /उसवक्त plastic money नही हुआ करती थी / वो अक्सर पैसों को अलग अलग बाँट कर जेबों में रखते थे / मैंने भी यही किया था क्यूँ की , 89-90 के समय 150 rs अच्छी रकम थी , मेरे लिए मोटी रकम / मैंने किताब खरीदी ,प्लेटफ़ॉर्म टिकट ख़रीदा और प्लेटफ़ॉर्म न. 3 पे चल दिया / १ न . या दो  न . पर पकडे जाने का डर था /वहां मैंने एक खाली बेंच देखि और किताब खोल कर पढने लगा , मैं कुछ भी याद नही करना चाहता था/ जिस वक़्त मैं किताब खरीद रहा था , उस वक़्त किसी की नज़र उस 100 के नोट पर पड़ चुकी थी और वो मेरे पीछे लग चुका था / वो मेरे पीछे पीछे उस बेंच तक पहुंचा और मेरे से कुछ सवाल जवाब किये मैंने बता दिया मुझे सुबह जाना है , रात काटनी  है बस / उसने मुझसे बोला के स्टेशन के फर्स्ट फ्लोर पे गेस्ट हाउस है वो 100 rs में कमरा दिलवा देगा / मैंने मना कर दिया मैंने कहा के मेरे पास 100 रूपए नही हैं , लेकिन उसने तो मुझे ठगने का पूरा प्लान बनाया था , उसे लगा के मेरे पास 100 का  नोट था , अब मेरे पास बस 70 ही बचे हैं, अब उसे हडपने के लिए उसने कहा के , वहां 50 rs में bedding system मिलता है / उसने मुझे अपनी मीठी बातों में फंसा लिया, ठंढ भी धीरे धीरे बढ़ रही थी ,  और मैं उसके पीछे वो bedding  सिस्टम देखने पुनः 1 न. प्लेटफ़ॉर्म चल दिया / उसके सभी आदमी मिले हुए थे , मैं सावधान तो था , लेकिन था तो बच्चा, मन का सच्चा , अक्ल का  कच्चा / 
Guest house पहुँच कर उसने मुझे bedding दिखाई , एक बड़ा सा कमरा था  ,जिसमे 8-10 बेड लगे थे , अन्दर कमरे में आकर मुझे अच्छा लग रहा था , क्यूँ की बहार ठण्ड थी और कमरे में गर्माहट / मैंने ओके कर दिया , उसने कहा के बेड उसे भी लेना था पर पैसे कम थे उसके पास , इसलिए मैं उसे कम से कम 70  रुपये दे दूँ , ताकि वो भी एक बेड लेले / मैंने सावधानी बरतते हुए ऑफर किया के , हम एक हीं बेड में कम चला सकते हैं,मैं तो थोड़ी जगह लूँगा बस छोटा हीं हूँ , और उसके पैसे भी बच जायेंगे / अन्दर का तो पता नही , मगर बाहर से वो बड़ा खुश हुआ / उसने कहा के पर्ची कटवानी पड़ेगी नीचे  १ न . प्लेटफ़ॉर्म पे जाके /मैंने कहा चलो मैं भी चलता हूँ / नीचे भीड़ थी , लाइन लगी हुई थी , उसने जल्दी से 50 rs मांगे और लाइन में खड़ा हो गया , मैं अलग से उसपर नज़र रखे हुए था / तभी एक ट्रेन आई और १ न. प्लेटफ़ॉर्म पे भीड़ जमा हो गयी / मेरी नज़रें कुछ देर के लिए ही उससे हटी , मगर धोखा देने वालों के लिए तो , एक पल ही काफी होता है / भीड़ के बीच से रास्ता बना कर किसी तरह लाइन के पास पहुंचा जहाँ उसे छोड़ के गया था , लेकिन वो तो भाग चुका था / मैंने बिना समय गवाएं दौड़ लगाई, चारों तरफ देखा , आधे घंटे तक दौड़ भाग करने के बाद मैं समझ गया के मैं उल्लू बन  चुका   हूँ / मुंह लटकाए मैं अपने 3 न. वाले बेंच पर पुनः वापस आ गया / अब मैं गंभीर था , मेरा मन किताब पढने में नही था / सबसे पहले तो मैंने ऑंखें बंद करके , हनुमान जी को याद किया , और दुहाई दी के हे प्रभु , अगर मैंने आपके लिए कुछ भी किया होगा , तो मेरे पैसे मुझे वापस लौटा दो , बजाप्ता मैंने उन्हें टाइम दिया के मैं मन में 100 तक गिनूंगा बस / मैं ऑंखें बंद करके 100 तक गिनने लगा , 100 बड़ा जल्दी ख़तम हो गया मैंने सोंचा के हनुमान जी को थोडा और टाइम मिलना चाहिए , मैंने 500 तक गिनने की  सोंची  , और ऑंखें बंद करके गिनती करने लगा / गिनती ख़तम हो गयी ,पर कुछ हुआ नही , न ही होना था / मुझे अब गुस्सा आ रहा था और , अब मैं केवल शुन्य को निहार रहा था / इस बच्चे का सच्चा दिल , घर और ज़माने की लापरवाही और धोखे से , धीरे धीरे सच्चाई खो रहा था , ये धोखे और विश्वाश घात की पहली घटना थी / मैं सोंच में डूबा था , रात गहरी होती जा रही थी , और ठण्ड बढ़ रही थी / मेरे पैर धीरे धीरे कांप रहे थे / उस वक़्त तो नही मगर आज मुझे ये महसूस होता है के , मेरा हनुमान जी को ध्यान  करना व्यर्थ नही गया था , उन्होंने एक और व्यक्ति को मेरे पास भेजा / मैं तो पहले से ही जला भुना हुआ था , मुझे लगा के एक और आ गया चूना लगाने / मैंने सही ढंग से उससे बात नही की / लेकिन वो भला आदमी था , उसने बड़े प्यार से , मेरे से बात की , आज आंसू पोछने वाले तो बहुत मिल जाते हैं , मगर वो कन्धा नही मिलता जिसपे सर रख कर हम रो सकें / मैं भावनात्मक तो था ही , उनकी बातों में , मैं और भी भावुक हो गया और , फिर सच उगलने लगा / मैंने सारी बातें बतायीं और उन्होंने ध्यान से सुनी / उन्होंने अपने बारे में भी बताया , वो भारत के पहले रेल इंजन फैक्ट्री में काम  करते थे जिसका नाम था "चितरंजन " जो आज भी है / दरअसल मेरी हिंदी की किताब में भी एक पाठ था जिसका शीर्षक था "चितरंजन का कारखाना " यही वजह थी की उनकी बात मैंने ध्यान से सुनी थी , और अपनी बातें भी बताई थी / फिर उन्होंने मुझे घर वापस चलने को कहा / मैं कहाँ  जाने वाला था , लेकिन उस व्यक्ति ने , जो सच में भगवान का ही भेजा हुआ कोई दूत था , लगभग १ घंटे के समझाने के बाद आखिरकार मुझे वापस घर चलने को मना ही लिया / रात के लगभग १ बज चुके थे / वो मुझे मेरे घर तक छोड़ने को मेरे साथ चल दिया / अब मेरी मनोवृति दूसरी हो चुकी थी / अब मेरे दिमाग में बस पिता जी का वो डंडा घूम रहा था , जो अन्दर से अलुमिनियम का तार था और ऊपर से उसपे प्लास्टिक का कवर चढ़ा हुआ था / लेकिन जब प्रयाश्चित करना था , तो डंडे से क्या डरना था / घर मेरा नजदीक ही था / मैं उनके साथ घर के नजदीक पहुंचा और उनसे वादा लिया के अगर पिता जी मुझे पीटेंगे तो मैं घर नही जाऊंगा , मैं कुछ दूर पहले ही एक ओट में छिप गया / उन्होंने मेरे घर का दरवाज़ा खटखटाया , माँ ने दरवाजा खोला , उनके बीच क्या बात- चीत हुई मुझे नही पता पर , उन्होंने आश्वाशन देते हुए आवाज लगाई मैं बाहर निकला और सर झुका के सीधा अपने कमरे में चला गया / घर के अन्दर आग जल रही थी, पिता जी ने , माँ ने उनसे बातें की , वो बाद में आने को कह कर चले गये / पिता जी और माँ ने उन्हें बहुत सारा धन्यवाद् दिया / मुझे नीद कहाँ आ रही थी , मुझे तो बस वो डंडा याद आ रहा था , सोंच रहा था हे  हनुमान जी , कम से कम अभी नही , बहुत ठण्ड है / रात को किसी ने कुछ नही कहा , सुबह माँ और पिता जी ने मेरे से कोई बात नही की , बस माँ ताने मरती रही , एक ही बेटा है,क्या क्या आशाएं लगाई हैं, पर ये किसी काम  का नही , कितना रोई मैं इसके लिए , अगर कुछ हो जाता तो वगैरह वगैरह / पापा कुछ नही बोल रहे थे , मुझे ये तूफान से पहले की शांति लग रही थी / तीन चार दिन बाद वो वक़्त भी आ गया / 
मुझे ऐसा लगता है के मैं भगवान् से जो भी मांगता हूँ वो मुझे मिल ही जाता है / उस वक़्त फिल्मो के पोस्टर में हीरो , जिसका माथे  पे पट्टी बंधी होती थी , उसे देख कर मुझे लगता था , के काश मेरे सर पे भी ऐसी पट्टी बंधी होती , बाल पट्टिओं के ऊपर से गिरे गिरे होते , किन्ना स्मार्ट लगता मैं / भगवान ने मेरी सुन ली , मेरे से कोई सामान पापा का , गिर कर टूट गया और फिर , पापा ने जो मार लगाई, उफ्फ्फ्फ़ / मगर गलती से ,  एक वार गलती से मेरे सर पर पड़ा और सर फट गया / सब घबरा गये , मुझे हस्पताल ले जाया गया , रास्ते भर समझाते रहे , वहां ये मत बोलना के पिटाई से सर फटा है / पट्टी बंध गयी , मनोकामना पूर्ण हो गयी / वहां से आने के बाद , मम्मी और पापा के बीच मुझे लेकर कुछ बातें हुई / उसके बाद से पिता जी का मारना  कम हुआ / 

पापा धीरे धीरे मेरे प्रति बदल रहे थे , अब वो मुझे चेस सिखाने लगे , और रोज़ हराने लगे / लेकिन मैं भी ,हारता भी था और सीखता भी / अब मेरे अन्दर जूनून था किसी को हराने का / मगर मेरी उम्र का तो क्या, थोड़े बड़े भी , मेरे घर के आस पास चेस खेलना नही जानता था / मैं दीवाना हो चुका था , मैंने "शतरंज के खिलाडी " देखी   उस वक़्त दूरदर्शन पर , और एक आईडिया आया के , मैं अकेला भी इसे खेल सकता हूँ / मैं नहा धोके सन्डे के दिन , शतरंज की बिसात बिछा कर खेलने बैठ गया / दोनों तरफ की बाज़ी मैं खुद खेल रहा था / मेरी दीदी , इसे बड़े ध्यान से देख रही थी / पता नही मेरी दीवानगी देख कर उसे एक शैतानी सूझी , मुझे तो कुछ पता ही नही चला / वो मेरे पास आई और बोली की , मैं तुम्हारे साथ शरतंज खेलूंगी , मैं बड़ा खुश हुआ के इसे तो मैं हरा ही दूंगा , क्यूंकि मुझे पता था इसे ठीक से खेलना नही आता, मगर उसने मेरे साथ एक शर्त रखी, वो ये के वो तभी खेलेगी जब मैं उसके कहे अनुसार करूँगा , मैंने हामी भर दी / मैं , जब तक मेरी मूछें नही आई थी , दिखने में लड़की की तरह दीखता था , उसने मुझे लड़कियों की तरह सजाना शुरू किया / चोटी बांधी , साधना की तरह माथे पे बाल को झुकाया , काजल , बिंदी , lipstick , कान की बाली , रूज़ , इत्यादि लगायी , मैं चुप चाप सारा करने दिया उसे , ये सोंच कर के वो मेरे साथ शरतंज खेलेगी / लेकिन वो तो कोई और ही शतरंज खेल रही थी मेरे साथ / वो बिलकुल भी नही हंसी जब तक मुझे पूरी तरह तय्यार नही कर लिया , और फिर बोली की हिलना मत यहाँ से , मैं आती हूँ अभी थोड़ी देर में / इसके बाद वो ज़ालिम, माँ को, आस पड़ोस की लड़कियों और महिलाओं को , ये कह कर बुला के लायी मुझे दिखने कि,  उसके घर एक नई लड़की आई है / हे  भगवान सब मुझे देखने आये , जोर जोर से हंस रहे थे , दीदी भी/ माँ कह रही थी , कितना सुन्दर लग रहा है / मैं अन्दर से खीज़  रहा था , मगर ये विश्वास था , के सब के जाने के बाद , वो जरुर खेलेगी , पर ज़ालिम मुझे उल्लू बना गयी , नही खेली मेरे साथ / और दुखी होकर सलवार कुर्ती उतरने लगा , और अपना makeup भी / आज भी उस घटना को सोंचता हूँ तो हँसी  आती है / 

समय तेज़ी के साथ बीत रहा था / धीरे धीरे पिता जी का कारोबार मंदा पड़ रहा था , मगर मुझे ज्ञान नही था / उन्होंने अतिरिक्त आमदनी के लिए , एक GENERAL STORE भी खोल लिया / बढ़िया उदघाटन किया / इसी बीच  दीदी का रिश्ता तय हो गया / पिता जी का शहर में शादी करने का ये पहला अनुभव था / लड़के वाले भी , हम से बड़े रसूख वाले थे / मगर पिता जी ने कोई कमी नही होने दी और अपनी चादर की लम्बाई का अनुभव उन्हें नही रहा / बिज़नस के भरोसे उन्होंने उस ज़माने में 1990 - 91 में करीब 5 लाख  रुपये खर्च कर दिए / मुझे इसलिए याद है के बाद में खर्चों का calculator पर मैंने ही टोटल किया था / पिता जी का अपना बैंक बैलेंस यूँ nil करना , उन्हें आने वाले समय में बहुत हीं भारी पड़ा / इसका अंदाजा मुझे अगले साल हुआ , जब लालू जी के राज में बिज़नस बिलकुल आधा रह गया , और पहली बार दशहरा में , हमारे लिए उन्होंने नये कपडे नही ख़रीदे / 
अब मैं आठवी कक्षा में आ चुका  था , और धीरे धीरे चीजों को , जो घर में चल रही थी, अच्छी तरह समझने लगा था / वैसे तो मेरे स्कूल में कोई विशेष फीस नही लगती थी , मगर फिर भी मैंने निर्णय लिया के मैं अब अपने पढाई का खर्च स्वयं उठाऊंगा / वो मौका मुझे जल्द ही मिल गया /मेरे नीचे  वाले फ्लैट में एक साउथ इंडियन फॅमिली रहा करती थी , जो क्रिस्चन थे , और उनकी बच्ची , Smitha S. john तीन साल की हो चुकी थी / मैंने उसे हिन्दू विधि विधान के सरस्वती पूजा के दिन से पढाना शुरू कर दिया / मुझे बदले में महीने के 150 rs मिलने लगे / मैं 5th तक उसे पढाता रहा , शायद  teaching की वो पहली ट्रेनिंग थी मेरी / वो हमेशा अच्छे नंबर से पास हुई /आज Smitha , Gurgaon IBM में काम कर रही है  और अपनी पढाई भी कर रही है / आठवी कक्षा में जाने के बाद से मैंने पिता जी से अपनी पढाई का कोई भी पैसा नही लिया / 

समय बिताता चला जा रहा था , पिता जी का बिज़नस भी धीरे धीरे खत्म होता जा रहा था / किसी तरह मैं अपनी पढाई की जरूरतों को पूरा कर रहा था , और पिता जी अपने घर के खर्चे को /अब मेरा और मेरे परिवार का सबसे मुश्किल समय आने वाला था /