बुधवार, 28 सितंबर 2011

Shangharsh ki Shuruat ...

एक तरफ मैं IPS के लिए मन लगा कर पढ़ रहा था , लोगों का मेरे ऊपर विश्वास देख कर , मैं बहुत उत्साहित था /
दूसरी तरफ मेरे सारे बुखार भी मेरे साथ साथ चल रहे थे / दिनचर्या कुछ यूँ थी :- सुबह 5 बजे कुंगफू (घर में , दौड़ लगाने जा रहा हूँ बोलता था ) , 6 - 7 :30 क्रिकेट , स्कूल जाने के दौरान 3 km के रास्ते में गाना (आने और जाने वक़्त ) , शाम को पढाई के बाद Drawing बनाना , और खाने के बाद सोने से पहले कॉमिक्स पढ़ना/
चाचा चौधरी का दिमाग , सुपर कमांडो ध्रुव का एक्शन और नागराज की फंतासी मुझे काफी रोचक लगती थी /कॉमिक्स के ग्राफिक्स से मैं हमेशा प्रभावित होता था , और अपने drawing में उन्हें उतारने की कोशिश करता था /मुझे याद है इस कॉमिक्स के शौक ने मुझे बचपन के अपने पहले business स्टार्ट करने की प्रेरणा दी / Business Model को बजाप्ते एक सादे पेपर पे लिखा /उसमे लिखा था " A. एक नयी कॉमिक्स के बदले 2 पुरानी कॉमिक्स पढने को दी जाएगी ,B , एक पुराने dizest के बदले भी २ कॉमिक्स मिलेंगी C . नयी कॉमिक्स share हमेशा नई के साथ ही की जाएगी / नहीं लौटने पर जुर्माने इत्यादि का भी जिक्र था / अब ठीक से याद नहीं उसका मजमून / फिर मैंने उसे फोटो स्टेट करवाया और दोस्तों में बाँट दिया / मेरा बिज़नस चल निकला और मेरे पास करीब 150 कॉमिक्स हो गये / पास के कॉमिक्स दुकान वाले से १-२ रूपए प्रत्येक के हिसाब से बेच दिया /कुछ अपने जेब खर्च के लिए रखा और बाकि की नई कॉमिक्स और dizest , इस तरह एक circle शुरू हो गया / मैं अपने धंधे पर पूरा समर्पित था / जो भी जेब खर्च मिलता मैं बहुत थोडा खर्च करता और अपने business में इन्वेस्ट करता ,इसका सिलसिला तब थमा जब मेरे कॉमिक्स की संख्या 250 तक पहुँच गयी / मेरे पढाई की अलमारी का निचला Floor पूरी तरह भर गया था / एक दिन पिताजी का मेरे टेबल के पास आना हुआ , उनकी नज़र अलमारी के नीचे पड़ी और मेरे बुलावा दुसरे कमरे में हुआ / उन्होंने मेरे घुसते ही पूछा के सारे कॉमिक्स यहाँ पे लाओ , मैं सारी कॉमिक्स उनके पास ले गया / दिल माधुरी की तरह धक् धक् कर रहा था , पापा  पीटते तो नहीं थे जल्दी मगर जब पीटते  थे तो मुझे सारे भगवान याद आ जाते थे /  पापा ने सारे कॉमिक्स के rates देखे , सबको टोटल किया , मेरे से पूछा " पैसे कहाँ से आये इतने सारे ?" मैंने अपनी पूरी बात बताई , लेकिन उनको मेरा business plan समझ नहीं आया और वो शक में आ  गये की कहीं मैं गलत संगत में तो नहीं /उन्होंने कड़ाई से पूछ ताछ की , मैं speak asia (a company ) के सीईओ मनोज कुमार की तरह अपना business plan समझाता रहा / उनके सब्र का बांध टूट गया और मेरे ऊपर उनका डंडा भी , उन्होंने कॉमिक्स का भूत उतार दिया / मेरा business फेल हो गया /

अब मैं ज्यादा ध्यान Drawing पे देने लगा,जहाँ जहाँ डंडा लगा था , उसका दर्द कुछ दिनों और असर कई महीनों तक रहा /बाकि चीजें चल रही थीं/ उसी दौरान मेरी दोस्ती एक ऐसे लड़के से हुई जो घर के पास का हीं था और उसकी sign board पेंटिंग की दुकान थी / उससे मेरे दो फायेदे हुए , एक वो साइकिल से स्कूल जाता था , मैं उसके साथ , दोनों साथ लौटते थे /सन्डे को उसके घर जाता था घर का बाहर के हिस्से में दुकान थी / वहां मैं आर्ट सीखता था देख देख के , कैसे वो किसी की पोट्रेट बनाते हैं / घर आ कर प्रक्टिस करता था / जल्द ही मैं छोटे फोटो से , किसी का भी पोट्रेट बनाने लगा , लोग पसंद करते थे / थोड़ी कमियां हुआ करती थी , लेकिन मेरी उम्र देख के लोग उसे इग्नोर कर देते थे /  एक बार मैं पूरा मन लगा कर अपनी फेवरेट हेरोइन ASHA PAREKH की पिक्चर बना रहा था , मैं इतना डूबा हुआ था के मुझे ध्यान हीं नहीं रहा के पापा कब मेरे पीछे से मुझे देख रहे हैं / अचानक उन्होंने पूछा "क्या कर रहे हो " मैंने कुछ बोला नहीं , उन्होंने ये कह कर उस पेंटिंग को फाड़ दिया के मैं पढाई पे ध्यान नहीं देता और ये सब बेकार की चीजें हैं /मेरा करियर पेंटिंग में नहीं है / मेरी कई घंटों की मेहनत बेकार हो चुकी थी / वो फटी हुई तस्वीर मुझे इस तरह लग रही थी , जैसे किसी में मेरे चेहरे , मेरे अस्तित्व को फाड़ कर फ़ेंक दिया हो /   अब मैं धीरे धीरे बड़ा हो रहा था और मेरे अन्दर का विद्रोह अब जाग रहा था / मुझे अहसास हो चला था के पढाई और डिग्री के अलावा जो भी मेरे अन्दर गुण हैं वो मैं पूरा नहीं कर पाउँगा , क्यों की मुझे पापा का सहयोग मिलने वाला नहीं / मेरा विरोधाभास अब मुझ पे हावी होने लगा था , अब मैं बड़ा हो रहा था / बड़ों की किताबें बड़ों का ज्ञान सब ध्यान से सुनने समझने के कारण, जल्दी ही मेरे अन्दर का विद्रोही भी जल्दी बड़ा हो चुका था / अपने सपनों को यूँ परों तले रोंद्ता हुआ देख ,अब उससे बर्दाश्त नहीं होता था / 
 मैंने अपने ही बलबूते पर बिना सीखे कुछ prize भी जीते , लेकिन उसका मूल्यांकन कोई नहीं कर पाया /         जब इस लायक हुआ के अपना मूल्यांकन खुद कर सकूँ,समय रेत की तरह मुट्ठी की तरह फिसल चुका था / अब बहोत देर हो चुकी थी / मेरा ये शौक चित्रकारी का 2003 तक रहा , अब तो समय हीं नहीं रहा /लेकिन मैं कूची पकड़ना अभी भुला नहीं हूँ /
कुंगफू के लगभग आठ महीने हो चुके थे / मुझे अपग्रेड होना था / जब तक yellow बेल्ट था , तब तक अपने मास्टर और दोस्तों की ड्रेस से काम चलाया मगर अब मुझे नई ड्रेस चाहिए थी , एक ननचक और एक तलवार जो खासतौर पे ट्रेनिंग के लिए बनाई जाती थी / पैसा लगना था कोई चारा नहीं था पापा से बात करने के अलावा /मास्टर ने बोला के मैं कोशिश करूँगा लेकिन 800 /- rs तो देना ही देना था / मेरे पास कोई चारा नहीं था / मैंने शाम को पापा का मूड देख के बात करने की कोशिश की / मैंने सब सच बता दिया कब से जा रहा हूँ , क्या क्या सिखा , मास्टर तारीफ करते हैं वगैरह / पापा ने सारी बातें बड़े ध्यान से सुनीं / पहले हँसे , मुझे गौर से देखा , फिर मेरे पास आये , बोले अब लड़ मेरे से कराटे, उन्होंने मेरा गिरेबान पकड़ लिया और झुलाने लगे / अरे लड़ न , बार बार वो बोल रहे थे / मैं चाहता तो एक सेकंड में अपना गिरेबान छुड़ा सकता था , लेकिन मुझे सिखाया गया था मास्टर के द्वारा के सम्मान क्या होते है, ये विद्या क्या है / जब मैंने कुछ नहीं किया तब उन्होंने मुझे थप्पड़ मार दिया , बोले अब तो लड़ के दिखा , चला कराटे / उस समय उस बच्चे के दिल पे क्या बीत रही होगी , जिसका हर सपना कुचला जा रहा हो , रोंदा जा रहा हो / अन्दर एक तूफान सा चल रहा था , पढ़े लिखे लोगों के इस व्यव्हार से मैं चकित था , जो गाना तो सुनते थे , गाने नहीं देते थे , ओलंपिक्स में कराटे देखते थे , महत्व भी जानते थे मगर सिखने नहीं देते थे / शायद मेरी सुरक्षा और करियर इसका कारण हो सकती थीं / मुझे पे कुछ नहीं बना / मैंने पहली बार अपनी आँखों से अपने पिता को विद्रोह भाव से देखा , और अपने रूम में वापस चला आया / सारी बातें माँ को बताई , सांसे तेज़ चल रहीं थीं / सारी बातें बोलीं . उसने सिर्फ इतना कहा , तेरे भले के लिए था / तुझे चोट लग सकती थी /मैंने बाद में अपनी क्लास जारी रखने की कोशिश की , मगर कर न सका / वो सपना भी अधुरा रह गया /

Cricket पिता जी को बहुत पसंद था रेडिओ के ज़माने से हीं पांच पांच दिनों तक टेस्ट मैच सुनते देखा था मैंने जब मैं 4 - 5 साल का रहा होऊंगा /क्यूँ के मैं घर से हमेशा दौड़ लगाने के बहाने अपने दोनों कम करता था / मेरा सुबह जाना भाई बंद करवा दिया गया / काफी मिन्नतों और माँ की सहायता से गाँधी मैदान दोबारा जाना शुरू हुआ / क्रिकेट का दीवानापन मेरे अन्दर बढ़ता जा रहा था /

ऐसा नहीं था के केवल मुझे कॉमिक्स पढने का ही शौक था , वो मेरे लिए मनोरंजक हुआ करती थी / लेकिन ज्ञान वर्धक भी पढता था , नंदन , सुमन सौरव, प्रतियिगिता दर्पण  इत्यादि / उसी दौरान एक किताब से मेरा परिचय हुआ जिसका नाम था , धर्मयुग/ ये किताब बच्चों के लिए नहीं थी / इसमें उस समय के सामायिक विषय (current affairs ) राजनीती इत्यादि की बातें होती थीं / लेकिन वो धरमवीर भारती के संपादन का जादू था हरेक पन्ना अच्छा लगता था / सभी ये देख कर आर्श्चय चकित होते थे के ये बड़े लोगों की किताब इतने ध्यान से क्यूँ पढता है ? कुछ लोग छींटा -कशी भी करते थे , पढ़ाकू, विद्वान , एक दिन प्रधान मंत्री बनेगा आदि इत्यादि /मगर मुझे पता था , मुझे IPS की तय्यारी करनी है, जितना ज्ञान हो सके लेना है / मोहर सर की बातें याद थीं मुझे , किताबें सबसे अच्छी मित्र और ज्ञान का स्रोत होती हैं / मैं सारी चीजें एक साथ कर रहा था / लेकिन टार्गेट याद था मुझे, IPS बनना /
धर्मयुग में , एक कार्टून कोना भी आता था , जिसके मुख्य पात्र का नाम था ढब्बू जी / तब जाके मुझे पता चला के पापा मुझे ढब्बू जी क्यूँ बुलाते हैं ?
मेरे नामों की लिस्ट भी लम्बी है , जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ेगी , पता चलता जायेगा / अब तक तो स्कूल और दोस्तों के बीच रवि , पापा और ननिहाल में ढब्बू जी , माँ के लिए लालो , और बड़ी बहिन के लिए बाबु था / कुछ लोग पंडित जी भी बोलते थे /

 इधर पटना में लालू जी की सरकार में धीरे-धीरे जाती वाद बढ़ने लगा था /उच्च जाती और पिछड़े वर्ग के लोगों के बीच दूरियां बढती जा रहीं थीं / उच्च जातियों के प्रभाव , सम्मान घटते जा रहे  थे ,और घटती जा रही थी , बिहार की अर्थ और कानून व्यवस्था  , मगर ये तो अभी शुरुआत थी / अभी तो बिहार को बहुत कुछ देखना बाकि था ,और मुझे भी /

पिता जी का Fire bricks (एक प्रकार की ईंट जिसका इस्तेमाल very high temperature वाली जगहों पे होता है ) का व्यवसाय था / अच्छी कमाई थी , मगर धीरे धीरे Industrial Area के कारखाने बिहार छोड़ के जा रहे थे , जो हमारे ग्राहक थे , उनका बिज़नस धीरे धीरे मंदा पड़ रहा था , मेरे आने वाले संघर्ष की बुनियाद तय्यार हो रही थी/

इसी बीच एक और घटना हुई , डंडे की मर का असर कम हो चुका था , और एक नए कॉमिक्स पे मेरा दिल आ गया / मैंने चुप चाप खरीदी और अपने स्कूल बैग में रख लिया / मुझे याद है वो 13 जनवरी थी , बहुत ठण्ड थी / लेकिन बचपन से हीं मुझे एक बीमारी है , मौसम के उल्टा रहना , शायद मेरा शरीर ही ऐसा है / मई की गर्मी में में आज भी मैं बिना fan के रह सकता हूँ अगर जरुरत पड़े तो , सो भाई सकता हूँ अगर मच्छर न हो एक भी / ऐसे ही ठण्ड में ज्यादा कुछ लादने की जरुरत नही पड़ती , बहने मुझे कभी कभी A/C और माँ मुझे बाबाजी भी बोल देती हैं / 
मैं कॉमिक्स लेकर आया और बैग रख कर खेलने चला गया /मेरा प्लान था के अगले दिन मकर संक्रांति की छुट्टी है स्कूल में , पापा भी घर से बाहर अपने business के सिलसिले में गये है / कल जब माँ कम में व्यस्त होगी मैं चुपके से उसे पढ़ लूँगा / किस्मत ख़राब थी या होनी थी , माँ ने बैग धोने के लिए उसे खाली किया और मेरा कॉमिक्स पकड़ा गया /शाम को जब आया , माँ ने बहुत कुछ सुनाया , बोली आने दे तेरे पापा को कल  , तेरी वही खबर लेंगे , तू नही सुधरेगा / उस दिन मैंने सारी रात डर के गुजारी / अगले दिन बहुत सोंचा और अंत में फैसला किया , रोज़ रोज़ के पिटने से अच्छा घर ही छोड़ देना चाहिए / मेरे पास 50 rs  थे ,प्लान बनाया , चुप चाप अपने स्कूल बैग में कुछ कपड़े डाले /माँ के purse से 100 rs और निकाले और तय किया मैं बिना किसी को बताये अपने ननिहाल चला जाऊंगा , एक वही जगह थी जो मैंने देखि थी और जहाँ जा सकता था / शाम को करीब 5 बजे मैंने घर छोड़ दिया , वो मंजर अभी आँखों के आगे घूम रहा है , सफ़ेद half shirt , और नीली half paint , कंधे पे बैग , और मैं चला जा रहा हूँ तेज़ तेज़ / वो मेरे विद्रोह का पहले कदम था /







सोमवार, 26 सितंबर 2011

MERE MAHATWAPURN 5 SAL

इंदिरा गाँधी के कत्ल के वक़्त curfew बहुत लम्बे समय तक चला / कई लोगों के धंधे चौपट हो गये /पिता जी के काम पे भी इसका प्रभाव पड़ा / बिज़नस आधा रह गया था / इसी बीच मेरी एक और बहन का जन्म हुआ /मुझे खेलने को , खुश होने को एक खिलौना मिल गया / अब मैं आठ साल का का हो चुका था , कक्षा पांचवी / उस वक़्त भी मैं अपने पापा के बिज़नस के बिल्स वगैरह बना लेता था , Quantity , रेट वगैरह verify कर लेता था /कुल मिला कर , उनके न रहने पर ,माँ की सहायता से , सारा कम देख लेता था / जो भी आता यही कहता के ये लड़का एक दिन कुछ करके दिखायेगा / 

4th क्लास में हिं मुझे एक शिक्षक मिले थे , मोहर सर नाम था उनका / वो GK  की पढाई कराते थे / उन्होंने सब से पहले मेरे अन्दर IPS exam पास करने के जज्बे को जन्म दिया / उनको मेरे ऊपर पूरा भरोसा था / पुरे दो साल जब तक मैं उस कॉन्वेंट स्कूल में रहा , उन्होंने मेरी GK इनती स्ट्रोंग कर दी के मैं 10th  तक के बच्चों को भी , GK में मात दे दिया करता था / मोहर सर बड़े ही अच्छे और बच्चों को प्यार से समझाने वाले teacher थे , उनका ये स्वाभाव  मेरे ऊपर बहुत गहरी छाप छोड़ गया , जो बाद में मेरे खुद के शिक्षक जीवन में काम आया / 

मेरे प्रिंसिपल सर का नाम श्री विजय सर था /वो बहोत ही कड़क और "पढाते नहीं गुरु जी , पढ़ाती छड़ी है " को मानने वाले थे / मेरा उनके डंडे से सामना बहुत कम होता था , लेकिन जब होता था तो बहुत कष्ट दायक होता था , क्यों की मैं थोडा कोमल टाइप का लड़का था / मुझे याद है मेरी पहली क्लास उन्होंने Parts of Speech ना याद करके  लाने के लिए ली , "कुर्सी " बना कर (जिसमे आप ना खड़े रह सकते और ना बैठ ही सकते ) 30  मिनट में पूरा Parts of Speech याद करा दिया , खड़े होने की कोशिश में , डंडे उपहार स्वरुप मिले / मेरा शरीर लाल पड़ गया / उस रात मुझे बुखार भी चढ़ा /लेकिन मेरे माता पिता स्कूल में कभी इस बात की शिकायत ले कर नहीं जाते थे के मेरे बच्चे को क्यूँ मारा , वजह सही होनी चाहिए / आज के समय में अगर ऐसा किया जाये तो गुरु जी को जेल की चक्की पीसनी पड़ सकती है /

पटना में एक बहुत ही नामी स्कूल है "Sir G.D. Patliputra High School" जिसकी स्थापना 1917 में हुई /इस विद्यालय ने कई  IAS , IPS और ना जाने कितने doctors  , engineers और बहुमुखी प्रतिभाओं के भविष्य की बुनियाद रखी/ इसमें दाखिला entrance exam  के बाद ही होता था / दाखिला 6th क्लास से लिया जाता था /अब मुझे अपना कॉन्वेंट स्कूल छोड़ना था, और अगला पड़ाव इस विद्यालय में दाखिला लेना था  / मोहर सर को छोड़ने का  दुःख तो था पर , एक तरह की ख़ुशी भी , क्यूंकि मैं 6 कमरों के स्कूल को छोड़ कर 100 कमरों के स्कूल में जा रहा था /दाखिले का exam 4 subjects का हुआ ,हिंदी , इंग्लिश , मैथ और GK , मैं फेल हो गया / वजह थी हिंदी , मैं कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ा था और यहाँ question Govt के Text बुक की थी / पहली बार मुझे फेल होने का अहसास हुआ , मैं बहुत रोया , सभी ने  समझाया तुम्हारी गलती नहीं , तब जाके माना/ लोगों ने सलाह दी मुझे एक और स्कूल में डाला जाये जहाँ Govt Text Books के हिसाब से पढाई होती हो / मुझे एक pubic  स्कूल में दाखिला 5th class में ही दिला दिया गया / मेरी पढाई का एक साल इस तरह बर्बाद हो गया / अगले साल हजारों विद्यार्थियों ने दाखिले की परीक्षा दी /मैंने भी पुनः परीक्षा दी / मैं पास हो गया , मेरा नंबर 103 वां था / मैं अपना नाम देख कर इतना खुश हुआ के स्कूल से दौड़ते हुए घर पहुंचा , ३ km बिना रुके / बिना किसी tutuion  के ये मेरी पहली छोटी सी उब्लाब्धि थी , जिसने मुझे बहुत ख़ुशी दी / 

स्कूल में मेरा section  मिला E और रोल No 102 , section F  तक था , और प्रत्येक section में 105 विद्यार्थी / इतने बड़े स्कूल में आकर मैं खुश था / पहले दिन ही introduction में मैं अपनी क्लास Teacher की नज़र में आ गया / 2 month में ही मोनिटर बना दिया गया / 

उधर घर पे सब ठीक चल रहा था / मुझे क्रिकेट का , और पेटिंग का बुखार चढ़ चुका था लेकिन मैंने घर में इसकी चर्चा नहीं की थी , बस स्कूल तक ही सीमित था /दो और बुखार चढ़े , गाने का और कॉमिक्स पढने का / इतने सारे बुखारों के बाद भी , मैं अपनी पढाई और स्कूल में अच्छा कर रहा था / इतने बच्चों के बीच अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था / 

इसी बीच एक और घटना हुई , रामानंद सागर की रामायण का आना हुआ / हमारे घर पर उस समय TV नहीं था , मैं पड़ोस में TV देखने जाया करता था , हर रविवार , रामायण ......./ पिता जी को ये पसंद नहीं था फिर भी मैं चोरी से चला जाता था , मुझे रामायण से प्रेम था / एक दिन किसी जरुरी काम से पापा ने मुझे याद किया , मैं मिला नहीं , पता चला मैं रामायण देख रहा हूँ /पापा ने मुझे बुलाया  , बहुत पिटाई की / मेरे अन्दर की विद्रोही प्रवृति धीरे धीरे जागने लगी थी , बेकार की पिटाई (मेरे हिसाब से ) मुझे अच्छी नहीं लगी / शाम को ही पिता जी घर में टीवी ले आये/ मैं नाराज़ था , लेकिन खुश हो गया / 

मैं सातवीं कक्षा में पहुँच चुका था / धीरे धीरे मेरे अन्दर का व्यक्तित्व उभरने लगा था / मैं उस समय भी किसी की शिकायत लिखित रूप से प्रिंसिपल रूम में देता था , जिससे अन्य शिक्षक और प्रिंसिपल की नज़र में मैं आ चुका था / प्रिंसिपल रूम में 9 th - 10th  के भी विद्यार्थी जाने से घबराते थे , और किसी की लिखित शिकायत के बाद , उस लड़के के बड़े भाई इत्यादि मोनिटर की पिटाई भी करते थे / लेकिन सत्य के लिए लड़ना शायद खून में था / विद्रोही तो मैं था हीं/एक ऐसे हीं मौके पे स्कूल से आने वक़्त मुझे कुछ बड़े लड़कों ने घेर लिया , और मेरी लात घूसों से पिटाई की / मैंने घर जा कर किसी को कुछ नहीं बताया , पर गुस्से में खाना भी नहीं खाया / रात भर सोंचता रहा , फिर प्लान बनाया / अगले दिन स्कूल नहीं गया / स्कूल की छुट्टी 4 :20 में हुआ करती थी / करीब 2 बजे से हीं अपनी तैयारी में लग गया /अब मैं युद्ध के लिए कवच इत्यादि धारण कर रहा था / पहले एक स्टील की पतली चादर अपने शर्ट के अन्दर डाली (ताकि पेट में चोट न लगे ) , दोनों हाथों में साइकिल के चेन, बांधी, ऊपर से शर्ट पहना और चल दिया शहंशाह , युद्ध लड़ने / ये मेरे ऊपर फिल्म का प्रभाव भी था , और पहली बार सच के लिए लड़ने की इक्षा भी / ठीक 4 बजे उस गली के नुक्कड़ पे पहुँच गया , जहाँ से वो लड़के गुजरते थे / उनका आगमन हुआ और शहंशाह टूट पड़ा उनपर / मेरे मुंह पे जो घूंसे पड़े , वो तकलीफ देने वाले थे , लेकिन और कहीं जो उन्होंने मारा , उनके लिए तकलीफ देने वाले थे / वो भाग गये , जाते जाते कल की धमकी दे गये / 

कल होके मैंने दो काम किया , एक अपना दाखिला बिना घर वालों से पूछे हुए (मुझे पता था पापा मारेंगे भी और जाने भी नहीं देंगे ) , कुंगफू ट्रेनिंग सेंटर में लिखा लिया / वहां भी एक छोटा सा entrance exam देना पड़ा / वो थे केहुनी के बल खुरदुरी जमीन पर चलने का , जब तक थोडा खून न निकले / वो मैंने पास कर लिया /  मुझे लग गया था के इस ज़माने में जीने के लिए आत्म रक्षा जरुरी है / दूसरा काम था उन लड़कों के खिलाफ प्रिंसिपल को तगड़ी चिट्ठी लिखना / सुबह application दी और लंच तक उनके guardian आ गए / मामले को ख़तम किया गया /

 एक और घटना हुई जो बिहार के इतिहास में पता नहीं किन अक्षरों में लिखी लाएगी , लेकिन मेरे लिए तो बाद में ये घटना , मेरे सारे सपने , सारे करियर , मेरे पिता के कारोबार सब के लिए एक तीखा मोड़ साबित हुई ......

रविवार, 25 सितंबर 2011

Jalim Singh Ka Bachpan

RAVI SHANKAR
 मेरा जन्म भी आर्श्चय जनक ही था / मुझे अब तक वो दृश्य याद है, जो एक शोर्ट क्लिप की तरह है जिसमे नर्स बोल रही है , कितना सुन्दर बच्चा है और मुझे गोद में उठा कर एक बार घूम जाती है / शायद कई लोगों को विश्वास न हो मगर , मुझे अपने जन्म के तुरंत बाद  का वो पहला Female Compliment  अब तक याद है /शायद इसलिए के  मेरी sixth sense बहुत ही स्ट्रोंग थी / 

जन्म के कई मिनटों के बाद अचानक मैं रोने लगा था (ये मुझे याद नही माँ ने बताया ) कई मिनटों तक चुप नही हुआ था , तब मेरी माँ को कुछ शक हुआ और वो रोने का कारण जान गयी , उसी वक़्त एक बहुत ही छोटा opration हुआ था , बिना मुझे बेहोश किये , क्यूँ की अभी जन्म का एक घंटा भी पूरा नही हुआ था / मुझे याद तो नही के उस नवजात को कितना दर्द हुआ होगा , मगर शायद इसी वजह से मेरे में बर्दाश्त करने की क्षमता का विकास हुआ / 

जब कुछ महीनो का हुआ तो अक्सर बीमार पड़ने लगा , ये सिलसिला तब तक चला जब तक इतना बड़ा न हो गया के मुझे Injection दिया जा सके , मैं 3  वर्ष का हो गया था / एक बड़े ही प्रसिद्द डॉक्टर ने दवा लिखी , २ Injection  सुबह और २ injection  शाम / मुझे याद है , जब पापा मुझे injection दिलवा के लाते थे , साइकिल की अगली सीट पर बैठा नही जाता था , करवटें बदल कर बैठा करता था / रूह कांपती थी सुबह शाम , मैं भी रोता था और माँ भी / ये दर्दनाक सिलसिला तब तक चला जब तक एक और डॉक्टर से मुझे इसी शर्त पर दिखाया गया के वो मुझे Injection नहीं देंगें/ सच तो ये है के injection  पड़ते पड़ते मेरे कूल्हों पे निशान पर चुके थे , जो अब तक नहीं मिटे , ये दर्द लेने और सहने के ट्रेनिंग भगवान ने बचपन से ही  देनी शुरू कर दी थी / 

 मैं बचपन में ज्यादा शरारती तो नहीं था मगर दीदी बताती है के जब वो गोद में लेके मुझे घुमती थी , मैं उसकी पीठ पे चुटकी काट काट के बेहाल कर देता था / 
अब मैं थोड़ा और बड़ा हो रहा था , और चीजों को बड़ी जल्दी समझने लगा था , उसी उम्र में सब कुछ जानने की इक्षा बलवती थी / सूर्य  , चन्द्रमा , प्रधान मंत्री , अमिताभ bachhan , क्रिकेट , फिल्म सब कुछ / 
बचपन कुछ घटनाएँ मेरे जीवन में बहुत ही महत्व रखती हैं / उस वक़्त देश की प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी थीं / मैंने पिता जी से सवाल किया "वो क्या खाती होगी " पापा ने जवाब दिया "यही रोटी चावल दाल और काजू किशमिश " मैंने सोंचा अगर हमारी तरह ही खाती है तो वो प्रधान मंत्री क्यों हैं ? मैंने फिर पूछा " और सोती कहाँ है " पापा ने हँसते हुए कहा "चाँदी के पलंग पे और नोटों के बिस्तर पे " (शायद वो मेरे मनोभाव समझ गये थे )...मुझे अब लगा हाँ , ये कुछ हुई प्रधान मंत्री वाली बात , मैंने फिर पूछा , "नोटों के बिस्तर पे कैसे सोती है " पापा ने कहा रुक बताता हूँ / इसके बाद पिता जी ने 1 , 2 , 5 , 10 और 20 की गड्डियों को जो वो अपने बक्से में रखा करते थे , एक बिस्तर सा बना दिया , उसपर एक पतली चादर बिछा दी और मुझे सुला दिया / मुझे अब तक उन नए नोटों की खुशबु याद है / क्या दिन थे वो भी / 

एक और विचित्र घटना उसी समय की है , नवरात्री का समय था / पिता जी , कलश स्थापना करते थे उन्होंने दीदी को बाहर की पान दुकान , जो घर से करीब 150 मीटर की दुरी पे था , से पान लाने को कहा (पूजन के लिए ) दीदी ने मेरे हाथ पकड़ा और चल दी / वो पान दुकान एक मील के पत्थर(जो अक्सर सड़क के किनारे दूरी बताने के किये गाड़े जाते हैं ) के ऊपर था / जब हम पान दुकान के पास पहुंचे तो अचानक ही शोर मचने लगा, चरों तरफ भागम भाग होने लगी, एक हाथी पागल हो गया था , और वहां के आस पास के दुकानों को तोड़ रहा था , अफरा तफरी में डर के मारे दीदी ने मेरा हाथ छोड़ दिया और घर के तरफ दौड़ लगाने लगी / मैं अकेला पड़ गया लेकिन दिमाग ने साथ नही छोड़ा / मैं उस पान दुकान के निचे घुस गया , और अपने आप को उस मील के पत्थर के पीछे छिपाने की कोशिश करने लगा / झांक झांक कर लोगो को भागते हुए और हाथी को गरजते हुए देख रहा था / थोड़ी देर बाद सब शांत हुआ और पापा ने मुझे दुकान के निचे पा कर चैन की साँस ली / दीदी को उस दिन बहुत डांट मिली , और मुझे माँ का असीम लाड -प्यार और आलू के पराठे , धनिया की चटनी , जो मेरा सबसे प्रिय आहार था / 
एक छोटी सी और घटना है उसी पान वाली दुकान की . पिता जी को पान खाने का शौक था /पिता जी देवी की आराधना करते थे और मस्तक पे रोज़ काला तिलक लगा दिया करते थे /एक बार उस पान वाले ने मुझसे पूछा "ये काला तिलक क्यूँ लगाते हो , खतरे की निशानी है " मेरे जवाब था " इसलिए तो लगता हूँ " वो मुझे देखता रह गया , उस वक़्त मेरी उम्र 5 साल थी / मुझे बाद में अहसास हुआ के ,मेरे में वाक पटुता आती जा रही है /

मैं स्कूल जाने लगा था , अच्छा स्टुडेंट था / Teachers बहुत प्यार करते थे मुझे / मेरी handwritting और मेरी सहनशीलता , संस्कार जो सिखाये जाते , उसपे मेरा response सब को अच्छा लगता था / मैं हमेशा फर्स्ट आता था / 5th क्लास तक कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ा ....3rd  से ही मुझसे प्रभावित हो के , स्कूल वाले मुझसे question पेपर (handwritting की वजह से ) टाइप कराते थे स्टेंसिल पर , सब मेरी प्रतिभा के कायल थे / मैं एक अच्छा singer , डांसर और GK का मास्टर था , अपनी उम्र के हिसाब से / 5 Th क्लास में कुछ लड़कियां भी थी , जो हमेशा देख के आपस में काना फूसी करती थी , लेकिन मेरे समझ में नही आता था , वो क्या बात करती हैं ? मुझे देख के इतना हँसती क्यों हैं ? एक ने तो मुझे दशहरा घुमने के लिए 10 rs  भी दिया था , मैंने काफी मना किया वो नही मानी, कसम दे दी , पहली बार ऐसा लगा के मैं अनिल कपूर हूँ और वो माधुरी दीक्षित / मैंने कई सालों तक वो 10  का नोट रखा / बाद में wallet भी खो गया और वो नोट भी / 

मेरे पिता  नौकरी में बड़े ईमानदार थे / उनके केबिन के आगे जो स्टूल लगा ले चपरासी बैठा करता था , उसका आज इस शहर में , बंगला गाड़ी सब कुछ है , क्यों की वो हर काम बिना पैसे लिए नहीं करता था / 
उनकी ईमानदारी का एक छोटा उदाहरण है , उनके संस्था में cement की बिक्री हुआ करती थी / ऑफिस पहले तल्ले पे हुआ करता था / एक बार cement की कालाबाजारी हो रही थी /लोग एक एक बैग पे 5 rs (उस ज़माने में ) ले रहे थे और पैसे कम रहे थे / लेकिन पिता जी तो ईमानदारी की प्रतिमूर्ति थे / एक बार एक सरदार जी जो पिता से बहुत प्रभावित थे बोले " झा जी सभी पैसे कमा रहे हैं , अपने अभी तक कुछ नही किया , आपने कष्ट से जीवन काटा है , अपने लिए नहीं अपने बच्चो के लिए सोंचिये और एक बैग पे एक रुपया लीजिये , सब से पहले मैं दूंगा " मेरे पिता का जवाब था , "सरदार जी, आज के बाद से मुझे बेईमानी सिखाई , ऑफिस के नीचे फेक दूंगा "/ मैं अपने पिता के इस जज्बे को सलाम करता हूँ / उनकी ये ईमानदारी और वसूल अभी तक कायम है / 

इसी बीच मेरे पिता जी ने अपनी जॉब छोड़ दी और अपना बिज़नस स्टार्ट किया / काफी सफलता मिली / पैसे भी कमाए और अपने जीने के तरीके को भी काफी आधुनिक कर दिया / मेरे पिता एक खर्चीले आदमी हैं / पैसा है तो खर्च करो , उन्होंने अपने पूरे जीवन में कोई भी LIC या ऐसी कोई चीज़ आज तक नहीं करवाई /


सबसे बड़ी घटना जिसने मेरे पूरे जीवन पे प्रभाव डाला वो था , इंदिरा गाँधी का क़त्ल होना / वो एक ऐसी घटना थी जिसने न केवल मेरे पे , मेरे पिता के बिज़नस , मुझपे , पूरे देश पे प्रभाव डाला था / चारों तरफ आग ही आग , लोगों का मरना , लुट खसोट ...../मैंने देखा के एक घर के सारे लोगों पे तेजाब फेक दिया गया / एक बच्चे के लिए बड़ा ही बुरा अनुभव था / मैंने पहली बार curfew देखा / चारों तरफ सन्नाटा और पुलिस वाले , आर्मी / 
एक और चीज़ देखि इत्ती देर वो था television / पहले तो केवल सिबाका गीत माला और छाया गीत सुना करता था / जब TV आया तो friday को चित्रहार देखने लगा / लेकिन पहली बार इंदिरा गाँधी का पूरा अंतिम संस्कार इत्ती देर तक टीवी पर देखा / 


इस घटना के बड़े दूरगामी प्रभाव पड़े / देश पे भी , मेरी फॅमिली पे भी , मेरे ऊपर भी / ये बात 1984  की थी लेकिन इस घटना का प्रभाव अब तक मेरे जीवन में है / 

जालिम सिंह अब 5 वर्ष का हो चुका था / 











JALIM SINGH KA JANM

कहानी शुरू होती है 1952 से जब श्री सत्य नारायण झा का पटना शहर में आगमन होता है / उनकी पढने की बहुत ही जबरदस्त इक्षा थी / एक गाँव में जन्म हुआ और उन्हें पढाई के लिए प्रेरित करने वाला कोई भी नही था / अपने बलबूते पर , अपने दोस्तों की सहायता से वो पटना आये , क्यूँ की उस वक़्त नवी कक्षा की परीक्षा भी बोर्ड हुआ करती थी / गाँव में आठवी कक्षा तक हीं पढाई की सुविधा  थी / पढाई की इक्षा उन्हें पटना जैसे शहर में ले आई जब उम्र केवल १४ साल की थी /उसी उम्र में उन्होंने tution पढ़ाना शुरू कर दिया , और अपना और अपने पढाई का खर्च निकालने लगे /वो मेरे पूज्य पिता थे / 

चूँकि हमारे दादा जी एक मामूली किसान थे , और उन्होंने साफ बोल दिया था के , अगर पढना है तो मेरे पिता को खुद ही मेहनत करनी पड़ेगी / पिता जी बताते हैं , के वो रोज़ लगभग २५ किलोमीटर रोज़ घूम घूम कर बच्चों को टयूशन पढाया करते थे / फिर खुद भी पढ़ते थे / वो बताते हैं कभी कभी , भूखा भी सोना पड़ता था , किराये के लिए पैसा न होने पर , गाँधी मैंदान (एक बड़ा पार्क जिसका इस्तेमाल बड़े आयोजनों में आज भी होता है ) में बेंच पर सोया करते थे / उन्होंने बताया एक बार वो २ दिन से भूखे थे और भगवान की दया से कैसे उन्हें २ रुपये का एक नोट मिला , जो उस वक़्त बहुत हुआ करता था / 

उन्होंने संघर्ष किया और दसवी की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की / उस वक़्त दसवी पास करना एक बड़ी बात थी / पापा बताते है के , जब वो पांचवी कक्षा में थे तब उनकी कक्षा में एक युवक पढ़ा करता था जिसकी मूछें और घनी दाढ़ी थी , जब पिता जी ने उनसे पूछा " पंडित जी शादी हो गयी क्या " उस महोदय ने जवाब दिया " हाँ २ बच्चे भी हैं "/ वो जमाना कुछ और था , पढाई पे विशेष ध्यान नही दिया जाता था और बचपने में ही शादी कर दी जाती थी / 

क्यूँ  के शहर में वो काफी दिनों से थे , और शिक्षक बन कर उन्होंने अच्छा नाम कमाया था / इसलिए उनकी जीविका अच्छी चलने लगी / उन्होंने अब पढाई के साथ साथ Typwritting and Short Hand का course भी लेना शुरू कर दिया /उस जमाने में ये सबसे आधुनिक तकनीक एवं ज्ञान था , जिसकी सहायता से कोई भी व्यक्ति विशेष अच्छी नौकरी पा सकता था / पिता जी भले ही गाँव से थे , लेकिन आधुनिकता उनके रग रग में थी / उस वक़्त के सारे आधुनिक पोशाकें , स्टाइल सब को अपने अन्दर ढलने का बड़ा शौक था उन्हें / 

जल्द ही उन्हें एक प्राइवेट संस्था में clerk की नौकरी मिल गयी , और केवल २ साल के अन्दर ही , अपनी आधुनिकता और Typewriting and Short Hand Skill के कारण वो संस्था के manager बन गये / ये उनकी बड़ी उपलब्धि थी / उनका विवाह माया मिश्रा से हो गया , और वो माया झा बन गयी , मेरी माँ/ 

पिता जी मास्टर साहेब के नाम से प्रसिद्ध थे / नौकरी के बाद भी उनका नाम यही रहा / उनका रहन सहन और भी अच्छा हो गया , उस वक़्त की सभी बुनियादी चीजें अब घर में थीं / 1972 में उन्हें पुत्री की प्राप्ति हुई , मेरी बड़ी बहिन इंदु , और उसके 7 साल बाद 1979 में बड़ी मन्नतों और पूजा पाठ के बाद , मेरा जन्म हुआ / मेरा नाम रखा गया / रवि , रवि शंकर /