शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

जुनून

यूँ तो मेरा भी संसार वहां सिमटा हुआ था | शहर से दूर , नई संभावनाओ से दूर ,न तो वहां ऐसे शैक्षणिक संसथान थे जिनकी ट्रेनिंग के उपरांत कोई काम धंधा किया जा सके | कमोवेश ये पुरे देश की समस्या दिखती थी मुझे के, कुछ चुने हुए शहर कुछ चुने हुए ज्ञान और तकनीक को पाने के लिए प्रसिद्द थे , बाकि जगह उपेक्षित , ये भेंड़ चाल थी , जो अब भी बरक़रार है ,  पर जहाँ तक संभव हो सकता था , मैं अख़बारों , रेडिओ के माध्यम से नए अविष्कारों , नए प्रोडक्ट , आने वाली नई तकनीक इत्यादि के बारे में जानने की कोशिश करता रहता था | येही वो वजह थी के मैंने उस समय कंप्यूटर शिक्षा को सर्वोपरी समझा और बच्चों को इसकी शिक्षा देने का निश्चय किया | सोंचना बहुत आसान था पर करना उतना ही कठिन , कई समस्याएं थी , पहली यह की मेरे पास दिन में समय का आभाव था , विद्यालय एवं ट्यूशन थे , दूसरी यह की कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर दादरी में था और वहां तक शाम में जाने का तो कोई साधन था ही नहीं , यह भी अनिश्चित था के कोचिंग वाले शाम में कोचिंग देंगे ये नहीं| पर मैंने मन में जो ठाना था उसमे प्रयास करने में मैं बिलकुल भी चूकना नहीं चाहता था , क्यूँ की मेरा लक्ष्य एक अच्छे काम को समर्पित था | अगले ही दिन मैं दादरी के Apteck Computer Centre पहुंचा , धड़कते दिल से अन्दर दाखिल हुआ , मेनेजर की कुर्सी पर एक युवक बैठे थे , और कुछ छात्र भी | मैंने अपना परिचय दिया और उन्हें कहा के मुझे कंप्यूटर कोर्से करना है एक साल का डिप्लोमा | उन्होंने फॉर्म दिया और मैंने उसे पूरा भर दिया , पर जब कोचिंग के समय की बात आयी तो वो नकार गये | उनका कहना था के , शाम के लिए लड़के नहीं हैं और एक विद्यार्थी के लिए ये कोचिंग नहीं खुल सकता है | मैं कुछ देर के लिए निराश हो चुका था पर मैं इतनी आसानी से हिम्मत नहीं हारने वाला था , मैंने उनसे कहा के ठीक है पर आप सब युवा हैं , क्या मेरी बात दो मिनट सुन सकते हैं , उन्होंने हामी भरी और मैंने कहना शुरू कियामैं यहाँ का नहीं , बिहार से हूँ , बहुत सारे काम किये मैंने जीवन में पर घूमता फिरता यहाँ के एक ऐसे गाँव में पहुँच गया जहाँ के बच्चे शिक्षा में पिछड़े हुए थे , उन्हें आज की आधुनिक शिक्षा कोई भी नहीं देना चाहता था , शायद ये उन्होंने इस प्रकार से सोंचा ही नहीं था , मैंने पिछले पांच सालों में उन्हें इस लायक बनाया है के वो हर उस बात से अवगत हो सके जो उनके लिए जरुरी हैं , चाहे वो देश से सम्बंधित हो , विदेश से या दुनिया से | मैं एक युवा हूँ , काम कर चुका हूँ शहरों में मगर मैंने अपना ठिकाना एक गाँव में बनाया क्यूँ की एक युवा होते हुए मेरे कन्धों पर भी कुछ जिम्मेवारियां बनती हैं , देश का प्रधानमंत्री यहाँ गाँव में नहीं पढ़ाने आयेगा, वो पैसे दे सकता है संसाधन भी पर वो समर्पित व्यक्ति कहाँ से देगा जो एक सपने को पूरा कर सके | मैं अपने करियर और भविष्य को दाव पर लगा कर कुछ नया करने की कोशिश में हूँ , एक युवा होते हुए मैं समझता हूँ के आप मेरी बात समझने की कोशिश करेंगे | आप सब लोग मेरी बातों पर विचार करें और मेरा साथ देने की कोशिश करें , ये मेरा विनम्र निवेदन है |  मैंने ये सारी बातें हाथ जोड़ के बोली थी इसका कुछ चमत्कारी प्रभाव हुआ , एक अमीर छात्र (पहनावे से लग रहा था ) ने मेरी प्रशंशा की और मेनेजर साहेब से जिनका नाम प्रमोद था बोला के , हम अपनी शिफ्ट शाम में करने को तय्यार हैं , इनके ऊपर ध्यान दिया जाये | प्रमोद जी ने कहा के ठीक है आप पैसे जमा करदो और परसों से शाम के 6 बजे आ जाओ , मैंने हामी भर दी पैसे जमा किये और उल्लास के साथ वापस गाँव पहुंचा| मैंने पहली सीढ़ी पार कर ली थी , अब जुगाड़ आने जाने का करना था क्यूँ की शाम को कोई साधन नहीं था गाँव से के मैं 9 किलोमीटर की यात्रा कर सकता , किसी प्रकार चला भी जाता पर वापस आने का तो बिलकुल भी साधन नहीं था | मेरा सुबह 7:30 पर विद्यालय पर होना जरुरी होता क्यूँ की अगले साल बच्चों के मेट्रिक की परीक्षा थी और मैं उन्हें 7:30 से 8:30 तक फ्री क्लास देता था | पर कहते हैं के ईश्वर साथ होता है अगर आप के पास कुछ अच्छा करने का जज्बा और जुनून हो | हमारे प्रधानाचार्य महोदय के पास एक पुराना स्कूटर था , अच्छा चलता था वो उसे बेचने के पक्ष में थे , मैं अगले दिन विद्यालय पहुंचा और अपनी सारी बात बताई , यह भी के उन्हें मेरा साथ देना चाहिए , मैंने कुछ नया करने का सोंचा है , मैं उनके ऊपर अपना प्रभाव डालने में सफल रहा और मैंने उन्हें राज़ी कर लिया के वो किश्तों में पैसे सैलरी से काट लेंगे और मुझे स्कूटर दे दिया | एक और समस्या का समाधान हो चुका था , अगले दिन एक नई आशा के साथ मैंने अपने दिनचर्या में थोड़ा परिवर्तन किया , 5 बजे शाम तक बच्चों को ट्यूशन देने के बाद मैं स्कूटर से दादरी पहुंचा , आज पहला दिन था , कंप्यूटर के सामने पहली बार बैठा था |एक नयी उमग हिचकोले ले रहा था , एक नया जोश के मैं कुछ ऐसा सिख रहा हूँ जो मुझे आगे तक ले कर जायेगा , थोड़ी परेशानियों के बाद पहले दिन मैं वर्ड फाइल बना कर सेव करना सीख गया , पर सेव कहाँ करना है और फिर उसे पुनः कैसे खोलना है नहीं सीख पाया , प्रमोद ही मुझे कंप्यूटर शिक्षा देते थे , पहले दिन से हीं मैं उनसे प्रभावित हो गया था , उनके सिखाने का ढंग अच्छा था और नए लोगों के प्रश्नों से वो परेशान नहीं होते थे| पहले दिन जिस चीज़ ने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया वो था कीबोर्ड का क्वेट्री होना , शब्द ढूंढने में काफी समय लगता था , पहले दिन मुझे वापस आते आते 8:30 बज गये | हवेली आने के बाद मैंने उस रात एक बात पर गौर किया की क्या यह सही है के इतिहास अपने को दुहराता है  , पिता जी ने फांके खाए और मैंने भी , वो टीचर थे , मैं भी हुआ , वो टाइपराइटर मास्टर थे ,उस ज़माने की नयी चीज़  और मैं कंप्यूटर सीख रहा हूँ , इस ज़माने की नयी चीज़ , उनकी भी शिक्षा अधूरी रह गयी और मेरी भी , ऐसा संयोग कैसे ? क्या मैं भी उनकी तरह किसी कंपनी का मेनेजर केवल ईमानदारी और मेहनत के बल पर बन पाउँगा ? मैंने पिता जी से उनके पास जा कर मिलता रहता था , वो मेरे मित्र के तरह ही थे , हम दोनों में वैचारिक मतभेद भले हो पर मित्रवत व्यव्हार था | मैं जब भी उनसे माचिस मांगता तो वो समझते के मैं उनसे थोड़ा दूर हो कर सिगरेट पियूँगा , पर वो मुझसे कुछ नहीं कहते थे , शायद वो समझते हों के मैं सही रास्ते पर हूँ अभी भी | मैंने उसने क्वर्टी सिस्टम के बारे में पूछा , वो हँसते हुए बोले थोड़े दिनों बाद उँगलियाँ अपने आप अल्फाबेट्स पर चली जाएँगी, बिना देखे टाइप कर सकोगे , मुझे उस वक़्त थोड़ा भी विश्वास नहीं हुआ उनपर , पर आज अहसास होता है के उन्होंने बिलकुल ही सही कहा था , सच में वो टाइपराइटर के मास्टर थे |

अब मेरी यही दिनचर्या हो गयी , मैं कंप्यूटर को धीरे धीरे समझने लगा , मेरे बाकी के सहपाठी मेरे से छोटे  थे पर मैं उनसे सीखने की कोशिश करता था , थोड़े दिनों में मुझमे तेज़ी आ गयी और मैं चीजों को जल्द से जल्द समझने लगा |

जुनपत से दादरी आने जाने के रास्ते में 5 किमी का रास्ता बिलकुल सुनसान था , एक आध जगह लोगों से पैसे छिनने और मारपीट भी घटनाएँ होती , पर मुझे भय नहीं था क्यूँ की ईश्वर पर अटूट विश्वास था और काम का जूनून | घटनाओं को देखते हुए रास्ते में पुलिस वहां लगा दिए गये थे , जिनसे मेरा सामना हुआ करता था , एक बार उन्होंने रोक कर मुझ से पूछताछ की और फिर वो मुझे पहचान गये , कई बार वो मुझसे पूछते पंडित जी कहाँ तक सीखे ? जल्दी सीख लो फिर हमें भी सिखाना | ये सिलसिला लगभग डेढ़ महीने तक चला , इसी बीच हमारे प्राचार्य महोदय से कुछ वैचारिक मतभेद हुए और उन्होंने मुझसे स्कूटर वापस ले लिया | शायद ये मेरी परीक्षा हो ये सोंच कर मैं विचलित नहीं हुआ बल्कि अन्य विकल्पों पर विचार करना शुरू कर दिया | मैं उसदिन किसी प्रकार दादरी पहुंचा और प्रमोद से अपनी समस्या बताई , ये भी के बिना वाहन के 6 बजे तक आना संभव नहीं है , मैं थोड़ा निराश सा था , पर प्रमोद ने मुझे उस समय एक बहुत बड़ा योगदान दिया , उन्होंने मुझसे कहा के तुम किसी भी समय आ जाओ मैं यही ऊपर में रहता हूँ , मैं तुम्हारे लगन से प्रभावित हूँ , इसलिए मैं तुम्हें रात को भी सिखा सकता हूँ , उन्होंने ही मुझे बताया के बोडाकी जो के जुनपत ग्राम से डेढ़ किमी की दुरी पर था , वहां से शाम को 7 बजे की ट्रेन है जो के पंद्रह मिनट में दादरी पहुंचा दिया करती था , पुनः सुबह वापसी की ट्रेन सुबह के 6 बजे थी | यूँ तो मैं दिल्ली आने जाने के लिए मैं इस स्टेशन का कई बार इस्तेमाल कर चुका था पर रात में रोज़ का यात्री बनना थोड़ा अजीब था , दूसरा यह के अभी नवम्बर का महिना चल रहा था और ठण्ड बढती जा रही थी रोज़ के हिसाब से , ऐसे में सुबह 5 बजे उठ कर टंकी के जमे हुए पानी ने नहाना फिर 6 बजे तक दादरी पहुंचना अपने आप में एक चुनौती थी | जुनपत ग्राम से बोडाकी आने का रास्ता भी कम खतरनाक नहीं था , रास्ते के लगभग बीच से नहर गुज़रती थी , और उसपर बने पुलिया पर अँधेरा होने का बाद असामाजिक तत्व जमा होते और वहां यदा कदा लूट पाट की भी घटनाएँ होती थी साल में एक आध हत्याओं की भी सूचना मिलती थी | आस पास के कई गाँव के लोग प्रतिदिन दिल्ली , गाज़ियाबाद इत्यादि जगहों पर नौकरी और व्यापारिक कार्य से जाते थे , देर रात होने पर अथवा 1 तारीख से 5 तारीख के बीच ऐसी घटनाये ज्यादा होती थी क्यू की उस वक़्त वेतन का समय होता था | उस वक़्त तो चुनौतियों का सामना करने की धुन सवार थी , इसलिए मैंने फैसला किया के मैं ट्रेन से ही जाया करूँगा | शाम को 6 बजे के बाद काम समाप्त करके पैदल बोडाकी की तरफ चला , हाथ में एक डंडा था क्यूँ की गाँव के बाद रास्ता बिलकुल सुनसान हुआ करता था और अकेले इन्सान पर कुत्ते या सियार झुण्ड बना कर हमला कर देते थे , इसलिए वो एक रक्षात्मक प्रवृति थी , दूसरा कारण यह था के लाठी या डंडा लेकर एक विशेष चाल में चलना वहां के मूल निवासियों की पहचान थी , सो दूर से ही देख कर कोई समझ सके के कोई ग्रामीण ही है , मैं डंडा हाथ में लिए हुए था | ठण्ड बढ़ी हुई थी , चारों तरफ खेत ही खेत नज़र आ रहे थे , चाँद उपेक्षाकृत ज्यादा बड़ा दिख रहा था , चारों तरफ चांदनी फैली हुई थी और दूर से कुत्ते के रोने और लड़ने की आवाज़ आ रही थी , पूरे जोश में मैं गाता चला जा रहा था किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार , किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार .... मुझे स्टेशन जाने वक़्त ऐसा लग रहा था जैसे मेरे साथ बजरंगबली स्वयं चल रहे हैं मेरे पीठ के पीछे और कह रहे हैं ....तू चल मै हूँ तेरे साथ , ये कोरी कल्पना थी , अध्यात्म का असर , या वो अनुभूति जो बड़े बड़े साधकों को कठिन साधना करने पर भी नहीं मिलता मगर किसी गरीब और सहृदयी को अपने आप ही मिल जाता है , मैं नहीं जानता, क्यूँ की आज भी ये सब लिखते हुए उस ठंडी रात , उस निश्चय , उस जिद , उस समर्पण और उस हिम्मत को याद करने के बाद मेरे रोम रोम में एक सिहरन सी दौड़ रही है | खैर , मैं स्टेशन पहुंचा 6:50 पर , टिकट काउंटर पर पंहुचा और दादरी की टिकट मांगी , टिकट बुकिंग अधिकारी बीडी पीता हुआ काउंटर से थोड़ा अलग अपने पांव टेक कर कुर्सी पर बैठा था , उसने मुझे एक नज़र देखा और बोले काहे कु 5 रुपल्ली फुके है ,दादरी तलक कोई भी न पूछे चलो जा मैं हैरान था , बिना टिकट यात्रा करने का एक और अनुभव होना था , पर मैंने टिकट लिया | पता चला के ट्रेन कभी समय पर नहीं आती , कभी कभी 8:30 भी बजाती है , ये आखिरी ट्रेन होती थी | ट्रेन लगभग 7:30 में आ गयी 10 मिनट बाद मैं दादरी में था , वहां रेलवे फाटक के समीप मुझे एक साफ सुथरी दुकान दिखी भूख लगी थी , मैंने वहां दो समोसे एक गिलास दूध लिया और चल पड़ा सेंटर की ओर | वहां पहुँचने पर प्रमोद मुझे ऊपर ले गये , वहां उन्होंने मुझसे खाने के लिए पूछा पर मैंने कहा के मैं खा के आया हूँ , मैं किसी पर कभी बोझ नहीं बनना चाहता था | खाने के बाद प्रमोद मुझे नीचे ले कर आये और बोले के मैं तुम्हें जो बता रहा हूँ जब भी पूरा हो जाये मुझसे नया टास्क ले लेना और बिलकुल हिचकिचाना नहीं | मैं अपने टास्क में जुट गया और प्रमोद सोने में , एफएम फुल साउंड में बजा कर | वो एक बड़ा सा हॉल था जिसमे कंप्यूटर रखे थे , प्रमोद फोल्डिंग खाट पर सोते थे , और मेरे लिए बेंचों को इक्कठा करके एक बिस्तर तैयार किया गया था | मैंने उस दिन प्रमोद को नहीं जगाया और टास्क पूरा करके सो गया | एफएम की वजह से नींद 4 बजे सुबह आई और 5 बजे मैं उठ भी गया क्यूँ की मुझे जाना था | सुबह की ठण्ड बढ़ चुकी थी , नित्यक्रिया से निपट कर मैं नहाने को तय्यार हुआ , मैं यहाँ कहना चाहूँगा के इश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया है जिसमे सबसे अनमोल है किसी भी परिस्थिति में ढल जाना , जैसे है मैंने मग का पानी अपने सर पर डाला मेरे दोनों जबड़े कस गये , एक हाथ जो आजाद था कस गया और मुह से एक ही शब्द निकला , जय श्री राम और फिर मग का पानी मेरे शरीर पर और फिर दोनों हाथ यांत्रिक गति से चल रहे थे , पानी ...बर्फ की तरह ठंडा था | नहाने और कपडे पहनने के बाद भी कानो में से ठंडी हवा निकल रही थी , पर कोई तनाव न था, एक दो घंटे ही सोया पर कोई थकावट नहीं थी , एक नयी सी स्फूर्ति थी | सुबह कडकडाती ठण्ड में पैदल ही दादरी स्टेशन पर पहुंचा, हाथ और कान ऐसे हो रहे थे जैसे कट के गिर जायेंगे , भीषण ठण्ड थी , बोडाकी से पैदल स्कूल पहुंचा वहां नवमी एवं दसवी के विद्यार्थी मेरा इंतज़ार कर रहे थे जिन्हें सुबह मैं फ्री क्लास विद्यालय शुरू होने से पहले दिया करता था |
इस प्रकार पुनः मेरी दिनचर्या में परिवर्तन हो गया , दिन भर पढाता , फिर शाम को पैदल बोडाकी पहुँच कर ट्रेन पकड़ता फिर दादरी स्टेशन से पैदल सेंटर तक एवं पुनः सुबह उठ कर दादरी से जुनपत | कष्ट तो होता था , पर एक बड़ा फायेदा ये था के सेंटर पर जाने के बाद कोई समय सीमा नहीं थी , ३-४ बजे सुबह तक मैं कंप्यूटर पर किताब की मदद से सीखता , परियोजनाओं को पूरा करता | एक बड़ा फायेदा यह भी हुआ के प्रमोद हार्डवेयर की भी अच्छी जानकारी रखते थे , इसलिए मैंने उनके सानिध्य में हार्डवेयर भी सीखा | ऐसा करते हुए मुझे लगभग २  और महीने हो गये |इसी दौरान मैंने अपने ओढने और बिछाने का सारा सामान दादरी स्थानांतरित कर दिया था , क्यूँ की मैं रात को वही रुकता था | एक दिन मैं सेंटर पहुंचा तो प्रमोद ने मुझसे कहा के अब तुमने एक साल का कोर्स पूरा कर लिया है , मैं आश्चर्यचकित था ! उन्होंने बताया के मैंने ३ महीनो में ही पुरे साल का कोर्स पूरा कर लिया है और ये भी के वो इसी वर्ष ऑनलाइन परीक्षा (जो की गाज़ियाबाद में होनी थी) में मुझे भेजेंगे | मुझे पंद्रह दिनों की तय्यारी करनी है बस परीक्षा के लिए | मैं काफी प्रसन्न था के मैंने एक और बाज़ी लगभग मार ली है | जनवरी का महिना चल रहा था , बहुत तेज़ ठण्ड थी और साथ ही साथ घना कोहरा भी , प्रमोद ने मुझसे कहा था के मुझे कल गाज़ियाबाद सेंटर चलना है उनके साथ और ऑनलाइन प्रक्रिया समझनी है , क्यूँ की अभी तक मैंने इन्टरनेट पर कुछ भी नहीं किया था , चलाया ही नहीं था | ये सोंच कर के कल इन्टरनेट पर काम करना है , एक आनंद सा महसूस कर रहा था , अजीब सी गुदगुदी हो रही थी , और घने कोहरे को चीरता हुआ ठण्ड से लापरवाह मैं चला जा रहा था बोडाकी की ओर | मैं नियत समय पर बोडाकी स्टेशन पहुँच गया और ट्रेन का इंतज़ार करने लगा , 7 से 8 और फिर 9 बज गये , ट्रेन नहीं आई कोहरा और घना होता जा रहा था , 5 फीट से ज्यादा कुछ दिख नहीं रहा था , पुरे प्लेटफार्म पर दो चार लोग ही बचे थे | रात के 10:30 तक मैंने ट्रेन का इंतज़ार किया , अब पुरे प्लेटफार्म पर केवल 1 आदमी बचा था मेरे अलावा | उन्होंने मेरे पास आ कर कहा के अब ट्रेन नहीं आयेगी , मेरी वजह से वो भी रुके थे अब तक , और अब वो जा रहे हैं , उनका गाँव बोडाकी ही था , पर मुझे तो वापस जुनपत जाना था , मेरा मन गुस्से से भरा हुआ था , जिस आनंद और जोश से मैं आया था , वो अब क्षोभ निराशा और गुस्से में बदल चुका था | मैंने वहीं के एक पेड़ से डंडा तोडा और वापस जुनपत की ओर चल पड़ा | चारो तरफ घोर अंधकार था , घना कोहरा और ठण्ड , कोहरे की वजह से सड़क भी ठीक से दिखाई नहीं पद रही थी , न टोर्च था न ही उस समय मोबाइल हुआ करता था आम आदमी के पास , अंदाज़े से चला जा रहा था जुनपत की तरफ | इधर गाँव में लोग रजाई में दुबके हुए थे और मैं उस ठंडी रात में भटक रहा था , जैसे तैसे मैं गाँव पहुंचा और अपने कमरे में गया | सबसे बड़ी समस्या ये थी के मैं सोऊंगा कैसे , क्यूँ की सारा सामान तो मैं दादरी में छोड़ आया था | दिमाग काम नहीं कर रहा था , कमरे में एक टूटी खाट थी मैं सर पकड़ कर थोड़ी देर के लिए बैठ गया , हड्डियाँ अन्दर तक काँप रही थीं | इश्वर का नाम लेकर मैंने अलमारी खोली , उसमे एक धोती , एक अंगोछा ,  और कुछ पुराने कपडे मुझे मिल गये , मैंने कुछ दिमाग लगाया , खाट के टूटे हुए पैर के निचे बाल्टी उलट के रखी ,खाट पर न्यूज़ पेपर की एक मोटी तह बिछाई , शर्ट के ऊपर एक और शर्ट , पैंट के ऊपर एक और पैंट पहना , अंगोछे को गुलबंद की तरह लपेटा और धोती ओढ़ के सोने की कोशिश करने लगा | उस रात मुझे मुंशी प्रेमचंद की लिखी पूस की रात की याद आ गयी , जैसे मैं उसके चरित्र को स्वयं जी रहा होऊं | मैंने उसी रात प्रण किया के अब मैं ट्रेन से भी नहीं जाऊंगा दादरी , अब पैदल जाऊंगा | सुबह पड़ोसियों से डांट मिली , पर मैं रात को किसी को परेशान नहीं करना चाहता था इसलिए किसी को जगाया नहीं था | दिन भर पढ़ाने के बाद शाम को अँधेरा होते ही चल पड़ा पैदल दादरी की ओर , गाँव की सीमा पार करने के बाद दो किमी तक केवल खेत थे , मैंने  ये दो किलोमीटर हलके हलके दौड़ते हुए पार किये , दूर से किसी वाहन की लाइट दिखाई देती तो चलने लगता , और वाहन गुजरने के बाद पुनः दौड़ लगाना शुरू करता | दो किलोमीटर के बाद एक गाँव आता था , उसे मैंने पैदल चल के पार किया फिर ३ किलोमीटर का सुनसान इलाका , कभी दौड़ते और चलते हुए | इस प्रकार मैं 5 किलोमीटर के बाद मुख्य सड़क पर आया  जो दादरी जाती थी , वहां से ४ किलोमीटर का रास्ता बचता था , वहां से मुझे बस मिल गयी और मैं सेंटर पहुँच गया | सारा वृतांत सुनने के बाद प्रमोद ने मुझसे कहा के अभी लगभग बीस पचीस दिन बचे हैं , तुम कब तक ऐसे दौड़ लगा के आओगे , मैंने कहा बीस पचीस दिनों तक | मेरे जुनून को देख कर के प्रमोद और ग्रामवासी जितने आश्चर्य चकित थे उतना मैं स्वयं भी था , एक अनोखी उर्जा थी , एक अनोखी प्रेरणा जिससे प्रेरित हो कर मैं ऐसा कर पा रहा था , उस प्रेरणा और उर्जा को मैंने फिर कभी दुबारा महसूस नहीं किया | शायद ये अध्यात्म और ध्यान की शक्ति थी जिसने मेरे आत्म बल को शिखर तक पहुंचा दिया था , या फिर शायद बच्चों के लिए ग्रामीण समाज के लिए  कुछ नया करने का जोश | मैंने लगभग 1 महीने तक ऐसे ही दौड़ते भागते दादरी जाना जारी रखा | इसी बीच मेरी आगे की परियोजना को सुन कर प्रमोद ने मेरे साथ मिल कर काम करने की इक्षा जाहिर की , मैं सहर्ष तैयार हो गया | मुझे सर्टिफिकेट मिल गया था , अब मैं जल्द से जल्द कंप्यूटर कोचिंग सेंटर जुनपत में शुरू करना चाहता था , मेरा एक सपना जिसे मैं सच करना चाहता था | मैंने प्रमोद के साथ मिल कर सारे खर्चों का हिसाब किताब लगाया | हमें शुरुआत में ४ कंप्यूटर चाहिए थे , उनके लिए फर्नीचर , एक जेनसेट , और प्रचार करने के लिए आवश्यक राशी | प्रमोद ने २ कंप्यूटर और जेनसेट का वादा किया मुझे दो कंप्यूटर चाहिए थे और बाकी खर्चों के लिए राशी | मैंने ग्रामवासियों से बात की , और सहयोग करने को कहा , मुझे आश्वाशन मिले पर धन नहीं , पर मैं अपनी मेहनत को बर्बाद नहीं होने देना चाहता था , कम से कम चालीस हज़ार रूपए चाहिए थे | मैंने ब्याज पर पैसे उठाये , और दो कंप्यूटर खरीद लिए उधर प्रमोद भी दो कंप्यूटर लेकर आ गये | केवल एक जेनसेट की कमी रह गयी थी , मैंने प्रमोद से बात की उन्होंने मुझसे कहा के उन्हें पंद्रह दिन लगेंगे इसके लिए | मैंने निश्चय किया के शुभ दिन देख कर कोचिंग सेंटर खोल लिया जाये , सौभाग्य से मुझे एक अच्छा मकान जो की नया बना हुआ था सेंटर के लिए मिल गया | मैंने निमंत्रण पत्र छपवाए , पुरे गाँव में और सड़कों के खम्बों पर कोचिंग सेंटर का बोर्ड लगवाया , और चार कंप्यूटर के साथ डॉलफिन कंप्यूटर कोचिंग सेंटर का शुभारम्भ कर दिया | इस सेंटर का खुलना मेरे लिए सपने सच होने जैसा था , मेरी मेहनत ,मेरे संघर्ष और मेरे जुनून का उपसंहार था ये सेन्टर |
गाँव के बच्चों को कंप्यूटर चलाता देखने की इक्षा पूर्ण होती दिखाई दे रही थी , बहुत सारे सपने देख रहा था मैं , सामाजिक बदलाव की एक नई आशा और जूनून के साथ ।  




गुरुवार, 11 जुलाई 2013

प्रायश्चित

पटना वापस आने वक्त ट्रेन का कोई रिजर्वेशन लिया नहीं था , वेटिंग की टिकट कटवाई और निकल पड़ा | संजोग से मैं जिस बोगी में चढ़ा वो सेना के जवानों से पूरी तरह भरा हुआ था , वहां टीटीई के आने का कोई प्रश्न नहीं था | मैं कोने में गेट के पास चुप चाप बैग रख के बैठ गया और आदत अनुसार एक अध्यात्मिक किताब निकल कर पढने लगा | एक सरदार जवान बार बार मुझे घूर रहा था , पर मैं पढने में तल्लीन था मुझे कोई दिक्कत नहीं हो रही थी निचे बैठने में | २ घंटे तक मैं लगातार पढता ही रहा और इसके बाद सरदार जी ने मुझसे पूछा कहा जाना है ? मैंने कहा पटना साहेब , ,मैंने ये जान बुझ कर बोला था | पटना से पटना साहेब १२ कि.मी. दूर है , दरअसल पटना साहेब , गुरु गोविन्द सिंह का जन्म स्थान है , और सिक्खों का एक तीर्थ भी | सरदार जी ने मुझसे कहा के वहां तक ऐसे ही बैठ के जाओगे किताब पढ़ते पढ़ते , मैंने हँसते हुए कहा के और चारा भी नहीं है कुछ , सरदार जी खिड़की वाली सीट पर थे उन्होंने कहा , यहाँ बैठ जाओ | मैं सरदार जी के पास आ गया और सामान नीचे रख दिया | पूरी रात मैंने बैठ के गुजारी , उस समय ट्रेन दिल्ली से पटना आने में सत्रह घंटे लेती थी | सत्रह घंटे मैंने बिलकुल बैठ के ही गुज़ारे| फौजी लोग भी समझ रहे होंगे के ये कैसा बन्दा है |

मेरा अचानक से घर आना सब के लिए आश्चर्यजनक था , मेरा भाई पहले से ही वहां आया हुआ था | माँ को मैंने बताया के वहां काम करना मुश्किल हो रहा है मैं यहीं कुछ करूँगा | फिर मैंने भाई से बात की के अब क्या करना है , उसने कहा के अब बिज़नेस करना है , मैंने कहा के पैसा कहाँ है ? उसने बोला मेरे पास हैं | दरअसल मामा जी ने जुनपत में एक प्लाट के लिए करीब ८०-९० हज़ार बतौर अग्रिम राशी दिए थे | मेरे भाई ने किसी प्रकार उनसे २५ हज़ार रूपए वापस ले लिए | उस वक़्त २५ हज़ार रुपयों का एक अलग महत्व था | मैंने उससे जनना चाहा के वो किस तरीके का बिज़नस करना चाहता है , जवाब मिला जिसमे अधिक से अधिक फायेदा हो| काफी सोंच विचार और एक दो दिन वही पटना में गंवाने के बाद हमने निश्चय किया के हम नेपाल जायेंगे| नेपाल बिहार से सटा हुआ एक खुबसूरत देश है , और सम्पूर्ण हिन्दू राष्ट्र है | नेपाल में खुद की कोई फैक्ट्री या भरी उद्योग जैसी कोई चीज़ नहीं , पर्यटन और विभिन्न देशों का एक व्यापारिक केंद्र है | उस वक़्त कंप्यूटर और कंप्यूटर पार्ट्स का बहुत बोल बाला था | लोग नेपाल से कंप्यूटर पार्ट्स सस्ते में ले कर आते और दुगने तिगुने भाव में यहाँ लाकर बेचते | हमें ये धंधा रास आया | हमदोनो ने पटना से रक्सौल की ट्रेन पकड़ी और वहां से बॉर्डर पार करके नेपाल की सीमा में पहुँच गये | ये एक तरह से पहली विदेश यात्रा थी , एक ऐसी विदेश यात्रा जिसका बॉर्डर हमने रिक्शे से पार किया | भारत और नेपाल के बीच सड़क से खुले तौर पर जाया जा सकता था , कोई विशेष चेकिंग नहीं थी अगर छोटा मोटा बैग है तो | वहां से रात को बस निकली काठमांडू के लिए जो नेपाल की राजधानी थी| मेरी सीट खिड़की के पास वाली थी , मुझे जल्द ही नींद आ गयी, सुबह करीब 6 बजे मेरी नींद खुली खिड़की के बाहर का दृश्य देख के एक बार को डर गया मैं , बस काफी ऊंचाई पर थी जाम लगा था , सड़क के एक तरफ पहाड़ था और दूसरी तरफ हजारों फीट गहरी खाई , पहाड़ को काट कर बनाया गया सर्पिला रास्ता खिड़की से दिख रहा था | नीचे भी पूरा जाम लगा था , हम बस से नीचे उतर आये , वहां का नज़ारा अद्भुत था | पूर्ण रूप से प्राकृतिक | झरने , पहाड़ इत्यादि दिखाई पड़ रहे थे , हलकी हलकी बारिश भी हो रही थी.| पता चला के जाम का कारण आगे पहाड़ से मिटटी का खिसकना है , जो सड़क पर आ चुकी है , संजोग से हमारी बस सबसे आगे थी , और कुछ छोटे वाहन | करीब आधे घंटे बाद ही वहां जेसीबी आ गयी , वहां ऐसी स्थिति से निपटने की तत्परता को देख कर मुझे काफी ख़ुशी हुई | मिटटी हटाने के बाद रास्ता खुल गया और बस चल पड़ी | अब मैं खिड़की से प्राकृतिक नजारों का आनंद ले रहा था , ऐसा लग रहा था जैसे किसी कल्पना में हूँ मैं , बादल हमारे नीचे थे , और हम ऊपर | मैंने पहले भी इसका जिक्र किया है के मेरे ऊपर मृत्युयोग था २२वे साल में , और मैं कुछ करूँ या न करूँ दिन में जब भी फुर्सत मिलती ये जप हमेशा करता रहता था | सफ़र में और आनंदित हो कर मैं ये जप करता था |करीब 10-11 बजे के आस पास हम काठमांडू पहुंचे और एक होटल किराये पर ले लिए , उस वक़्त भारतीय मुद्रा के 100 रूपए के बदले 160 नेपाली मुद्रा मिलती थी | हमने थोड़ा आराम किया और फिर निकल पड़े काठमांडू की सैर पर |

काठमांडू कई पहाड़ों से घिरा हुआ समुद्र से लगभग 1400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है | बहुत ही साफ सुथरा शहर | वहां मुख्य रूप से हिंदी और नेपाली बोली जाती है | लोग काफी अच्छे स्वाभाव के थे | पुरुष और स्त्रियाँ समान रूप से वहां हर व्यवसाय में भागीदारी करते हुए दिखे | वहां काफी हिन्दू मंदिर थे | एक मुख्य मंदिर दिखा वहां काष्ठमंडप जो पूरी तरह लकड़ी का बना हुआ था और २ तल्ले ऊँचा था | काफी प्रयटक भी दिखे वहां पर | जगह जगह रंगीन पताकाएं लगी हुई थी , रंगों से विशेष लगाव दिखा वहां के लोगों के बीच| हमने वहां के मुख्य बाज़ार से कपड़ों और जूतों इत्यादि की खरीदारी की | वहां के इलेक्ट्रोनिक मार्किट भी गये हम और आवश्यकता के अनुसार लोगों से बातचीत की | मगर हमें वहां कुछ खास नहीं मिला | हम वहां पर ३ दिन रहे और निराश हो कर लौटने का प्लान बनाया , वहां से व्यापर करने का फायेदा तभी था जब कम से कम एक लाख रूपए का सामान ख़रीदा जाता | हमारे पास पैसे कम थे | हम वापस पटना आ गये | कुछ दिनों तक कई प्रकार के काम करने की कोशिश की लेकिन हम असफल रहे | इसी बीच मामा जी को पैसों की जानकारी हुई और उन्होंने भाई को अपने पास बुलाने का दवाब बनाया , भाई ने कहा के मैं कुछ दिनों के लिए घर हो कर आता हूँ और वो निकल गया |

मैं पुनः एक बार बेरोजगार हो चुका था | मैंने जुनपत फ़ोन लगाया तो पता चला के वहां मेरे बारे में बहुत भारी गलतफ़हमी फ़ैल गयी है | सब ये कह रहे थे के मैंने सबको धोखा दिया है | इस दुष्प्रचार में वो लोग शामिल थे जो मौके की तलाश में थे | ये भी पता चला के पिता जी से भी लोगों ने मेरे बारे में बुरा भला कहा है | कुछ ऐसी बातें भी सुनने में आई के यदि मैं जुनपत गया तो मेरे साथ मर पीट भी हो सकती है | मैं मानसिक रूप से परेशान हो चुका था | मैंने यही किसी नौकरी को ढूंढने की कोशिश की , पर लगभग २० दिनों के प्रयास के बाद भी मुझे कोई नौकरी नहीं मिली जो मेरे लायक हो |

इस बीच मुझे ध्यान में आया के मेरे कुछ पैसे मेरे एक मित्र के पास हैं जिसके साथ मैंने स्टेशनरी का धंधा किया था , लगभग 12 हज़ार रूपए अब भी बकाया थे मेरे मूलधन से ही| मैंने उससे संपर्क किया , उसने एक प्रपोजल रखा , उसने बताया के उसके पास कुछ दवाइयां हैं जो बिकवा देनी हैं | मैं उससे अपना बकाया चुकता कर लूँ , मैंने हामी भर दी | अगले दिन सुबह करीब 10 बजे मेरे मित्र का छोटा भाई आया और बताया के दवाइयां आ गयी हैं | मैंने कहाँ के कहाँ है ? उसने इशारे से सड़क पर एक बंद ठेले की ओर इशारा करके बताया के उसमे हैं | मैंने कहा के भाई इसे यहाँ क्यू ले के आये हो , मेरे पास रखने की जगह नहीं है न ही अभी मैंने किसी ग्राहक की तलाश की है, क्या माल है , किस कंपनी का है सब देखना पड़ेगा ऐसे थोड़े ही न होता है | उसने कहा के चाहे जो हो ये माल आपको रखना ही पड़ेगा | मुझे कुछ शक हुआ मैंने पूछा के ये कैसा माल है , पता चला के चोरी का है , मैंने तुरंत उसे मना कर दिया के मैं इस तरीके का काम नहीं करता | उसने मेरे से उलझने की कोशिश की मगर मैं अपने घर के पास था , उसने मुझे धमकी दी और चला गया | अगले दिन अख़बार से ज्ञात हुआ के , ये 50 लाख के रुपयों के दवाइयों की लूट हुई है और लगभग 8 लोग पकडे गये हैं , ये सारा कारनामा मित्र के भाई और उसे दोस्तों ने किया था | मित्र के भाई के नाम पर वारंट निकल चुका था | वो छिप के रह रहा था | शाम को मैंने अपने मित्र से मुलाकात की और बताया के ये सब क्या था , उसने बोला के मैंने इसे नहीं कहा था ऐसा करने को , खैर अब उसकी समस्या उसके भाई को जमानत दिलवाने की थी , और मेरी मेरे पैसों की | मेरे बहुत जिद करने पर उसने मुझे करीब 10 हज़ार की दवाइयां दी जो मार्किट में करीब 5 हज़ार में बिक गयी | मुझे थोड़ी राहत हुई | अगले दिन मैं फिर अपने मित्र के पास रात के करीब 9:30 में गया , वो कुछ मित्रों के साथ बैठा था , उसने मेरे से पैसे मांगे | मैंने कहा के मुझे अभी और 7 हज़ार तुमसे चाहिए , उसने कहा के उसके लिए उसके भाई की जमानत सबसे महत्वपूर्ण है , मैंने कहा के मेरी स्थिति बहुत ही बुरी है | हम दोनों में गरमा गरम बहस होने लगी , तभी मैंने अपनी खोपड़ी के पीछे एक खट जैसी आवाज़ सुनी , देखा एक शराब पिए हुए लड़के में अपनी देसी पिस्टल से मेरी खोपड़ी पर फायर किया था जो मिस हो गया था , अगले पल जो हुआ वो बड़ी ही तेज़ी के साथ हुआ , कब मैंने उससे पिस्टल छिनी , कब उसके चेहरे पर मारा और फिर कब पलट कर जो और बैठे थे उनके तरफ हथियार किया मुझे पता नहीं , पर आनन फानन में वो वहां से भाग गये | पिस्टल अभी भी मेरे पास ही था, लोडेड , मुझे उसे अनलोड करना भी नहीं आता था | अगले दिन मैंने अपने एक पुराने मित्र के भाई को जो के सीमेंट वगैरह की एजेंसी चलता था वो पिस्टल 4 हज़ार में बेच दिया | २४ घंटों में दो काम बड़ी तेज़ी के साथ हुए , एक तो मेरे ऊपर का मृत्युयोग टल गया था और , मुझे 4 हज़ार और मिल गये बकाये मे से|

मैं अक्सर सोंचता के अब ये पैसे भी ख़त्म हो जायेंगे तो क्या होगा, भाई भी वापस नहीं आया न ही मेरे से कोई बात ही की है , यहाँ कोई जॉब मिल नहीं रही है , क्यूँ न दिल्ली जा कर एक बार और किस्मत आजमाई जाये | मेरे पास अभी कुछ पैसे थे , इसलिए मैंने अगले दिन ही दिल्ली जाने का प्लान बनाया | मैंने जाने से पहले एक बार फिर जुनपत फ़ोन मिलाया , मेरी नवाब सिंह से बात हुई , मैंने उससे बताया की मैंने कोई गलत काम नहीं किया है और सारा हिसाब किताब स्कूल में दे चुका हूँ | नवाब ने मुझे एक बार जुनपत आने को बोला , बोला के एक बार आ कर अपनी स्थिति को साफ कर लो | मेरे पास कोई विकल्प नहीं था , चूँकि मैं यहाँ निराश ही हो चुका था इसलिए घर से भी किसी ने मेरे से कुछ कहा नहीं , मैं दिल्ली के लिए दुबारा निकल गया | फिर से एक बार पहाड़गंज पर आ चुका था | मेरी ज़िन्दगी एक सर्किल की तरह हो गयी थी , मैं गोल गोल घूम रहा था ,और स्थिर हो नहीं पा रहा था | मैंने वहां एक गेस्ट हाउस में एक बेड लिया , कीमत थी 400/- | दिन भर इधर उधर घूमता और शाम को थक कर वापस आता , एक समय खाना खाता, रात को घर से भुने हुए चुडा और मूंगफली खाकर सो जाता | पैसे धीरे धीरे खत्म हो रहे थे , और नौकरी का कोई ठिकाना नहीं था | मैं जुनपत इसलिए वापस नहीं जा रहा था क्यूँ की एक दम से सबने मेरी मेहनत एक पल में ही भुला दी और मेरी बुरे शुरू कर दी थी, मेरा दिल वहां से टूट चुका था | मेरी नज़र अख़बार के एक इश्तेहार पर पड़ी जिसमे ऑफिस असिस्टेंट की आवश्यकता थी | मैंने दिए हुए नंबर पर फ़ोन मिलाया और बस पकड़ कर चल दिया मिलने | मैं बताई हुई जगह पर खड़ा था थोड़ी देर बाद स्कूटर पर एक व्यक्ति आया , स्कूटर का नंबर बिहार का था | बातचीत से पता चला के वो पटना से ही हैं , मैं खुश हुआ पर अगले पल ही मुझे निराश होना पड़ा , उसने कहा के ये जॉब आपके लिए नहीं है| ऑफिस असिस्टेंट नाम को लिखा हुआ है जबकि ये पिउन का काम है | मैंने कहा के कोई बात नहीं मुझे करना है मैं शुरू से शुरुआत करना चाहता हूँ , पर वो नहीं माने , बोले के एक ब्राह्मण को ऐसा काम दे कर मैं पाप का भागी नहीं बनना चाहता हूँ , मेरी कई विनती के बाद भी वो नही माने | मेरी जेब में जबरदस्ती 200 रु. डाले और बोले के आप वापस चले जाओ | मैं फिर से गेस्ट हाउस पहुंचा , मेरे पैसे खत्म हो चुके थे अब आखिरी दिन के पैसे ही बचे थे रहने को , मुझे वापसी के लिए भी पैसों की जरूरत थी | मैंने निश्चय किया के एक बार जुनपत जा कर पिता जी से मिलना है , अपना हिसाब सब को देना है और पाक साफ होकर वापस आ जाना है | मेरे पास पैसे बहुत कम थे , मैंने अपनी चाँदी की एक चेन और दो अंगूठियाँ 800 /- रु. में बेच दी | मैं अगले दिन जुनपत का सामना करने को निकल पड़ा , जहाँ के लिए मैं भगोड़ा बिहारी, दगाबाज़ व्यक्ति बन चुका था |

मैं जुनपत पहुंचा , शाम का वक़्त था इसलिए स्कूल बंद हो चुका था , जैसे ही मैंने गाँव में प्रवेश किया सब आश्चर्यचकित हो कर मुझे देख रहे थे , मेरी हिम्मत को के , गुर्जरों को धोखा देने वाला फिर से उनकी मांद में क्यूँ जा रहा है | सभी की नज़रें मुझे घूर रही थीं , और कानाफूसी भी हो रही थी ,पर मैं सीधा सामने की तरफ देखता हुआ चल रहा रहा था , पहले की तरह सभी बड़े बुजुर्गों को राम राम करता हुआ | मैं अपने मोहल्ले में पहुंचा , घर पर पिता जी थे , उनका चरण स्पर्श किया , हालत बयां किये और फिर नवाब सिंह के यहाँ चल दिया | वहां नवाब सिंह और भाभी से मिला , सारी चीजों की जानकारी दी , खाना भी वही खाया , उन्होंने पूछा के स्कूल में मैं रहूँगा या नहीं मैंने कहा के सबसे पहले मैं सारा हिसाब साफ करूँगा तभी कुछ सोचूंगा | रात में कई व्यक्ति मिलने आये , कई ने मजाक किया कई ने कहा के वापस आ कर अच्छा किया , पर मैं वहां रहने के मूड में नहीं था इस बाबत मैंने पिताजी को भी बता दिया था |

अगले दिन मैं नवाब सिंह के साथ विद्यालय पहुंचा , मुझे देखते ही भूतपुर्व प्रिंसिपल महोदय भड़क गये ,पर नवाब सिंह के साथ होने के कारण कुछ कह नहीं पाए | पूरे स्कूल में बच्चे मुझे दुबारा देख के खुसर फुसर करने लगे | हम ऑफिस में हिसाब करने बैठे , कई तरीके से मेरे हिसाब को गलत साबित करने की कोशिश की गयी | एक मुश्किल और थी वो ये के , वो डेबिट और क्रेडिट नहीं समझ पा रहे थे | मैंने देसी तरीके से सारा हिसाब समझा दिया | मेरा हिसाब साफ था | मैं वापस आ गया हवेली पर | पिताजी को बता दिया के मेरा हिसाब क्लियर है , कुछ नवयुवक जो मेरे नजदीकी थे और मुझे नजदीक से जानते थे शाम को मेरे पास आये और मुझे बताया के मुझपर 15 हज़ार रूपए का इल्जाम लगाया गया , पर उन्हें जब पता चला के मेरा हिसाब साफ है तो उन्होंने कहा के मैं यही रहूँ | उन्होंने ये भी बोला के संस्थापक महोदय डांट लगा सकते हैं , उनकी बातों का बुरा मत मानना क्यूँ की पुरे गाँव के बीच उन्होंने तुमपर भरोसा किया था | उन्हें सभी बातों की जानकारी नहीं है | मैंने उन्हें अनमने ढंग से बोल दिया के ठीक है |

अगले दिन मैं विद्यालय नहीं गया , मुझे केवल एक बार संस्थापक महोदय से मिलना था , और उनका सामना करना था , मैं पीठ दिखा कर भागना नहीं चाहता था | यदि कुछ जगहों पर वो सही थे , तो कुछ जगहों पर मैं भी सही था | करीब एक बजे का वक़्त था , मैं अपने कमरे में सो रहा था तभी एक लड़का आया और मुझे बताया के आपको बुला रहे हैं , पता चला के संस्थापक महोदय आये हैं | मैं नवाब सिंह के घर पहुंचा , संस्थापक महोदय के साथ , तीन चार और व्यक्ति बैठे थे और नवाब का परिवार , मैंने नजदीक जाकर उनको राम राम कहा , वो उठे और मेरे मुंह पर एक तमाचा मारा | मैं सकते में तो था , पर अगर मेरी नज़र उठी हुई नहीं थी तो झुकी हुई भी नहीं थी | लोगों ने बीच बचाव किया ,मैं वही खड़ा रहा , उन्होंने कहा के तुझे पता है के मैंने तुझपर कितना भरोसा किया ? मेरा जवाब था के हाँ जी , इसलिए मैं वापस आपके सामने आया | थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा के कल से स्कूल चले जाना और इस बार ऐसे गया तो अच्छा नहीं होगा | मैं वापस अपने कमरे में आया , पिता जी से इसकी कोई चर्चा नहीं की | सोंच रहा था के एक बार एक लड़का ऐसे ही मुझे बुला के गया था तो मुझे कितना सम्मान मिला और फिर एक लड़का आज बुला कर ले गया तो कैसा अपमान | लेकिन किसी वजह से , अंतर आत्मा ने मुझसे ये कहा के ये थप्पड़ गलत नहीं था , गुल्लू के थप्पड़ की तरह ये थप्पड़ मेरे दिल को लगा था | अगले दिन मैं , संस्थापक महोदय के आज्ञानुसार स्कूल की तरफ चल दिया अनमने ढंग से , पर मैंने उस दिन नीली शर्ट , ब्लैक पैंट , और कटर पिलर के जूते जो मैं काठमंडू से लाया था वो पहन रखा था | रास्ते में मुझे एक नवयुवक मिला जो मेरे साथ अक्सर समय बिताया करता था | बातचीत के दौरान उसने मुझसे एक बात कही गुरु जी, आप वापस तो आ गये हो पर आप वो सम्मान दुबारा नहीं हासिल कर पाओगे जो आपने पहले हासिल की थी | मुझे ये बात लग गयी , वो थप्पड़ भी अभी तक भुला नहीं था मैं , मैंने उसे जवाब दिया के देखो भाई ये सच है के , अगर धागा टूट जाये तो जोड़ने में एक गांठ लग जाती है , पर मेरा मानना है के , अगर उस धागे को फिर से तोडा जाये तो वो कही से टूट सकता है पर गांठ से नहीं | गांठ जीवन में जरुरी है, जीवन से लेकर , शादी , और मृत्यु तक , और मैं ये साबित करके रहूँगा | ये बात मेरे मुंह से अनायास ही निकली थी , पर पता नहीं मेरे ऊपर इसका क्या असर हुआ , मैं स्कूल से केवल 1 मिनट की दुरी पर था , मैंने उस एक मिनट में ही निश्चय कर लिया के मैं इस बात को यहाँ सिद्ध करके रहूँगा , मैं अपने गाल पर लगे तमाचे को व्यर्थ नहीं जाने दूंगा | मेरी सांसे तेज़ चल रही थी और , मैंने अपनी मुट्ठी को भिचते हुए अपने आप से एक वादा किया और विद्यालय परिसर पहुँच गया | वहां बच्चों के बीच अभी भी मेरा खौफ था , जैसे जैसे मैं विद्यालय भवन के नजदीक पहुँच रहा था वैसे वैसे बच्चों का शोर कम होता जा रहा था | मेरे ऑफिस पहुचने तक विद्यालय शांत हो चुका था | मैं सीधा ऑफिस में गया , पानी से भरा जग उठाया और पेट भर के पानी पिया , जैसे अभी मुझे बहुत पसीना बहाना हो | थोड़ी ही देर में प्राचार्य महोदय आये और मुझसे पूछा के मेरा वहां आना कैसे हुआ ? मैंने जवाब दिया के संस्थापक महोदय का आदेश से , वो बोले के सच में रवि जी आप बड़े ढीठ इन्सान हो , जिसकी इतनी बेईज्जती हुई , वो फिर से यहाँ काम करना चाहता है | मैंने कहा के हाँ मैं ढीठ इन्सान हूँ , और मेरी अभी इज्ज़त लुटी नहीं है , इज्ज़त क्या होती है मैं हासिल करके रहूँगा यही पर | उन्होंने मुझे कही और नौकरी का भी प्रस्ताव दिया , पर मैं नहीं माना | कोई मौका ना देख कर उन्होंने मेरे कपड़ों पर ही आपत्ति जतानी शुरू कर दी , बोले के ऐसे कपडे पहन के आये हो , यहाँ सर्कस करना है क्या ? मैंने कहा के पहली बात की ये कपड़े सर्कस के नहीं , दूसरी बात ये के अगर आप ऐसे कपडे नहीं पहन सकते तो आप दूसरों को कुछ मत बोलें , तीसरी बात मेरे पास ऐसे कपड़ों के अलावा कोई और कपडा नहीं , अगर आप मुझे सिलवा दें तो मैं पहन लूँगा | महोदय को समझ में आ गया के मैं अब यही रहने वाला हूँ | मैंने उनसे अपना नाम रजिस्टर में चढाने को कहा , उन्होंने बोला के आप का नाम पहले से चढ़ा हुआ है , मैंने कहा के नहीं मैंने अपना नाम बदल लिया है ,मैंने अपना नाम लिखवाया , रवि भारद्वाज | इसका कारण ये था के मैं कही भी टिक के काम नहीं कर पता था , जुनपत से निकल कर , नेपाल और पटना के प्रवास के दौरान मैंने किरो को पढ़ा जो अंक शास्त्र के महान ज्ञाता थे , और वो भारत में भी लगभग 8 साल रहे | मैंने अपने अंक को जाना और देखा के मेरा नाम ऐसा है जो मेरे जन्मांक के मेल नहीं खाता इसलिए मैंने अपने नाम में बदलाव का फैसला किया था | नाम में बदवाल करने से दो फायदे हुए मुझे , एक तो मैं एक जगह टिक कर नौकरी कर पाया , जैसे अब भी कर रहा हूँ और दूसरा मैं ऐसा पहला शख्स था खानदान का जिसने अपनी परंपरा तोड़ी , वो था अपने गोत्र के नाम को अपने नाम के साथ लगाना | पौराणिक समय में हमारे यहाँ अक्सर ऐसा हुआ करता था के , ब्राह्मण बालकों का किसी शादी विवाह , और अन्य समारोह , रिश्तेदारों इत्यादि के यहाँ से अपहरण हो जाया करते थे, शादियों के लिए  , पर शादी के लिए गोत्र का जानना अतिअवाश्यक हुआ करता था और आज भी है , इसलिए बड़े बुजुर्गों ने ये नियम बनाया था के गोत्र का नाम छुपा लिया जाये और उसके बदले किसी और टाइटल को लगाया जाये , जैसे के ब्राह्मणों में झा,मिश्रा, दुबे , पाण्डेय इत्यादि | पर मैं जब अपने नाम के परिवर्तन का विचार कर रहा था तब काफी मशक्कत के बाद और इश्वर की कृपा से मेरा गोत्र काम आया जो मेरी जन्मांक के हिसाब से बिलकुल सही था  , मैंने रवि शंकर से , रवि भारद्वाज बनने का फैसला लिया था , और आज मैं गर्व के साथ कह सकता हूँ के मेरा वो फैसला मेरे जीवन के सफ़र में एक ऐसा मील का पत्थर है जिसको पार करने के बाद मैंने कभी भी जीवन में पीछे मुड के नहीं देखा | मैंने अब तय कर लिया था के ईश्वर को मान कर चलो, आगे बढ़ो और बढाओ , रुको मत, थको मत , सोंचों मत बस , चलते जाओ |

अगले दिन से मैं अपनी दिनचर्या में लग गया , मैं किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करता था , बस अपने काम में लगा रहता | अपमान भरे सहानुभूति के तीक्ष्ण बाण अक्सर चलते रहते थे | पर मुझे जूनून था के मैं पहले से भी अच्छा करके दिखाऊंगा यहाँ | उस वक़्त मेरे दिमाग में क्या बस यही चलता के कैसे इन्सान की सारी अच्छाई केवल एक गलत कदम से बुराई में बदल जाती है , कैसे ऐसी परिस्थितियों में आप अपने जगह सही होते हैं पर समाज के नज़र में गलत , कैसे आपका मजबूत दिमाग भी , हालत के आगे मजबूर हो जाता है , पर उस वक़्त जिस ताक़त ने मेरा साथ दिया , जिसने मुझे कभी ये नहीं कहा के तू हार गया है , वो था , मेरा इश्वर पर अटूट विश्वास | इसी विश्वाश के सहारे मैंने आगे बढ़ने का फैसला किया | मैं हनुमान मंदिर जाता , वहां जो भी मेरे अध्यात्मिक मित्र थे , सभी मुझे प्रोत्साहित करते | मैं लगातार अपने आप को आध्यत्म के तरफ खिचता हुआ महसूस करता | पहले मैं जब भी हतोत्साहित होता तो अपने को अक्सर अकेला महसूस करता पर अब मेरे पास एक शक्ति थी, इश्वर पर भरोसे की शक्ति |

नवम्बर के महीने में मैंने एक प्रतियोगिता करवाने का प्रस्ताव रखा जिसमे आस पास के 8 विद्यालयों को हिस्सा लेना था | इसमें खेलकूद, सामान्य ज्ञान एवं शब्दकोष पर आधारित प्रतियोगिता शामिल थी| मेरा यह प्रस्ताव मान लिया गया| अब मैंने अपना ध्यान प्रतियोगिता पर पूर्ण रूप से लगा दिया | मैंने गाँव के एक व्यक्ति को खास कर आमंत्रित किया के वो मेरी खो खो टीम को प्रशिक्षित करे , बाकि पढाई सम्बंधित सारी चीजों की तय्यारी मैं खुद करा रहा था| मेरे विरोधियों के लिए ये सुनहरा अवसर था , क्यूँ की सारी जिम्मेवारिया मेरे ऊपर थी , और यदि मेरा विद्यालय अच्छा नहीं कर पाता तो सब की बात मुझे ही सुननी थी, ग़ाज़ तो मेरे ऊपर ही गिरनी थी | मैंने इस चुनौती को स्वीकार किया | मैंने शब्दकोष प्रतियोगिता की तय्यारी कुछ इस प्रकार की के , लगभग ऐसे 150 शब्दों का चुनाव किया जिसके अंत का अक्षर Y , Z और X इससे मुझे एक फायदा होना था के विरोधी टीम को ज्यादा से ज्यादा ऐसे मुश्किल अक्षरों से शब्द बोलने पड़ते | पिता जी के स्कूल की टीम भी इसमें शामिल थी , और उन्होंने मेरी तय्यारी को बेईमानी करार दिया , जबकि, ऐसा था नहीं | मेरी पिता जी से बहुत बहस हुई , अक्सर पिता जी गुस्से में आ जाते तो इंग्लिश के शब्दों का प्रयोग करते और मैं भी ऐसे ही उनको जवाब देता | बहस के दौरान , गाँव के कुछ नवयुवक आ गये , जो मेरे मित्र थे और पिता जी के भी , वैसे तो पिता जी शराब नहीं पीते थे पर कभी कभी पीने से उन्हें परहेज़ भी नहीं था , उनसब ने मेरे से पूछा के बात क्या हुई है मैंने मजाक में वहां की भाषा में कहा तमने बुड्ढे को कुछ पिला तो न दिया ये बात मैंने मजाक में और धीरे से कही थी , बुड्ढा शब्द वहां के बुजुर्गों के लिए आम था , पर पिता जी ने ये सुन लिया और मुझेसे बोले यू कॉल में बुड्ढा , आई ऍम गोइंग फ्रॉम हियर , आई विल नॉट लिव विथ यू एनी मोर | अगले दिन पिता जी मुझे छोड़ के चले गये, जहाँ वो पढ़ाते थे वही उन्होंने अपना ठिकाना बना लिया | वो अपने उसूलों के पक्के थे , मैंने काफी समझाया पर वो माने नहीं थे | मैं सोंचता के , क्या उसूल किसी रिश्ते से बड़े होते हैं , उसूलों की खातिर रिश्तों का बलिदान करना कहाँ तक उचित होता है , पर मुझे स्पष्ट जवाब नहीं मिलता था , शायद इसलिए क्यूँ की मैं भी उसूलों का पक्का बनता जा रहा था |

प्रतियोगिता का आयोजन अच्छे से हुआ , हमारे विद्यालय के छात्रों ने , हर क्षेत्र में अच्छा किया , हम जीत गये | एक बार फिर से मैं अभिभावकों का ध्यान आकर्षित करने में सफल हुआ , वो पुनः ये सोंचने पर मजबूर हुए के उन्हें अपने बच्चे गाँव से बाहर भेजने चाहियें या फिर , गुरु जी के पास. |


धीरे धीरे मैं पुनः ग्राम वासियों का विश्वाश हासिल करने में जुटा था एक चीज़ ध्यान में थी गांठ पर जाती है पर , वहां से नहीं टूटती जहाँ से गांठ लगी हो |
फिर से गणतंत्रा दिवस आने वाला था , पुरे गाँव वालों के मन में था के इस बार भी मैं जरुर कुछ अच्छा करूँगा , मैं त्य्यारियों में जुटा था | पुनः मैंने शिक्षा को केन्द्रित करते हुए एक नाटक लिखा , जिसका सारांश था के , विदेशी कंपनियां भारत में ऐसे कारखाने लगाते हैं ग्रामीण क्षेत्रों में , वहां के गद्दारों के साथ मिल कर, जो नकली दवाइयां , नकली खाद्य पदार्थ इत्यादि बनांते हैं ताकि यहाँ की जनता अन्दर से खोखली हो जाये | ये कहानी मैंने सन २००२ में लिखी थी जिसे आज के परिदृश्य में होते हुए देख पा रहा हूँ | मेरी ये सोंच और मेरा ये विचार सबको पसंद आया और कई विद्यालय के प्राचार्यों ने अपने विद्यालय के प्रोग्राम को संचालित करने का प्रस्ताव मुझे नौकरी के साथ दिया | पर मेरा लक्ष्य था , इसी गाँव में शहर से आने वालों बसों को रोकना , ये सिद्ध करना के अच्छी शिक्षा जरुरी है , दिखावा नहीं | हम गाँव में भी अच्छी शिक्षा दे और ले सकते हैं | धीरे धीरे अन्य शिक्षक और हमारे प्राचार्य महोदय भी मेरे साथ हो गये |

इस बीच मैं दसवी के विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान देता , मैंने अपने हवेली में ही सब के रहने का इन्तेजाम कर रखा था | रात के 10 बजे के बाद पढाई शुरू होती , ठण्ड का समय था , हमने पुरे कमरे में पुआल बिछा रखे थे , वही हमारा बिस्तर हुआ करता था , रात के 1 बजे तक फिर सुबह 5 से 7| मैंने उनके पीछे काफी मेहनत की , कई ऐसे विद्यार्थी थे जो पिछली बार नहीं निकल पाए थे , पर उन्हें मेरे ऊपर भरोसा था और वो जानते थे के गलती उनकी है इसलिए वो मेरे साथ थे इस बार भी | इस बार के बैच में १६ लड़के थे | परीक्षा शुरू हुई ,हर बार की तरह इस बार भी मेरे बताये हुए प्रश्न आये , पिछली बार की तरह इस बार भी मैं निश्चिन्त था |

अब छुट्टियाँ पड़ चुकी थीं , मेरे पास एक अच्छा अवसर था , योग, अध्यात्म इत्यादि में आगे बढ़ने का |  मैंने अपना अभ्यास करना शुरू कर दिया| गाँव से कुछ दूरी पर एक पौराणिक मंदिर था , समाधी थी किसी सन्यासी की , करीब २ किमी के क्षेत्रफल में फैला हुआ जंगल जैसा क्षेत्र था , जिसमे विभिन्न किस्मों के पेड़ पौधे थे और बहुत तरह के पशु पक्षी और कीड़े मकोड़े भी , केंद्र में मंदिर था | वहां के मुख्य पुजारी जी से पहली बार जब मिला था तो उनके तेज़ को देख कर मैं काफी प्रभावित हुआ था | मैं अक्सर वहां जाया करता था , वहां कई लोग आया करते थे जो हरी चर्चा करते , आध्यात्म और ज्ञान की बातें होती | सबसे अच्छा जो वहां मुझे लगता वो था वहां का प्राकृतिक स्वरुप | मैं घंटों वहां अकेला बैठता, पक्षियों के कलरव को ध्यान से सुनता , कही भी आसन लगा कर बैठ जाता , पेड़ों को छाती से लगता , उन्हें चूमता | कभी कभी नागराज के दर्शन होते , पर वो कुछ कहते नहीं थे क्यूँ की मैं भी कुछ नहीं कहता था उन्हें | वहीँ पर प्रभु इक्षा से मुझे एक ऐसे समारोह में भाग लेने का मौका मिला जहाँ पर 3 दिनों का एक आयोजन होना था , जिसमे रामायण पाठ , भंडारा इत्यादि होना था | वहां साधु संतों की भीड़ थी , बहुत दूर दूर से विभिन्न सम्पर्दायों को मानने वाले संत, साध्वियां , अघोरी बड़े बड़े जटाधारी पहुंचे थे | वहां का माहौल पूरी तरह भगवा रंग में रंग चुका था | मैं सुबह से ही रामायण पाठ में जुट गया | दोपहर में इधर उधर चहलकदमी की और कई साधु संतों से मिला और उनके सम्पर्दाय , उनकी मान्यताओं के बारे में जानने की कोशिश की | उन मान्यताओं का हमारे सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता था , इसका विश्लेषण करने की कोशिश करता था | उसी शाम को पुनः रामायण पाठ पर अपने एक अन्य मित्र के बैठा , मैं जब भी पाठ करता तो चेष्टा करता के शब्द पूरी तरह स्पष्ट तरीके से बोले जाएँ , शायद यही वजह थी के वहां के मौजूद श्रोताओं ने मुझे ही रामायण पाठ करने का आग्रह किया | लगभग २ घंटे तक लगातार पाठ किया संगीत के साथ , बहुत ही आनंद आया| ऐसा लगता था जैसे नयी उर्जा का संचार हो रहा हो | देर शाम को चहलकदमी करता हुआ मैं एक एकांत जगह पर पहुंचा जहाँ कई छोटी छोटी झोपड़ियाँ थीं और अन्दर से धुआं निकल रहा था | मैं एक ऐसी ही झोपडी में घुसा , देखा एक जटाधारी पूरी तरह राख मले हुए अन्दर बैठा है , सामने त्रिशूल है और हवन कुण्ड में आग जल रही है , मैं प्रणाम करके उनके सामने बैठ गया | वो कुछ देर तक कुछ नहीं बोले , फिर मुझे एक सेब खाने को दिया , मैंने प्रेमपूर्वक उसे ग्रहण किया | मैंने उनके बारे में जानने की कोशिश की , उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में , उन्होंने मुझे गौर से देखा , एक लम्बी साँस ली और अपने झोले में से चिलम निकाल कर उसका मसाला तय्यार करने लगे , वो कुछ बोल नहीं रहे थे , शायद ऐसे प्रश्न का उत्तर वो देना नहीं चाहते थे फिर मसाला बनाते बनाते उन्होंने अपनी कहानी बतानी शुरू की , जान कर घोर आश्चर्य हुआ के वो इंग्लिश के प्रोफेसर रह चुके थे ,फिर ऐसा जीवन उन्होंने क्यूँ चुना ? ऐसे सैकड़ों प्रश्न मेरे दिमाग में आते रहे उनकी आपबीती के दौरान पर मैंने टोका नहीं , मैं ध्यान से केवल सुन रहा था | उन्होंने चिलम भरी और मेरी ओर बढाया , मैं इसके लिए तय्यार नहीं था , परन्तु मुझे कई प्रश्नों के जवाब ढूंढने थे , मैंने चिलम पी | चिलम का नशा मेरे खोपड़ी पर २ मिनट के अन्दर ही सवार हो गया था , अजीब सी अनुभूति थी , बहुत हल्का सा महसूस कर रहा था खुद को | मैंने उनसे कई प्रश्न किया और उन्होंने तसल्ली से सारे प्रश्नों के उत्तर मुझे दिए | रात हो चली थी , नशा इतना था के मैं वापस अपने गाँव नहीं जा सकता था , मैंने उनसे आज्ञा ली और वही मन्दिर के प्रांगन में लेट गया | चारों तरफ रामायण , भजन कीर्तन का शोर था , पर फिर भी खाली जमीन पर भी , मुझे एक घंटे की गहरी नींद आ गयी | मेरे अन्य मित्र भी वही थे , हम सब 4 बजे उठे और स्नान आदि के बाद पुनः उसी दिनचर्या में जुट गये | अंतिम दिन भंडारा होना था , भंडारे वाले दिन पहले पूजा होनी थी , खाना बनना था और भगवान के भोग के बाद भंडारा | पता नहीं कहाँ कहाँ से और साधु संत इत्यादि वहां इकट्ठे होने लगे , अब साधुओं की संख्या लगभग 5 सौ से अधिक हो चुकी थी | मेरा यहाँ तीसरा दिन था , इस दौरान मैंने साधु के वेश में कुछ बुरी नज़रों वालों को देखा , एक जो भंडारे के लिए खाना बना रहा था , एक जो युवा था और हारमोनियम अच्छी बजा लेता था ऐसे ही एक दो और | मैं और मेरा एक मित्र साधुओं की मंडली के साथ एक घेरे के अन्दर बैठे हुए थे , वहां एक प्रमुख संत भी थे जिनका तेज़ देखने लायक था | तभी मैंने पूजा कराने वाले पंडित जी को देखा, मुझे घोर आश्चर्य हुआ के , इतने बड़े आयोजन में एक ऐसा पंडित पूजा करेगा जिसको कर्म कांड तक का ज्ञान नहीं है , किसी भी मन्त्र का शुद्ध उच्चारण तक जिसे नहीं आता हो , वो कैसे कर सकता है यहाँ ऐसी पूजा | मैं ये सोंच ही रहा था ,तभी एक घटना हुई , पंडित जी थाली ले कर शायद फूल तोड़ने जा रहे थे , तभी एक मधुमक्खी पंडित जी के पास आ कर चक्कर काटने लगी , पंडित जी थोड़े असहज से हुए , तभी दो तीन और मधुमक्खियाँ आ गयी , पंडित जी थोड़े गुस्सैल स्वाभाव के थे उन्होंने अपने अंगोछे से मधुमक्खियों को उड़ाने की कोशिश की , फिर क्या था मधुमक्खियों का एक छत्ता वहां टूट पड़ा और अपने दुश्मन की तलाश करने लगा , वहां के पेड़ों पर मधुमक्खियों के कई छत्ते थे , २ बड़े छत्ते ठीक हमारे बगल वाले पेड़ के ऊपर थे | चारों तरफ मधुमक्खियाँ ही मधुमक्खियाँ होने लगी , हम जिस घेरे में बैठे थे उनके प्रमुख संत ने कहा के आप लोग बिलकुल शांति से बैठे रहें कुछ देर में सब शांत हो जायेगा| हम चुप चाप बैठे हुए थे , सामने एक साधु के पास पहले कुछ मधुमक्खी आयी फिर पूरा का पूरा एक झुण्ड उसके सर के पर बैठने लगा , वो साधू चुप चाप ऑंखें बंद करके और अपना सर अपने घुटनों में छुपा कर बैठा था , देखते ही देखते साधु के सर की जगह केवल बजबजाती हुई मधुमक्खियाँ थी , उसका सर बिलकुल ढँक चुका था | प्रमुख साधु बिलकुल भी विचलित नहीं हुआ , उन्होंने केवल इतना कहा प्रयाश्चित कर लो , वहां की स्थिति भयावह होती जा रही थी , मैंने अपने मित्र से इशारे में बात की और वहां से चुप चाप दूर निकलने की कोशिश की | हम तालाब का चक्कर काट कर दूसरी तरफ आ गये , जिधर उस जगह का पिछला प्रवेश द्वार था , हम एक पेड़ के निचे खड़े हो गये , पेड़ के ऊपर देखा तो वहां भी एक मधुमक्खी का छत्ता था पर शायद अभी इधर कोई सूचना नहीं मिली थी , इसलिए इधर सब शांत था | हम जिस जगह खड़े थे वहां से पिछला गेट लगभग 50 मीटर की दूरी पर था , और मुख्य घटना स्थल से लगभग २० मीटर की दूरी पर , तभी पिछले गेट पर एक साइकल सवार आ कर रुका , उसके साथ एक बच्चा भी था जिसकी उम्र मुश्किल से ३ वर्ष रही होगी , बच्चे ने शर्ट नहीं पहन रखा था | साइकल सवार जैसे ही वहां आकर रुका , कुछ मधुमक्खी सैनिक उन्हें पहचानने की कोशिश में उधर गये , और उस साईकिल सवार ने भी वही गलती दोहराई जो के पंडित जी ने दोहराई थी , उसने अंगोछे से उन्हें मार भागने की कोशिश की , फिर क्या था देखते ही देखते पूरा का पूरा मधुमक्खियों का दल उधर हमला करने को चल पड़ा , और तो और जिस पेड़ के नीचे हम खड़े थे उस छत्ते के भी सैनिक उधर की ओर कूच कर गये | पर इससे भी आश्चर्य मुझे ये देख के हुआ के , उस साइकल सवार को जब ये लगा के वो हमले का सामना नहीं कर पायेगा तो , उसने अंगोछे को फैलाया , और उसे ओढ़ कर वही बैठ गया , उसने खुद को ढँक लिया और बच्चे को वही ऐसे ही छोड़ दिया , उफ़ कैसे कैसे लोग होते हैं , जब अपनी जान पर बन गयी तो बच्चे के जान के बारे में भी नहीं सोंचा , मुझे गुस्सा आ रहा था | तभी बच्चे के चीखने की आवाज़ आई , मधुमक्खियाँ बच्चे को काट रही थी , और बच्चा चीखे जा रहा रहा , उससे २० मीटर की दूरी पर कई साधू संत बैठे थे पर कोई भी उसके पास जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था , साइकल सवार वैसे का वैसा ही बैठा था| क्षण भर में ही बच्चे का आधा सर मधुमक्खियों से भर गया था , मैं इस स्थिति को देख नहीं पा रहा था , मैंने अपने मित्र से कहा के अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा , मैंने अपने दन्त भीचे ,मुट्ठी बंद की और तेज़ी से बच्चे की ओर चल दिया , बच्चे के पास पहुँचते पहुँचते उसका लगभग पूरा माथा मधुमक्खियों से ढँक चुका था , मेरा दिमाग तेज़ी से काम कर रहा था , मैंने बच्चे को गोद में उठा लिया उसका सर जैसे ही मेरी छाती पर पड़ा मधुमक्खियाँ मेरे शरीर पर चलने लगी, सब कुछ बड़ा भयावह था , अभी तक मुझे काटा नहीं गया था , मधुमक्खियाँ भी डंगारा प्रजाति की थी जो बहुत खतरनाक और औसत से बड़ी होती हैं | मैंने सबसे पहले उस साइकल वाले को गाली देते हुए उठाया और वहां से निकलने को बोला | पिछले गेट से थोड़ा आगे जाकर दाहिनी तरफ एक गली जाती थी , और थोड़ा सीधा चल के बाई तरफ मुख्य सड़क थी , मैंने उसे समझाया के वो बच्चे को लेकर दाहिनी तरफ वाली गली में धीरे धीरे आगे बढेगा और मैं बाई तरफ मुख्य सड़क की ओर जाऊंगा , मैंने तेज़ न भागने की चेतावनी दी, वो मेरा उपाय समझ गया , मेरी नज़र साईकिल के आगे लगे टोकरी पर पड़ी जिसमे एक काला सा कपडा था ,जिसमे ग्रीस इत्यादि लगा था , जो शायद साइकल साफ करने के काम आता था , मैंने वो उठाया और चल दिया मुख्य सड़क की तरफ , उसे मैंने गली में भेज दिया था | मेरे शरीर पर सैकड़ों मधुमक्खियाँ थी , मैंने अपने जबड़े और मुट्ठी भिची हुई थी और चलता हुआ वहां से दूर जा रहा था , जब उन्हें लगा के मैं उन्हें उनके छत्ते से दूर कर रहा हूँ तो उन्होंने मुझे काटना शुरू कर दिया , पर मैं जितना दूर जा सकता था जाना चाहता था , अब मैं मुख्या सड़क पर आ चुका था , मैंने दौड़ लगाना शुरू कर दिया और शरीर से उन्हें हटाना भी | लगभग 200 मीटर सड़क पर दौड़ने के बाद मैं रुका और पलट गया मेरा अब भी पीछा किया जा रहा था पर अब मैं लड़ने को तय्यार था , मेरा हथियार था वो कपडा , मैंने उसे लम्बा करके दोनों छोर को पकड़ कर दो चार बार गोल गोल घुमाया और सामने से आ रहे सैनिकों पर वार करना शुरू कर दिया | लगभग 10-15 सैनिक मैंने वहां शहीद किये , मेरे सर के निचले हिस्से में गर्दन पर मुझे दर्द महसूस हो रहा था | अब वहां सैनिक नहीं थे , मैं पास में एक लकड़ी के मिल में घुस गया और लकड़ी के एक लट्ठे पर बैठ गया , मैंने अपने शरीर से उनके डंक निकलने शुरू किये , कुल आठ डंक निकले , वहां भी कुछ जासूस सैनिक आये मुझे ढूंढते हुए , पर बेचारे वो भी शहीद हो गये | डंक इतना नुकीला था के मेरे मित्र ने उन्हें देखने के लिए जैसे ही हाथ में पकड़ा , वो उसकी उँगलियों में घुस गया | मेरी सांसें तेज़ चल रही थी , चेहरे पर लालिमा थी , शायद कुछ अच्छा करने की | थोड़ी देर बाद हम वापस उस जगह पर पहुंचे , सब कुछ शांत हो चुका था तब तक , जैसे ही मैं प्रांगन में पहुंचा दूर से एक नवयुवक ने मेरी ओर देख कर जोर से चिल्लाया  , जय श्री राम मैंने भी प्रतिउत्तर में अपनी मुट्ठी हवा में उठा कर यही कहा | वो नवयुवक अपने परिवार के साथ वहां पूजन के लिए आया था , और उसने सारे घटनाक्रम को देखा था | मुझे वहां संतों के बीच ले जाया गया , सभी ने मेरी प्रशंशा की , जहाँ मधुमक्खी ने काटा था वहां पर भभूत लगाया | इसी बीच एक घोर आश्चर्य और हुआ , मैंने देखा के पंडित जी का मुह पूरा सुजा हुआ है , उस हलवाई का और उस हारमोनियम वाले युवक का भी जिनकी नज़रों में मुझे खोट दिखाई दिया था , बाकि किसी को कुछ भी नहीं हुआ था , पर आश्चर्य तो ये था के , मुझे भी 8 जगह काटा गया था पर मुझे सूजन क्यूँ नही हुआ ? इस प्रश्न का उत्तर तो आज तक मुझे नहीं मिला , पर इस घटना में मुझे बहुत कुछ सीखे , मुझे खुद से भी मिलवाया | मेरे मित्र की वजह से गाँव में कई दिनों तक ये चर्चा का विषय रहा | ये घटना भी अविस्मर्णीय है मेरे लिए |  


खाली समय में मैं यही सब करता , ज्योतिष इत्यादि के बारे में पढना , उनका प्रयोग करना और सच में इसका परिणाम धीरे धीरे आने लगा था , मेरे आकलन पर विश्वास करने वालों का एक अलग ग्रुप था वो मेरे से अक्सर सलाह लिया करते थे | वापस आने के मात्र एक वर्ष में ही मैं पुनः सबका चहेता बन चुका था , मैं अपने मोहल्ले में होने वाले किसी भी आयोजन में घर के सदस्य की तरह हिस्सा लेता था , मेरी भाषा गुर्जरों जैसी हो चुकी थी | वहां के मित्रों के साथ रिश्तेदारी में जाता तो , मुझे लोग वहीँ का समझते , बिहारी हूँ ऐसा कहने पर वो विश्वास ही नहीं करते थे |

मुझे वहां रिश्ते भी मिले , भाइयों के बहनों के, भाभियों के सभी तरह के , मैं अक्सर सोते सोते ये महसूस करता के शायद मैं यही का ही हूँ | मुझे ये भी महसूस होता की यदि मैंने यहाँ से जा कर सबके विश्वास का गला भी दबाया हो तो शायद मैं अब प्रायश्चित कर चुका हूँ | मेरा सब कुछ , इस देश और इस गाँव को समर्पित था | अब कुछ और ऐसा करना था जो यहाँ के लोगों और बच्चो की शिक्षा में विकास करे | 

शनिवार, 29 जून 2013

SAMARPAN

हर इन्सान के जीवन में दो तीन ऐसे मौके आते हैं , या यूँ  कहें के , समय का एक ऐसा अन्तराल आता है जिसमे जीवन , उसकी क्षमताओं , उसके विवेक और उसके प्राप्त संस्कारों की परीक्षा लेता है । कई बार इन्सान अपने अन्दर छिपी विशेषताओं के बारे में अनभिज्ञ होता है और कई बार इन्सान के अन्दर में छिपी यही विशेषताएं , उनके जीवन में आगे चल कर उनकी पहचान बनाने में सहायक होती हैं , ये उन विशेषताओं से अलग होती हैं जो उसने किताबें पढ़ कर और परीक्षा पास करके हासिल की गयी हों ।ये तो वो विशेषताएं हैं जो पता नहीं कब से उनके अन्दर ही थीं पर अभी तक उभर कर बाहर नहीं आ  पाई थीं ।

इसी बीच पिता जी को कुछ हृदय  सम्बंधित समस्या हुई , और डॉक्टर के अनुसार उन्हें किसी पहाड़ी स्थल पर कुछ  दिनों रहने का सुझाव डॉक्टर ने दिया । चूकिं यहाँ का वातावरण काफी अच्छा था और समुद्र से काफी ऊंचाई पर भी , अतः मैंने फैसला किया के पिता जी को यही बुला लूँ । हम कभी ऐसे अकेले साथ नहीं रहे थे , पर मेरे पास इससे अच्छा कोई रास्ता नहीं था । मैंने पिता जी को अपने पास बुला लिया । यहाँ आने के बाद उन्हें प्रारंभिक परेशानियाँ हुईं , सबसे ज्यादा खाने को लेकर क्यूँ की यहाँ खाने की संस्कृति हमारे यहाँ से  पूर्णतः  भिन्न थी । अक्सर हम दोनों मिल कर खाना बनाते थे । परन्तु मैं किसी भी तरीके से उन्हें ठीक देखना चाहता था , जहाँ तक हो सकता था मै  उनका ख्याल रखने की कोशिश करता था । 

मेरा लक्ष्य अब बच्चों के आत्मविश्वाश के विकास पर था । इसके लिए उनका भीड़ के सामने अपनी क्षमता दिखानी थी , ये दिखाना था के वो किसी से कम नहीं हैं । कई बार ऐसा देखा था  के जो बच्चे गाँव से बाहर पढने जाते थे , वो 15 अगस्त या 26 जनवरी के समय तय्यारिओं को लेकर ज्यादा उत्साहित रहते । एक प्रतिस्पर्धा सी थी , बच्चों में भी और साथ ही साथ अभिवावकों में भी । शहरों में पढ़ाने  वाले अभिभावक खुद को ज्यादा गौरान्वित महसूस करते । मुझे ये प्रतिस्पर्धा और बढ़नी थी , मुझे ये दिखाना था के बच्चे यही रहकर सब कर सकते हैं , उन्हे अच्छे  नेत्तृत्व और समाज के सहयोग की आवश्कता थी ।

बच्चों के लिए मैंने प्रोग्राम बनाने की प्रक्रिया पर काम  करना शुरू कर दिया । मेरे द्वारा पहले स्टेज पर किये गये काम  का अनुभव मेरे लिए प्रोग्राम बनाने में बड़ा मददगार रहा । मैंने इस प्रोग्राम को तीन भागों में बाँटा , एक भाग में भाषण , कवितायेँ , वंदना एवं गाने थे , दूसरा  भाग था नाटक खेलना , तीसरा भाग था रिकॉर्डिंग डांस । दूसरा एवं तीसरा भाग वहां के बच्चों के लिए बिलकुल ही नया था । न तो पहले कभी किसी ने अभिनय किया था स्टेज पर , और न ही कभी रिकॉर्डिंग डांस । इन दोनों भागों की पूर्ण जिम्मेवारी मेरी थी , मज़े की बात ये थी के मैंने न तो कभी किसी नाटक का स्क्रिप्ट लिखा था , न ही कभी किसी ग्रुप डांस को  निर्देशित किया था । वहां की स्थिति को देखते हुए मैंने स्वयं  ही स्क्रिप्ट लिखने का निर्णय लिया ताके  संवाद की भाषा छोटी और सरल हो जिससे बच्चों को वो ठीक ढंग से याद हो सकें और संवाद बोलते समय उन्हें संवाद याद  करके बोलने से ज्यादा अभिनय पर ध्यान केन्द्रित करने में सुविधा हो । 

अगले दिन से ही मैं अपने काम  में  जुट गया। स्क्रिप्ट लिखने से पहले अभिनय की संभावनाओं को तलाशने का काम मुझे पहले करना था , ताके उपलब्ध पात्रों के अनुसार मै  पटकथा लिख सकूँ । तीन चार दिनों की मेहनत के बाद मुझे अपने पात्र  मिलते नज़र आये । मैंने एक पटकथा लिखनी शुरू की , जिसका सारांश था के झूठे आरोप में नरम दल के गांधीवादियों को क्रान्तिकारी और लुटेरे सिद्ध करके अंग्रेजी सरकार  7 देशभक्तों को फांसी  की सज़ा  सुना देती है , और बाद में एक मुस्लिम उन्हें गीता की दुहाई और उसके कुछ ज्ञान को बता कर उन्हें आज़ाद करता है और फिर सभी दोषियों को सारे  मिलकर अलग अलग नाटकिय  ढंग से मौत के घाट उतार  देते हैं । इस नाटक का नाम मैंने "सात हिन्दुस्तानी " रखा था । सारे पात्र  तो मिल चुके थे पर बटलर (अंग्रेज अफसर ) अफसर का अभिनय करने वाला कोई नहीं मिल रहा था।वजह ये थी के उसे पहला संवाद ही यही बोलना था " महाटमा गांडी को टो हम बाड में डेकेगा  पहले टुमको डेकटा है " ये अंग्रेजों वाली हिंदी बोलने वाला कोई मिल नहीं पा  रहा था । मै बहुत परेशान  था , एक विद्यार्थी जो अत्यधिक गोरा था पर , अक्सर हीं उसे मैंने एक कोने में चुप चाप पाया , मेरा ध्यान उसकी तरफ बिलकुल भी नहीं था । परन्तु वो मेरी परेशानी समझ रहा था , अचानक ही वो मेरे पास आया और बोला के वो ये कर सकता है , और आश्चर्यजनक ढंग से उसने पहली बार में ही बिलकुल सटीक संवाद बोला , मै  इतना अभिभूत हुआ के " बटलर " को गले से लगा लिया । एक और समस्या थी वो थी , "खान " की , जो देशभक्तों को  सही राह  दिखता है और जेल से उन्हें रिहा करता है , ये अभिनय मैंने खुद करने का निर्णय किया , मेरी सोंच थी की मेरी उपस्थिति बच्चों का हौसला बढ़ाएगी ।

अगले ही दिन से विद्यालय का एक कोना साहित्य कला मंदिर में बदल गया । एक तरफ गाने की तय्यारी हमारे प्रिंसिपल साहब  करवा रहे थे, एक शिक्षक पी.टी. , मै बच्चों के साथ नाटक की तय्यारी । अभिनय सिखाने के लिए खुद को भी अभिनय करना पड़ता था , बच्चे शुरू में बहुत हँसते पर जब खुद की बारी  आती  तो वो गंभीर हो जाते फिर मै  उनके साथ हँसता । बहुत मुश्किल था बच्चों को पहली बार नाटक के लिए तैयार करना , लेकिन सबसे मुश्किल काम था रिकॉर्डिंग डांस । इसके लिए मैंने 6 बच्चे चुने और गाना चुना "कही आग लगे लग जा वे" - फिल्म ताल से , गाना करीब 7 मिनट लम्बा था और ग्रुप डांस, जिसमे सब में तालमेल जरुरी है , उसको तय्यार करना आसान  नहीं था । पर मेरे ऊपर तो जैसे जुनून सा चढ़ चुका था , मै रोज़ सारे काम  करते हुए रात को गाने के एक एक बीट पर , एक एक स्टेप तैयार करता रोज़ घंटों । करीब एक महीने की मेहनत  के बाद आखिर वो दिन अ गया जब बच्चों को परफॉरमेंस देना था । 24 तारीख की शाम को एक नई  समस्या शुरू हुई ,वो था स्टेज । मुझे 30 फीट X 30 फीट का स्टेज चाहिए था ,इतना बड़ा स्टेज वहां क्या वहां के आसपास के भी किसी गाँव में नहीं लगा था , न ही ऐसा स्टेज बनाने वाला वहां कोई प्रोफेशनल था । इसका निवारण सुबह किया गया , एक विद्यार्थी ने भैसा बुग्गी ली और साथ में वानर सेना , 2 घंटे के अन्दर हमारे पास 12 चौकियाँ  थी , जिसे अच्छे  तरीके से लगा कर शाम को रिहर्सल कर उसकी मजबूती सुनिश्चित की गयी ।

अगले दिन प्रभात फेरी से समारोह की शुरुआत हुई, इस अवसर पर मुख्य  अतिथि के रूप में स्थानीय विधायक मौजूद थे । प्रारंभिक वंदना और गान  के बाद , नाटक का पहला दृश्य शुरू हुआ और समारोह के अंत तक मौजूद दर्शक गण प्रत्येक दृश्य पर आश्चर्यचकित और अभिभूत होते रहे । मै  परदे के पीछे रहकर सारा काम कर रहा था , पर अभी एक धमाका और बाकि था वो था डांस। डांस के परफॉरमेंस के वक़्त मै  स्टेज के पीछे से निकल कर बिलकुल स्टेज के सामने आ गया । बच्चों का ताल मेल गड़बड  न हो इसलिए मैंने रिहर्सल में हीं  प्रत्येक स्टेप को हाथों के इशारों में कैद कर लिया था जो बच्चों को पता था , मेरा निर्देश था के थोड़े संदेह में भी मेरी तरफ देखें और इशारों को समझें । उन्होंने मेरी आशा से बढ़ कर काम किया , चारों  तरफ तालियों की गडगडाहट , स्वयं विधायक महोदय में खड़े होकर तालियाँ बजाई । वो दिन हमारे स्कूल के लिए मील  का पत्थर साबित हुआ |

मैंने उस दिन अंपनी कुछ क्षमताओं को पहली बार महसूस किया ,  मसलन नेतृत्व की  क्षमता ,  निर्देशन की क्षमता , नृत्य के बीट को पहचानने की क्षमता और सबसे बड़ी चीज़ के ऐसे किसी आयोजन को आयोजित करने की क्षमता । ये आयोजन मेरे लिए काफी  महत्वपूर्ण साबित हुआ । अब गाँव के कुछ ऐसे लड़के जो मुझसे कटे से रहते थे  वो भी धीरे धीरे मेरे संपर्क में आने लगे । वो अक्सर अपनी समस्याओं का साझा मुझसे करते और मैं यथासंभव उचित उपाय बताने की  चेष्टा भी करता ।

इधर पिता जी कुछ ठीक हो रहे थे , पर अकेले उनका मन नहीं लगता था ।  मैंने पास के ही एक गाँव में बात की और वहां पापा एक अध्यापक के रूप में जाने लगे । गाँव दो किलोमीटर दूर था , रोज़ का उनका टहलना भी हो जाता था और अपने खर्चे भी निकलने लगे उनके । सब ठीक ठाक ही चल रहा था ।

विद्यालय पहले से अच्छे तरीके से चल रहा था ,अगले सत्र में बच्चों की संख्या काफी बढ़नी थी | कई अभिवावकों का आश्वाशन मिला था|मगर उनका कहना था के विद्यालय में कुछ चीजों का आभाव है ,और वो सही भी थे |अभी विद्यालय की कई समस्याएँ थी ,जैसे पूरा फर्नीचर न होना | शिक्षकों के उचित वेतन का न होना ,जिसके कारण हम बहुत अच्छे टीचर रखने में असमर्थ थे | विद्यालय का किराया नहीं वसूला जाता था संस्थापक के द्वारा ,परन्तु फिर भी मूलभूत सुविधाओं के लिए विद्यालय के पास पैसा नहीं था |बरसात के मौसम में छत टपकती थी विद्यालय भवन के मरम्मत की आवश्यकता थी |इन सब बातों को लेकर शिक्षकों ,अभिभावकों एवं प्रबंधन से चर्चा होती |तभी मैंने सुझाव दिया के बच्चों को कोर्स की किताबें हम सीधे प्रकाशन से मंगवा कर विद्यालय द्वारा वितरित करें ,और लाभ का इस्तेमाल हम विद्यालय की जरुरी चीजों को पूरा करने में करें |ये विचार सभी को पसंद आया |अगले सत्र के लिए ऐसा ही करना है इसपर सब राज़ी हो गये|

किसी भी विद्यालय में छोटी क्लास के बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ऐसा मैं सोंचता था|मैंने फैसला किया के मैं छोटे बच्चों की क्लास भी लिया करूँगा |मेरे घर के थोड़ा हट कर ही एक घर था जहाँ एक नन्हा शैतान रहता था जिसका नाम था गुल्लू,मैं अक्सर उसे गली में शैतानी करते देखा करता था |एक दिन गुल्लू के पिता जी ने मेरे पास आ कर गुल्लू की स्कूल में दाखिले की बात की ,और कल से गुल्लू स्कूल |गुल्लू बहुत ही शैतानी करता स्कूल में ,कभी किसी से शर्ट के अन्दर ,कभी सर पर धूल मिट्टी डाल देना ,कभी किसी की चिकोटी काट लेना कभी कुछ कभी कुछ |डरता वो किसी से भी नहीं था ,वो केवल ४ साल का रहा होगा उस वक़्त |गोल चेहरा और मज़बूत शरीर ,आँखों में हमेशा एक शैतानी चमकती रहती थी उसकी |उसकी शिकायतों से परेशान हो कर एक दिन हमारे प्रिंसिपल साहब ने उसे बुलाया और उसे एक थप्पड़ मारा,थप्पड़ दमदार था पर गुल्लू से ज्यादा नहीं ,वो भावहीन खड़ा रहा वहीँ पर जैसे उसे कुछ हुआ ही नहीं हो | प्रिंसिपल साहब का गुस्सा अब सातवें आसमान पर था , उन्होंने उसे मुर्गा बना दिया ,पर 5 मिनट बाद भी उसके ऊपर कोई असर नहीं हुआ , दरअसल व उसे कान पकड़ कर अपने गाल पर थप्पड़ लगाने को बोल रहे थे जो गुल्लू को कतई नामंजूर था |अब तो गुस्से से मरे प्रिंसिपल साहब ने डंडा मंगाया और कर दी उसकी धुलाई शुरू ,पर मजाल के एक आंसू भी आ जाएँ गुल्लू की आँखों में | थक कर और गुस्से से कांपते हुए प्रिंसिपल साहब ऑफिस में आये ,हम सभी शिक्षक वही बैठे थे , और अपने कान में तीन उमेठीयां देते हुए बोले एक ,दो ,तीन आज के बाद से इस लड़के को हाथ नहीं लगाऊंगा ,इतनी से उम्र में इतना ढीठ ! ये लड़का तो आतंकवादी निकलेगा आगे जा कर |
शाम को घर जाने पर गुल्लू की बड़ी बहिन ने बताया ,जो उस समय कक्षा ४ में रही होगी के गुल्लू प्रिंसिपल साहब का नाम लेकर कह रहा था के अगर वो इधर से गुज़रे तो वो उनका ईंट से सर फोड़ देगा |मैं मुस्का दिया |शाम को गुल्लू के पिता जी आए और इस बाबत मेरे से बात की ,मैंने उनसे एक हप्ते का समय माँगा और आश्वाशन दिया के सब ठीक कर दिया जायेगा |

अगले दिन से मेरी एक नयी चाल शुरू हो गयी ,मैंने अल्पेन्लिबे चॉकलेट ख़रीदे ४-5 और पहुँच गया स्कूल सीधा गुल्लू की क्लास में |मैं उसे बहुत प्यार करने लगा ,रोज़ टॉफ़ी खिलाता और उसके साथ खेलता ,हँसाता ,२ दिनों में ही वो मेरे से काफी घुल मिल गया ,मेरे घर आते ही वो मेरे पास चला आता और १-२ घंटे मेरे पास ही रहता |घर पर कभी कभी मेरे कंधे पर भी चढ़ जाता था,उसे मैं टीचर नहीं एक दोस्त जैसा दिखने लगा था |पर उसकी शैतानियाँ कम नहीं हो रही थी |होम वर्क तो कभी करता ही नहीं था वो |मैं गुल्लू को होम वर्क करने के लिए प्रोत्साहित करता और बार बार समझाता ,पर गुल्लू तो गुल्लू था वो नहीं माना |मैंने जब देख लिया के अब वो मेरे से घुल मिल गया है तब मैंने अपनी चाल का अगला  दाव  खेला |मैंने उस दिन गुल्लू को थोड़ा सख्त होते हुए कहा के कल तुम्हें होमवर्क कर के ही लाना है वरना बहुत पिटाई होने वाली है |अगले दिन क्या होना है कुछ अंदेशा था पहले मुझे , मैं उस दिन टॉफ़ी लेकर नहीं गया ,क्लास में पहुंचा और गुल्लू को सबसे पहले बुलाया |यह सोंच कर के अब टॉफी  मिलने ही वाली है ,गुल्लू खुश होकर मेरे पास आया | मेरा उस दिन मिजाज़ सख्त था ,जिसे शायद गुल्लू भी भांप गया था ,उसके नजदीक आते ही मैंने उससे पूछा के क्या वह होमवर्क बना के लाया है ?उसने जैसे ही ना बोला मेरा एक थप्पड़ गुल्लू के गुलगुले गाल पर पड़ा ,और इसके बाद जो आंसू और हिचकियाँ शुरू हुई गुल्लू की ,करीब आधे घंटे तक रोता रहा वो |मैं फिर से क्लास में पहुंचा उसे चुप कराने और उससे बोला के आज के बाद से मैं उससे कभी बात नहीं करूँगा अगर उसने ऐसा दुबारा किया तो |गुल्लू में इसके बाद आश्चर्यजनक परिवर्तन हुए ,मैं स्वयं हैरान था के इतना ढीठ बालक एक थप्पड़ में ऐसे कैसे रो सकता हैं ,पर शायद मेरी सोंच मेरी  चाल  सफल हुई थी |बच्चे का ह्रदय कोमल होता है ,अगर उसमे किसी के लिए प्यार हो तो वो उसे खोना नहीं चाहता और अगर वो उसे कोई तकलीफ दे तो उसे दिल तक चोट पहुंचाती है |गुल्लू मेरे से हिल मिल गया था इसलिए मेरा एक थप्पड़ उसके गाल पर नहीं उसके सीधे दिल पर लगा था |गुल्लू अब मेरे पास पढता ,अब उसकी स्थिति ऐसी थी के अगर उसने कोई शैतानी की और जैसे ही किसी ने बोला के गुरु जी आ गये ,वो फ़ौरन या तो सावधान हो जाता या घर के अन्दर भाग जाता |
मुझे याद है एक दिन रात के दस बजे दरवाजे पर गुल्लू के पिता जी ने दस्तक दी पता चला उसे बुखार है दवा दूध के साथ खानी है पर गुल्लू खा नहीं रहा |मैं उसके घर गया देखा गुल्लू नहीं है , सब ने बता दिया था उसे के मै आ रहा हूँ ,उसकी बड़ी बहिन ने मुझे इशारे से बताया के वो पलंग के नीचे छुपा हुआ है | मैंने उसे निकला और गोद में बैठाया ,बोला दवा और दूध लाओ |गुल्लू बिना किसी शिकायत के आज्ञा करती बच्चे की तरह सारा दूध दावा सहित पी गया |आज गुल्लू कॉलेज में है और संस्मरण में हमेशा रहेगा |

इस प्रकार मोहल्ले और गाँव में मैं एक अच्छे टीचर के रूप में स्थापित हो चुका था |मेरे पास समय बहुत कम रह पता था खुद के लिए ,सुबह ६ बजे से रात के ११ बजे तक सिर्फ और सिर्फ पढाई |

दसवीं की परीक्षा शुरू हो चुकी थी , बच्चों के पेपर अच्छे जा रहे थे क्यूँ की मेरे बताये हुए ज्यादातर प्रश्न ही आये थे ,मैं निश्चिन्त था परिणाम को लेकर |एक महीने के बाद सत्र बदलने वाला था ,हमने भी अपने विद्यालय की परीक्षा ली |

एक दिन पुनः एक बेहद आश्चर्यजनक घटना हुई ,मैं मोहल्ले में ही टयूशन दे रहा था ,तभी एक बच्चे ने खबर दी के मुझे बुलाया गया है स्कूल के मालिक के पास ,मैं तुरंत वहां से चल दिया | वहां देखा के गाँव के कई बड़े बुजुर्गों का वहां जमावड़ा था ,और हमारे साथी टीचर और प्रिंसिपल साहब भी वहां मौजूद थे |साथ ही वहां हमारे स्कूल के मननिये संस्थापक महोदय भी उपस्थित थे , मुझे थोड़ी आशंका हुई के यहाँ मुझे क्यूँ बुलाया गया है ?जान कर आश्चर्य हुआ के मुझे विद्यालय का कार्यभार सौपने के लिए बुलाया गया है |संथापक महोदय ने मेरे साथी टीचर और प्रिंसिपल साहब से पूछा तो उन्होंने कोई आपत्ति नहीं जताई |मैं आश्चर्य मिश्रित आनंद का अनुभव कर रहा था , मुझे इतना सम्मान मिला ये मेरे लिए एक सुखद क्षण था |एक साल में ही एक बिहारी होकर भी जो उपलब्धि मैंने हासिल की थी वो औरों के लिए भी एक सबक थी जो यहाँ बरसों से रह रहे थे | मैंने अपने को कभी एक राज्य का नहीं माना था |इन सब के होने के पीछे की वजह वहां के युवा जिन्होंने मुझे जाना, वहां के बुजुर्ग जिन्होंने मुझे परखा,वहां के अभिभावक जिन्होंने मुझे समझा और मेरी छोटी सी कोशिश जो एक अच्छे कार्य के पीछे समर्पित थी | इस उपलब्धि से पिता जी को भी ख़ुशी हुई और मेरे जानने वालों को भी |
मैंने अपनी आगे की रणनीति तय की ,मैंने जरुरी चीजों की लिस्ट बनाई जो विद्यालय की आवश्यकता थी और इसके बारे में प्रबंधन से चर्चा की | तय हुआ के विद्यालय से ही बच्चों की किताबें सप्लाई होंगी ,इसके लिए १००००/- की सहायता राशी संस्थापक महोदय ने मुझे सौपी ,जो वापस करनी थी,लाभ लेने के बाद |

मैं किताबों की पहली खेप लेने सीधे दीपक प्रकाशन मेरठ पहुंचा |मैंने किताबों की लिस्ट दी ,मेरे किताबों की संख्या कम थी ,इसलिए उन्होंने २० % से ज्यादा डिस्काउंट देने से इंकार कर दिया , जब की ४०% डिस्काउंट तो वही दादरी में ही मिलता था |पता चला की मैं डायरेक्ट विद्यालय से आया था ,एजेंसी से नहीं इसलिए डिस्काउंट नहीं मिलेगा ,मुझे मेरे सारे सपने ख़त्म होते दिखे , मैंने प्रबन्धक से बात करने की इक्षा जताई |प्रबंधक एक बुजुर्ग थे मैंने संक्षेप में अपनी ,विद्यालय और ये पुस्तक यहाँ से सीधा ले जाने का कारण बताया |उन्होंने मेरी बात समझी और मुझे ४५% का डिस्काउंट दिया |मैं बहुत खुश हुआ |

अगले दिन से ही मैंने विद्यालय के कुछ अनुसाशन सम्बन्धी नियम में बदलाव किये  , और विद्यालय के मरम्मती का कुछ काम शुरू किया |मैंने ये गौर किया के मेरे प्रिंसिपल बनने से भूतपूर्व प्राचार्य महोदय और अन्य शिक्षकगण में एक असंतोष सा व्याप्त था मैंने सब को एक साथ बुलाया और कहा के मुझे किसी कुर्सी का लोभ नहीं आप लोग केवल मेरा साथ दें हम सब मिलकर इस विद्यालय को एक नयी ऊंचाई तक पहुँचाने में कामयाब होंगे |हम सब का विकास होगा |परन्तु फिर भी मुझे महसूस हुआ के मैं अलग थलग सा पड़ गया हूँ |मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और काम करता रहा |

इन सब के बावजूद मैंने नयी चीजों को सिखने और उसका प्रयोग करना नहीं छोड़ा था |योग इत्यादि भी करता और साधू संतों से मिलता रहता था ,उनसे प्रश्न करता और आकलन करता | कुछ पुरानी किताबें मसलन शिव पुराण ,भृगु संहिता ,पतंजलि की पुस्तकें इत्यादि पढ़ी और आश्चर्य चकित हुआ के इन किताबों में भौतकी ,रसायन ,खगोल विज्ञान और अन्य विशेष विज्ञान के अद्भुत उदाहरण थे |कुछ बातें ऐसी भी थी जो हमेशा घूमती जिसका उत्तर मुझे नहीं मिला था और मैं उसके उत्तर ढूंढने की कोशिश करता | मेरी उस वक़्त की स्थिति एक जुनूनी व्यक्ति की थी ,जिसे अध्यात्म का अधूरा ज्ञान था ,और जिसका केवल एक ही जूनून था ,इस गाँव के बच्चों में छिपी हुई प्रतिभा को जगाना ,उन्हें दुनिया में होने वाली तरक्की से अवगत कराना और एक नयी सोंच को विकसित करना ताके वो आने वाली पीढ़ी को कम से कम अच्छी शिक्षा दे सकें|कई बार मेरे साथ ऐसा होता के लोगों के भीड़ में बैठा हुआ होऊं और मैं अपनी हीं धुन में खोया रहूँ | कई बार लोगों ने मुझे टोका भी ,के मैं क्या सोंचता रहता हूँ |वहां के मेरे मित्र अक्सर ऐसा कहते के घना मत सोंचें कर ,बावला हो जावेगा |


मई का महिना आ चुका था ,अब छुट्टियाँ पड़ने ही वाली थी |सत्र के अंत में बकाया फीस उगाहने का बहुत दवाब था ,सभी टीचर्स को पैसे देने थे |कोई साथ भी नहीं दे रहा था ढंग से ,इसी बीच १०वि कक्षा का परिणाम आ गया |एक भी बच्चा पास नहीं हुआ ,सारे के सारे फेल ,बहुत ही ज्यादा दुखी हो गया मैं|कई तरह के दवाब का सामना कर रहा था मैं |इसी बीच एक अन्य घटना हुई ,वह घटना मेरे लिए फिर से एक नया मोड़ साबित हुई | हमारे भाई साहब जो वहां रहते थे और ,एक मेरे ममेरे भाई के साथ कुछ ऐसी व्यक्तिगत घटना हुई जिसका जिक्र मैं यहाँ नहीं कर सकता क्यूँ के ये उनका व्यक्तिगत मामला है और हो सकता है के उन्हें आपत्ति हो इसका जिक्र आने पर |पर इस घटना का असर इस प्रकार से हुआ के मेरा भाई जिसे मैं एक छोटे भाई की तरह मानता था वो वहां से यह कह कर वापस बिहार आ गया के अगर मैं अगले महीने की चार तारीख तक अगर बिहार नहीं पहुंचा तो वो खुद को ख़त्म कर लेगा |वो बहुत ही जिद्दी था और मेरे पास केवल 15 दिन थे |अब एक तरफ यहाँ की परिस्थितियां और दूसरी तरफ मेरा भाई |मैं काफी कशमकश में रहा |अभी तुरंत मेरे पर इतना भरोसा करके गाँव के लोगों ने मुझे फलक पर बिठाया था ,वहां मैं जाने का कारण भी नहीं बता सकता था क्यूँ की ये अत्यंत ही व्यक्तिगत था |यदि मैं बिना कारण बताये वहां से आऊं तो यह संभव नहीं था |अंत में मैंने निश्चय किया के मैं एक महीने के लिए यहाँ से चला जाऊंगा और उसे संभाल कर समझा कर वापस आ जाऊंगा|इसके लिए मैंने फ़ोन पर अपने भाई को सूचित किया एक फर्जी रजिस्ट्री भेजने को जिसमे मुझे ट्रेनिंग के लिए एक माह के लिए मुंबई जाने का आमंत्रण हो , एक अर्धसरकारी संस्था में |भाई ने वो रजिस्ट्री भेज दी ,वो यहाँ 1 तारीख में पहुँच गयी |मैंने ज्यादा से ज्यादा लोगों को वो पत्र दिखने की कोशिश की ताकि सब को लगे के मेरे लिए ट्रेनिंग का लैटर आया है |मैंने दो और पत्र लिखे एक भूतपूर्व प्रिंसिपल साहब के नाम ,जो मैंने अपने भाई को दिया पहुचने को और दूसरा नवाब सिंह को जो विद्यालय समिति के अध्यक्ष थे ,नवाब सिंह वाला पत्र मैंने पिता जी को दिया |
पिता जी से भी मैंने झूठ ही बोला के मैं ट्रेनिंग के लिए जा रहा हूँ क्यूँ की असली कारण मैं उन्हें भी नहीं बता सकता था ,क्यूँ की अगर मैं बताता तो वो समझते नहीं ,सारा कुछ झेलना तो मुझे ही था |एक बार फिर से मेरे जीवन में रिस्क आ गया था ,लेकिन ये रिस्क मैंने एक ऐसे रिश्ते को बचाने के लिए लिया था ,जिससे मैं अभी तक वंचित था ,वो था छोटे भाई का रिश्ता |२ तारीख को मैं बिना किसी को सच बताये ,निकल पड़ा पुनः एक नयी मंजिल की ओर ,एक नयी संभावना में , एक नयी कहानी बुनने में |मैंने जाते जाते पैसों का पूरा हिसाब नवाब सिंह और भूतपूर्व प्रिंसिपल को दे दिया था |
मुझे जाते वक़्त मेरे दिमाग ने मेरे से यह पूछा के मैंने सब को धोखा तो नहीं दिया,खुद को ,बच्चों को पिता जी को ?मेरे दिल ने उत्तर दिया नहीं ,ये धोका नहीं है ,तुम्हें फिर वापस आना ही होगा |








रविवार, 21 अक्टूबर 2012

Antah Parivartan

मैंने वापस लौटने के पहले , सब के लिए कुछ न कुछ ख़रीदा था । मैं काफी दिनों बाद घर जा रहा था , मैं बदला था , मैं वो नहीं रहा था जो मैं था । मेरे अन्दर का नास्तिक इन्सान , आस्तिक बन चुका था । सोंच बदल चुकी थी , पर इस सफ़र का अंत तो कहीं नज़र हीं नहीं आ रहा था । मैं फिर से वापस पटना जा रहा था , वहीँ खड़ा था जहाँ से चलते चलते मुझे लगभग 5 साल बीत चुके थे । पूरे रास्ते मैं फिर से अपने बारे में ही सोंच रहा था , एक नई विचार धारा ने मेरे अन्दर अपनी पैठ बनाई थी , वो थी देश के लिए समाज के लिए कुछ करना । दरअसल मैं घर से बाहर इतने लम्बे समय के लिए कभी गया नहीं था , और सच में समाज के बारे में तभी पता चलता है जब आप एक नई संस्कृति और समाज का हिस्सा बनते हैं , घर के पारिवारिक माहौल से दूर हो कर अपनी पहचान ढूंढने की कोशिश करते हैं । जहाँ देखने वाला आपके आस पड़ोस का कोई व्यक्ति नहीं , एक सुदूर प्रान्त का व्यक्ति/समाज  होता है , जो आपको जानता नहीं है , न ही आपकी संस्कृति और विचारों से अवगत होता है । ऐसी परिस्थितियों में अपना एक सामाजिक स्तर बनाना , अपने आप को वहां ढालना ही मेरी समझ से समाजिकता को समझने का प्रमाण है । कुछ अध्यात्मिक और कुछ सामाजिक जिम्मेवारियां मुझे सोंचने पर मजबूर कर रही थीं । मैंने रास्ते भर चिंतन ,मनन किया , मेरे अन्दर का आदमी मेरे से कहने लगा था के जीवन में केवल पैसा कमाना , शादी विवाह कर लेना , बंगला गाड़ी का मालिक बन जाना पर्याप्त नहीं है , कुछ सार्थक होना चाहिए जो सब के हित में हो । सोंच तो बहुत कुछ रहा था मगर , लौट के फिर से वापस अपने परिवार की तरफ ही ध्यान चला जाता था ।

ट्रेन सुबह १०:३० के आस पास पटना पहुंची , अपनी मिट्टी की खुशबू , आबो हवा में अपने पन , अपने बचपन का अहसास सब महसूस हुआ । मैंने घर आने की अपनी निश्चित तारीख घर वालों को नहीं बताई थी , मैं उन्हें अचानक से जाकर उन्हें अचंभित करना चाहता था । स्टेशन से बाहर निकलते हीं हनुमान मंदिर को देखा , जिसमे लगी ईटों में मेरा भी श्रम दान था , अभिवादन करके मैं घर की तरफ चला । रास्ते में चारों तरफ नज़रें घुमा कर देखता , देखता के क्या क्या बदलाव आया है यहाँ इतने दिनों में । मगर मुझे कोई खास बदलाव नज़र नहीं आया । मैं घर पहुँच कर दबे पाँव आकर पलंग के अन्दर घुस गया , एक एक करके सब को surprise दिया ..बड़ा मज़ा आया । दो चार दिन वहां की बातें घर में और दोस्तों के साथ बाँटने में हीं बीत गये । मैं अक्सर दिनभर इधर उधर घूम कर आता और सोने के वक़्त चिंतन करता के मैं अब क्या करूँ ? एक तरफ परिवार की मुश्किलें , मेरी पढाई मेरा कैरिएर , दूसरी तरफ मेरे अन्दर बैठा एक दूसरा इन्सान जो इस धरती पर आने का अपना कारण ढूंढ़ रहा था और देश और समाज के लिए अपनी आत्म संतुष्टि के लिए कुछ करना चाहता था । मेरे लिए पैसा कमाना एक मात्र लक्ष्य नहीं था ।

बिहार का माहौल उस वक़्त और भी बिगड़ चुका था । चारों तरफ भय , अराजकता का ही माहौल व्याप्त था , एक खास वर्ग के लोगों का बोलबाला था । पुलिस और प्रशासन जैसे गुलाम बने हुए थे । वहां से बड़े कारोबारियों का पलायन जारी था , नए काम में कोई निवेश नहीं करना चाहता था । वहां प्राइवेट जॉब के लिए भी , रिश्वत की मांग थी । मेरा निजी काम जो मैंने अपने मित्र के साथ किया था , उसके पैसे भी पुरे नहीं मिले थे मुझे , मैं लगातार उसके संपर्क में रहता और जैसे तैसे वसूली करता , और अपना और घर का खर्च चलने की कोशिश करता । ऐसा करते हुए लगभग 1 महीने बीत गये , मगर न तो मैं अपना कोई काम हीं शुरू कर पाया न हीं कोई जॉब ही हासिल कर पाया। दोस्तों में भी केवल मैं ही फ़िलहाल ऐसा था जिसके पास इतना अनुभव था और संघर्ष भी । मैं उनके बीच जब भी होता तो उन्हें अच्छा लगता , फिल्म देखना हो या पार्टी या कोई अन्य आयोजन मैं उसके बीच एक प्रमुख की भूमिका निभाता , मुझे विश्वास था के वो मेरे सच्चे और अच्छे दोस्त हैं ।मैं पटना में भी विभिन्न आयु वर्गों के लोगों का मित्र था , और कई तो ऐसे थे जिनसे मेरा शाम को मिलना रोज़ होता था । सब से मेरी बात होती मगर कोई भी कम मिलना मुश्किल सा लग रहा था  , परिस्थितियां पुनः विपरीत होती जा रही थीं ।कुछ काम मिले भी , जिसमे पैसे तो थे , मगर या तो वो गैर कानूनी थे , या फिर समाज के हित में नहीं थे । इसलिए मैंने ऐसे कार्यों को मना कर दिया , आज मुझे लगता है के अगर मैं आस्तिक न बना होता तो ऐसे ही किसी काम में संलिप्त होता । किसी शहर का कोई दबंग, गुंडा होता , या किसी पुलिस की गोली का शिकार , कौन जाने ?

उधर जुनपत से , स्कूल के मालिक नवाब सिंह और प्रिंसिपल का बार बार फ़ोन आ रहा था मेरे वहां वापस आने को लेकर । मैंने वहां 3 - 4  महीने में जो अपनी पहचान बनाई थी , उसका काफी प्रभाव पड़ा था , और मेरे वापस आने के बाद मेरी चर्चा वहां होती थी । लोग मुझे वहां वापस चाहते थे । मेरे अन्दर का सकून, मेरे बाहरी ताम झाम पर हावी हो गया । मैंने सोंच लिया के , कुछ दिन मैं जुनपत में रह कर ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा देने का काम करूँगा । दरअसल ये सब उस अध्यात्म ज्ञान का , या यूँ कहें के मेरे ऊपर अध्यात्मिक विचारों का इतना गहरा प्रभाव पड़ा था , के मैं सोंचता के अगर इन्सान किसी भी कार्य को मन लगा कर करे तो उसी में सफलता उसकी निश्चित है । वैसे भी पटना में 1999 - 2000 में 4-5 हज़ार की कमाई तो इंजिनियर को भी नहीं थी , मैंने हिसाब लगाया , और सोंचा के वहीँ कुछ तकनिकी शिक्षा लूँगा । मेरे इस निर्णय से मुझे कई फायदे मिलने थे , एक तो ब्राह्मन होने का कर्म , शिक्षा लेना और देना पूर्ण होता , देश की सेवा होती , शिक्षण करने का एक नया अनुभव प्राप्त होता , वहां रहकर मैं अपने अध्यात्म ज्ञान को भी बढ़ा सकता था । कई पहलुओं पर गौर करने के बाद मैंने आखिर में जुनपत वापस जाने का फैसला कर लिया । मैंने घर वालों से बात की और जाने को तैयार हो गया । मैंने सभी को सुचना दे दी के मैं आ रहा हूँ । पंडित जी भी खुश हो गये थे , उनके यहाँ घर का कम करने वाला एक आदमी कम पड़ गया था , अब मै जा रहा था तो उन्हें राहत मिलने की पूरी उम्मीद थी ।

मार्च सन  2000  को मैं वापस जुनपत आ चुका था ।जुनपत पहुँचने पर मैंने स्कूल ज्वाइन  कर लिया , और पहले जिन परिवारों में मैं ट्यूशन पढाता था उन्हें भी पकड़ लिया । मैंने भाई से बात की के मुझे अब पंडित जी के यहाँ नहीं रहना है। भाई ने मुझे आश्वाशन दिया और हम शाम को नवाब सिंह के घर पहुंचे , मैंने अपनी परेशानी उसे बताई । उनका एक पुराना मकान था जो वही गाँव के बीचों बीच था , उसमे तीन कमरे थे मगर वो  पिछले 10-15 सालों  से बंद पड़ा था। आस पड़ोस की महिलाएं और बच्चे रात को उस मकान के  पास से अकेले  नहीं गुज़रते थे । कई तरह की अफवाह थी , के वहां भूत प्रेतों की छाया है । सब बातें मुझे बताई गयी , मैंने उसी घर में रहने का फैसला किया ।

अगले दिन सुबह अपने दो चार बड़े छात्रों को ले कर पुराने मकान पंहुचा जिसे लोग "हवेली" बोलते थे । दरवाजा  बमुश्किल खुल पाया , क्यूँ की अन्दर की ओर से बहुत  सारे जंगल  झाड उग आये थे । हम अन्दर पहुंचे , हमारे  हाथ में जंगल झाड को काटने के हथियार थे । मकान की बनावट साधारण सी थी , एक साथ तीन कमरे , ऊपर पक्की छत , एक जीना, आगे बड़ा सा अहाता उसमे एक नीम का पेड़ जो बड़ा था, आंगन भी कच्चा था और कमरे का फर्श भी । आंगन में भांग के 6-7 फीट बड़े पेड़ जम चुके थे , बहुत सारा जंगल भी , हमें साफ सफाई करते करते शाम हो गयी , 2 - 3 बड़े सांप और लगभग 8-10 बिच्छुओं का सफाया हुआ और एक कोने में उनका दफना के अंतिम संस्कार । सब थक चुके थे हम उस दिन वापस चले आये । अगले दिन रूम की सफाई हुई , गोबर और मिट्टी से तीनों कमरों को लीपा गया । पड़ोस से एक बड़ी खाट मंगाई गयी , मैंने बीच वाले कमरे में रहने का फैसला किया था , उसकी पुताई की गयी । मैंने पूजा की और वहां रहना शुरू कर दिया । वहां दो चीजों की कमी थी , न तो उस मकान में टॉयलेट था , न ही उसमे हैण्ड पंप । वहां केवल शाम को लाइट आती  थी । शाम को लाइट आ गयी । आस पड़ोस के लोग खुश थे के मैंने फिर से उस घर को जिन्दा किया । शाम को पड़ोस से खाना आ गया । मै बरसों बाद खाट पर सोया, अकेला , मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा वहां पर, बस एक नया अहसास था , सोंच रहा था अपने रूम को जहाँ मैं सोया करता था । मुझे अपने बड़े वाले आईने की बहुत याद आ रही थी ।

मेरा स्कूल में  आना कुछ ऐसा था जैसे के किसी नए  सिस्टम का आना। मैंने स्कूल में आते ही प्रिंसिपल साहब से विचार विमर्श करके सबसे पहले अध्यापकों की नियमावली बनाई । स्कूल का रुटीन  बनाया , पहले वहां पढ़ाने की व्यवस्था ऐसी थी के जो जहाँ बैठता घंटो पढाता रहता । उस वक़्त स्कूल 7 वीं  क्लास तक ही था । मैथ्स में तो फिर भी मेरा भाई पढ़ा लेता था , पर इंग्लिश तो 4 थी कक्षा का भी और कोई पढ़ा नहीं पाता था । मैंने धीरे धीरे अनुशासन बनाना शुरू किया । मैंने अपने पुराने शिक्षकों से ही बच्चों को नियंत्रित करने की कला की सीख ली   , उनका गंभीर होना , आँखों से , बातों से मारना। वैसे भी मै पिछले 6 महीनों से बच्चों को पढ़ा रहा था , धीरे धीरे मै अपनी खुद की भी विशेषता बनाता जा रहा था । स्कूल में मैंने 1 सप्ताह बड़े प्यार से बच्चों को पढाया , समझा कर दुलार से , और मै वार्निंग भी देता जाता के मै आपका मित्र जरुर हूँ पर यदि बताये हुए समय के अन्दर कोई सुधरा नहीं तो ठीक नहीं होगा । स्कूल में बच्चे तो वही थे जिनका दिमाग पढाई में लगता ही नहीं था , एक से एक बिगड़े हुए केस ,  वजह वहां की ग्रामीण संस्कृति और 75% लोगों का अभी भी ये मानना के दो चार दिन स्कूल न जाके घर या खेत का काम उनसे करा लेंगे तो कुछ  बिगड़ेगा नहीं ।

मैं बच्चों को पीटने के बिलकुल भी हक़ में नहीं था , पर वहां का माहौल अब भी ऐसा था के घर वाले खुद जानते थे के अगर उन्हें सजा न दी गयी तो वो बिलकुल भी नहीं पढ़ पाएंगे इस लिए वहां के सरकारी और प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं के ऑफिस में बजाप्ता 5-6 कट्ठे (एक प्रकार का पौधा जिसकी छड़ी लचीली और बहुत मजबूत होती थी ) की छड़ियाँ रखी होती थी । शिक्षक खुल के पीटते बच्चों को , और बिगड़े हुए केस रोज़ रोज़ की मार खा के , ढीट बन चुके थे । मुझे बच्चों के शरीर पर नहीं उनके दिमाग पर चोट करनी थी , ताके वो पढाई के महत्व को समझें और पढ़ें । मैंने  इसके लिए एक नुस्खा निकाला , सुबह प्रार्थना के बाद PT करवानी शुरू की , इसके बाद प्रतिदिन सभी बच्चों को वहीं  हममे से एक टीचर उन्हें , पढाई , अनुशासन और जीवन के मूल्यों के बारे में बताता , कहानी  इत्यादि सुनाता । मैंने शिक्षकों से अनुरोध किया के अभी कुछ दिन किसी बच्चे को पीटा न जाये । अगले चरण में मैंने संगीत , चित्रकला , चुटकुले , कहानी , अन्त्राक्ष्री और ऐसे ही पीरियड सप्ताह में तीन दिन शुरू कर दिए । हमने वहां हर शनिवार को आधा समय  साप्ताहिक टेस्ट और आधा समय गीत संगीत इत्यादि के लिए तय कर दिया ।लगभग 30 दिनों में हीं उन बच्चों में रूचि जगी जो पढना तो चाहते थे मगर उबाऊ शिक्षा पद्दति से पढने में रूचि खो चुके थे । अब बारी थी बिगड़े हुए केस का । कक्षा 4 से 6 के जितने बिगड़े हुए केस थे उनकी सूची बनाई , उनके परिवार के सदस्यों से मिला और घर में बच्चों को कैसे सहयोग करना है , इसका निवेदन किया । अब मेरे दुसरे रूप की बारी थी । मैंने हर क्लास में एक छोटा सा टास्क दिया ये कह के कल इसे अवश्य कर के लाना है । ये एक सुखद घटना थी के , प्रयोगों के कारण कई बिगड़े केस में सुधार था मगर कई ऐसे थे जैसे ढाक के तीन पात । मुझे याद है के करीब 12-13 ऐसे बिगड़े केस थे जिन्हें क्लास से बाहर मैंने निकला था और ग्राउंड में ले जा कर पहली बार डंडे से दंड का प्रयोग किया । उस दिन ऑफिस में रखे 3 के तीन डंडे टूट गए थे। पहले भी जब में विद्यालय आता और शोर होने पर एक बार चिल्लाता तो शोर शांत हो जाता था , लेकिन थोड़ी देर बाद पुनः शुरू हो जाता था, मगर इस पिटाई की घटना के बाद कई परिवर्तन हुए । एक तो ये के छुट्टी के बाद जब मै विद्यालय से घर की ओर जाता तो , रास्ते में जो भी बच्चा होता , देख के भाग खड़ा होता । सुबह स्कूल की बगल वाली सड़क पे मेरे आते ही पूरा विद्यालय शांत हो जाता , जब तक मै घूम के स्कूल के मुख्य द्वार पर आता , तब तक सब अनुशासित हो जाते ।

स्कूल की बदली हुई कार्य प्रणाली को देख कर अभिभावक बहुत ही खुश थे । सभी अपने बच्चों को मुझसे ही पढाना चाहते थे , पर मेरा ध्यान अभी बिगड़े हुए केस पर था । मैंने उन्हें विद्यालय के बाद  अतिरिक्त कक्षाएं देनी शुरू की । मै जान बुझ कर पढ़ाने के दौरान सबको हँसता, क्यूँ की फिर पिटाई खाने के बाद उन्हें दिल पे ये अहसास हो , क्यूँ की जब हँसाने वाला रुलाता है तो दुःख ज्यादा होता है, चाहे वो बच्चा  हो या बड़ा । इसी बीच मैंने 10 वीं के बच्चों का ट्यूशन शुरू कर दिया ।

अब मेरी दिनचर्या कुछ इस प्रकार हो गयी थी , सुबह 5:30 में जगना , 6:15 तक फ्रेश होना , 6:30 से 7:30 एक ट्यूशन लेना , 7:40 स्कूल , फिर 2-6 अलग अलग  जगहों पर ट्यूशन , और 7-9:30 10 वीं के बच्चों की क्लास । घर में पानी की व्यवस्था न होने के कारण बहुत परेशानी होती थी । सामने के मकान के बाहर हैंडपंप था , सुबह दो बाल्टी पानी वहां से भर के लाना और स्नान के बाद फिर पानी भर के रखना । रविवार के दिन कपडे धोने में ज्यादा परेशानी होती , क्यूँ की मै अपने निजी कार्य खुले में बाहर करने का आदि नहीं था , न ही किसी और से करवाने का । इसलिए उस दिन कई बाल्टी पानी बार बार ढो के लाना पड़ता । रात को अक्सर लाइट भी चली जाती , बच्चों को गैस के लैंप में पढाना होता । वैसे तो लगभग एक महीने मैंने नवाब सिंह के अनुरोध पर उनके यहाँ ही भोजन किया , और बीच बीच में पडोसी भी खाना दे जाते अगर कुछ अच्छा बनता तो , जैसे पूरी या आलू के पराठे, पर स्वभाव के कारण मैंने खुद से खाना बनाने की ठानी , मै खाने को ही लेकर सही , किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता था । अगले ही दिन मै दादरी गया,वहां से खाने के कुछ बर्तन और जरुरी सामान लेकर आया । मैंने पहले ही जिक्र किया था के मै चीजों को देख कर सीखता था , घर में माँ को खाना बनाते देख के मैंने खुद अब खाना बनाने की सोंची। पहली चीज़ जो मैंने बनाई थी वो थी सोया भेज बिरियानी । इसके बाद से मेरी दिनचर्या में एक चीज़ और शामिल हो गयी , खाना बनाना ।

धीरे धीरे मै सबसे पहले अपने आस पड़ोस , स्कूल के बच्चों और धीरे धीरे पूरे गाँव का चहेता बन गया , चूँकि मै सभी बड़े बूढों का सम्मान करता इसलिए मुझे भी सम्मान मिलता, और सबसे बड़ी बात ये थी के मै  उनकी भाषा अच्छी  तरह बोलने लगा था , कोई भी ये नहीं जान पाता  के मै  बिहार से हूँ  । चाहे जो भी हो ब्राम्हण होने का सम्मान मैंने वहां जितना पाया उतना कही भी नहीं । मै जाति  वादी नहीं हूँ , पर उनमे कुछ ऐसा था जो मेरे लिए सम्मानिये था । धीरे धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी स्कूल में । मुझे रिश्ते भी मिले , नवाब सिंह जैसा भाई , भाभी और मेरे सामने के मकान में रहने वाली बीबी (वहां माँ को इसी नाम से संबोधित करते थे ) वो बिलकुल मेरा ऐसा ख्याल रखती जैसे की माँ ।

वहां के बारे में पहले ही कह चूका हूँ के वहां सुन्दरता हर जगह कूट कूट के भरी थी , और पहले की कुछ घटनाओं के कारण लोग वहां परदेशियों खास कर के बिहारियों पर भरोसा नहीं करते थे , ये और बात है के मेरे जैसा बिहारी अभी तक उन्हें वहां नहीं मिला था जिसने गाँव के सबसे बड़े दुकानदार से आते ही पैंटीन शैम्पू , हेयर जेल , सव्लोन साबुन जैसे ब्रांडेड उत्पादों की मांग की थी , जो उसके पास उपलब्ध नहीं थी  वो ग्रेजुएट था , और योग इत्यादि करता था , उससे भी मेरी अच्छी मित्रता हो गयी । वहां की सुबह बहुत सुहानी लगती , मेरा स्वास्थ्य भी अच्छा होता गया ।

वहां के समुदाय में एकता की कमी तो नहीं थी , पर गाँव में एक ही जाति में भी कई समुदाय थे , सब के विभिन्न नाम भी थे । ये नाम उस गाँव में बसने वाले समयानुसार थे , जो पहले आये वो अगेड़े बाद में आये पछोले , कुछ अन्य विधि से भी नाम थे । सभी समुदायों के  नवयुवकों से मेरी अच्छी जान पहचान हो चुकी थी , अक्सर शाम को "हवेली" में उनका आना होता , हंसी मजाक भी होता , बातों का आदान प्रदान भी । ताश का एक खेल जिसे "सीप" बोलते थे वो भी खेला जाता था । मेरे से व्यक्तिगत रूप से भी लोग बात करते , एक दुसरे के बारे में भी पर कभी ऐसी नौबत नहीं आई थी के मेरे द्वारा बात इधर से उधर होती ।

इतना व्यस्त होने  के बावजूद मै हनुमान मंदिर जाने का और आरती में शामिल होना का कोई भी मौका नहीं गंवाता था। न तो मेरे पास कंप्यूटर था न  टीवी इसलिए जब भी  खाली समय मिलता कुछ न कुछ आध्यात्मिक  पढता या सीखने की कोशिश करता । आज जो भी आध्यात्मिक , या व्यक्तिगत ज्ञान मेरे अन्दर है वो इसी समय की बदौलत है। आज मै सोंचता हूँ के उस वक़्त मै 16 घंटे काम करता था , पर फिर भी खुद के लिए समय था , आज उतना काम तो नहीं पर खुद के लिए वक़्त निकलना बड़ा मुश्किल है बावजूद इसके के आधा काम तो  अब टेबल पर बैठे बैठे हो जाता है । पड़ोस में एक गाँव था जो क्षत्रियों का था , वहां के एक बुजुर्ग रामायण के प्रेमी थे , और हर महीने 5-6 रामायणों का आयोजन कराते थे , वो अक्सर हनुमान मंदिर आया करते थे हम 5-6 लोगों का एक ग्रुप बन चुका था जो रामायण पाठ करने आस पास के गाँव में भी जाते । मेरे अन्दर रामायण प्रेम बढ़ता ही जा रहा था और मै  एक भी मौका रामायण का मै छोड़ता नहीं था , अक्सर मेरा समय रात 8 के बाद का होता था जो की सुबह के 4-5 बजे तक चलता था , बीच बीच में अक्सर चाय वगैरह का लघु विराम होता । ये समय ऐसा समय होता के कई बार खुद आयोजन करने वाले भी सो जाते थे , चूँकि रामायण अखंड होती थी इसलिए वो खंडित न हो इसकी पूरी जिम्मेवारी हम तीन चार लोगों पर ही होती । मैंने अपने पूरे प्रवास के दौरान लगभग 100 रामायण से भी ज्यादा में हिस्सा लिया होगा ।

मुझे अक्सर लोग हवेली के बारे में डराने की कोशिश करते , पर जब कुछ बड़े बुजुर्गों ने भी ऐसा कुछ वहां होने की बात कही थी तो मैंने इसका अलग ही निदान निकल लिया था ।मेरे अन्दर इतना भरोसा हो गया था ईश्वर  पर के मुझे बिलकुल भी डर नहीं लगता था । यद्यपि वहां भूत  प्रेतों के हमले और ऐसी कई कहानियां अक्सर सुनने को  मिलती थी , तथापि मैंने कभी भी कुछ सामने से अभी तक नहीं देखा था , हाँ ये जरुर मानता  था के भूत  और आत्माओं का अस्तित्व इश्वर और मानव की तरह है । मैंने अपने बाकि के दोनों कमरों में से एक पूरी तरह भूतों के नाम कर रखा था ,उसका दरवाजा  हमेशा बंद करके रखता था । उसमे यदा कदा ही सफाई होती , न उसमे कभी धुप दीप जलाता ।

घरवालों से फ़ोन पर हर तीसरे चौथे दिन बात होती , हर 10 दिनों पर चिट्ठियों का आदान प्रदान होता। मुझे अपनी बहन अपर्णा पर भरोसा था के वो पढ़ाई में ज्यादा नाम करेगी , इसलिए उसकी जो भी जरूरतें होती मै पूरी करने की कोशिश करता था । वो पढाई में अच्छा कर रही थी । मै तो अब ऐसी स्थिति में फंस चुका था के मै फ़िलहाल अपनी पढाई पूरी नहीं कर सकता था । अभी मेरे दिमाग में केवल दो चीजें थी , यहाँ रहकर यहाँ के बच्चों का विकास , खुद के ज्ञान का विकास और बहनों की पढाई ।

विद्यालय बहुत अच्छा चल रहा था । मैंने विज्ञानं पढ़ाने  के दौरान अधिक से अधिक प्रयोगों को , जो संभव हो सकते थे वहां बच्चों को दिखाया ,खास करके बायोलॉजी के , पेड़ पौधों सम्बंधित । बिगड़े केस भी सुधार पर थे । महीने में एक बार डंडा चलाना पड़ता जो अगले एक महीने के लिए प्रयाप्त होता । मेरी ज्यादातर  क्लास 4थी सी ऊपर की ही थी , पर छोटी क्लास के नन्हें बच्चों के बीच भी मै  अक्सर बैठता उन्हें हँसाना , उनके साथ हँसना  मुझे बहुत ही अच्छा लगता था । नन्हें बच्चे मुझे बहुत चाहते थे ।

इसी बीच 4 सितम्बर आ गया , जिस दिन मेरा जन्मदिन था । बहुत कम ही लोगों को इसके बारे में पता था । मैंने उस दिन कुछ विशेष नहीं सोंच रखा था , विद्यालय में भी कोई विशेष बधाई नहीं मिली , मै  घर के बारे में सोंच रहा था जहाँ अब तक हर जन्म दिन पर केक आता था , और नए कपडे मिलते । सुबह मैंने माँ और बाबा को फ़ोन करके उनका आशीर्वाद ले लिया था । स्कूल के ख़त्म होते ही , पड़ोस का युवक जिसके घर के  नल से मै  पानी भर के लाता था , स्कूटर ले कर आ गया और मुझे दादरी चलने को कहा । मैंने भी सोचा के चलो थोडा घूम  ही लिया जाये । पर रास्ते  में पता चला के उसे पता चल गया है के आज मेरा जन्मदिन है और हम पार्टी करने जा रहे थे। हम दादरी से भी  दूर निकले , क्यूंकि शिक्षक होने की कुछ मर्यादा थी , बहुत दिनों बाद मैंने बियर पिया और फिल्म देखि , शायद वो मेला या बागी थी । हमें वापस घर आते आते 8 बज गये थे , गाँव में बिजली नहीं थी , जैसे ही हम स्कूटर से मोहल्ले में घुसे , दो छोटे बच्चे "गुरु जी आ गये " बोल के मेरे घर के अन्दर भागे। मै अपने घर के दरवाजे को खोला , मगर वो अन्दर से बंद था , मै  कुछ समझा नहीं मैंने दस्तक दी और जैसे ही दरवाजा खुला सामने जो देखा वो अविस्मर्णीय था । लगभग 30-40 नन्हें बच्चे अन्दर थे अहाते में , मेरे दरवाजा खोलते हीं  उन्होंने चिल्ला कर "हैप्पी बर्थ डे टू यू " दो तीन बार कहा और बारी बारी  से मेरा चरण स्पर्श करने लगे । मै  चकित था , अन्दर कई मोमबतियां जल रही थीं , एक बड़ा तिरपाल बिछा था जिसपे वो सारे बच्चे बैठे थे । सामने एक स्टूल रखा था , जिसपर मिल्क केक (खोये की बनी मिठाई ) एक प्लेट में रखी थी , बिलकुल ऐसे जैसे केक रखा जाता है , उसमे कैंडल्स भी लगे थे । मै  सारी  चीजें देख कर भावुक हो गया , आँखों में ख़ुशी के आंसू  थे , मेरी बाँहों में जितने भी बच्चे समां सकते थे , सब को एक साथ पकड़ कर ऑंखें बंद करके मुस्कुरा रहा था , और आँखों से लगातार आंसू  बह रहे थे । मै  उठा, पहले केक काटा  और बच्चों के लिए चॉकलेट मंगवाई और सब में बाँटा , फिर उनके साथ बैठ कर हंसी मजाक में समय बिताया  । बातों  के दौरान पता चला के ये सारा कुछ बच्चों ने अपने पैसों से किया था , और लगभग एक घंटे से मेरे इंतज़ार में बैठे थे । उनके विदा होने के बाद मै अपने कमरे में पहुंचा ईश्वर  के समक्ष पहुँच कर उनका बहुत बहुत धन्यवाद् किया , ये घटना मेरे लिए ऐसी है जो मै  कभी भूल नहीं सकता ।


अक्टूबर के महीने में एक और विचित्र घटना हुई , मै रात में सोया हुआ था तभी मुझे एक पायल जैसी आवाज ने मुझे चौकाया , मैंने घड़ी देखी  रात के करीब 1:30 हो रहे थे । वहां की ज्यादा तर  महिलाएं पायल पहनती थी , मगर रात के 1:30 बज रहे थे और ये आवाज भी पास से आती  महसूस हो रही थी । मै बाहर  निकला , पर जैसे ही दरवाजे की कुण्डी नीचे गिराई आवाज बंद । पर मै  हाथ में एक छोटा गंगा जल से भरा बर्तन ले कर चारों  तरफ देखा , छत पर गया पर कुछ भी नहीं मिला । मै  पुनः अपने कमरे में आया , थोड़ी देर बाद लाइट चली  गयी , माहौल और भी भयावह हो गया और पुनः वो आवाज बिलकुल ऐसी लगी जैसे मेरे दरवाजे के ठीक बाहर से आ  रही हो । मेरे अपनी रीढ़ की हड्डी में कुछ दिमाग की तरफ चलता सा महसूस हुआ , शायद ये डर  था। रात भर मै  परेशां रहा , मेरी नीद पूरी नहीं हुई थी और सुबह मै  बहुत गुस्से में था । अगले दिन सुबह सुबह हनुमान मंदिर पहुंचा , वहां से गंगा जल और उनपे चढ़े हुए कुछ फूल उठा कर लाया , सीधा अपने घर पहुंचा और उस रूम में घुसा जिसे मैं बंद रखता था , मैंने हाथ में गंगा जल और फूल  लेकर तेज़ आवाज़ में कहा  " मै  यहाँ हमेशा के लिए रहने नहीं आया हूँ , और मैंने यदि यहाँ कोई है तो उनके लिए अलग से  कमरा दे रखा है , मैंने कभी भी उन्हें तंग करने की कोशिश नहीं की है , और यदि मुझे आगे से तंग करने की कोशिश की तो गंगा जल की कसम है , मै  तो जाऊंगा ही , पर तुम्हें सबक सीखा  के जाऊंगा " और ये कह कर मैंने गंगा जल छिड़कने को हाथ उठाया पर फिर कुछ सोंच कर शांत हो गया । इस घटना के बाद मुझे कभी भी कुछ महसूस नहीं हुआ पर मेरे कुछ रिश्तेदार , मेरे पिता जो बाद में यहाँ आये सब को महसूस हुआ जो आगे जिक्र में आयेगा ।



नवम्बर का महिना चल रहा था , अब मेरा ध्यान बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाने  के ऊपर था । मैंने तय किया के 26 जनवरी को मै  स्टेज शो करूँगा बच्चों का , क्यूँ की विद्यालय में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था । मै अब इसकी तय्यारी में जुट गया ।