शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

जुनून

यूँ तो मेरा भी संसार वहां सिमटा हुआ था | शहर से दूर , नई संभावनाओ से दूर ,न तो वहां ऐसे शैक्षणिक संसथान थे जिनकी ट्रेनिंग के उपरांत कोई काम धंधा किया जा सके | कमोवेश ये पुरे देश की समस्या दिखती थी मुझे के, कुछ चुने हुए शहर कुछ चुने हुए ज्ञान और तकनीक को पाने के लिए प्रसिद्द थे , बाकि जगह उपेक्षित , ये भेंड़ चाल थी , जो अब भी बरक़रार है ,  पर जहाँ तक संभव हो सकता था , मैं अख़बारों , रेडिओ के माध्यम से नए अविष्कारों , नए प्रोडक्ट , आने वाली नई तकनीक इत्यादि के बारे में जानने की कोशिश करता रहता था | येही वो वजह थी के मैंने उस समय कंप्यूटर शिक्षा को सर्वोपरी समझा और बच्चों को इसकी शिक्षा देने का निश्चय किया | सोंचना बहुत आसान था पर करना उतना ही कठिन , कई समस्याएं थी , पहली यह की मेरे पास दिन में समय का आभाव था , विद्यालय एवं ट्यूशन थे , दूसरी यह की कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर दादरी में था और वहां तक शाम में जाने का तो कोई साधन था ही नहीं , यह भी अनिश्चित था के कोचिंग वाले शाम में कोचिंग देंगे ये नहीं| पर मैंने मन में जो ठाना था उसमे प्रयास करने में मैं बिलकुल भी चूकना नहीं चाहता था , क्यूँ की मेरा लक्ष्य एक अच्छे काम को समर्पित था | अगले ही दिन मैं दादरी के Apteck Computer Centre पहुंचा , धड़कते दिल से अन्दर दाखिल हुआ , मेनेजर की कुर्सी पर एक युवक बैठे थे , और कुछ छात्र भी | मैंने अपना परिचय दिया और उन्हें कहा के मुझे कंप्यूटर कोर्से करना है एक साल का डिप्लोमा | उन्होंने फॉर्म दिया और मैंने उसे पूरा भर दिया , पर जब कोचिंग के समय की बात आयी तो वो नकार गये | उनका कहना था के , शाम के लिए लड़के नहीं हैं और एक विद्यार्थी के लिए ये कोचिंग नहीं खुल सकता है | मैं कुछ देर के लिए निराश हो चुका था पर मैं इतनी आसानी से हिम्मत नहीं हारने वाला था , मैंने उनसे कहा के ठीक है पर आप सब युवा हैं , क्या मेरी बात दो मिनट सुन सकते हैं , उन्होंने हामी भरी और मैंने कहना शुरू कियामैं यहाँ का नहीं , बिहार से हूँ , बहुत सारे काम किये मैंने जीवन में पर घूमता फिरता यहाँ के एक ऐसे गाँव में पहुँच गया जहाँ के बच्चे शिक्षा में पिछड़े हुए थे , उन्हें आज की आधुनिक शिक्षा कोई भी नहीं देना चाहता था , शायद ये उन्होंने इस प्रकार से सोंचा ही नहीं था , मैंने पिछले पांच सालों में उन्हें इस लायक बनाया है के वो हर उस बात से अवगत हो सके जो उनके लिए जरुरी हैं , चाहे वो देश से सम्बंधित हो , विदेश से या दुनिया से | मैं एक युवा हूँ , काम कर चुका हूँ शहरों में मगर मैंने अपना ठिकाना एक गाँव में बनाया क्यूँ की एक युवा होते हुए मेरे कन्धों पर भी कुछ जिम्मेवारियां बनती हैं , देश का प्रधानमंत्री यहाँ गाँव में नहीं पढ़ाने आयेगा, वो पैसे दे सकता है संसाधन भी पर वो समर्पित व्यक्ति कहाँ से देगा जो एक सपने को पूरा कर सके | मैं अपने करियर और भविष्य को दाव पर लगा कर कुछ नया करने की कोशिश में हूँ , एक युवा होते हुए मैं समझता हूँ के आप मेरी बात समझने की कोशिश करेंगे | आप सब लोग मेरी बातों पर विचार करें और मेरा साथ देने की कोशिश करें , ये मेरा विनम्र निवेदन है |  मैंने ये सारी बातें हाथ जोड़ के बोली थी इसका कुछ चमत्कारी प्रभाव हुआ , एक अमीर छात्र (पहनावे से लग रहा था ) ने मेरी प्रशंशा की और मेनेजर साहेब से जिनका नाम प्रमोद था बोला के , हम अपनी शिफ्ट शाम में करने को तय्यार हैं , इनके ऊपर ध्यान दिया जाये | प्रमोद जी ने कहा के ठीक है आप पैसे जमा करदो और परसों से शाम के 6 बजे आ जाओ , मैंने हामी भर दी पैसे जमा किये और उल्लास के साथ वापस गाँव पहुंचा| मैंने पहली सीढ़ी पार कर ली थी , अब जुगाड़ आने जाने का करना था क्यूँ की शाम को कोई साधन नहीं था गाँव से के मैं 9 किलोमीटर की यात्रा कर सकता , किसी प्रकार चला भी जाता पर वापस आने का तो बिलकुल भी साधन नहीं था | मेरा सुबह 7:30 पर विद्यालय पर होना जरुरी होता क्यूँ की अगले साल बच्चों के मेट्रिक की परीक्षा थी और मैं उन्हें 7:30 से 8:30 तक फ्री क्लास देता था | पर कहते हैं के ईश्वर साथ होता है अगर आप के पास कुछ अच्छा करने का जज्बा और जुनून हो | हमारे प्रधानाचार्य महोदय के पास एक पुराना स्कूटर था , अच्छा चलता था वो उसे बेचने के पक्ष में थे , मैं अगले दिन विद्यालय पहुंचा और अपनी सारी बात बताई , यह भी के उन्हें मेरा साथ देना चाहिए , मैंने कुछ नया करने का सोंचा है , मैं उनके ऊपर अपना प्रभाव डालने में सफल रहा और मैंने उन्हें राज़ी कर लिया के वो किश्तों में पैसे सैलरी से काट लेंगे और मुझे स्कूटर दे दिया | एक और समस्या का समाधान हो चुका था , अगले दिन एक नई आशा के साथ मैंने अपने दिनचर्या में थोड़ा परिवर्तन किया , 5 बजे शाम तक बच्चों को ट्यूशन देने के बाद मैं स्कूटर से दादरी पहुंचा , आज पहला दिन था , कंप्यूटर के सामने पहली बार बैठा था |एक नयी उमग हिचकोले ले रहा था , एक नया जोश के मैं कुछ ऐसा सिख रहा हूँ जो मुझे आगे तक ले कर जायेगा , थोड़ी परेशानियों के बाद पहले दिन मैं वर्ड फाइल बना कर सेव करना सीख गया , पर सेव कहाँ करना है और फिर उसे पुनः कैसे खोलना है नहीं सीख पाया , प्रमोद ही मुझे कंप्यूटर शिक्षा देते थे , पहले दिन से हीं मैं उनसे प्रभावित हो गया था , उनके सिखाने का ढंग अच्छा था और नए लोगों के प्रश्नों से वो परेशान नहीं होते थे| पहले दिन जिस चीज़ ने मुझे सबसे ज्यादा परेशान किया वो था कीबोर्ड का क्वेट्री होना , शब्द ढूंढने में काफी समय लगता था , पहले दिन मुझे वापस आते आते 8:30 बज गये | हवेली आने के बाद मैंने उस रात एक बात पर गौर किया की क्या यह सही है के इतिहास अपने को दुहराता है  , पिता जी ने फांके खाए और मैंने भी , वो टीचर थे , मैं भी हुआ , वो टाइपराइटर मास्टर थे ,उस ज़माने की नयी चीज़  और मैं कंप्यूटर सीख रहा हूँ , इस ज़माने की नयी चीज़ , उनकी भी शिक्षा अधूरी रह गयी और मेरी भी , ऐसा संयोग कैसे ? क्या मैं भी उनकी तरह किसी कंपनी का मेनेजर केवल ईमानदारी और मेहनत के बल पर बन पाउँगा ? मैंने पिता जी से उनके पास जा कर मिलता रहता था , वो मेरे मित्र के तरह ही थे , हम दोनों में वैचारिक मतभेद भले हो पर मित्रवत व्यव्हार था | मैं जब भी उनसे माचिस मांगता तो वो समझते के मैं उनसे थोड़ा दूर हो कर सिगरेट पियूँगा , पर वो मुझसे कुछ नहीं कहते थे , शायद वो समझते हों के मैं सही रास्ते पर हूँ अभी भी | मैंने उसने क्वर्टी सिस्टम के बारे में पूछा , वो हँसते हुए बोले थोड़े दिनों बाद उँगलियाँ अपने आप अल्फाबेट्स पर चली जाएँगी, बिना देखे टाइप कर सकोगे , मुझे उस वक़्त थोड़ा भी विश्वास नहीं हुआ उनपर , पर आज अहसास होता है के उन्होंने बिलकुल ही सही कहा था , सच में वो टाइपराइटर के मास्टर थे |

अब मेरी यही दिनचर्या हो गयी , मैं कंप्यूटर को धीरे धीरे समझने लगा , मेरे बाकी के सहपाठी मेरे से छोटे  थे पर मैं उनसे सीखने की कोशिश करता था , थोड़े दिनों में मुझमे तेज़ी आ गयी और मैं चीजों को जल्द से जल्द समझने लगा |

जुनपत से दादरी आने जाने के रास्ते में 5 किमी का रास्ता बिलकुल सुनसान था , एक आध जगह लोगों से पैसे छिनने और मारपीट भी घटनाएँ होती , पर मुझे भय नहीं था क्यूँ की ईश्वर पर अटूट विश्वास था और काम का जूनून | घटनाओं को देखते हुए रास्ते में पुलिस वहां लगा दिए गये थे , जिनसे मेरा सामना हुआ करता था , एक बार उन्होंने रोक कर मुझ से पूछताछ की और फिर वो मुझे पहचान गये , कई बार वो मुझसे पूछते पंडित जी कहाँ तक सीखे ? जल्दी सीख लो फिर हमें भी सिखाना | ये सिलसिला लगभग डेढ़ महीने तक चला , इसी बीच हमारे प्राचार्य महोदय से कुछ वैचारिक मतभेद हुए और उन्होंने मुझसे स्कूटर वापस ले लिया | शायद ये मेरी परीक्षा हो ये सोंच कर मैं विचलित नहीं हुआ बल्कि अन्य विकल्पों पर विचार करना शुरू कर दिया | मैं उसदिन किसी प्रकार दादरी पहुंचा और प्रमोद से अपनी समस्या बताई , ये भी के बिना वाहन के 6 बजे तक आना संभव नहीं है , मैं थोड़ा निराश सा था , पर प्रमोद ने मुझे उस समय एक बहुत बड़ा योगदान दिया , उन्होंने मुझसे कहा के तुम किसी भी समय आ जाओ मैं यही ऊपर में रहता हूँ , मैं तुम्हारे लगन से प्रभावित हूँ , इसलिए मैं तुम्हें रात को भी सिखा सकता हूँ , उन्होंने ही मुझे बताया के बोडाकी जो के जुनपत ग्राम से डेढ़ किमी की दुरी पर था , वहां से शाम को 7 बजे की ट्रेन है जो के पंद्रह मिनट में दादरी पहुंचा दिया करती था , पुनः सुबह वापसी की ट्रेन सुबह के 6 बजे थी | यूँ तो मैं दिल्ली आने जाने के लिए मैं इस स्टेशन का कई बार इस्तेमाल कर चुका था पर रात में रोज़ का यात्री बनना थोड़ा अजीब था , दूसरा यह के अभी नवम्बर का महिना चल रहा था और ठण्ड बढती जा रही थी रोज़ के हिसाब से , ऐसे में सुबह 5 बजे उठ कर टंकी के जमे हुए पानी ने नहाना फिर 6 बजे तक दादरी पहुंचना अपने आप में एक चुनौती थी | जुनपत ग्राम से बोडाकी आने का रास्ता भी कम खतरनाक नहीं था , रास्ते के लगभग बीच से नहर गुज़रती थी , और उसपर बने पुलिया पर अँधेरा होने का बाद असामाजिक तत्व जमा होते और वहां यदा कदा लूट पाट की भी घटनाएँ होती थी साल में एक आध हत्याओं की भी सूचना मिलती थी | आस पास के कई गाँव के लोग प्रतिदिन दिल्ली , गाज़ियाबाद इत्यादि जगहों पर नौकरी और व्यापारिक कार्य से जाते थे , देर रात होने पर अथवा 1 तारीख से 5 तारीख के बीच ऐसी घटनाये ज्यादा होती थी क्यू की उस वक़्त वेतन का समय होता था | उस वक़्त तो चुनौतियों का सामना करने की धुन सवार थी , इसलिए मैंने फैसला किया के मैं ट्रेन से ही जाया करूँगा | शाम को 6 बजे के बाद काम समाप्त करके पैदल बोडाकी की तरफ चला , हाथ में एक डंडा था क्यूँ की गाँव के बाद रास्ता बिलकुल सुनसान हुआ करता था और अकेले इन्सान पर कुत्ते या सियार झुण्ड बना कर हमला कर देते थे , इसलिए वो एक रक्षात्मक प्रवृति थी , दूसरा कारण यह था के लाठी या डंडा लेकर एक विशेष चाल में चलना वहां के मूल निवासियों की पहचान थी , सो दूर से ही देख कर कोई समझ सके के कोई ग्रामीण ही है , मैं डंडा हाथ में लिए हुए था | ठण्ड बढ़ी हुई थी , चारों तरफ खेत ही खेत नज़र आ रहे थे , चाँद उपेक्षाकृत ज्यादा बड़ा दिख रहा था , चारों तरफ चांदनी फैली हुई थी और दूर से कुत्ते के रोने और लड़ने की आवाज़ आ रही थी , पूरे जोश में मैं गाता चला जा रहा था किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार , किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार .... मुझे स्टेशन जाने वक़्त ऐसा लग रहा था जैसे मेरे साथ बजरंगबली स्वयं चल रहे हैं मेरे पीठ के पीछे और कह रहे हैं ....तू चल मै हूँ तेरे साथ , ये कोरी कल्पना थी , अध्यात्म का असर , या वो अनुभूति जो बड़े बड़े साधकों को कठिन साधना करने पर भी नहीं मिलता मगर किसी गरीब और सहृदयी को अपने आप ही मिल जाता है , मैं नहीं जानता, क्यूँ की आज भी ये सब लिखते हुए उस ठंडी रात , उस निश्चय , उस जिद , उस समर्पण और उस हिम्मत को याद करने के बाद मेरे रोम रोम में एक सिहरन सी दौड़ रही है | खैर , मैं स्टेशन पहुंचा 6:50 पर , टिकट काउंटर पर पंहुचा और दादरी की टिकट मांगी , टिकट बुकिंग अधिकारी बीडी पीता हुआ काउंटर से थोड़ा अलग अपने पांव टेक कर कुर्सी पर बैठा था , उसने मुझे एक नज़र देखा और बोले काहे कु 5 रुपल्ली फुके है ,दादरी तलक कोई भी न पूछे चलो जा मैं हैरान था , बिना टिकट यात्रा करने का एक और अनुभव होना था , पर मैंने टिकट लिया | पता चला के ट्रेन कभी समय पर नहीं आती , कभी कभी 8:30 भी बजाती है , ये आखिरी ट्रेन होती थी | ट्रेन लगभग 7:30 में आ गयी 10 मिनट बाद मैं दादरी में था , वहां रेलवे फाटक के समीप मुझे एक साफ सुथरी दुकान दिखी भूख लगी थी , मैंने वहां दो समोसे एक गिलास दूध लिया और चल पड़ा सेंटर की ओर | वहां पहुँचने पर प्रमोद मुझे ऊपर ले गये , वहां उन्होंने मुझसे खाने के लिए पूछा पर मैंने कहा के मैं खा के आया हूँ , मैं किसी पर कभी बोझ नहीं बनना चाहता था | खाने के बाद प्रमोद मुझे नीचे ले कर आये और बोले के मैं तुम्हें जो बता रहा हूँ जब भी पूरा हो जाये मुझसे नया टास्क ले लेना और बिलकुल हिचकिचाना नहीं | मैं अपने टास्क में जुट गया और प्रमोद सोने में , एफएम फुल साउंड में बजा कर | वो एक बड़ा सा हॉल था जिसमे कंप्यूटर रखे थे , प्रमोद फोल्डिंग खाट पर सोते थे , और मेरे लिए बेंचों को इक्कठा करके एक बिस्तर तैयार किया गया था | मैंने उस दिन प्रमोद को नहीं जगाया और टास्क पूरा करके सो गया | एफएम की वजह से नींद 4 बजे सुबह आई और 5 बजे मैं उठ भी गया क्यूँ की मुझे जाना था | सुबह की ठण्ड बढ़ चुकी थी , नित्यक्रिया से निपट कर मैं नहाने को तय्यार हुआ , मैं यहाँ कहना चाहूँगा के इश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया है जिसमे सबसे अनमोल है किसी भी परिस्थिति में ढल जाना , जैसे है मैंने मग का पानी अपने सर पर डाला मेरे दोनों जबड़े कस गये , एक हाथ जो आजाद था कस गया और मुह से एक ही शब्द निकला , जय श्री राम और फिर मग का पानी मेरे शरीर पर और फिर दोनों हाथ यांत्रिक गति से चल रहे थे , पानी ...बर्फ की तरह ठंडा था | नहाने और कपडे पहनने के बाद भी कानो में से ठंडी हवा निकल रही थी , पर कोई तनाव न था, एक दो घंटे ही सोया पर कोई थकावट नहीं थी , एक नयी सी स्फूर्ति थी | सुबह कडकडाती ठण्ड में पैदल ही दादरी स्टेशन पर पहुंचा, हाथ और कान ऐसे हो रहे थे जैसे कट के गिर जायेंगे , भीषण ठण्ड थी , बोडाकी से पैदल स्कूल पहुंचा वहां नवमी एवं दसवी के विद्यार्थी मेरा इंतज़ार कर रहे थे जिन्हें सुबह मैं फ्री क्लास विद्यालय शुरू होने से पहले दिया करता था |
इस प्रकार पुनः मेरी दिनचर्या में परिवर्तन हो गया , दिन भर पढाता , फिर शाम को पैदल बोडाकी पहुँच कर ट्रेन पकड़ता फिर दादरी स्टेशन से पैदल सेंटर तक एवं पुनः सुबह उठ कर दादरी से जुनपत | कष्ट तो होता था , पर एक बड़ा फायेदा ये था के सेंटर पर जाने के बाद कोई समय सीमा नहीं थी , ३-४ बजे सुबह तक मैं कंप्यूटर पर किताब की मदद से सीखता , परियोजनाओं को पूरा करता | एक बड़ा फायेदा यह भी हुआ के प्रमोद हार्डवेयर की भी अच्छी जानकारी रखते थे , इसलिए मैंने उनके सानिध्य में हार्डवेयर भी सीखा | ऐसा करते हुए मुझे लगभग २  और महीने हो गये |इसी दौरान मैंने अपने ओढने और बिछाने का सारा सामान दादरी स्थानांतरित कर दिया था , क्यूँ की मैं रात को वही रुकता था | एक दिन मैं सेंटर पहुंचा तो प्रमोद ने मुझसे कहा के अब तुमने एक साल का कोर्स पूरा कर लिया है , मैं आश्चर्यचकित था ! उन्होंने बताया के मैंने ३ महीनो में ही पुरे साल का कोर्स पूरा कर लिया है और ये भी के वो इसी वर्ष ऑनलाइन परीक्षा (जो की गाज़ियाबाद में होनी थी) में मुझे भेजेंगे | मुझे पंद्रह दिनों की तय्यारी करनी है बस परीक्षा के लिए | मैं काफी प्रसन्न था के मैंने एक और बाज़ी लगभग मार ली है | जनवरी का महिना चल रहा था , बहुत तेज़ ठण्ड थी और साथ ही साथ घना कोहरा भी , प्रमोद ने मुझसे कहा था के मुझे कल गाज़ियाबाद सेंटर चलना है उनके साथ और ऑनलाइन प्रक्रिया समझनी है , क्यूँ की अभी तक मैंने इन्टरनेट पर कुछ भी नहीं किया था , चलाया ही नहीं था | ये सोंच कर के कल इन्टरनेट पर काम करना है , एक आनंद सा महसूस कर रहा था , अजीब सी गुदगुदी हो रही थी , और घने कोहरे को चीरता हुआ ठण्ड से लापरवाह मैं चला जा रहा था बोडाकी की ओर | मैं नियत समय पर बोडाकी स्टेशन पहुँच गया और ट्रेन का इंतज़ार करने लगा , 7 से 8 और फिर 9 बज गये , ट्रेन नहीं आई कोहरा और घना होता जा रहा था , 5 फीट से ज्यादा कुछ दिख नहीं रहा था , पुरे प्लेटफार्म पर दो चार लोग ही बचे थे | रात के 10:30 तक मैंने ट्रेन का इंतज़ार किया , अब पुरे प्लेटफार्म पर केवल 1 आदमी बचा था मेरे अलावा | उन्होंने मेरे पास आ कर कहा के अब ट्रेन नहीं आयेगी , मेरी वजह से वो भी रुके थे अब तक , और अब वो जा रहे हैं , उनका गाँव बोडाकी ही था , पर मुझे तो वापस जुनपत जाना था , मेरा मन गुस्से से भरा हुआ था , जिस आनंद और जोश से मैं आया था , वो अब क्षोभ निराशा और गुस्से में बदल चुका था | मैंने वहीं के एक पेड़ से डंडा तोडा और वापस जुनपत की ओर चल पड़ा | चारो तरफ घोर अंधकार था , घना कोहरा और ठण्ड , कोहरे की वजह से सड़क भी ठीक से दिखाई नहीं पद रही थी , न टोर्च था न ही उस समय मोबाइल हुआ करता था आम आदमी के पास , अंदाज़े से चला जा रहा था जुनपत की तरफ | इधर गाँव में लोग रजाई में दुबके हुए थे और मैं उस ठंडी रात में भटक रहा था , जैसे तैसे मैं गाँव पहुंचा और अपने कमरे में गया | सबसे बड़ी समस्या ये थी के मैं सोऊंगा कैसे , क्यूँ की सारा सामान तो मैं दादरी में छोड़ आया था | दिमाग काम नहीं कर रहा था , कमरे में एक टूटी खाट थी मैं सर पकड़ कर थोड़ी देर के लिए बैठ गया , हड्डियाँ अन्दर तक काँप रही थीं | इश्वर का नाम लेकर मैंने अलमारी खोली , उसमे एक धोती , एक अंगोछा ,  और कुछ पुराने कपडे मुझे मिल गये , मैंने कुछ दिमाग लगाया , खाट के टूटे हुए पैर के निचे बाल्टी उलट के रखी ,खाट पर न्यूज़ पेपर की एक मोटी तह बिछाई , शर्ट के ऊपर एक और शर्ट , पैंट के ऊपर एक और पैंट पहना , अंगोछे को गुलबंद की तरह लपेटा और धोती ओढ़ के सोने की कोशिश करने लगा | उस रात मुझे मुंशी प्रेमचंद की लिखी पूस की रात की याद आ गयी , जैसे मैं उसके चरित्र को स्वयं जी रहा होऊं | मैंने उसी रात प्रण किया के अब मैं ट्रेन से भी नहीं जाऊंगा दादरी , अब पैदल जाऊंगा | सुबह पड़ोसियों से डांट मिली , पर मैं रात को किसी को परेशान नहीं करना चाहता था इसलिए किसी को जगाया नहीं था | दिन भर पढ़ाने के बाद शाम को अँधेरा होते ही चल पड़ा पैदल दादरी की ओर , गाँव की सीमा पार करने के बाद दो किमी तक केवल खेत थे , मैंने  ये दो किलोमीटर हलके हलके दौड़ते हुए पार किये , दूर से किसी वाहन की लाइट दिखाई देती तो चलने लगता , और वाहन गुजरने के बाद पुनः दौड़ लगाना शुरू करता | दो किलोमीटर के बाद एक गाँव आता था , उसे मैंने पैदल चल के पार किया फिर ३ किलोमीटर का सुनसान इलाका , कभी दौड़ते और चलते हुए | इस प्रकार मैं 5 किलोमीटर के बाद मुख्य सड़क पर आया  जो दादरी जाती थी , वहां से ४ किलोमीटर का रास्ता बचता था , वहां से मुझे बस मिल गयी और मैं सेंटर पहुँच गया | सारा वृतांत सुनने के बाद प्रमोद ने मुझसे कहा के अभी लगभग बीस पचीस दिन बचे हैं , तुम कब तक ऐसे दौड़ लगा के आओगे , मैंने कहा बीस पचीस दिनों तक | मेरे जुनून को देख कर के प्रमोद और ग्रामवासी जितने आश्चर्य चकित थे उतना मैं स्वयं भी था , एक अनोखी उर्जा थी , एक अनोखी प्रेरणा जिससे प्रेरित हो कर मैं ऐसा कर पा रहा था , उस प्रेरणा और उर्जा को मैंने फिर कभी दुबारा महसूस नहीं किया | शायद ये अध्यात्म और ध्यान की शक्ति थी जिसने मेरे आत्म बल को शिखर तक पहुंचा दिया था , या फिर शायद बच्चों के लिए ग्रामीण समाज के लिए  कुछ नया करने का जोश | मैंने लगभग 1 महीने तक ऐसे ही दौड़ते भागते दादरी जाना जारी रखा | इसी बीच मेरी आगे की परियोजना को सुन कर प्रमोद ने मेरे साथ मिल कर काम करने की इक्षा जाहिर की , मैं सहर्ष तैयार हो गया | मुझे सर्टिफिकेट मिल गया था , अब मैं जल्द से जल्द कंप्यूटर कोचिंग सेंटर जुनपत में शुरू करना चाहता था , मेरा एक सपना जिसे मैं सच करना चाहता था | मैंने प्रमोद के साथ मिल कर सारे खर्चों का हिसाब किताब लगाया | हमें शुरुआत में ४ कंप्यूटर चाहिए थे , उनके लिए फर्नीचर , एक जेनसेट , और प्रचार करने के लिए आवश्यक राशी | प्रमोद ने २ कंप्यूटर और जेनसेट का वादा किया मुझे दो कंप्यूटर चाहिए थे और बाकी खर्चों के लिए राशी | मैंने ग्रामवासियों से बात की , और सहयोग करने को कहा , मुझे आश्वाशन मिले पर धन नहीं , पर मैं अपनी मेहनत को बर्बाद नहीं होने देना चाहता था , कम से कम चालीस हज़ार रूपए चाहिए थे | मैंने ब्याज पर पैसे उठाये , और दो कंप्यूटर खरीद लिए उधर प्रमोद भी दो कंप्यूटर लेकर आ गये | केवल एक जेनसेट की कमी रह गयी थी , मैंने प्रमोद से बात की उन्होंने मुझसे कहा के उन्हें पंद्रह दिन लगेंगे इसके लिए | मैंने निश्चय किया के शुभ दिन देख कर कोचिंग सेंटर खोल लिया जाये , सौभाग्य से मुझे एक अच्छा मकान जो की नया बना हुआ था सेंटर के लिए मिल गया | मैंने निमंत्रण पत्र छपवाए , पुरे गाँव में और सड़कों के खम्बों पर कोचिंग सेंटर का बोर्ड लगवाया , और चार कंप्यूटर के साथ डॉलफिन कंप्यूटर कोचिंग सेंटर का शुभारम्भ कर दिया | इस सेंटर का खुलना मेरे लिए सपने सच होने जैसा था , मेरी मेहनत ,मेरे संघर्ष और मेरे जुनून का उपसंहार था ये सेन्टर |
गाँव के बच्चों को कंप्यूटर चलाता देखने की इक्षा पूर्ण होती दिखाई दे रही थी , बहुत सारे सपने देख रहा था मैं , सामाजिक बदलाव की एक नई आशा और जूनून के साथ ।  




3 टिप्‍पणियां:

  1. इंजीनियर होते हुये भी मुझे कंप्यूटर की ABCD नहीं पता थी ,
    जब speakasia मे id लगाई तो मजबूरी हो गई कि कंप्यूटर चलाना होगा , छोटे भाई के पास डेस्कटॉप और लेप्टोप दोनों थे पर उसने साफ मना कर दिया कि न तो वो सिखाएगा और न ही अपने कंप्यूटर को हाथ लगाने देगा ।
    जैसे तैसे मैंने अपने एक मित्र को पटाया जिसने लेपटॉप तो ले रखा था पर चलना नहीं आता था , उसने भी अपने घर वालों से छ्पकर मुझे अपना लेपटॉप दे दिया ,
    उस दिन पूरी रात ... बिना किसी से पूछे - जाने , Login करने का प्रयास करता रहा और अंततः सफल होनेके बाद सोया ।
    सुबह जल्दी उठ कर साइट के सारे ऑप्शन खोल खोल के देखता रहा ... उसी दिन फेसबुक परभि अपनी id बनाई और आपके ग्रुप मे आ गया ...
    यहाँ से मेरी ट्रेनिंग आरंभ हो गई , फिर महफिल मे आया ... और अब ये आलम है कि किसी की भी id हेक कर लेता हूँ :) ... खुराफाती दिमाग

    आपकी कशमकश देख कर लगता है कि मैंने अपने जीवन मे इतना सब नहीं किया :(
    किन्तु आपके जीवट साहस की प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकता ।

    आपका लेख पढ़कर एक गीत की पंक्तियाँ कानो मे गूंज रही है -
    " कहिए तो आसमां को ज़मीं पर उतार लाएँ ,
    मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर थान लीजिये ... "

    आपका लेख और स्वानुभव 'गजब' हैं भाई :)

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