पटना वापस आने वक्त ट्रेन का कोई रिजर्वेशन लिया नहीं था , वेटिंग की टिकट कटवाई और निकल पड़ा | संजोग से मैं जिस बोगी में चढ़ा वो सेना के जवानों से पूरी तरह भरा हुआ था , वहां टीटीई के आने का कोई प्रश्न नहीं था | मैं कोने में गेट के पास चुप चाप बैग रख के बैठ गया और आदत अनुसार एक अध्यात्मिक किताब निकल कर पढने लगा | एक सरदार जवान बार बार मुझे घूर रहा था , पर मैं पढने में तल्लीन था मुझे कोई दिक्कत नहीं हो रही थी निचे बैठने में | २ घंटे तक मैं लगातार पढता ही रहा और इसके बाद सरदार जी ने मुझसे पूछा “कहा जाना है ?” मैंने कहा पटना साहेब , ,मैंने ये जान बुझ कर बोला था | पटना से पटना साहेब १२ कि.मी. दूर है , दरअसल पटना साहेब , गुरु गोविन्द सिंह का जन्म स्थान है , और सिक्खों का एक तीर्थ भी | सरदार जी ने मुझसे कहा के वहां तक ऐसे ही बैठ के जाओगे किताब पढ़ते पढ़ते , मैंने हँसते हुए कहा के और चारा भी नहीं है कुछ , सरदार जी खिड़की वाली सीट पर थे उन्होंने कहा , यहाँ बैठ जाओ | मैं सरदार जी के पास आ गया और सामान नीचे रख दिया | पूरी रात मैंने बैठ के गुजारी , उस समय ट्रेन दिल्ली से पटना आने में सत्रह घंटे लेती थी | सत्रह घंटे मैंने बिलकुल बैठ के ही गुज़ारे| फौजी लोग भी समझ रहे होंगे के ये कैसा बन्दा है |
मेरा अचानक से घर आना सब के लिए आश्चर्यजनक था , मेरा भाई पहले से ही वहां आया हुआ था | माँ को मैंने बताया के वहां काम करना मुश्किल हो रहा है मैं यहीं कुछ करूँगा | फिर मैंने भाई से बात की के अब क्या करना है , उसने कहा के अब बिज़नेस करना है , मैंने कहा के पैसा कहाँ है ? उसने बोला मेरे पास हैं | दरअसल मामा जी ने जुनपत में एक प्लाट के लिए करीब ८०-९० हज़ार बतौर अग्रिम राशी दिए थे | मेरे भाई ने किसी प्रकार उनसे २५ हज़ार रूपए वापस ले लिए | उस वक़्त २५ हज़ार रुपयों का एक अलग महत्व था | मैंने उससे जनना चाहा के वो किस तरीके का बिज़नस करना चाहता है , जवाब मिला जिसमे अधिक से अधिक फायेदा हो| काफी सोंच विचार और एक दो दिन वही पटना में गंवाने के बाद हमने निश्चय किया के हम नेपाल जायेंगे| नेपाल बिहार से सटा हुआ एक खुबसूरत देश है , और सम्पूर्ण हिन्दू राष्ट्र है | नेपाल में खुद की कोई फैक्ट्री या भरी उद्योग जैसी कोई चीज़ नहीं , पर्यटन और विभिन्न देशों का एक व्यापारिक केंद्र है | उस वक़्त कंप्यूटर और कंप्यूटर पार्ट्स का बहुत बोल बाला था | लोग नेपाल से कंप्यूटर पार्ट्स सस्ते में ले कर आते और दुगने तिगुने भाव में यहाँ लाकर बेचते | हमें ये धंधा रास आया | हमदोनो ने पटना से रक्सौल की ट्रेन पकड़ी और वहां से बॉर्डर पार करके नेपाल की सीमा में पहुँच गये | ये एक तरह से पहली विदेश यात्रा थी , एक ऐसी विदेश यात्रा जिसका बॉर्डर हमने रिक्शे से पार किया | भारत और नेपाल के बीच सड़क से खुले तौर पर जाया जा सकता था , कोई विशेष चेकिंग नहीं थी अगर छोटा मोटा बैग है तो | वहां से रात को बस निकली काठमांडू के लिए जो नेपाल की राजधानी थी| मेरी सीट खिड़की के पास वाली थी , मुझे जल्द ही नींद आ गयी, सुबह करीब 6 बजे मेरी नींद खुली खिड़की के बाहर का दृश्य देख के एक बार को डर गया मैं , बस काफी ऊंचाई पर थी जाम लगा था , सड़क के एक तरफ पहाड़ था और दूसरी तरफ हजारों फीट गहरी खाई , पहाड़ को काट कर बनाया गया सर्पिला रास्ता खिड़की से दिख रहा था | नीचे भी पूरा जाम लगा था , हम बस से नीचे उतर आये , वहां का नज़ारा अद्भुत था | पूर्ण रूप से प्राकृतिक | झरने , पहाड़ इत्यादि दिखाई पड़ रहे थे , हलकी हलकी बारिश भी हो रही थी.| पता चला के जाम का कारण आगे पहाड़ से मिटटी का खिसकना है , जो सड़क पर आ चुकी है , संजोग से हमारी बस सबसे आगे थी , और कुछ छोटे वाहन | करीब आधे घंटे बाद ही वहां जेसीबी आ गयी , वहां ऐसी स्थिति से निपटने की तत्परता को देख कर मुझे काफी ख़ुशी हुई | मिटटी हटाने के बाद रास्ता खुल गया और बस चल पड़ी | अब मैं खिड़की से प्राकृतिक नजारों का आनंद ले रहा था , ऐसा लग रहा था जैसे किसी कल्पना में हूँ मैं , बादल हमारे नीचे थे , और हम ऊपर | मैंने पहले भी इसका जिक्र किया है के मेरे ऊपर मृत्युयोग था २२वे साल में , और मैं कुछ करूँ या न करूँ दिन में जब भी फुर्सत मिलती ये जप हमेशा करता रहता था | सफ़र में और आनंदित हो कर मैं ये जप करता था |करीब 10-11 बजे के आस पास हम काठमांडू पहुंचे और एक होटल किराये पर ले लिए , उस वक़्त भारतीय मुद्रा के 100 रूपए के बदले 160 नेपाली मुद्रा मिलती थी | हमने थोड़ा आराम किया और फिर निकल पड़े काठमांडू की सैर पर |
काठमांडू कई पहाड़ों से घिरा हुआ समुद्र से लगभग 1400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है | बहुत ही साफ सुथरा शहर | वहां मुख्य रूप से हिंदी और नेपाली बोली जाती है | लोग काफी अच्छे स्वाभाव के थे | पुरुष और स्त्रियाँ समान रूप से वहां हर व्यवसाय में भागीदारी करते हुए दिखे | वहां काफी हिन्दू मंदिर थे | एक मुख्य मंदिर दिखा वहां “काष्ठमंडप” जो पूरी तरह लकड़ी का बना हुआ था और २ तल्ले ऊँचा था | काफी प्रयटक भी दिखे वहां पर | जगह जगह रंगीन पताकाएं लगी हुई थी , रंगों से विशेष लगाव दिखा वहां के लोगों के बीच| हमने वहां के मुख्य बाज़ार से कपड़ों और जूतों इत्यादि की खरीदारी की | वहां के इलेक्ट्रोनिक मार्किट भी गये हम और आवश्यकता के अनुसार लोगों से बातचीत की | मगर हमें वहां कुछ खास नहीं मिला | हम वहां पर ३ दिन रहे और निराश हो कर लौटने का प्लान बनाया , वहां से व्यापर करने का फायेदा तभी था जब कम से कम एक लाख रूपए का सामान ख़रीदा जाता | हमारे पास पैसे कम थे | हम वापस पटना आ गये | कुछ दिनों तक कई प्रकार के काम करने की कोशिश की लेकिन हम असफल रहे | इसी बीच मामा जी को पैसों की जानकारी हुई और उन्होंने भाई को अपने पास बुलाने का दवाब बनाया , भाई ने कहा के मैं कुछ दिनों के लिए घर हो कर आता हूँ और वो निकल गया |
मैं पुनः एक बार बेरोजगार हो चुका था | मैंने जुनपत फ़ोन लगाया तो पता चला के वहां मेरे बारे में बहुत भारी गलतफ़हमी फ़ैल गयी है | सब ये कह रहे थे के मैंने सबको धोखा दिया है | इस दुष्प्रचार में वो लोग शामिल थे जो मौके की तलाश में थे | ये भी पता चला के पिता जी से भी लोगों ने मेरे बारे में बुरा भला कहा है | कुछ ऐसी बातें भी सुनने में आई के यदि मैं जुनपत गया तो मेरे साथ मर पीट भी हो सकती है | मैं मानसिक रूप से परेशान हो चुका था | मैंने यही किसी नौकरी को ढूंढने की कोशिश की , पर लगभग २० दिनों के प्रयास के बाद भी मुझे कोई नौकरी नहीं मिली जो मेरे लायक हो |
इस बीच मुझे ध्यान में आया के मेरे कुछ पैसे मेरे एक मित्र के पास हैं जिसके साथ मैंने स्टेशनरी का धंधा किया था , लगभग 12 हज़ार रूपए अब भी बकाया थे मेरे मूलधन से ही| मैंने उससे संपर्क किया , उसने एक प्रपोजल रखा , उसने बताया के उसके पास कुछ दवाइयां हैं जो बिकवा देनी हैं | मैं उससे अपना बकाया चुकता कर लूँ , मैंने हामी भर दी | अगले दिन सुबह करीब 10 बजे मेरे मित्र का छोटा भाई आया और बताया के दवाइयां आ गयी हैं | मैंने कहाँ के कहाँ है ? उसने इशारे से सड़क पर एक बंद ठेले की ओर इशारा करके बताया के उसमे हैं | मैंने कहा के भाई इसे यहाँ क्यू ले के आये हो , मेरे पास रखने की जगह नहीं है न ही अभी मैंने किसी ग्राहक की तलाश की है, क्या माल है , किस कंपनी का है सब देखना पड़ेगा ऐसे थोड़े ही न होता है | उसने कहा के चाहे जो हो ये माल आपको रखना ही पड़ेगा | मुझे कुछ शक हुआ मैंने पूछा के ये कैसा माल है , पता चला के चोरी का है , मैंने तुरंत उसे मना कर दिया के मैं इस तरीके का काम नहीं करता | उसने मेरे से उलझने की कोशिश की मगर मैं अपने घर के पास था , उसने मुझे धमकी दी और चला गया | अगले दिन अख़बार से ज्ञात हुआ के , ये 50 लाख के रुपयों के दवाइयों की लूट हुई है और लगभग 8 लोग पकडे गये हैं , ये सारा कारनामा मित्र के भाई और उसे दोस्तों ने किया था | मित्र के भाई के नाम पर वारंट निकल चुका था | वो छिप के रह रहा था | शाम को मैंने अपने मित्र से मुलाकात की और बताया के ये सब क्या था , उसने बोला के मैंने इसे नहीं कहा था ऐसा करने को , खैर अब उसकी समस्या उसके भाई को जमानत दिलवाने की थी , और मेरी मेरे पैसों की | मेरे बहुत जिद करने पर उसने मुझे करीब 10 हज़ार की दवाइयां दी जो मार्किट में करीब 5 हज़ार में बिक गयी | मुझे थोड़ी राहत हुई | अगले दिन मैं फिर अपने मित्र के पास रात के करीब 9:30 में गया , वो कुछ मित्रों के साथ बैठा था , उसने मेरे से पैसे मांगे | मैंने कहा के मुझे अभी और 7 हज़ार तुमसे चाहिए , उसने कहा के उसके लिए उसके भाई की जमानत सबसे महत्वपूर्ण है , मैंने कहा के मेरी स्थिति बहुत ही बुरी है | हम दोनों में गरमा गरम बहस होने लगी , तभी मैंने अपनी खोपड़ी के पीछे एक “खट” जैसी आवाज़ सुनी , देखा एक शराब पिए हुए लड़के में अपनी देसी पिस्टल से मेरी खोपड़ी पर फायर किया था जो मिस हो गया था , अगले पल जो हुआ वो बड़ी ही तेज़ी के साथ हुआ , कब मैंने उससे पिस्टल छिनी , कब उसके चेहरे पर मारा और फिर कब पलट कर जो और बैठे थे उनके तरफ हथियार किया मुझे पता नहीं , पर आनन फानन में वो वहां से भाग गये | पिस्टल अभी भी मेरे पास ही था, लोडेड , मुझे उसे अनलोड करना भी नहीं आता था | अगले दिन मैंने अपने एक पुराने मित्र के भाई को जो के सीमेंट वगैरह की एजेंसी चलता था वो पिस्टल 4 हज़ार में बेच दिया | २४ घंटों में दो काम बड़ी तेज़ी के साथ हुए , एक तो मेरे ऊपर का मृत्युयोग टल गया था और , मुझे 4 हज़ार और मिल गये बकाये मे से|
मैं अक्सर सोंचता के अब ये पैसे भी ख़त्म हो जायेंगे तो क्या होगा, भाई भी वापस नहीं आया न ही मेरे से कोई बात ही की है , यहाँ कोई जॉब मिल नहीं रही है , क्यूँ न दिल्ली जा कर एक बार और किस्मत आजमाई जाये | मेरे पास अभी कुछ पैसे थे , इसलिए मैंने अगले दिन ही दिल्ली जाने का प्लान बनाया | मैंने जाने से पहले एक बार फिर जुनपत फ़ोन मिलाया , मेरी नवाब सिंह से बात हुई , मैंने उससे बताया की मैंने कोई गलत काम नहीं किया है और सारा हिसाब किताब स्कूल में दे चुका हूँ | नवाब ने मुझे एक बार जुनपत आने को बोला , बोला के एक बार आ कर अपनी स्थिति को साफ कर लो | मेरे पास कोई विकल्प नहीं था , चूँकि मैं यहाँ निराश ही हो चुका था इसलिए घर से भी किसी ने मेरे से कुछ कहा नहीं , मैं दिल्ली के लिए दुबारा निकल गया | फिर से एक बार पहाड़गंज पर आ चुका था | मेरी ज़िन्दगी एक सर्किल की तरह हो गयी थी , मैं गोल गोल घूम रहा था ,और स्थिर हो नहीं पा रहा था | मैंने वहां एक गेस्ट हाउस में एक बेड लिया , कीमत थी 400/- | दिन भर इधर उधर घूमता और शाम को थक कर वापस आता , एक समय खाना खाता, रात को घर से भुने हुए चुडा और मूंगफली खाकर सो जाता | पैसे धीरे धीरे खत्म हो रहे थे , और नौकरी का कोई ठिकाना नहीं था | मैं जुनपत इसलिए वापस नहीं जा रहा था क्यूँ की एक दम से सबने मेरी मेहनत एक पल में ही भुला दी और मेरी बुरे शुरू कर दी थी, मेरा दिल वहां से टूट चुका था | मेरी नज़र अख़बार के एक इश्तेहार पर पड़ी जिसमे ऑफिस असिस्टेंट की आवश्यकता थी | मैंने दिए हुए नंबर पर फ़ोन मिलाया और बस पकड़ कर चल दिया मिलने | मैं बताई हुई जगह पर खड़ा था थोड़ी देर बाद स्कूटर पर एक व्यक्ति आया , स्कूटर का नंबर बिहार का था | बातचीत से पता चला के वो पटना से ही हैं , मैं खुश हुआ पर अगले पल ही मुझे निराश होना पड़ा , उसने कहा के ये जॉब आपके लिए नहीं है| ऑफिस असिस्टेंट नाम को लिखा हुआ है जबकि ये पिउन का काम है | मैंने कहा के कोई बात नहीं मुझे करना है मैं शुरू से शुरुआत करना चाहता हूँ , पर वो नहीं माने , बोले के एक ब्राह्मण को ऐसा काम दे कर मैं पाप का भागी नहीं बनना चाहता हूँ , मेरी कई विनती के बाद भी वो नही माने | मेरी जेब में जबरदस्ती 200 रु. डाले और बोले के आप वापस चले जाओ | मैं फिर से गेस्ट हाउस पहुंचा , मेरे पैसे खत्म हो चुके थे अब आखिरी दिन के पैसे ही बचे थे रहने को , मुझे वापसी के लिए भी पैसों की जरूरत थी | मैंने निश्चय किया के एक बार जुनपत जा कर पिता जी से मिलना है , अपना हिसाब सब को देना है और पाक साफ होकर वापस आ जाना है | मेरे पास पैसे बहुत कम थे , मैंने अपनी चाँदी की एक चेन और दो अंगूठियाँ 800 /- रु. में बेच दी | मैं अगले दिन जुनपत का सामना करने को निकल पड़ा , जहाँ के लिए मैं भगोड़ा बिहारी, दगाबाज़ व्यक्ति बन चुका था |
मैं जुनपत पहुंचा , शाम का वक़्त था इसलिए स्कूल बंद हो चुका था , जैसे ही मैंने गाँव में प्रवेश किया सब आश्चर्यचकित हो कर मुझे देख रहे थे , मेरी हिम्मत को के , गुर्जरों को धोखा देने वाला फिर से उनकी मांद में क्यूँ जा रहा है | सभी की नज़रें मुझे घूर रही थीं , और कानाफूसी भी हो रही थी ,पर मैं सीधा सामने की तरफ देखता हुआ चल रहा रहा था , पहले की तरह सभी बड़े बुजुर्गों को राम राम करता हुआ | मैं अपने मोहल्ले में पहुंचा , घर पर पिता जी थे , उनका चरण स्पर्श किया , हालत बयां किये और फिर नवाब सिंह के यहाँ चल दिया | वहां नवाब सिंह और भाभी से मिला , सारी चीजों की जानकारी दी , खाना भी वही खाया , उन्होंने पूछा के स्कूल में मैं रहूँगा या नहीं मैंने कहा के सबसे पहले मैं सारा हिसाब साफ करूँगा तभी कुछ सोचूंगा | रात में कई व्यक्ति मिलने आये , कई ने मजाक किया कई ने कहा के वापस आ कर अच्छा किया , पर मैं वहां रहने के मूड में नहीं था इस बाबत मैंने पिताजी को भी बता दिया था |
अगले दिन मैं नवाब सिंह के साथ विद्यालय पहुंचा , मुझे देखते ही भूतपुर्व प्रिंसिपल महोदय भड़क गये ,पर नवाब सिंह के साथ होने के कारण कुछ कह नहीं पाए | पूरे स्कूल में बच्चे मुझे दुबारा देख के खुसर फुसर करने लगे | हम ऑफिस में हिसाब करने बैठे , कई तरीके से मेरे हिसाब को गलत साबित करने की कोशिश की गयी | एक मुश्किल और थी वो ये के , वो डेबिट और क्रेडिट नहीं समझ पा रहे थे | मैंने देसी तरीके से सारा हिसाब समझा दिया | मेरा हिसाब साफ था | मैं वापस आ गया हवेली पर | पिताजी को बता दिया के मेरा हिसाब क्लियर है , कुछ नवयुवक जो मेरे नजदीकी थे और मुझे नजदीक से जानते थे शाम को मेरे पास आये और मुझे बताया के मुझपर 15 हज़ार रूपए का इल्जाम लगाया गया , पर उन्हें जब पता चला के मेरा हिसाब साफ है तो उन्होंने कहा के मैं यही रहूँ | उन्होंने ये भी बोला के संस्थापक महोदय डांट लगा सकते हैं , उनकी बातों का बुरा मत मानना क्यूँ की पुरे गाँव के बीच उन्होंने तुमपर भरोसा किया था | उन्हें सभी बातों की जानकारी नहीं है | मैंने उन्हें अनमने ढंग से बोल दिया के ठीक है |
अगले दिन मैं विद्यालय नहीं गया , मुझे केवल एक बार संस्थापक महोदय से मिलना था , और उनका सामना करना था , मैं पीठ दिखा कर भागना नहीं चाहता था | यदि कुछ जगहों पर वो सही थे , तो कुछ जगहों पर मैं भी सही था | करीब एक बजे का वक़्त था , मैं अपने कमरे में सो रहा था तभी एक लड़का आया और मुझे बताया के आपको बुला रहे हैं , पता चला के संस्थापक महोदय आये हैं | मैं नवाब सिंह के घर पहुंचा , संस्थापक महोदय के साथ , तीन चार और व्यक्ति बैठे थे और नवाब का परिवार , मैंने नजदीक जाकर उनको राम राम कहा , वो उठे और मेरे मुंह पर एक तमाचा मारा | मैं सकते में तो था , पर अगर मेरी नज़र उठी हुई नहीं थी तो झुकी हुई भी नहीं थी | लोगों ने बीच बचाव किया ,मैं वही खड़ा रहा , उन्होंने कहा के तुझे पता है के मैंने तुझपर कितना भरोसा किया ? मेरा जवाब था के हाँ जी , इसलिए मैं वापस आपके सामने आया | थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा के कल से स्कूल चले जाना और इस बार ऐसे गया तो अच्छा नहीं होगा | मैं वापस अपने कमरे में आया , पिता जी से इसकी कोई चर्चा नहीं की | सोंच रहा था के एक बार एक लड़का ऐसे ही मुझे बुला के गया था तो मुझे कितना सम्मान मिला और फिर एक लड़का आज बुला कर ले गया तो कैसा अपमान | लेकिन किसी वजह से , अंतर आत्मा ने मुझसे ये कहा के ये थप्पड़ गलत नहीं था , गुल्लू के थप्पड़ की तरह ये थप्पड़ मेरे दिल को लगा था | अगले दिन मैं , संस्थापक महोदय के आज्ञानुसार स्कूल की तरफ चल दिया अनमने ढंग से , पर मैंने उस दिन नीली शर्ट , ब्लैक पैंट , और कटर पिलर के जूते जो मैं काठमंडू से लाया था वो पहन रखा था | रास्ते में मुझे एक नवयुवक मिला जो मेरे साथ अक्सर समय बिताया करता था | बातचीत के दौरान उसने मुझसे एक बात कही “गुरु जी, आप वापस तो आ गये हो पर आप वो सम्मान दुबारा नहीं हासिल कर पाओगे जो आपने पहले हासिल की थी | मुझे ये बात लग गयी , वो थप्पड़ भी अभी तक भुला नहीं था मैं , मैंने उसे जवाब दिया के “ देखो भाई ये सच है के , अगर धागा टूट जाये तो जोड़ने में एक गांठ लग जाती है , पर मेरा मानना है के , अगर उस धागे को फिर से तोडा जाये तो वो कही से टूट सकता है पर गांठ से नहीं | गांठ जीवन में जरुरी है, जीवन से लेकर , शादी , और मृत्यु तक , और मैं ये साबित करके रहूँगा |” ये बात मेरे मुंह से अनायास ही निकली थी , पर पता नहीं मेरे ऊपर इसका क्या असर हुआ , मैं स्कूल से केवल 1 मिनट की दुरी पर था , मैंने उस एक मिनट में ही निश्चय कर लिया के मैं इस बात को यहाँ सिद्ध करके रहूँगा , मैं अपने गाल पर लगे तमाचे को व्यर्थ नहीं जाने दूंगा | मेरी सांसे तेज़ चल रही थी और , मैंने अपनी मुट्ठी को भिचते हुए अपने आप से एक वादा किया और विद्यालय परिसर पहुँच गया | वहां बच्चों के बीच अभी भी मेरा खौफ था , जैसे जैसे मैं विद्यालय भवन के नजदीक पहुँच रहा था वैसे वैसे बच्चों का शोर कम होता जा रहा था | मेरे ऑफिस पहुचने तक विद्यालय शांत हो चुका था | मैं सीधा ऑफिस में गया , पानी से भरा जग उठाया और पेट भर के पानी पिया , जैसे अभी मुझे बहुत पसीना बहाना हो | थोड़ी ही देर में प्राचार्य महोदय आये और मुझसे पूछा के मेरा वहां आना कैसे हुआ ? मैंने जवाब दिया के संस्थापक महोदय का आदेश से , वो बोले के सच में रवि जी आप बड़े ढीठ इन्सान हो , जिसकी इतनी बेईज्जती हुई , वो फिर से यहाँ काम करना चाहता है | मैंने कहा के हाँ मैं ढीठ इन्सान हूँ , और मेरी अभी इज्ज़त लुटी नहीं है , इज्ज़त क्या होती है मैं हासिल करके रहूँगा यही पर | उन्होंने मुझे कही और नौकरी का भी प्रस्ताव दिया , पर मैं नहीं माना | कोई मौका ना देख कर उन्होंने मेरे कपड़ों पर ही आपत्ति जतानी शुरू कर दी , बोले के ऐसे कपडे पहन के आये हो , यहाँ सर्कस करना है क्या ? मैंने कहा के पहली बात की ये कपड़े सर्कस के नहीं , दूसरी बात ये के अगर आप ऐसे कपडे नहीं पहन सकते तो आप दूसरों को कुछ मत बोलें , तीसरी बात मेरे पास ऐसे कपड़ों के अलावा कोई और कपडा नहीं , अगर आप मुझे सिलवा दें तो मैं पहन लूँगा | महोदय को समझ में आ गया के मैं अब यही रहने वाला हूँ | मैंने उनसे अपना नाम रजिस्टर में चढाने को कहा , उन्होंने बोला के आप का नाम पहले से चढ़ा हुआ है , मैंने कहा के नहीं मैंने अपना नाम बदल लिया है ,मैंने अपना नाम लिखवाया , रवि भारद्वाज | इसका कारण ये था के मैं कही भी टिक के काम नहीं कर पता था , जुनपत से निकल कर , नेपाल और पटना के प्रवास के दौरान मैंने “किरो” को पढ़ा जो अंक शास्त्र के महान ज्ञाता थे , और वो भारत में भी लगभग 8 साल रहे | मैंने अपने अंक को जाना और देखा के मेरा नाम ऐसा है जो मेरे जन्मांक के मेल नहीं खाता इसलिए मैंने अपने नाम में बदलाव का फैसला किया था | नाम में बदवाल करने से दो फायदे हुए मुझे , एक तो मैं एक जगह टिक कर नौकरी कर पाया , जैसे अब भी कर रहा हूँ और दूसरा मैं ऐसा पहला शख्स था खानदान का जिसने अपनी परंपरा तोड़ी , वो था अपने गोत्र के नाम को अपने नाम के साथ लगाना | पौराणिक समय में हमारे यहाँ अक्सर ऐसा हुआ करता था के , ब्राह्मण बालकों का किसी शादी विवाह , और अन्य समारोह , रिश्तेदारों इत्यादि के यहाँ से अपहरण हो जाया करते थे, शादियों के लिए , पर शादी के लिए गोत्र का जानना अतिअवाश्यक हुआ करता था और आज भी है , इसलिए बड़े बुजुर्गों ने ये नियम बनाया था के गोत्र का नाम छुपा लिया जाये और उसके बदले किसी और टाइटल को लगाया जाये , जैसे के ब्राह्मणों में झा,मिश्रा, दुबे , पाण्डेय इत्यादि | पर मैं जब अपने नाम के परिवर्तन का विचार कर रहा था तब काफी मशक्कत के बाद और इश्वर की कृपा से मेरा गोत्र काम आया जो मेरी जन्मांक के हिसाब से बिलकुल सही था , मैंने रवि शंकर से , रवि भारद्वाज बनने का फैसला लिया था , और आज मैं गर्व के साथ कह सकता हूँ के मेरा वो फैसला मेरे जीवन के सफ़र में एक ऐसा मील का पत्थर है जिसको पार करने के बाद मैंने कभी भी जीवन में पीछे मुड के नहीं देखा | मैंने अब तय कर लिया था के ईश्वर को मान कर चलो, आगे बढ़ो और बढाओ , रुको मत, थको मत , सोंचों मत बस , चलते जाओ |
अगले दिन से मैं अपनी दिनचर्या में लग गया , मैं किसी से ज्यादा बातचीत नहीं करता था , बस अपने काम में लगा रहता | अपमान भरे सहानुभूति के तीक्ष्ण बाण अक्सर चलते रहते थे | पर मुझे जूनून था के मैं पहले से भी अच्छा करके दिखाऊंगा यहाँ | उस वक़्त मेरे दिमाग में क्या बस यही चलता के कैसे इन्सान की सारी अच्छाई केवल एक गलत कदम से बुराई में बदल जाती है , कैसे ऐसी परिस्थितियों में आप अपने जगह सही होते हैं पर समाज के नज़र में गलत , कैसे आपका मजबूत दिमाग भी , हालत के आगे मजबूर हो जाता है , पर उस वक़्त जिस ताक़त ने मेरा साथ दिया , जिसने मुझे कभी ये नहीं कहा के तू हार गया है , वो था , मेरा इश्वर पर अटूट विश्वास | इसी विश्वाश के सहारे मैंने आगे बढ़ने का फैसला किया | मैं हनुमान मंदिर जाता , वहां जो भी मेरे अध्यात्मिक मित्र थे , सभी मुझे प्रोत्साहित करते | मैं लगातार अपने आप को आध्यत्म के तरफ खिचता हुआ महसूस करता | पहले मैं जब भी हतोत्साहित होता तो अपने को अक्सर अकेला महसूस करता पर अब मेरे पास एक शक्ति थी, इश्वर पर भरोसे की शक्ति |
नवम्बर के महीने में मैंने एक प्रतियोगिता करवाने का प्रस्ताव रखा जिसमे आस पास के 8 विद्यालयों को हिस्सा लेना था | इसमें खेलकूद, सामान्य ज्ञान एवं शब्दकोष पर आधारित प्रतियोगिता शामिल थी| मेरा यह प्रस्ताव मान लिया गया| अब मैंने अपना ध्यान प्रतियोगिता पर पूर्ण रूप से लगा दिया | मैंने गाँव के एक व्यक्ति को खास कर आमंत्रित किया के वो मेरी खो – खो टीम को प्रशिक्षित करे , बाकि पढाई सम्बंधित सारी चीजों की तय्यारी मैं खुद करा रहा था| मेरे विरोधियों के लिए ये सुनहरा अवसर था , क्यूँ की सारी जिम्मेवारिया मेरे ऊपर थी , और यदि मेरा विद्यालय अच्छा नहीं कर पाता तो सब की बात मुझे ही सुननी थी, ग़ाज़ तो मेरे ऊपर ही गिरनी थी | मैंने इस चुनौती को स्वीकार किया | मैंने शब्दकोष प्रतियोगिता की तय्यारी कुछ इस प्रकार की के , लगभग ऐसे 150 शब्दों का चुनाव किया जिसके अंत का अक्षर “Y” , “Z” और “X” इससे मुझे एक फायदा होना था के विरोधी टीम को ज्यादा से ज्यादा ऐसे मुश्किल अक्षरों से शब्द बोलने पड़ते | पिता जी के स्कूल की टीम भी इसमें शामिल थी , और उन्होंने मेरी तय्यारी को बेईमानी करार दिया , जबकि, ऐसा था नहीं | मेरी पिता जी से बहुत बहस हुई , अक्सर पिता जी गुस्से में आ जाते तो इंग्लिश के शब्दों का प्रयोग करते और मैं भी ऐसे ही उनको जवाब देता | बहस के दौरान , गाँव के कुछ नवयुवक आ गये , जो मेरे मित्र थे और पिता जी के भी , वैसे तो पिता जी शराब नहीं पीते थे पर कभी कभी पीने से उन्हें परहेज़ भी नहीं था , उनसब ने मेरे से पूछा के बात क्या हुई है मैंने मजाक में वहां की भाषा में कहा “तमने बुड्ढे को कुछ पिला तो न दिया “ ये बात मैंने मजाक में और धीरे से कही थी , बुड्ढा शब्द वहां के बुजुर्गों के लिए आम था , पर पिता जी ने ये सुन लिया और मुझेसे बोले “यू कॉल में बुड्ढा , आई ऍम गोइंग फ्रॉम हियर , आई विल नॉट लिव विथ यू एनी मोर “ | अगले दिन पिता जी मुझे छोड़ के चले गये, जहाँ वो पढ़ाते थे वही उन्होंने अपना ठिकाना बना लिया | वो अपने उसूलों के पक्के थे , मैंने काफी समझाया पर वो माने नहीं थे | मैं सोंचता के , क्या उसूल किसी रिश्ते से बड़े होते हैं , उसूलों की खातिर रिश्तों का बलिदान करना कहाँ तक उचित होता है , पर मुझे स्पष्ट जवाब नहीं मिलता था , शायद इसलिए क्यूँ की मैं भी उसूलों का पक्का बनता जा रहा था |
प्रतियोगिता का आयोजन अच्छे से हुआ , हमारे विद्यालय के छात्रों ने , हर क्षेत्र में अच्छा किया , हम जीत गये | एक बार फिर से मैं अभिभावकों का ध्यान आकर्षित करने में सफल हुआ , वो पुनः ये सोंचने पर मजबूर हुए के उन्हें अपने बच्चे गाँव से बाहर भेजने चाहियें या फिर , गुरु जी के पास. |
धीरे धीरे मैं पुनः ग्राम वासियों का विश्वाश हासिल करने में जुटा था एक चीज़ ध्यान में थी “ गांठ पर जाती है पर , वहां से नहीं टूटती जहाँ से गांठ लगी हो “ |
फिर से गणतंत्रा दिवस आने वाला था , पुरे गाँव वालों के मन में था के इस बार भी मैं जरुर कुछ अच्छा करूँगा , मैं त्य्यारियों में जुटा था | पुनः मैंने शिक्षा को केन्द्रित करते हुए एक नाटक लिखा , जिसका सारांश था के , विदेशी कंपनियां भारत में ऐसे कारखाने लगाते हैं ग्रामीण क्षेत्रों में , वहां के गद्दारों के साथ मिल कर, जो नकली दवाइयां , नकली खाद्य पदार्थ इत्यादि बनांते हैं ताकि यहाँ की जनता अन्दर से खोखली हो जाये | ये कहानी मैंने सन २००२ में लिखी थी जिसे आज के परिदृश्य में होते हुए देख पा रहा हूँ | मेरी ये सोंच और मेरा ये विचार सबको पसंद आया और कई विद्यालय के प्राचार्यों ने अपने विद्यालय के प्रोग्राम को संचालित करने का प्रस्ताव मुझे नौकरी के साथ दिया | पर मेरा लक्ष्य था , इसी गाँव में शहर से आने वालों बसों को रोकना , ये सिद्ध करना के अच्छी शिक्षा जरुरी है , दिखावा नहीं | हम गाँव में भी अच्छी शिक्षा दे और ले सकते हैं | धीरे धीरे अन्य शिक्षक और हमारे प्राचार्य महोदय भी मेरे साथ हो गये |
इस बीच मैं दसवी के विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान देता , मैंने अपने हवेली में ही सब के रहने का इन्तेजाम कर रखा था | रात के 10 बजे के बाद पढाई शुरू होती , ठण्ड का समय था , हमने पुरे कमरे में पुआल बिछा रखे थे , वही हमारा बिस्तर हुआ करता था , रात के 1 बजे तक फिर सुबह 5 से 7| मैंने उनके पीछे काफी मेहनत की , कई ऐसे विद्यार्थी थे जो पिछली बार नहीं निकल पाए थे , पर उन्हें मेरे ऊपर भरोसा था और वो जानते थे के गलती उनकी है इसलिए वो मेरे साथ थे इस बार भी | इस बार के बैच में १६ लड़के थे | परीक्षा शुरू हुई ,हर बार की तरह इस बार भी मेरे बताये हुए प्रश्न आये , पिछली बार की तरह इस बार भी मैं निश्चिन्त था |
अब छुट्टियाँ पड़ चुकी थीं , मेरे पास एक अच्छा अवसर था , योग, अध्यात्म इत्यादि में आगे बढ़ने का | मैंने अपना अभ्यास करना शुरू कर दिया| गाँव से कुछ दूरी पर एक पौराणिक मंदिर था , समाधी थी किसी सन्यासी की , करीब २ किमी के क्षेत्रफल में फैला हुआ जंगल जैसा क्षेत्र था , जिसमे विभिन्न किस्मों के पेड़ पौधे थे और बहुत तरह के पशु पक्षी और कीड़े मकोड़े भी , केंद्र में मंदिर था | वहां के मुख्य पुजारी जी से पहली बार जब मिला था तो उनके तेज़ को देख कर मैं काफी प्रभावित हुआ था | मैं अक्सर वहां जाया करता था , वहां कई लोग आया करते थे जो हरी चर्चा करते , आध्यात्म और ज्ञान की बातें होती | सबसे अच्छा जो वहां मुझे लगता वो था वहां का प्राकृतिक स्वरुप | मैं घंटों वहां अकेला बैठता, पक्षियों के कलरव को ध्यान से सुनता , कही भी आसन लगा कर बैठ जाता , पेड़ों को छाती से लगता , उन्हें चूमता | कभी कभी नागराज के दर्शन होते , पर वो कुछ कहते नहीं थे क्यूँ की मैं भी कुछ नहीं कहता था उन्हें | वहीँ पर प्रभु इक्षा से मुझे एक ऐसे समारोह में भाग लेने का मौका मिला जहाँ पर 3 दिनों का एक आयोजन होना था , जिसमे रामायण पाठ , भंडारा इत्यादि होना था | वहां साधु संतों की भीड़ थी , बहुत दूर दूर से विभिन्न सम्पर्दायों को मानने वाले संत, साध्वियां , अघोरी बड़े बड़े जटाधारी पहुंचे थे | वहां का माहौल पूरी तरह भगवा रंग में रंग चुका था | मैं सुबह से ही रामायण पाठ में जुट गया | दोपहर में इधर उधर चहलकदमी की और कई साधु संतों से मिला और उनके सम्पर्दाय , उनकी मान्यताओं के बारे में जानने की कोशिश की | उन मान्यताओं का हमारे सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता था , इसका विश्लेषण करने की कोशिश करता था | उसी शाम को पुनः रामायण पाठ पर अपने एक अन्य मित्र के बैठा , मैं जब भी पाठ करता तो चेष्टा करता के शब्द पूरी तरह स्पष्ट तरीके से बोले जाएँ , शायद यही वजह थी के वहां के मौजूद श्रोताओं ने मुझे ही रामायण पाठ करने का आग्रह किया | लगभग २ घंटे तक लगातार पाठ किया संगीत के साथ , बहुत ही आनंद आया| ऐसा लगता था जैसे नयी उर्जा का संचार हो रहा हो | देर शाम को चहलकदमी करता हुआ मैं एक एकांत जगह पर पहुंचा जहाँ कई छोटी छोटी झोपड़ियाँ थीं और अन्दर से धुआं निकल रहा था | मैं एक ऐसी ही झोपडी में घुसा , देखा एक जटाधारी पूरी तरह राख मले हुए अन्दर बैठा है , सामने त्रिशूल है और हवन कुण्ड में आग जल रही है , मैं प्रणाम करके उनके सामने बैठ गया | वो कुछ देर तक कुछ नहीं बोले , फिर मुझे एक सेब खाने को दिया , मैंने प्रेमपूर्वक उसे ग्रहण किया | मैंने उनके बारे में जानने की कोशिश की , उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में , उन्होंने मुझे गौर से देखा , एक लम्बी साँस ली और अपने झोले में से चिलम निकाल कर उसका मसाला तय्यार करने लगे , वो कुछ बोल नहीं रहे थे , शायद ऐसे प्रश्न का उत्तर वो देना नहीं चाहते थे फिर मसाला बनाते बनाते उन्होंने अपनी कहानी बतानी शुरू की , जान कर घोर आश्चर्य हुआ के वो इंग्लिश के प्रोफेसर रह चुके थे ,फिर ऐसा जीवन उन्होंने क्यूँ चुना ? ऐसे सैकड़ों प्रश्न मेरे दिमाग में आते रहे उनकी आपबीती के दौरान पर मैंने टोका नहीं , मैं ध्यान से केवल सुन रहा था | उन्होंने चिलम भरी और मेरी ओर बढाया , मैं इसके लिए तय्यार नहीं था , परन्तु मुझे कई प्रश्नों के जवाब ढूंढने थे , मैंने चिलम पी | चिलम का नशा मेरे खोपड़ी पर २ मिनट के अन्दर ही सवार हो गया था , अजीब सी अनुभूति थी , बहुत हल्का सा महसूस कर रहा था खुद को | मैंने उनसे कई प्रश्न किया और उन्होंने तसल्ली से सारे प्रश्नों के उत्तर मुझे दिए | रात हो चली थी , नशा इतना था के मैं वापस अपने गाँव नहीं जा सकता था , मैंने उनसे आज्ञा ली और वही मन्दिर के प्रांगन में लेट गया | चारों तरफ रामायण , भजन कीर्तन का शोर था , पर फिर भी खाली जमीन पर भी , मुझे एक घंटे की गहरी नींद आ गयी | मेरे अन्य मित्र भी वही थे , हम सब 4 बजे उठे और स्नान आदि के बाद पुनः उसी दिनचर्या में जुट गये | अंतिम दिन भंडारा होना था , भंडारे वाले दिन पहले पूजा होनी थी , खाना बनना था और भगवान के भोग के बाद भंडारा | पता नहीं कहाँ कहाँ से और साधु संत इत्यादि वहां इकट्ठे होने लगे , अब साधुओं की संख्या लगभग 5 सौ से अधिक हो चुकी थी | मेरा यहाँ तीसरा दिन था , इस दौरान मैंने साधु के वेश में कुछ बुरी नज़रों वालों को देखा , एक जो भंडारे के लिए खाना बना रहा था , एक जो युवा था और हारमोनियम अच्छी बजा लेता था ऐसे ही एक दो और | मैं और मेरा एक मित्र साधुओं की मंडली के साथ एक घेरे के अन्दर बैठे हुए थे , वहां एक प्रमुख संत भी थे जिनका तेज़ देखने लायक था | तभी मैंने पूजा कराने वाले पंडित जी को देखा, मुझे घोर आश्चर्य हुआ के , इतने बड़े आयोजन में एक ऐसा पंडित पूजा करेगा जिसको कर्म कांड तक का ज्ञान नहीं है , किसी भी मन्त्र का शुद्ध उच्चारण तक जिसे नहीं आता हो , वो कैसे कर सकता है यहाँ ऐसी पूजा | मैं ये सोंच ही रहा था ,तभी एक घटना हुई , पंडित जी थाली ले कर शायद फूल तोड़ने जा रहे थे , तभी एक मधुमक्खी पंडित जी के पास आ कर चक्कर काटने लगी , पंडित जी थोड़े असहज से हुए , तभी दो तीन और मधुमक्खियाँ आ गयी , पंडित जी थोड़े गुस्सैल स्वाभाव के थे उन्होंने अपने अंगोछे से मधुमक्खियों को उड़ाने की कोशिश की , फिर क्या था मधुमक्खियों का एक छत्ता वहां टूट पड़ा और अपने दुश्मन की तलाश करने लगा , वहां के पेड़ों पर मधुमक्खियों के कई छत्ते थे , २ बड़े छत्ते ठीक हमारे बगल वाले पेड़ के ऊपर थे | चारों तरफ मधुमक्खियाँ ही मधुमक्खियाँ होने लगी , हम जिस घेरे में बैठे थे उनके प्रमुख संत ने कहा के आप लोग बिलकुल शांति से बैठे रहें कुछ देर में सब शांत हो जायेगा| हम चुप चाप बैठे हुए थे , सामने एक साधु के पास पहले कुछ मधुमक्खी आयी फिर पूरा का पूरा एक झुण्ड उसके सर के पर बैठने लगा , वो साधू चुप चाप ऑंखें बंद करके और अपना सर अपने घुटनों में छुपा कर बैठा था , देखते ही देखते साधु के सर की जगह केवल बजबजाती हुई मधुमक्खियाँ थी , उसका सर बिलकुल ढँक चुका था | प्रमुख साधु बिलकुल भी विचलित नहीं हुआ , उन्होंने केवल इतना कहा “प्रयाश्चित कर लो “ , वहां की स्थिति भयावह होती जा रही थी , मैंने अपने मित्र से इशारे में बात की और वहां से चुप चाप दूर निकलने की कोशिश की | हम तालाब का चक्कर काट कर दूसरी तरफ आ गये , जिधर उस जगह का पिछला प्रवेश द्वार था , हम एक पेड़ के निचे खड़े हो गये , पेड़ के ऊपर देखा तो वहां भी एक मधुमक्खी का छत्ता था पर शायद अभी इधर कोई सूचना नहीं मिली थी , इसलिए इधर सब शांत था | हम जिस जगह खड़े थे वहां से पिछला गेट लगभग 50 मीटर की दूरी पर था , और मुख्य घटना स्थल से लगभग २० मीटर की दूरी पर , तभी पिछले गेट पर एक साइकल सवार आ कर रुका , उसके साथ एक बच्चा भी था जिसकी उम्र मुश्किल से ३ वर्ष रही होगी , बच्चे ने शर्ट नहीं पहन रखा था | साइकल सवार जैसे ही वहां आकर रुका , कुछ मधुमक्खी सैनिक उन्हें पहचानने की कोशिश में उधर गये , और उस साईकिल सवार ने भी वही गलती दोहराई जो के पंडित जी ने दोहराई थी , उसने अंगोछे से उन्हें मार भागने की कोशिश की , फिर क्या था देखते ही देखते पूरा का पूरा मधुमक्खियों का दल उधर हमला करने को चल पड़ा , और तो और जिस पेड़ के नीचे हम खड़े थे उस छत्ते के भी सैनिक उधर की ओर कूच कर गये | पर इससे भी आश्चर्य मुझे ये देख के हुआ के , उस साइकल सवार को जब ये लगा के वो हमले का सामना नहीं कर पायेगा तो , उसने अंगोछे को फैलाया , और उसे ओढ़ कर वही बैठ गया , उसने खुद को ढँक लिया और बच्चे को वही ऐसे ही छोड़ दिया , उफ़ कैसे कैसे लोग होते हैं , जब अपनी जान पर बन गयी तो बच्चे के जान के बारे में भी नहीं सोंचा , मुझे गुस्सा आ रहा था | तभी बच्चे के चीखने की आवाज़ आई , मधुमक्खियाँ बच्चे को काट रही थी , और बच्चा चीखे जा रहा रहा , उससे २० मीटर की दूरी पर कई साधू संत बैठे थे पर कोई भी उसके पास जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था , साइकल सवार वैसे का वैसा ही बैठा था| क्षण भर में ही बच्चे का आधा सर मधुमक्खियों से भर गया था , मैं इस स्थिति को देख नहीं पा रहा था , मैंने अपने मित्र से कहा के अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा , मैंने अपने दन्त भीचे ,मुट्ठी बंद की और तेज़ी से बच्चे की ओर चल दिया , बच्चे के पास पहुँचते पहुँचते उसका लगभग पूरा माथा मधुमक्खियों से ढँक चुका था , मेरा दिमाग तेज़ी से काम कर रहा था , मैंने बच्चे को गोद में उठा लिया उसका सर जैसे ही मेरी छाती पर पड़ा मधुमक्खियाँ मेरे शरीर पर चलने लगी, सब कुछ बड़ा भयावह था , अभी तक मुझे काटा नहीं गया था , मधुमक्खियाँ भी डंगारा प्रजाति की थी जो बहुत खतरनाक और औसत से बड़ी होती हैं | मैंने सबसे पहले उस साइकल वाले को गाली देते हुए उठाया और वहां से निकलने को बोला | पिछले गेट से थोड़ा आगे जाकर दाहिनी तरफ एक गली जाती थी , और थोड़ा सीधा चल के बाई तरफ मुख्य सड़क थी , मैंने उसे समझाया के वो बच्चे को लेकर दाहिनी तरफ वाली गली में धीरे धीरे आगे बढेगा और मैं बाई तरफ मुख्य सड़क की ओर जाऊंगा , मैंने तेज़ न भागने की चेतावनी दी, वो मेरा उपाय समझ गया , मेरी नज़र साईकिल के आगे लगे टोकरी पर पड़ी जिसमे एक काला सा कपडा था ,जिसमे ग्रीस इत्यादि लगा था , जो शायद साइकल साफ करने के काम आता था , मैंने वो उठाया और चल दिया मुख्य सड़क की तरफ , उसे मैंने गली में भेज दिया था | मेरे शरीर पर सैकड़ों मधुमक्खियाँ थी , मैंने अपने जबड़े और मुट्ठी भिची हुई थी और चलता हुआ वहां से दूर जा रहा था , जब उन्हें लगा के मैं उन्हें उनके छत्ते से दूर कर रहा हूँ तो उन्होंने मुझे काटना शुरू कर दिया , पर मैं जितना दूर जा सकता था जाना चाहता था , अब मैं मुख्या सड़क पर आ चुका था , मैंने दौड़ लगाना शुरू कर दिया और शरीर से उन्हें हटाना भी | लगभग 200 मीटर सड़क पर दौड़ने के बाद मैं रुका और पलट गया मेरा अब भी पीछा किया जा रहा था पर अब मैं लड़ने को तय्यार था , मेरा हथियार था वो कपडा , मैंने उसे लम्बा करके दोनों छोर को पकड़ कर दो चार बार गोल गोल घुमाया और सामने से आ रहे सैनिकों पर वार करना शुरू कर दिया | लगभग 10-15 सैनिक मैंने वहां शहीद किये , मेरे सर के निचले हिस्से में गर्दन पर मुझे दर्द महसूस हो रहा था | अब वहां सैनिक नहीं थे , मैं पास में एक लकड़ी के मिल में घुस गया और लकड़ी के एक लट्ठे पर बैठ गया , मैंने अपने शरीर से उनके डंक निकलने शुरू किये , कुल आठ डंक निकले , वहां भी कुछ जासूस सैनिक आये मुझे ढूंढते हुए , पर बेचारे वो भी शहीद हो गये | डंक इतना नुकीला था के मेरे मित्र ने उन्हें देखने के लिए जैसे ही हाथ में पकड़ा , वो उसकी उँगलियों में घुस गया | मेरी सांसें तेज़ चल रही थी , चेहरे पर लालिमा थी , शायद कुछ अच्छा करने की | थोड़ी देर बाद हम वापस उस जगह पर पहुंचे , सब कुछ शांत हो चुका था तब तक , जैसे ही मैं प्रांगन में पहुंचा दूर से एक नवयुवक ने मेरी ओर देख कर जोर से चिल्लाया , “जय श्री राम “ मैंने भी प्रतिउत्तर में अपनी मुट्ठी हवा में उठा कर यही कहा | वो नवयुवक अपने परिवार के साथ वहां पूजन के लिए आया था , और उसने सारे घटनाक्रम को देखा था | मुझे वहां संतों के बीच ले जाया गया , सभी ने मेरी प्रशंशा की , जहाँ मधुमक्खी ने काटा था वहां पर भभूत लगाया | इसी बीच एक घोर आश्चर्य और हुआ , मैंने देखा के पंडित जी का मुह पूरा सुजा हुआ है , उस हलवाई का और उस हारमोनियम वाले युवक का भी जिनकी नज़रों में मुझे खोट दिखाई दिया था , बाकि किसी को कुछ भी नहीं हुआ था , पर आश्चर्य तो ये था के , मुझे भी 8 जगह काटा गया था पर मुझे सूजन क्यूँ नही हुआ ? इस प्रश्न का उत्तर तो आज तक मुझे नहीं मिला , पर इस घटना में मुझे बहुत कुछ सीखे , मुझे खुद से भी मिलवाया | मेरे मित्र की वजह से गाँव में कई दिनों तक ये चर्चा का विषय रहा | ये घटना भी अविस्मर्णीय है मेरे लिए |
खाली समय में मैं यही सब करता , ज्योतिष इत्यादि के बारे में पढना , उनका प्रयोग करना और सच में इसका परिणाम धीरे धीरे आने लगा था , मेरे आकलन पर विश्वास करने वालों का एक अलग ग्रुप था वो मेरे से अक्सर सलाह लिया करते थे | वापस आने के मात्र एक वर्ष में ही मैं पुनः सबका चहेता बन चुका था , मैं अपने मोहल्ले में होने वाले किसी भी आयोजन में घर के सदस्य की तरह हिस्सा लेता था , मेरी भाषा गुर्जरों जैसी हो चुकी थी | वहां के मित्रों के साथ रिश्तेदारी में जाता तो , मुझे लोग वहीँ का समझते , बिहारी हूँ ऐसा कहने पर वो विश्वास ही नहीं करते थे |
मुझे वहां रिश्ते भी मिले , भाइयों के बहनों के, भाभियों के सभी तरह के , मैं अक्सर सोते सोते ये महसूस करता के शायद मैं यही का ही हूँ | मुझे ये भी महसूस होता की यदि मैंने यहाँ से जा कर सबके विश्वास का गला भी दबाया हो तो शायद मैं अब प्रायश्चित कर चुका हूँ | मेरा सब कुछ , इस देश और इस गाँव को समर्पित था | अब कुछ और ऐसा करना था जो यहाँ के लोगों और बच्चो की शिक्षा में विकास करे |