रविवार, 21 अक्टूबर 2012

Antah Parivartan

मैंने वापस लौटने के पहले , सब के लिए कुछ न कुछ ख़रीदा था । मैं काफी दिनों बाद घर जा रहा था , मैं बदला था , मैं वो नहीं रहा था जो मैं था । मेरे अन्दर का नास्तिक इन्सान , आस्तिक बन चुका था । सोंच बदल चुकी थी , पर इस सफ़र का अंत तो कहीं नज़र हीं नहीं आ रहा था । मैं फिर से वापस पटना जा रहा था , वहीँ खड़ा था जहाँ से चलते चलते मुझे लगभग 5 साल बीत चुके थे । पूरे रास्ते मैं फिर से अपने बारे में ही सोंच रहा था , एक नई विचार धारा ने मेरे अन्दर अपनी पैठ बनाई थी , वो थी देश के लिए समाज के लिए कुछ करना । दरअसल मैं घर से बाहर इतने लम्बे समय के लिए कभी गया नहीं था , और सच में समाज के बारे में तभी पता चलता है जब आप एक नई संस्कृति और समाज का हिस्सा बनते हैं , घर के पारिवारिक माहौल से दूर हो कर अपनी पहचान ढूंढने की कोशिश करते हैं । जहाँ देखने वाला आपके आस पड़ोस का कोई व्यक्ति नहीं , एक सुदूर प्रान्त का व्यक्ति/समाज  होता है , जो आपको जानता नहीं है , न ही आपकी संस्कृति और विचारों से अवगत होता है । ऐसी परिस्थितियों में अपना एक सामाजिक स्तर बनाना , अपने आप को वहां ढालना ही मेरी समझ से समाजिकता को समझने का प्रमाण है । कुछ अध्यात्मिक और कुछ सामाजिक जिम्मेवारियां मुझे सोंचने पर मजबूर कर रही थीं । मैंने रास्ते भर चिंतन ,मनन किया , मेरे अन्दर का आदमी मेरे से कहने लगा था के जीवन में केवल पैसा कमाना , शादी विवाह कर लेना , बंगला गाड़ी का मालिक बन जाना पर्याप्त नहीं है , कुछ सार्थक होना चाहिए जो सब के हित में हो । सोंच तो बहुत कुछ रहा था मगर , लौट के फिर से वापस अपने परिवार की तरफ ही ध्यान चला जाता था ।

ट्रेन सुबह १०:३० के आस पास पटना पहुंची , अपनी मिट्टी की खुशबू , आबो हवा में अपने पन , अपने बचपन का अहसास सब महसूस हुआ । मैंने घर आने की अपनी निश्चित तारीख घर वालों को नहीं बताई थी , मैं उन्हें अचानक से जाकर उन्हें अचंभित करना चाहता था । स्टेशन से बाहर निकलते हीं हनुमान मंदिर को देखा , जिसमे लगी ईटों में मेरा भी श्रम दान था , अभिवादन करके मैं घर की तरफ चला । रास्ते में चारों तरफ नज़रें घुमा कर देखता , देखता के क्या क्या बदलाव आया है यहाँ इतने दिनों में । मगर मुझे कोई खास बदलाव नज़र नहीं आया । मैं घर पहुँच कर दबे पाँव आकर पलंग के अन्दर घुस गया , एक एक करके सब को surprise दिया ..बड़ा मज़ा आया । दो चार दिन वहां की बातें घर में और दोस्तों के साथ बाँटने में हीं बीत गये । मैं अक्सर दिनभर इधर उधर घूम कर आता और सोने के वक़्त चिंतन करता के मैं अब क्या करूँ ? एक तरफ परिवार की मुश्किलें , मेरी पढाई मेरा कैरिएर , दूसरी तरफ मेरे अन्दर बैठा एक दूसरा इन्सान जो इस धरती पर आने का अपना कारण ढूंढ़ रहा था और देश और समाज के लिए अपनी आत्म संतुष्टि के लिए कुछ करना चाहता था । मेरे लिए पैसा कमाना एक मात्र लक्ष्य नहीं था ।

बिहार का माहौल उस वक़्त और भी बिगड़ चुका था । चारों तरफ भय , अराजकता का ही माहौल व्याप्त था , एक खास वर्ग के लोगों का बोलबाला था । पुलिस और प्रशासन जैसे गुलाम बने हुए थे । वहां से बड़े कारोबारियों का पलायन जारी था , नए काम में कोई निवेश नहीं करना चाहता था । वहां प्राइवेट जॉब के लिए भी , रिश्वत की मांग थी । मेरा निजी काम जो मैंने अपने मित्र के साथ किया था , उसके पैसे भी पुरे नहीं मिले थे मुझे , मैं लगातार उसके संपर्क में रहता और जैसे तैसे वसूली करता , और अपना और घर का खर्च चलने की कोशिश करता । ऐसा करते हुए लगभग 1 महीने बीत गये , मगर न तो मैं अपना कोई काम हीं शुरू कर पाया न हीं कोई जॉब ही हासिल कर पाया। दोस्तों में भी केवल मैं ही फ़िलहाल ऐसा था जिसके पास इतना अनुभव था और संघर्ष भी । मैं उनके बीच जब भी होता तो उन्हें अच्छा लगता , फिल्म देखना हो या पार्टी या कोई अन्य आयोजन मैं उसके बीच एक प्रमुख की भूमिका निभाता , मुझे विश्वास था के वो मेरे सच्चे और अच्छे दोस्त हैं ।मैं पटना में भी विभिन्न आयु वर्गों के लोगों का मित्र था , और कई तो ऐसे थे जिनसे मेरा शाम को मिलना रोज़ होता था । सब से मेरी बात होती मगर कोई भी कम मिलना मुश्किल सा लग रहा था  , परिस्थितियां पुनः विपरीत होती जा रही थीं ।कुछ काम मिले भी , जिसमे पैसे तो थे , मगर या तो वो गैर कानूनी थे , या फिर समाज के हित में नहीं थे । इसलिए मैंने ऐसे कार्यों को मना कर दिया , आज मुझे लगता है के अगर मैं आस्तिक न बना होता तो ऐसे ही किसी काम में संलिप्त होता । किसी शहर का कोई दबंग, गुंडा होता , या किसी पुलिस की गोली का शिकार , कौन जाने ?

उधर जुनपत से , स्कूल के मालिक नवाब सिंह और प्रिंसिपल का बार बार फ़ोन आ रहा था मेरे वहां वापस आने को लेकर । मैंने वहां 3 - 4  महीने में जो अपनी पहचान बनाई थी , उसका काफी प्रभाव पड़ा था , और मेरे वापस आने के बाद मेरी चर्चा वहां होती थी । लोग मुझे वहां वापस चाहते थे । मेरे अन्दर का सकून, मेरे बाहरी ताम झाम पर हावी हो गया । मैंने सोंच लिया के , कुछ दिन मैं जुनपत में रह कर ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा देने का काम करूँगा । दरअसल ये सब उस अध्यात्म ज्ञान का , या यूँ कहें के मेरे ऊपर अध्यात्मिक विचारों का इतना गहरा प्रभाव पड़ा था , के मैं सोंचता के अगर इन्सान किसी भी कार्य को मन लगा कर करे तो उसी में सफलता उसकी निश्चित है । वैसे भी पटना में 1999 - 2000 में 4-5 हज़ार की कमाई तो इंजिनियर को भी नहीं थी , मैंने हिसाब लगाया , और सोंचा के वहीँ कुछ तकनिकी शिक्षा लूँगा । मेरे इस निर्णय से मुझे कई फायदे मिलने थे , एक तो ब्राह्मन होने का कर्म , शिक्षा लेना और देना पूर्ण होता , देश की सेवा होती , शिक्षण करने का एक नया अनुभव प्राप्त होता , वहां रहकर मैं अपने अध्यात्म ज्ञान को भी बढ़ा सकता था । कई पहलुओं पर गौर करने के बाद मैंने आखिर में जुनपत वापस जाने का फैसला कर लिया । मैंने घर वालों से बात की और जाने को तैयार हो गया । मैंने सभी को सुचना दे दी के मैं आ रहा हूँ । पंडित जी भी खुश हो गये थे , उनके यहाँ घर का कम करने वाला एक आदमी कम पड़ गया था , अब मै जा रहा था तो उन्हें राहत मिलने की पूरी उम्मीद थी ।

मार्च सन  2000  को मैं वापस जुनपत आ चुका था ।जुनपत पहुँचने पर मैंने स्कूल ज्वाइन  कर लिया , और पहले जिन परिवारों में मैं ट्यूशन पढाता था उन्हें भी पकड़ लिया । मैंने भाई से बात की के मुझे अब पंडित जी के यहाँ नहीं रहना है। भाई ने मुझे आश्वाशन दिया और हम शाम को नवाब सिंह के घर पहुंचे , मैंने अपनी परेशानी उसे बताई । उनका एक पुराना मकान था जो वही गाँव के बीचों बीच था , उसमे तीन कमरे थे मगर वो  पिछले 10-15 सालों  से बंद पड़ा था। आस पड़ोस की महिलाएं और बच्चे रात को उस मकान के  पास से अकेले  नहीं गुज़रते थे । कई तरह की अफवाह थी , के वहां भूत प्रेतों की छाया है । सब बातें मुझे बताई गयी , मैंने उसी घर में रहने का फैसला किया ।

अगले दिन सुबह अपने दो चार बड़े छात्रों को ले कर पुराने मकान पंहुचा जिसे लोग "हवेली" बोलते थे । दरवाजा  बमुश्किल खुल पाया , क्यूँ की अन्दर की ओर से बहुत  सारे जंगल  झाड उग आये थे । हम अन्दर पहुंचे , हमारे  हाथ में जंगल झाड को काटने के हथियार थे । मकान की बनावट साधारण सी थी , एक साथ तीन कमरे , ऊपर पक्की छत , एक जीना, आगे बड़ा सा अहाता उसमे एक नीम का पेड़ जो बड़ा था, आंगन भी कच्चा था और कमरे का फर्श भी । आंगन में भांग के 6-7 फीट बड़े पेड़ जम चुके थे , बहुत सारा जंगल भी , हमें साफ सफाई करते करते शाम हो गयी , 2 - 3 बड़े सांप और लगभग 8-10 बिच्छुओं का सफाया हुआ और एक कोने में उनका दफना के अंतिम संस्कार । सब थक चुके थे हम उस दिन वापस चले आये । अगले दिन रूम की सफाई हुई , गोबर और मिट्टी से तीनों कमरों को लीपा गया । पड़ोस से एक बड़ी खाट मंगाई गयी , मैंने बीच वाले कमरे में रहने का फैसला किया था , उसकी पुताई की गयी । मैंने पूजा की और वहां रहना शुरू कर दिया । वहां दो चीजों की कमी थी , न तो उस मकान में टॉयलेट था , न ही उसमे हैण्ड पंप । वहां केवल शाम को लाइट आती  थी । शाम को लाइट आ गयी । आस पड़ोस के लोग खुश थे के मैंने फिर से उस घर को जिन्दा किया । शाम को पड़ोस से खाना आ गया । मै बरसों बाद खाट पर सोया, अकेला , मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा वहां पर, बस एक नया अहसास था , सोंच रहा था अपने रूम को जहाँ मैं सोया करता था । मुझे अपने बड़े वाले आईने की बहुत याद आ रही थी ।

मेरा स्कूल में  आना कुछ ऐसा था जैसे के किसी नए  सिस्टम का आना। मैंने स्कूल में आते ही प्रिंसिपल साहब से विचार विमर्श करके सबसे पहले अध्यापकों की नियमावली बनाई । स्कूल का रुटीन  बनाया , पहले वहां पढ़ाने की व्यवस्था ऐसी थी के जो जहाँ बैठता घंटो पढाता रहता । उस वक़्त स्कूल 7 वीं  क्लास तक ही था । मैथ्स में तो फिर भी मेरा भाई पढ़ा लेता था , पर इंग्लिश तो 4 थी कक्षा का भी और कोई पढ़ा नहीं पाता था । मैंने धीरे धीरे अनुशासन बनाना शुरू किया । मैंने अपने पुराने शिक्षकों से ही बच्चों को नियंत्रित करने की कला की सीख ली   , उनका गंभीर होना , आँखों से , बातों से मारना। वैसे भी मै पिछले 6 महीनों से बच्चों को पढ़ा रहा था , धीरे धीरे मै अपनी खुद की भी विशेषता बनाता जा रहा था । स्कूल में मैंने 1 सप्ताह बड़े प्यार से बच्चों को पढाया , समझा कर दुलार से , और मै वार्निंग भी देता जाता के मै आपका मित्र जरुर हूँ पर यदि बताये हुए समय के अन्दर कोई सुधरा नहीं तो ठीक नहीं होगा । स्कूल में बच्चे तो वही थे जिनका दिमाग पढाई में लगता ही नहीं था , एक से एक बिगड़े हुए केस ,  वजह वहां की ग्रामीण संस्कृति और 75% लोगों का अभी भी ये मानना के दो चार दिन स्कूल न जाके घर या खेत का काम उनसे करा लेंगे तो कुछ  बिगड़ेगा नहीं ।

मैं बच्चों को पीटने के बिलकुल भी हक़ में नहीं था , पर वहां का माहौल अब भी ऐसा था के घर वाले खुद जानते थे के अगर उन्हें सजा न दी गयी तो वो बिलकुल भी नहीं पढ़ पाएंगे इस लिए वहां के सरकारी और प्राइवेट शिक्षण संस्थाओं के ऑफिस में बजाप्ता 5-6 कट्ठे (एक प्रकार का पौधा जिसकी छड़ी लचीली और बहुत मजबूत होती थी ) की छड़ियाँ रखी होती थी । शिक्षक खुल के पीटते बच्चों को , और बिगड़े हुए केस रोज़ रोज़ की मार खा के , ढीट बन चुके थे । मुझे बच्चों के शरीर पर नहीं उनके दिमाग पर चोट करनी थी , ताके वो पढाई के महत्व को समझें और पढ़ें । मैंने  इसके लिए एक नुस्खा निकाला , सुबह प्रार्थना के बाद PT करवानी शुरू की , इसके बाद प्रतिदिन सभी बच्चों को वहीं  हममे से एक टीचर उन्हें , पढाई , अनुशासन और जीवन के मूल्यों के बारे में बताता , कहानी  इत्यादि सुनाता । मैंने शिक्षकों से अनुरोध किया के अभी कुछ दिन किसी बच्चे को पीटा न जाये । अगले चरण में मैंने संगीत , चित्रकला , चुटकुले , कहानी , अन्त्राक्ष्री और ऐसे ही पीरियड सप्ताह में तीन दिन शुरू कर दिए । हमने वहां हर शनिवार को आधा समय  साप्ताहिक टेस्ट और आधा समय गीत संगीत इत्यादि के लिए तय कर दिया ।लगभग 30 दिनों में हीं उन बच्चों में रूचि जगी जो पढना तो चाहते थे मगर उबाऊ शिक्षा पद्दति से पढने में रूचि खो चुके थे । अब बारी थी बिगड़े हुए केस का । कक्षा 4 से 6 के जितने बिगड़े हुए केस थे उनकी सूची बनाई , उनके परिवार के सदस्यों से मिला और घर में बच्चों को कैसे सहयोग करना है , इसका निवेदन किया । अब मेरे दुसरे रूप की बारी थी । मैंने हर क्लास में एक छोटा सा टास्क दिया ये कह के कल इसे अवश्य कर के लाना है । ये एक सुखद घटना थी के , प्रयोगों के कारण कई बिगड़े केस में सुधार था मगर कई ऐसे थे जैसे ढाक के तीन पात । मुझे याद है के करीब 12-13 ऐसे बिगड़े केस थे जिन्हें क्लास से बाहर मैंने निकला था और ग्राउंड में ले जा कर पहली बार डंडे से दंड का प्रयोग किया । उस दिन ऑफिस में रखे 3 के तीन डंडे टूट गए थे। पहले भी जब में विद्यालय आता और शोर होने पर एक बार चिल्लाता तो शोर शांत हो जाता था , लेकिन थोड़ी देर बाद पुनः शुरू हो जाता था, मगर इस पिटाई की घटना के बाद कई परिवर्तन हुए । एक तो ये के छुट्टी के बाद जब मै विद्यालय से घर की ओर जाता तो , रास्ते में जो भी बच्चा होता , देख के भाग खड़ा होता । सुबह स्कूल की बगल वाली सड़क पे मेरे आते ही पूरा विद्यालय शांत हो जाता , जब तक मै घूम के स्कूल के मुख्य द्वार पर आता , तब तक सब अनुशासित हो जाते ।

स्कूल की बदली हुई कार्य प्रणाली को देख कर अभिभावक बहुत ही खुश थे । सभी अपने बच्चों को मुझसे ही पढाना चाहते थे , पर मेरा ध्यान अभी बिगड़े हुए केस पर था । मैंने उन्हें विद्यालय के बाद  अतिरिक्त कक्षाएं देनी शुरू की । मै जान बुझ कर पढ़ाने के दौरान सबको हँसता, क्यूँ की फिर पिटाई खाने के बाद उन्हें दिल पे ये अहसास हो , क्यूँ की जब हँसाने वाला रुलाता है तो दुःख ज्यादा होता है, चाहे वो बच्चा  हो या बड़ा । इसी बीच मैंने 10 वीं के बच्चों का ट्यूशन शुरू कर दिया ।

अब मेरी दिनचर्या कुछ इस प्रकार हो गयी थी , सुबह 5:30 में जगना , 6:15 तक फ्रेश होना , 6:30 से 7:30 एक ट्यूशन लेना , 7:40 स्कूल , फिर 2-6 अलग अलग  जगहों पर ट्यूशन , और 7-9:30 10 वीं के बच्चों की क्लास । घर में पानी की व्यवस्था न होने के कारण बहुत परेशानी होती थी । सामने के मकान के बाहर हैंडपंप था , सुबह दो बाल्टी पानी वहां से भर के लाना और स्नान के बाद फिर पानी भर के रखना । रविवार के दिन कपडे धोने में ज्यादा परेशानी होती , क्यूँ की मै अपने निजी कार्य खुले में बाहर करने का आदि नहीं था , न ही किसी और से करवाने का । इसलिए उस दिन कई बाल्टी पानी बार बार ढो के लाना पड़ता । रात को अक्सर लाइट भी चली जाती , बच्चों को गैस के लैंप में पढाना होता । वैसे तो लगभग एक महीने मैंने नवाब सिंह के अनुरोध पर उनके यहाँ ही भोजन किया , और बीच बीच में पडोसी भी खाना दे जाते अगर कुछ अच्छा बनता तो , जैसे पूरी या आलू के पराठे, पर स्वभाव के कारण मैंने खुद से खाना बनाने की ठानी , मै खाने को ही लेकर सही , किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता था । अगले ही दिन मै दादरी गया,वहां से खाने के कुछ बर्तन और जरुरी सामान लेकर आया । मैंने पहले ही जिक्र किया था के मै चीजों को देख कर सीखता था , घर में माँ को खाना बनाते देख के मैंने खुद अब खाना बनाने की सोंची। पहली चीज़ जो मैंने बनाई थी वो थी सोया भेज बिरियानी । इसके बाद से मेरी दिनचर्या में एक चीज़ और शामिल हो गयी , खाना बनाना ।

धीरे धीरे मै सबसे पहले अपने आस पड़ोस , स्कूल के बच्चों और धीरे धीरे पूरे गाँव का चहेता बन गया , चूँकि मै सभी बड़े बूढों का सम्मान करता इसलिए मुझे भी सम्मान मिलता, और सबसे बड़ी बात ये थी के मै  उनकी भाषा अच्छी  तरह बोलने लगा था , कोई भी ये नहीं जान पाता  के मै  बिहार से हूँ  । चाहे जो भी हो ब्राम्हण होने का सम्मान मैंने वहां जितना पाया उतना कही भी नहीं । मै जाति  वादी नहीं हूँ , पर उनमे कुछ ऐसा था जो मेरे लिए सम्मानिये था । धीरे धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी स्कूल में । मुझे रिश्ते भी मिले , नवाब सिंह जैसा भाई , भाभी और मेरे सामने के मकान में रहने वाली बीबी (वहां माँ को इसी नाम से संबोधित करते थे ) वो बिलकुल मेरा ऐसा ख्याल रखती जैसे की माँ ।

वहां के बारे में पहले ही कह चूका हूँ के वहां सुन्दरता हर जगह कूट कूट के भरी थी , और पहले की कुछ घटनाओं के कारण लोग वहां परदेशियों खास कर के बिहारियों पर भरोसा नहीं करते थे , ये और बात है के मेरे जैसा बिहारी अभी तक उन्हें वहां नहीं मिला था जिसने गाँव के सबसे बड़े दुकानदार से आते ही पैंटीन शैम्पू , हेयर जेल , सव्लोन साबुन जैसे ब्रांडेड उत्पादों की मांग की थी , जो उसके पास उपलब्ध नहीं थी  वो ग्रेजुएट था , और योग इत्यादि करता था , उससे भी मेरी अच्छी मित्रता हो गयी । वहां की सुबह बहुत सुहानी लगती , मेरा स्वास्थ्य भी अच्छा होता गया ।

वहां के समुदाय में एकता की कमी तो नहीं थी , पर गाँव में एक ही जाति में भी कई समुदाय थे , सब के विभिन्न नाम भी थे । ये नाम उस गाँव में बसने वाले समयानुसार थे , जो पहले आये वो अगेड़े बाद में आये पछोले , कुछ अन्य विधि से भी नाम थे । सभी समुदायों के  नवयुवकों से मेरी अच्छी जान पहचान हो चुकी थी , अक्सर शाम को "हवेली" में उनका आना होता , हंसी मजाक भी होता , बातों का आदान प्रदान भी । ताश का एक खेल जिसे "सीप" बोलते थे वो भी खेला जाता था । मेरे से व्यक्तिगत रूप से भी लोग बात करते , एक दुसरे के बारे में भी पर कभी ऐसी नौबत नहीं आई थी के मेरे द्वारा बात इधर से उधर होती ।

इतना व्यस्त होने  के बावजूद मै हनुमान मंदिर जाने का और आरती में शामिल होना का कोई भी मौका नहीं गंवाता था। न तो मेरे पास कंप्यूटर था न  टीवी इसलिए जब भी  खाली समय मिलता कुछ न कुछ आध्यात्मिक  पढता या सीखने की कोशिश करता । आज जो भी आध्यात्मिक , या व्यक्तिगत ज्ञान मेरे अन्दर है वो इसी समय की बदौलत है। आज मै सोंचता हूँ के उस वक़्त मै 16 घंटे काम करता था , पर फिर भी खुद के लिए समय था , आज उतना काम तो नहीं पर खुद के लिए वक़्त निकलना बड़ा मुश्किल है बावजूद इसके के आधा काम तो  अब टेबल पर बैठे बैठे हो जाता है । पड़ोस में एक गाँव था जो क्षत्रियों का था , वहां के एक बुजुर्ग रामायण के प्रेमी थे , और हर महीने 5-6 रामायणों का आयोजन कराते थे , वो अक्सर हनुमान मंदिर आया करते थे हम 5-6 लोगों का एक ग्रुप बन चुका था जो रामायण पाठ करने आस पास के गाँव में भी जाते । मेरे अन्दर रामायण प्रेम बढ़ता ही जा रहा था और मै  एक भी मौका रामायण का मै छोड़ता नहीं था , अक्सर मेरा समय रात 8 के बाद का होता था जो की सुबह के 4-5 बजे तक चलता था , बीच बीच में अक्सर चाय वगैरह का लघु विराम होता । ये समय ऐसा समय होता के कई बार खुद आयोजन करने वाले भी सो जाते थे , चूँकि रामायण अखंड होती थी इसलिए वो खंडित न हो इसकी पूरी जिम्मेवारी हम तीन चार लोगों पर ही होती । मैंने अपने पूरे प्रवास के दौरान लगभग 100 रामायण से भी ज्यादा में हिस्सा लिया होगा ।

मुझे अक्सर लोग हवेली के बारे में डराने की कोशिश करते , पर जब कुछ बड़े बुजुर्गों ने भी ऐसा कुछ वहां होने की बात कही थी तो मैंने इसका अलग ही निदान निकल लिया था ।मेरे अन्दर इतना भरोसा हो गया था ईश्वर  पर के मुझे बिलकुल भी डर नहीं लगता था । यद्यपि वहां भूत  प्रेतों के हमले और ऐसी कई कहानियां अक्सर सुनने को  मिलती थी , तथापि मैंने कभी भी कुछ सामने से अभी तक नहीं देखा था , हाँ ये जरुर मानता  था के भूत  और आत्माओं का अस्तित्व इश्वर और मानव की तरह है । मैंने अपने बाकि के दोनों कमरों में से एक पूरी तरह भूतों के नाम कर रखा था ,उसका दरवाजा  हमेशा बंद करके रखता था । उसमे यदा कदा ही सफाई होती , न उसमे कभी धुप दीप जलाता ।

घरवालों से फ़ोन पर हर तीसरे चौथे दिन बात होती , हर 10 दिनों पर चिट्ठियों का आदान प्रदान होता। मुझे अपनी बहन अपर्णा पर भरोसा था के वो पढ़ाई में ज्यादा नाम करेगी , इसलिए उसकी जो भी जरूरतें होती मै पूरी करने की कोशिश करता था । वो पढाई में अच्छा कर रही थी । मै तो अब ऐसी स्थिति में फंस चुका था के मै फ़िलहाल अपनी पढाई पूरी नहीं कर सकता था । अभी मेरे दिमाग में केवल दो चीजें थी , यहाँ रहकर यहाँ के बच्चों का विकास , खुद के ज्ञान का विकास और बहनों की पढाई ।

विद्यालय बहुत अच्छा चल रहा था । मैंने विज्ञानं पढ़ाने  के दौरान अधिक से अधिक प्रयोगों को , जो संभव हो सकते थे वहां बच्चों को दिखाया ,खास करके बायोलॉजी के , पेड़ पौधों सम्बंधित । बिगड़े केस भी सुधार पर थे । महीने में एक बार डंडा चलाना पड़ता जो अगले एक महीने के लिए प्रयाप्त होता । मेरी ज्यादातर  क्लास 4थी सी ऊपर की ही थी , पर छोटी क्लास के नन्हें बच्चों के बीच भी मै  अक्सर बैठता उन्हें हँसाना , उनके साथ हँसना  मुझे बहुत ही अच्छा लगता था । नन्हें बच्चे मुझे बहुत चाहते थे ।

इसी बीच 4 सितम्बर आ गया , जिस दिन मेरा जन्मदिन था । बहुत कम ही लोगों को इसके बारे में पता था । मैंने उस दिन कुछ विशेष नहीं सोंच रखा था , विद्यालय में भी कोई विशेष बधाई नहीं मिली , मै  घर के बारे में सोंच रहा था जहाँ अब तक हर जन्म दिन पर केक आता था , और नए कपडे मिलते । सुबह मैंने माँ और बाबा को फ़ोन करके उनका आशीर्वाद ले लिया था । स्कूल के ख़त्म होते ही , पड़ोस का युवक जिसके घर के  नल से मै  पानी भर के लाता था , स्कूटर ले कर आ गया और मुझे दादरी चलने को कहा । मैंने भी सोचा के चलो थोडा घूम  ही लिया जाये । पर रास्ते  में पता चला के उसे पता चल गया है के आज मेरा जन्मदिन है और हम पार्टी करने जा रहे थे। हम दादरी से भी  दूर निकले , क्यूंकि शिक्षक होने की कुछ मर्यादा थी , बहुत दिनों बाद मैंने बियर पिया और फिल्म देखि , शायद वो मेला या बागी थी । हमें वापस घर आते आते 8 बज गये थे , गाँव में बिजली नहीं थी , जैसे ही हम स्कूटर से मोहल्ले में घुसे , दो छोटे बच्चे "गुरु जी आ गये " बोल के मेरे घर के अन्दर भागे। मै अपने घर के दरवाजे को खोला , मगर वो अन्दर से बंद था , मै  कुछ समझा नहीं मैंने दस्तक दी और जैसे ही दरवाजा खुला सामने जो देखा वो अविस्मर्णीय था । लगभग 30-40 नन्हें बच्चे अन्दर थे अहाते में , मेरे दरवाजा खोलते हीं  उन्होंने चिल्ला कर "हैप्पी बर्थ डे टू यू " दो तीन बार कहा और बारी बारी  से मेरा चरण स्पर्श करने लगे । मै  चकित था , अन्दर कई मोमबतियां जल रही थीं , एक बड़ा तिरपाल बिछा था जिसपे वो सारे बच्चे बैठे थे । सामने एक स्टूल रखा था , जिसपर मिल्क केक (खोये की बनी मिठाई ) एक प्लेट में रखी थी , बिलकुल ऐसे जैसे केक रखा जाता है , उसमे कैंडल्स भी लगे थे । मै  सारी  चीजें देख कर भावुक हो गया , आँखों में ख़ुशी के आंसू  थे , मेरी बाँहों में जितने भी बच्चे समां सकते थे , सब को एक साथ पकड़ कर ऑंखें बंद करके मुस्कुरा रहा था , और आँखों से लगातार आंसू  बह रहे थे । मै  उठा, पहले केक काटा  और बच्चों के लिए चॉकलेट मंगवाई और सब में बाँटा , फिर उनके साथ बैठ कर हंसी मजाक में समय बिताया  । बातों  के दौरान पता चला के ये सारा कुछ बच्चों ने अपने पैसों से किया था , और लगभग एक घंटे से मेरे इंतज़ार में बैठे थे । उनके विदा होने के बाद मै अपने कमरे में पहुंचा ईश्वर  के समक्ष पहुँच कर उनका बहुत बहुत धन्यवाद् किया , ये घटना मेरे लिए ऐसी है जो मै  कभी भूल नहीं सकता ।


अक्टूबर के महीने में एक और विचित्र घटना हुई , मै रात में सोया हुआ था तभी मुझे एक पायल जैसी आवाज ने मुझे चौकाया , मैंने घड़ी देखी  रात के करीब 1:30 हो रहे थे । वहां की ज्यादा तर  महिलाएं पायल पहनती थी , मगर रात के 1:30 बज रहे थे और ये आवाज भी पास से आती  महसूस हो रही थी । मै बाहर  निकला , पर जैसे ही दरवाजे की कुण्डी नीचे गिराई आवाज बंद । पर मै  हाथ में एक छोटा गंगा जल से भरा बर्तन ले कर चारों  तरफ देखा , छत पर गया पर कुछ भी नहीं मिला । मै  पुनः अपने कमरे में आया , थोड़ी देर बाद लाइट चली  गयी , माहौल और भी भयावह हो गया और पुनः वो आवाज बिलकुल ऐसी लगी जैसे मेरे दरवाजे के ठीक बाहर से आ  रही हो । मेरे अपनी रीढ़ की हड्डी में कुछ दिमाग की तरफ चलता सा महसूस हुआ , शायद ये डर  था। रात भर मै  परेशां रहा , मेरी नीद पूरी नहीं हुई थी और सुबह मै  बहुत गुस्से में था । अगले दिन सुबह सुबह हनुमान मंदिर पहुंचा , वहां से गंगा जल और उनपे चढ़े हुए कुछ फूल उठा कर लाया , सीधा अपने घर पहुंचा और उस रूम में घुसा जिसे मैं बंद रखता था , मैंने हाथ में गंगा जल और फूल  लेकर तेज़ आवाज़ में कहा  " मै  यहाँ हमेशा के लिए रहने नहीं आया हूँ , और मैंने यदि यहाँ कोई है तो उनके लिए अलग से  कमरा दे रखा है , मैंने कभी भी उन्हें तंग करने की कोशिश नहीं की है , और यदि मुझे आगे से तंग करने की कोशिश की तो गंगा जल की कसम है , मै  तो जाऊंगा ही , पर तुम्हें सबक सीखा  के जाऊंगा " और ये कह कर मैंने गंगा जल छिड़कने को हाथ उठाया पर फिर कुछ सोंच कर शांत हो गया । इस घटना के बाद मुझे कभी भी कुछ महसूस नहीं हुआ पर मेरे कुछ रिश्तेदार , मेरे पिता जो बाद में यहाँ आये सब को महसूस हुआ जो आगे जिक्र में आयेगा ।



नवम्बर का महिना चल रहा था , अब मेरा ध्यान बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाने  के ऊपर था । मैंने तय किया के 26 जनवरी को मै  स्टेज शो करूँगा बच्चों का , क्यूँ की विद्यालय में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था । मै अब इसकी तय्यारी में जुट गया ।




 


सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

Manzilen

नवम्बर 1998 के सर्दियों के दिन थे , मुझे जैसा बताया था मेरे भाई ने , मुझे पहले नॉएडा जाना था ,और वहां से दादरी नामक जगह की बस पकडनी थी | वहां से 9  km "जुनपत " नाम का गाँव था , मुझे वहीँ पहुंचना था | मुझे नॉएडा की बस लेने के लिए दो बार बस बदलना पड़ी , तब जा कर नॉएडा की बस मिली | उस साल अच्छी ठण्ड थी , मौसम सुहाना था , खिड़की की सीट पर बैठे मैं बाहर के नज़ारे को देख रहा था | जैसे जैसे मैं दिल्ली से बाहर निकल रहा था , एक नई दुनियाँ दिखाई दे रही थी , कुछ अच्छा सा खुला खुला सा , चौड़ी सड़कें और दूर दूर तक खाली ज़मीन | कुछ लोगों की आपसी बात चीत से पता चला के , नॉएडा एक कांसेप्ट है , जहाँ बड़े बड़े बिज़नस घरानों को आमंत्रित किया जा रहा है , और एक नया शहर बसाया जा रहा है | वैसे नॉएडा के बारे में मुझे , कुरिअर लाइन से हीं पता था , देख आज रहा था | खिड़की से आते ठन्डे हवा के झोंके मेरे चेहरे  से टकरा रहे थे , मगर मैं जिन विचारों में खोया हुआ था , उसे तोड़ नहीं पा रहे थे | मेरे लिए सबसे बड़ा सवाल अब ये था के , इतनी मेहनत और संघर्ष के बाद भी , मेरे पास कोई ऐसी नौकरी नहीं के मैं , चुप चाप अपना  काम दिल लगा के कर सकूँ | उधर घर के हालत फिर से बिगड़ रहे थे , क्यूँ की , केवल पिता जी की कमाई से घर का खर्च चलाना मुश्किल था | इधर मेरे आने के बाद जब पिता जी से बात हुई तो पता चला के , वो बहुत मानसिक तनाव घर में झेल रहे हैं | छोटी बहन की अब नवी कक्षा की परीक्षा थी , उसके लिए भी पैसे चाहिए थे | सब चल रहा था दिमाग में मगर , फिलहाल मैंने ये तय किया था के , सबसे पहले मैं दो तीन दिन आराम करूँगा अपने दिमाग के रील को खाली करूँगा , फिर एक नई शुरुआत करूँगा | मैं करीब 11 बजे नॉएडा पहुंचा , सेक्टर 37 ....मुझे भूख लगी थी | मैंने पता किया अभी लगभग २ घंटे का सफर बाकि था | मैंने वहीँ घूमते हुए नॉएडा के मार्केट , आस पास के इलाके का  जाएजा लिया | दिल्ली से अलग माहौल था , भाषा भी कुछ अजीब सी थी, बहुत सी बातें तो ऊपर से निकल रही थी| अभी वहां बहुत सारी चीजें बन रही थीं , नॉएडा भी पूरी तरह अभी विकसित नहीं था , construction  बहुत तेज़ी से चल रहा था वहां का | मैंने वहां कुछ देर बिताया और , फिर दादरी की बस पकड़ ली | दादरी जाने वाली बस में मुझे पारंपरिक वेश भूषा में कुछ पुरुष और महिलाएं दिखीं| मेरे समझ में धीरे धीरे आ रहा था के मैं किसी ऐसी जगह जा रहा हूँ , जो पारंपरिक रूप से अलग है , जो मैंने अब तक देखा न हो | नॉएडा से दादरी जैसे जैसे बढ़ता जा रहा था , वैसे वैसे हवा की खुशबु बदल रही थी , एक अजब सा सकून मिल रहा था | लग रहा था जैसे कुछ खुला खुला सा अच्छा सा माहौल बन रहा है | मुझे पता नही चला के मुझे कब नींद आ गयी , अक्सर मैं बस या ट्रेन में सोता नहीं हूँ मगर , रात भर जगे रहने के कारण नींद आ गयी | करीब 1 - 1 .5 घंटे बाद मेरी नींद खुली | पहला झटका तब लगा जब घड़ी देखी के लगभग 1 . 5  घंटे सो चुका था ,,दूसरा तब जब ये देखा के बस खचा खच भरी चुकी थी , और तीसरा जब मैंने खिड़की से बाहर का नज़ारा देखा | बाहर का नज़ारा देख कर मुझे कृषि दर्शन के चौपाल की याद आ गयी , वो ही वेश भूषा ,वैसे ही घर , वैसे ही घरों के आगे रखे हुए बड़े बड़े हुक्के | सब नया नया सा लगा , जब मैंने भैसे को गाड़ी से बंधा देखा तो हंसी आ गयी , क्यूँ की ये नज़ारा मैंने पहली बार देखा था | हमारे यहाँ ये काम बैलों से लिया जाता है | वहां की महिलाओं का दुपट्टा ओढने का तरीका भी थोडा अजीब लगा ,दुपट्टा उनके मुंह को ढके हुए था , शरीर को नहीं | सब कुछ नया नया सा था , अच्छा लगा ,मुझे नई चीजें जानने समझने की हमेशा से इच्छा रही है , नई जगहों को देखने की | यही सब देखते देखते मैं दादरी पहुँच गया | एक व्यस्त बाज़ार था वो , साधारण सा , मगर बहुत हीं व्यस्त , चारों तरफ शोर शराबा था ऐसा लग रहा था जैसे मैं राजस्थान के किसी क़स्बे में पहुँच गया हूँ | मैंने थोड़ी देर पहले इधर उधर घुमा , और फिर वहां "जुनपत " के बारे में पूछा , पर वहां कोई जुनपत के बारे में बता नहीं पाया | मैंने दुबारा फ़ोन करने का फैसला किया , फ़ोन लगाने के बाद किसी महिला ने फ़ोन उठाया , उनकी भाषा कुछ अजीब सी थी | मैंने अपना परिचय दिया , और कहा के मैं दादरी पहुँच चूका हूँ , जवाब आया के कोई "रेहड़ा" या " बुग्गी " पकड़ के आ जाओ | मैंने कहा के मैं समझा नहीं , "रेहड़ा" "बुग्गी " ये क्या है ?? वो मुझे बस इतना बता पायीं के वहां से कुछ न कुछ जरुर मिल जायेगा | मैंने वहां करीब 15-20 मिनट इधर उधर पता किया , फिर एक बुजुर्ग ने इशारा एक भैंसे गाड़ी के तरफ इशारा कर के कहा के , " ये बुग्गी जावेगी , घंटे भर में , याही में बैठ ले " मैंने देखा के उसपर पहले से ही बहुत सारा बोझ था और लोग भी ज्यादा थे , एक घंटा बैठना फिर एक भैसा गाड़ी पर , पता नहीं कब तक पहुंचा पायेगी वहां तक | मैंने मन में एक फैसला लिया , मैंने एक अन्य बुजुर्ग से जुनपत जाने का रास्ता पूछा , और दूरी ...फिर मैं चल दिया वहां से जुनपत की ओर 9 km  की यात्रा पर , पैदल | मेरे कंधे पर एक बैग था , हाथ में एक ब्रीफ केस और चेहरे पे एक मुस्कान | मेरी वेश भूषा , बाल रखने का तरीका , कुछ अलग था वहां के बहुत सारे लोगों के मुकाबले , कई लोगों से मेरी नज़रें चार हुई | रास्ते में मैंने दो चीजें सीखीं , एक "ताऊ" बोलना और एक "राम राम " जो अभिवादन का एक तरीका था | मैं मुख्य सड़क तक आ चुका था , 4  km  का रास्ता तय करके , अभी 5 km  का रास्ता जो मुख्य सड़क से कटता था , वो तय करना था | मैंने वहां नल से पानी पिया, वहां का पानी बहुत हीं अच्छा था  , और एक बुजुर्ग को "राम राम " करके जुनपत गाँव के बारे में पता किया , ताके मैं निश्चिन्त हो जाऊं के मैं सही रास्ते पर जा रहा हूँ | मुख्य सड़क से सटा हुआ गाँव "तिलपता" था | गाँव संपन्न लग रहा था , बहुत सारे लोगों के घरों के आगे ट्रेक्टर खड़े थे , हर दरवाजे पर 4 - 5 भैंस बंधी थी | वहां मुझे गाय एक भी नहीं दिखी , थोडा आश्चर्य हुआ | हर घर के आगे , कई कई चारपाई लगी थी और बड़े बुजुर्ग ,हुक्के का आनंद ले रहे थे | धीरे धीरे तिलपता पीछे छूट गया , आगे का नज़ारा बड़ा विहंगम था , जहाँ तक नज़र जाती वही तक खेत ही खेत थे | सड़क सीधी थी , कोई नही था दूर दूर तक  केवल हरियाली की चादर दोनों तरफ बिखरी हुई थी| मुझे ये देख कर अच्छा लग रहा था , क्यूँ की हमारे गाँव ऐसे नहीं होते , सड़कों के किनारे , खेतों के किनारे , इतने सारे पेड़ होते हैं के ,,कभी कभी गाँव के नजदीक आने के बाद भी पता नही चलत के आगे गाँव भी है | पर यहाँ तो कुछ शीशम , और बबूल जैसे काटें दार झाड़ियों के अलावा कुछ नहीं था | मगर खेतों को देख कर तो मेरा मन झूम रहा था , मुझे कोई थकावट नहीं हो रही थी , और मैं सिटी बजाता, गाना गाता चलता जा रहा था | कहीं कहीं महिलाएं काम करती दिखाई दे रही थीं और , जैसे हीं मैं नजदीक से गुजरता वो दुपट्टे से अपना मुंह ढँक लेती , मैं हँसता मन ही मन | करीब 4-5 km. चलने के बाद मैं एक गाँव के नजदीक पहुंचा , मुझे लगा था मैंने रास्ता तय कर लिया है , मैंने राम राम करके एक ताऊ से पूछा के , क्या ये जुनपत है ?? उन्होंने कहा के नहीं , अभी दो km और है , और मुझसे पूछा , "कहाँ  सू आ रो है ? " मैं समझ गया वो क्या जानना चाहते हैं , मैंने कहा के दादरी से , उन्होंने मुझे डांट लगते हुए कहा के , "काहि ट्रक्टर पे लटक लेतो " हाहाहा मन ही मन हंसी आई ,,,लटक लेता , मैं राम राम करता हुआ निकल गया वहां से | करीब एक km चलने के बाद ,दूर से एक मंदिर दिखाई दिया , और उसके बाद गाँव , मुझे समझ आ गया के यही है , जुनपत | मैं तेज़ क़दमों के साथ चल पड़ा , मंदिर से थोड़े पहले , मैंने कुछ औरतों को मेरी तरफ इशारा करके बात करते हुए देखा | मेरी वेश भूषा तो परदेशियों की तरह थी हीं, बड़े बड़े बाल , आँखों पे चश्मा , हाथ में ब्रीफकेस ,और कंधे पर बैग , शायद कोई टिप्पणी की हो | मुझे बाद में पता चला कुछ दिनों बाद जब उनमे से एक महिला से बात हुई के उन्होंने उस दिन कहा था , "यु आ रओ है कोई माँ का लाला "। मैं मंदिर के पास पहुंचा , वो करीब 12-15 बीघे का चारदीवारी से घिरा हुआ एक आम का बागीचा था | एक कोने में मंदिर और दूसरे छोर पर स्कूल था | मैं अन्दर पहुंचा, वहां बच्चों का शोर था , मुझे मेरा भाई वहीँ दिख गया , उसने मेरा स्वागत किया | मैं थक गया था , उसने मुझे एक क्लास में बैठा दिया ,और चाय की व्यवस्था करने चला गया | वो सेवेंथ क्लास थी , बहुत सारे बच्चे थे | मैंने एक बच्चे की कॉपी उठाई और और नाम देखा , नाम लिखा था "रीता भाटी" मैंने सोंचा के इसने गलत नाम लिखा है शायद , भाटिया होना चाहिए | मैंने विद्यार्थी से पूछा के ये नाम तो गलत है , लेकिन विद्यार्थी ने बताया के नहीं ये सही है , यहाँ ज्यादातर लोगों का टाइटिल यही है ,भाटी | वहीँ से पता चला के , ये इलाका गुर्जरों का है | इतिहास में मैंने गुर्जरों के बारे में पढ़ा था , मगर मिला पहली बार था | गुर्जरों का इतिहास काफी पुराना था , और संस्कृति भिन्न मुझे अच्छा लगा एक नई संस्कृति में आने का, उसे करीब से देखने का मौका मिल रहा था ।       मैं स्कूल के टाइम तक वहीँ रहा , बच्चों से बातें की , मुझे वहां पढाई का स्तर बहुत ही निम्न लगा | बच्चे , कक्षा के हिसाब से पढाई और ज्ञान में पिछड़े हुए थे ।शाम को भाई के साथ , मैं गाँव की तरफ चला , ये हमारे तरफ के गाँव से उन्नत गाँव था , मगर आबादी में और रकबे में काफी छोटा था | वहां की संस्कृति , पहनावा , भाषा सब बिलकुल अलग थी | सबसे पहले हम वहां पहुंचे जहाँ मेरा भाई रहता था , वो जिनके यहाँ रहता था , वो वहीँ के हनुमान मंदिर में पुजारी थे और पंडित जी का कार्य किया करते थे | वो जगह कुछ ऐसी बनी थी के चार कमरों का एक मकान बना था , बड़ा सा आंगन ,और उससे सटे हनुमान जी का मंदिर | पंडित जी भी बिहार से ही थे और , लगभग 10 सालों से वहां रह रहे थे | शुरुआती परिचय के बाद मैं , हनुमान मंदिर पहुँचा , मंदिर छोटा नहीं था , काफी जगह थी | मैं जैसे ही अन्दर पहुंचा ,दिमाग को एक झटका सा लगा ,लगा जैसे यहाँ मैं पहले भी आ चुका हूँ | सभी चीजें जानी पहचानी सी लग रही थी , मैं थोड़ी देर वहां घूमता रहा , और फिर एक जगह बैठ कर ऑंखें बंद करके याद करने की कोशिश करने लगा | कुछ याद तो नहीं आया मगर सुकून जरुर मिला | थोड़ी देर बाद , शाम को मैं और मेरा भाई , स्कूल के मालिक के वहां गये | नवाब सिंह भाटी नाम था उनका करीब 36-37 साल के हँसमुख व्यक्ति थे | उन्होंने अच्छे से स्वागत किया मेरा | ब्राह्मणों के प्रति वहां बहुत सम्मान बचा था । उन्होंने मुझे खाट पर सिराहने का स्थान दिया , मैं समझा नहीं के ऐसा क्यूँ ? बाद में समझ आया के वो ब्रह्मण , चाहे वो बच्चा क्यूँ न हो सम्मान देने के लिए उसे सिराहना देते थे ।वहां मैंने सरसों के साग के साथ साथ गरमा गरम रोटी खाई | बहुत हीं स्वाद आया खाने में , सरसों का साग हमारे यहाँ भी बनता है ,मगर वहां की बात कुछ अलग थी |हम थोड़े समय बाद वापस आ गये , अच्छा अनुभव रहा |

वहां के खाने पीने के तरीके में दूध से बनी चीजों की प्राथमिकता दिखी , जैसे दूध , दही और छाछ | वहां की भाषा थोड़े अलग तरीके की थी , हिंदी के शब्द केवल 50 %  थे , और बाकि की वहां की स्थानीय । इसलिए अच्छे ढंग से मैं उनकी बातें समझ नहीं पाया । टोन में भी काफी अंतर था ।वहां का प्रमुख व्यवसाय दूध का था , हर घर में चार पाँच भैस थी , और बड़े लोग जैसे नवाब सिंह के यहाँ तो 20 - 25 भैंस । दूसरा व्यवसाय वहां खेती थी, नौकरी करने वाले गिने चुने ही लोग थे । खेती वहां अच्छे तरीके से होती , क्यूँ की वहां सिचाई की अच्छी व्यवस्था कम मूल्य पर उपलब्ध थी , दरअसल ये पूरा इलाका उजाड़ था , बड़े बुजुर्गों ने मेहनत कर के , कई सालों में यहाँ की जमीन को उपजाऊ बनाया था ।वहां पुरुषों का पहनावा , साधारण पैंट शर्ट थी , जींस पहने युवा कुछ हीं दिखे , बुजुर्ग धोती , कुर्ता और गाँधी टोपी पहनते , हाथ में ज्यादा तर के लाठी होती , वजह थी , वहां मिलने वाले अधिकतर सांप विषैले थे , कोबरा और करैत बहुत थे वहां , महिलाओं की पोषक मेरे लिए ज्यादा नई थी , नवयुवतियां सूट पहनती और गाँव की वधुएँ सूट के साथ साथ दुपट्टा भी रखती , जिनसे उनका केवल मुंह ढका होता, बुजुर्ग महिलाएं घाघरा , सूट और दुपट्टा पहनती । बुजुर्ग महिलाओं में ज्यादा तर के पैरों , हाथों और बाँहों पर चाँदी के मोटे मोटे कड़े होते , और कमर में चाँदी की कमरबंद । कई महिलाएं वहां ऐसी मिली जिनके शरीर पर कम से कम १ किलो चाँदी के आभूषण हों |

अगले दिन सुबह करीब 4.5 बजे पंडित जी का जागना हुआ , और साथ साथ मेरा भी । वहां की सुबह उपेक्षा कृत ज्यादा ठंडी थी । वहां नित्य क्रिया के लिए खेतों में जाना था , ये भी थोडा अलग सा अनुभव था । मैंने जब सुबह गाँव का चक्कर लगाया तो महसूस हुआ के ,वहां नीम के पेड़ों की बहुतायत थी । इसलिए वहां का वातावरण शुद्ध था । काफी अच्छा महसूस हो रहा था । वहां के लोग हृष्ट पुष्ट और सुन्दर थे । मैं स्नान कर के काफी दिनों बाद , मंदिर में पूजा करने गया , जो मंदिर जहाँ मैं रहता था , उससे बिलकुल सटा हुआ था । ध्यान भी मैंने वही किया , मुझे असीम शांति मिली , और एक अजीब सा चुम्बकीय अहसास जो मुझे बार बार याद दिलाता के मैं इस प्रांगन में पहले भी आ चुका हूँ । पूजा के बाद मैं स्कूल गया यूहीं घुमने को , वहां मुझे प्रिंसिपल साहब से बातचीत करने का मौका मिला । उन्होंने मुझे क्लास लेने को बोला । क्लास में इस तरह आने का यह पहला अनुभव था , मुझे अपने स्कूल की वो बात याद आई जब मुझे फिसिक्स के शिक्षक ने मुझे बेवजह दो डंडी लगाई थी , और मैंने रोते हुए मन में ये सोंचा था के काश मैं भी एक शिक्षक होता , आज वो बात भी सच हो रही थी । मैंने बच्चों की पढाई के स्तर को देखा । इंग्लिश , मैथ और साइंस के मामले में बच्चे काफी पीछे थे । बाद में मैंने जब इस बाबत प्रिंसिपल साहब से बात की तो ज्ञात हुआ के , 5th क्लास के बाद बच्चों को पढ़ने के लिए वहां शिक्षकों का अभाव है । जो शिक्षक बाहर से आये वो , गाँव की अलग तरीके के रहन सहन को झेल नहीं पाए और जल्द ही वापस हो गये । स्थानीय लोगों का यह हाल था , के एक बार में पुरे गाँव में से किसी ने दसवीं पास नहीं की थी । एक मात्र फर्स्ट क्लास से पास हुए व्यक्ति ने करीब 15 सालों पहले दसवीं की थी । शिक्षा के प्रति जागरूक और समर्थ व्यक्ति , बच्चों को पढने बाहर भेजते । शिक्षा का माहौल वहां अच्छा नहीं था । शिक्षक गाँव में गलत सलत पढ़ा देते , देखने वाला कोई भी नहीं था । खैर मैं , शाम को वापस अपने रहने के स्थान पर , पंडित जी के यहाँ आ गया ।

पंडित जी का पूरा परिवार वहां की भाषा से पूर्ण रूप से अवगत हो चुका था । वहां की संस्कृति को अपना चुका था । मेरा रोज़ पूजा और ध्यान मंदिर में सुबह सुबह करना और शाम को आरती भजन , इससे काफी कुछ मेरा दिमाग संतुलित हो चुका था । मुझे वहां आये हुए तीन चार दिन हो चुके थे । अब मैंने निश्चय किया के किसी के यहाँ यूहीं ज्यादा दिन रुकना ठीक नहीं है , मैंने घर वापस जाने का निश्चय किया और इस बाबत मैंने अपने भाई से बात की । मैंने दो दिन बाद घर जाने का प्रोग्राम बनाया , पर किस्मत को तो कुछ और हीं मंजूर था । अगले दिन मैं यूहीं शाम को टहलता टहलता स्कूल की तरफ गया  जहाँ मेरा भाई, दसवीं के बच्चों को गणित पढ़ा रहा था , लगभग चार छात्र थे वहां । मैं वैसे हीं वहां बैठ गया और देखने लगा । मेरा भाई अलजेब्रा के किसी सवाल पर अटक गया था और उसे सोल्व नहीं कर पा रहा था । उसने अचानक हीं मेरी तरफ किताब देते हुए कहा के , भाई इस सवाल को सोल्व करो , मेरा तो दिमाग ख़राब हो गया है । मुझे थोडा संकोच हुआ , यद्यपि गणित पर मेरी अच्छी पकड़ थी , तथापि मुझे कई साल हो चुके थे और वो भी दसवी कक्षा का सवाल । मगर मैंने कोशिश की , और बोर्ड पर सवाल को बनाने की कोशिश करने लगा , मैंने सवाल को सोल्व कर दिया और फिर छात्रों को समझाया । उन्होंने फिर मेरे से एक दो और सवाल समझे , बाद में उन्होंने मेरा पूरा परिचय लिया और , अपना भी दिया । मैंने इस बात को इतनी गंभीरता से नहीं लिया । अगले दिन सुबह मुझे पंडित जी ने जगाया और बताया के कुछ बालक मुझसे  मिलना चाहते हैं । मुझे आश्चर्य हुआ , मैं बाहर निकला तो देखा के वहां 8 छात्र खड़े हैं , पूछने पर पता चला के वो सब मेरे से गणित पढने आये हैं । मैंने हँसते  हुए कहा के मैंने कभी पढाया नहीं है , और मैं दो दिनों बाद वापस भी जाने वाला हूँ । उन्होंने आग्रह किया के मैं जब तक यहाँ हूँ , उन्हें पढाऊ । मैं मान गया और सुबह लगभग मैंने दो ढाई घंटे उन्हें गणित के सवाल समझाए ।उन्होंने जाते वक़्त कहा के , आपके समझाने का तरीका अच्छा है, और आप यही रुक जाओ , जब तक हमारी परीक्षा नहीं होती । मैंने समझाया के नहीं मैं रुक नहीं सकता , क्यूंकि मुझे अपने परिवार को देखना है । उनकी इस प्रतिक्रिया की वजह ये थी , वहां के छात्रों में कैचिंग पॉवर कम थी , और वो परम्परागत तरीके से अगर नहीं समझ पाते तो मैं अलग तरीके से समझाता , तरीके बदलता रहता जब तक सवाल उनके समझ में नहीं आ जाये । रात को जाने के विषय पर पंडित जी से और अपने भाई से बात की , मैं जाने को तैयार था ।

मैंने घर पर फ़ोन से बातें की , वहां की स्थिति बिगडती जा रही थी । घर में पैसे का आना रुक सा गया था , मुझे भी लगभग २ महीने हो चुके थे, घर से बाहर । बहनों की पढाई , किताब इत्यादि का खर्च था । पापा से बात करने से पता चला के वो , काफी कमजोर हो चुके हैं और घर में टेंशन में जीते हैं । मैंने बात करने के बाद , मंदिर आके थोडा ध्यान किया , मेरा उस मंदिर से लगाव बढ़ता जा रहा था । जब भी उस मंदिर में आता कोई विशेष शक्ति मुझे अपनी ओर खीचती जिसका अहसास मुझे होता था । मैं वहां जाने के बाद काफी सुकून महसूस करता । यहाँ की प्रकृति में काफी कुछ अच्छा था , शहर से दूर बिलकुल शांत वातावरण और मंदिर की तो बात हीं कुछ अलग थी । वहां रहकर मैंने मंत्र रहस्य , योग इत्यादि की किताबों को घंटों पढ़ा । मैं वहां योग भी करता, कुछ आसन भी । 7 दिनों में हीं मुझे अपने अन्दर स्फूर्ति का संचार सा होता हुआ महसूस हुआ ।

अगले दिन जब मैं सो कर उठा तो हैरान रह गया , छात्रों की संख्या 12 हो चुकी थी । छात्रों ने पढने के बाद मुझसे कहा के शाम को कुछ और बच्चे भी आएंगे , सभी मुझे एडवांस में फीस देने को तैयार थे , मैंने शाम को आने का कह दिया । अब मेरा दिमाग इस विषय पर गंभीरता से सोंच रहा था , ये की यहाँ खाने का कोई खर्च नहीं , न ही रहने का ,जो भी पैसे मिलेंगे घर पर ही भेजना है । एक और बात दिमाग में आयी के अचानक घर जाने के बाद कोई नौकरी भी नहीं मिलेगी , न हीं मैंने अपने मित्र को जो पैसे दे रखें है वो ही , फिर क्यूँ न कुछ दिन यहाँ रह कर पैसे कमायें जाएँ और फिर जाया जाये , वैसे भी केवल तीन महीने की बात थी । मैंने दिन में ही इस बाबत पंडित जी से बात की , उन्होंने मुझे बताया के यहाँ तो वैसे ही कमी है पढ़ने वालों की, कई जानने वाले हैं उनके और मुझे तो फुर्सत भी नहीं मिलने वाली इतने टयूशन मिलेंगे यहाँ पर ।यही बात मुझे मेरे भाई ने भी कही । मैंने हिसाब लगाया , अपनी सारी परिस्थितियों पर गौर किया , प्रकृति प्रेम तो था हीं , मैंने वहीँ अगले तीन महीने गुजरने का निश्चय किया । शाम को छात्रों की संख्या सच में बढ़ गयी और करीब 15 छात्र हो गये ,प्रत्येक से  मुझे 300 रु. मिले , लगभग 10 छात्रों ने पैसे दे दिए । शाम को ही पंडित जी ने एक घर में मुझे ले जा कर वहां के बच्चों को पढ़ाने का काम भी दिलवा दिया , वहां से मुझे 800 रु. मिलने थे महीने के । अगले दिन मैंने कुछ पैसे घर भेज दिए और घर पर इस बाबत जानकारी दे दी के मैं कुछ महीने यहीं रहूँगा।

अगले दिन से , मेरी दिनचर्या यह थी के , सुबह उठाना , मंदिर में पूजा पाठ करना , फिर बच्चों को पढाना। अभी तक मैंने पूरा गाँव देखा नहीं था , न हीं लोगों से कोई खास जान पहचान की थी । मगर अब चूँकि मुझे वहीँ रहना था कुछ दिनों तक मैंने धीरे धीरे लोगों को जानने और जान पहचान बनाने की शुरुआत कर दी थी । मेरी अब एक और समस्या थी , मैं पंडित जी के यहाँ रहता और खाता था , बदले में मैं कुछ नहीं करता था उनके लिए , ये मुझे गवारा नहीं था । मैंने इस बाबत अपने भाई से बात की , मुझे कोई किराये का कमरा दिलवा दे , सुन कर हैरानी हुई के यहाँ किराये पर कमरा नहीं मिलता..जरुरत हीं नहीं पड़ीं कभी किसी को, हाँ कोई ख़ाली घर देख कर वो मेरे रहने का इंतजाम कर देगा तब तक मैं वहीँ रहूँ । मगर मैं बिना काम काज के वहां ऐसे किसी के ऊपर बोझ बन कर रहना नहीं चाहता था । मैंने रात में पंडित जी से बात की , और ये बताया के मैं उनके काम में सहायता करूँगा , और बदले में मैं यहाँ रहूँगा ।

अगले दिन सुबह उठ कर पुरे मंदिर को साफ करने में पंडित जी की मदद की , लगभग एक घंटे का काम था ये  , जीवन में मैंने कभी भी हैंडपंप से इतना पानी नहीं भरा था , बाजू भर गये थे पहले दिन । अगला काम था , भैसों को नहाना , पंडित जी के पास चार भैंस थी उस वक़्त ,जीवन में कभी भी इससे पहले इतनी सारी भैसों के साथ मेरा पाला नहीं पड़ा था । ननिहाल में एक गाय हुआ करती थी , मगर मैं केवल उसके बछड़े के साथ हीं खेला था , मगर यहाँ तो मामला कुछ और हीं था । खैर , कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना था हीं , और मेरे लिए ये सब नया सा अनुभव था ,मैं उनके साथ लग गया  , फिर से हैंडपंप चलाना पड़ा ढेर सारा , और मैंने ध्यान से देखा के पंडित जी कैसे नहला रहे हैं भैसों को ,कल से मुझे ये सब करना था । इसके बाद बारी थी , चारा काट कर लाने की , जो की भैसा गाड़ी " बुग्गी " पर लानी थी , मैं पंडित जी के साथ चल पड़ा , साथ में मैंने अपनी नोट बुक और कुछ सवाल ले लिए , ताकि मैं वहां बैठ कर सोल्व कर सकूँ । दरअसल मैं कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को पहले खुद किसी आसान तरीके से बनाता फिर सब को समझाता । मैं खेतों में जा कर , पेड़ के नीचे बैठ कर अपने सवाल बनाने लगा और पंडित जी , चारा काटने लगे ,लगभग एक घंटे लगे उन्हें , हमने गाड़ी में चारा लोड करा और वापस आ गये । इतना सब करने में मुझे 11 बज गये थे । मैं टाइम देख रहा था , कल से मुझे यही सब करना था अपने हिसाब से । खैर , ये सब नया सा अनुभव था , थक गया था बुरी तरह से , नहा धो के पूजा वगैरह से फारिग हो कर छात्रों का इंतजार करने लगा । मेरे drawing का शौक फिर से जगा था , वहां की प्रकृति ही कुछ ऐसी थी । मैं अपने काम में लग गया । वहां के लिए मैं एक परदेसी , और नए तरीके का व्यक्तित्व था , इसलिए बहुत सी नज़रें मेरा पीछा करती , मगर मेरी नज़र केवल सामने की तरफ रहती, यदि किसी के साथ लग जाये तो तब तक नहीं हटती थी जब तक सामने वाला खुद न नज़र झुकाए। मैं तस्वीर बनाने में व्यस्त था , तभी पड़ोस की दो लड़कियां वहां पंडित जी की पत्नी से मिलने आई , मगर उनका मकसद मेरे से बात करना था। उन्होंने मेरे से राम राम की , बदले में मैंने भी , और उनकी तरफ ध्यान दिए बिना अपने काम में लग गया । उन्होंने पंडित जी की पत्नी से कुछ देर बातें की और चली गयी , बाद में मुझे पता चला के वो मेरे बारे में छान बीन करके गयी हैं । मुझे बताते वक़्त पंडितानी बहुत हँस रही थी , मेरी समझ में ज्यादा कुछ नहीं आया उस वक़्त । थोड़ी देर में मेरे छात्र आ गये और मैं उनके साथ व्यस्त हो गया । शाम में जिस घर में मुझे टयूशन देना था , वहां पहुंचा , बच्चों को पढ़ाने के दौरान हीं मुझे दो टयूशन वहां और मिल गये । शाम को मैं स्कूल की तरफ गया जहाँ मेरा भाई शिव मंदिर में सुबह शाम पूजा अर्चना किया करता था । वहां मैंने दिन की घटना उसे बताई , उसने मुझे संभल कर रहने को बोला । मैंने उसे विस्तार से बताने को कहा , उसने मुझे समझाया के यहाँ की संस्कृति बहुत अलग तरीके की है । यहाँ लड़कियां किसी भी बाहरी आदमी से बात करने में हिचकिचाती नहीं हैं , और अगर बात कुछ आगे बढ़ जाये तो भी समस्या नहीं है । पर यदि ये समाज में जरा सा भी फैला तो , अंजाम बहुत ही बुरा होता है । यहाँ के लोग मिलन सार तो हैं मगर , बाहरी आदमी के लिए ,खास कर बिहार के लोगों के लिए इनके दिमाग में एक अलग तरीके की छवि बनी हुई है । उसने मुझे पहले की कुछ डरावनी घटनाये बताई , और यहाँ के लोगों के सजा देने के तरीके , क्रूरता इत्यादि के बारे में बताया । हम ने शाम को वहां आरती की , और मैं वापस अपने हनुमान मंदिर पहुंचा,शाम को वहां भी आरती की ।

अगले दिन से मेरी दिनचर्या सुबह 5:00 बजे से शुरू होती , मंदिर की सफाई , भैसों को नहलाना , और फिर चारे की व्यवस्था करना मेरा रोज़ का काम बन गया । मैं कभी भी किसी काम से हिचकिचाता नहीं था , और काम को एक नया अनुभव जो , मेरा शगल था , सोंच कर करता । मेरे handwritting , पढ़ाने के तरीके इत्यादि , गाँव में तेज़ी से फैलने लगे और 7 दिनों के अन्दर हीं मेरे पास पूरा कोटा फुल हो गया , आखिरी टयूशन मैं 7 बजे शाम की लेता । वहां के विद्यार्थी , टीचर को गुरु जी बोलते थे , और मेरे कई नामों के साथ एक नाम और जुड़ गया "गुरु जी " । मुझे नित नए लोग मिलते और मेरी बातें होती उनसे , चूँकि मेरी भाषा, टोन इत्यादि वहां रह रहे और बिहार के लोगों से अलग था , इसलिए मुझे ज्यादा तवज्जो मिली वहां पर । धीरे धीरे मैं वहां की संस्कृति में घुलता जा रहा था । वहां गाँव या सड़क , भीड़ या तन्हाई , मेरी नज़र सदा सामने की ओर रहती , शायद मेरी नज़रों में कोई खोट नहीं था , मैं किसी की तरफ देखता हीं नहीं जब तक मुझे कोई आवाज न लगाये । इस वजह से वहां के लोगों , महिलाओं और लड़कियों के बीच मेरी एक अलग पहचान थी । वो इलाका , केवल शिक्षा के मामले में ही नहीं , और कई मामलों में पिछड़ा हुआ था । जैसे की अंधविश्वास , रूढ़ीवाद , अध्यात्म के बारे में अधूरी जानकारी , नयी तकनीक के बारे में कुछ सीमित लोगों को जानकारी । वहां पुरे गाँव में कम ही ऐसे लोग थे , जो रोज़ स्नान करें , हर मौसम में । खाने में सब्जी इत्यादि का प्रयोग कम ही होता था, मसाले इत्यादि तो बिलकुल न के बराबर , सब्जी होती तो दाल नहीं, खाने में विभिन्नता नही थी । स्वाद भी अलग था , मगर मैंने अपने को ढालना शुरू किया वहां ।

मंदिर में सुबह शाम समय देने लगा था , बचे समय में मैं ध्यान भी करता , एक दिन सोते हुए मुझे कुछ स्वप्न आया और मैंने अपने आप को वहीँ मंदिर में पाया , कुछ प्रेरणा भी मिली ,शायद ये मेरे पहले दिमाग में घूम रही कोई बात थी , मगर ये स्वप्न अगले दिन भी मेरे जेहन में था । वो दिन मंगलवार का था , मैंने उसी दिन से वर्त रखना शुरू कर दिया , मुझे तुलसी की वो बात याद आयी के , किसी भी कार्य में दक्ष होने से पहले उसका पहले ढोंग करना जरुरी है , वो मैं बहुत दिनों से कर रहा था अब शायद मेरे अन्दर अध्यात्म जाग चुका था । मुझे प्रतिदिन नए नए अनुभव होते ,मसलन एक बुजुर्गवार ने मुझसे घूरते हुए कर्नल और लेफ्टिनेंट की स्पेल्लिंग पूछी , वो आधे किमी. से यही पूछने आये थे , सही जवाब देखने के बाद बड़े खुश हुए और अगले दिन से पोते को पढ़ाने को बोल के गये । एक विद्यार्थी पहुंचा और मेरे से बोला के हाइड्रोजन और ओक्सिजन के संयोग से मैं उसे पानी बना के दिखाऊ , मैंने उसे बैठने को कहा और सामान की पूरी लिस्ट , जिसमे बीकर, स्टोव, परखनली इत्यादि शामिल थे दे दिया और कहा के ये सामान ले आना ..मैं पानी बना दूंगा । वहां शिक्षकों के ग्रुप थे , एक ग्रुप सरकारी विद्यालय का था , जिसके कुछ टीचर बड़े प्रभाव वाले थे , दूसरा ग्रुप उस प्राइवेट स्कूल का था जिसमे हमारे भाई साहब पढ़ाते थे , तीसरा ग्रुप उनका था जो गाँव से बाहर कसबे में , या शहरों में पढ़ाने जाते । तीनो ग्रुप आपस में दिमागी लड़ाई लड़ते , हमेशा एक दुसरे को नीचा दिखने की कोशिश करते और एक दुसरे की चुगली गाँव में करते । इन सब के बीच , एक और चीज़ आयी थी , मैं , मुझे तीनो को झेलना होता । बुजुर्ग शिक्षकों का मैं सम्मान करता चाहे वो किसी ग्रुप का हो , तमीज़ से जवाब देता , समझाता के एक दुसरे की बुरे करते रहने से सब का ही नुकसान है । मुझे वहां के शिक्षकों की कमजोरी पता थी, जिसे इंग्लिश की थोड़ी जानकारी होती , मैथ में जीरो होता , मैथ अच्छा होता तो , इंग्लिश में कमजोर , जो बहस करता , उसे वैसा ही फल देता । मैं वहां चर्चित होता जा रहा था  । आस पास के गाँव से भी छात्र पढने आ रहे थे । इसी दौरान मैं शिव ज्योति पब्लिक स्कूल के मालिक के यहाँ एक दिन भोजन पर आमंत्रित हुआ , उन्होंने मुझे अगले सत्र से उनके विद्यालय में पढ़ाने का आमंत्रण दिया और सुनिश्चित किया के यहाँ किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी । इस बाबत अगले दिन वहां के वर्तमान प्राचार्य से भी मेरी बात हुई , उन्होंने ने मुझे बताया के ये उनका भी सोंचना था । मैंने उन्हें अनमने ढंग से आश्वाशन दे दिया । यहाँ का जीवन कदापि सरल न था, अपनी एक अलग पहचान बनानी बहुत मुश्किल का काम था, यहाँ की दिनचर्या भी मुझसे मेल नहीं खाती थी , न ही यहाँ का रहन सहन और यहाँ के बाहरी लोगों के प्रति विचार । इधर एक और समस्या गहराती जा रही थी , पंडित जी की हर आज्ञा का पालन मैं ये समझ कर करता के , मैं यहाँ रहता और खाता हूँ , बदले में मुझे इनकी मदद करनी है , मगर अब ये ऐसा होता जा रहा था जैसे मैं उनका दास बन गया हूँ । पहले तो उन्होंने शुरुआत चारा कटवाने से की , मुझे शारीरिक मेहनत तो लगी मगर कष्ट नहीं हुआ , मगर उनकी "बुग्गी " जब ख़राब हो गयी तो मुझे सर पर भी चारा ढोना पड़ा । सुबह शाम रात , हर वक़्त उनकी जुबान पर मेरा हीं नाम रहता । मैं फिर भी परेशान नहीं हुआ , मुझे अपना समय काटना था ।वहां साधनों का आभाव था , वहां रह कर कोई भी नई चीज़ नहीं सीखी जा सकती थी क्यूंकि वहां के कस्बे "दादरी" में भी किसी तकनीकि कोर्स को पढ़ाने की सुविधा नहीं थी ।मुझे अपना पसंदीदा साबुन , शैम्पू एवं अन्य प्रसाधन वहां नहीं मिलते थे , इसके लिए मुझे 9 किमी. दूर दादरी जाना पड़ता । इसलिए मेरा यही मानना था के मुझे यहाँ से मार्च तक वापस लौट जाना है । इसी दौरान हनुमान जयंती का पर्व आया । हनुमान जयंती वहां बड़ी धूम धाम से मनाया जाती  , अखंड रामायण का पाठ होता था , मंदिर की सजावट होती , भजन कीर्तन होता और भंडारा होता । इसबार मेरा होना वहां के पहले की व्यवस्था से अलग होना था । सजावट के मामले में मैं पहले से ही दक्ष था , सो पुरे मंदिर की सजावट भव्य रूप से की । मथुरा से संतों और भजन गायकों की एक पूरी मंडली वहां पहुंची । उसके देख भाल , सेवा की जिम्मेवारी मुझे सौंपी गयी , लगभग आठ लोगों का गुट था । पहली बार किसी संत महात्मा के इतने करीब से जानने का मुझे मौका मिला । जान कर आश्चर्य हुआ के , दिखने में गाँव के भोले भले लोग , बड़े ही ज्ञानी पुरुष थे ,  विज्ञान और अध्यात्म का नापा तुला संयोग था उनमे । मैं घंटों उनके साथ सत्संग करता , कर्म , ज्ञान , विज्ञान , अध्यात्म के बारे में जान कर अपनी ज्ञान पिपासा शांत करता । क्या है मनुष्य के आने का प्रयोजन , जन्म लेने का प्रयोजन , किस प्रकार पूरा होता है ये , ऐसे ही बहुत सारे सवालों पर मेरी उनसे चर्चा हुई । उनसे मैंने कुछ मंत्र , उनके स्वर , और कुछ योग भी सिखा । अगले दिन 4 बजे सुबह से रामायण का पाठ होना था , जो तीन दिनों तक अखंड चलना था , मैंने उनके पाँव दबा दबाये , शरीर दबाया और उनका आशीर्वाद लेकर सोने चला गया , इतनी दूरी पर मैंने अपनी खाट लगाई के वो मुझे पुकारें तो मैं सुन सकूँ । कुछ बातों का उल्लेख करना मैं यहाँ उचित समझता हूँ के , बचपन से ही, शरीर के मालिश की कला मुझे आती थी , जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ , ये और अच्छा होता गया । अक्सर मैं पिता जी, मामा जी, भाई इत्यादि के शरीर की थकावट अपनी मालिश से मिटाता । मेरी नींद भी बहुत पतली थी , खाना भी मैं हमेशा भूख से कुछ कम ही लेता , मीठा, लाल मिर्च और खट्टा जैसे अचार वगैरह  बिलकुल नहीं खाता था । नमक भी मैं सीमित मात्रा में लेता था , और पानी खाना खाने के एक घंटे बाद लेता था ,  जो अभी तक वैसे हीं जारी है । कुछ ऐसे लक्षण थे मुझमें जो मुझे औरों से अलग करते थे ।

अगले दिन रामायण का पाठ शुरू हुआ , बाहर से आये संतों ने शुरुआत की , उनके रामायण पढने का ढंग कुछ ऐसा था जो मैं पहली बार देख रहा था , बहुत ही अच्छा लग रहा था । कुछ देर बाद मेरी बारी भी आई ,  मैंने जीवन में पहली बार , इस तरह से रामायण पढ़ी , ढोलक , मंजीरे और समूह के साथ । उस का असर कुछ इस तरह मेरे पर हुआ के , पहली बार में ही लगभग 2  घंटे का पाठ किया । अब तो जैसे रामायण मुझे अपनी तरफ खिचती थी । जैसे ही और काम से निपटता रामायण पढने बैठ जाता , उन तीन दिनों में मैंने कई घंटे रामायण पढ़ी । मेरे अध्यात्म जीवन के लिए वो पूरा सप्ताह ही मील का पत्थर साबित हो रहा था । मेरी उत्कंठा , जिज्ञासा सब को एक अलग ऊंचाई तक पहुंचा दिया था , और एक नई बात हुई थी , रामायण से मेरा लगाव । हालांके तुलसी दस जी ने रामचरित मानस में कुछ नए पात्रों को जोड़ा था , मूल वाल्मीकि रामायण से अलग , इसलिए मैं इतना ज्यादा इसे पसंद नहीं करता था। मगर पढने के बाद , और इसके कई शिक्षाप्रद दोहों और चौपाइयों ने मेरे ऊपर बहुत हीं सकारात्मक प्रभाव डाला । बहुत अच्छे तरीके से संपन्न हुआ सब कुछ , भंडारे में दूर दूर से लोग आये और मेरा परिचय सब से हुआ । संतों का साथ मिला , सत्संग भी मिला और ज्ञान भी, साथ में ढेर सारा उनका आशीर्वाद ।

Feb 1999 ख़त्म होने को थी  , मुझे घर से निकले हुए करीब 5 महीने हो चुके थे । इतने दिनों घर से बाहर कभी नहीं रहा था , बहुत याद आती थी सब की । लम्बी बातें चिट्ठियों से ही भेज पाता था , फ़ोन में पैसा बहुत लगता और व्यक्तिगत बातें भी नहीं हो पाती थी । एक बार मुझे स्मिता (मेरी पहली शिष्या ) ने एक लेटर भेजा जब वो उस वक़्त वो फिफ्थ में थी , पूरा लेटर इंग्लिश में था , उस लेटर को देखने वहां आस पास के कई लोग आये । मुझे अपने पर फक्र महसूस हुआ के मैंने उसे पढाया था , उसका नामांकन एक नामी ईसाई स्कूल में हो गया था , इसी बाबत उसने मुझे ये पत्र लिखा था । दसवीं की परीक्षा शुरू ही होने वाली थी , मैं छात्रों को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के ज्यादा से ज्यादा समय देता था। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की , परीक्षा शुरू हो गयी , मेरे द्वारा बताये गये , 75 % वही प्रश्न आये , मैं बहुत खुश था , उम्मीद थी के अच्छा रिजल्ट आयेगा । सब कुछ संपन्न करा कर अब मैं अपने घर जाने को बेचैन था , सबसे मिलने को । मार्च के समय होली से पहले मैं वापस घर जाने को तैयार था , वहां के ग्रामीणों ने , छात्रों ने सब ने मुझे दुबारा आने को कहा , और मैं वापस ख़ुशी और उत्सुकता से घर जाने को वहां से रवाना हो गया ।